कविता शुक्रवार: कुमार अम्बुज की नई कविताएँ

पाठकों का अभिनन्दन
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जैसा कि अमूमन होता है कि किसी प्रस्तुति-विशेष की शुरुआत करते हुए लक्ष्य, उद्देश्य या दावों के साथ (महत्वपूर्ण भी बताते हुए) कदम बढ़ाया जाता है। संयोग से ‘कविता शुक्रवार’ के साथ ऐसा कुछ भी नहीं है। शुद्धता यह कविता का मंच है। कविता के श्रेष्ठ या निम्न होने का मापदंड भी पाठकों, और उससे कहीं अधिक कवियों की खेमेबंदी के पास ही रहे, तो शायद अधिक उचित होगा।
हिंदी में जितने तरह के वाद, मठ या स्कूल हैं, यह मंच उन सबके लिए है। मालवी में एक शब्द है ‘ओटला’। यह घर के बाहर बैठने की एक जगह होती है। जिस पर फुरसत में शाम को उस गली-मोहल्ले में रहने वाले विपरीत सोच वाले व्यक्ति (जिसमें मजे लेने वाले अधिक ही होते) बैठकर गपियाते थे। और अपनी तार्किक-अतार्किक दलीलों से मजे-मजे में वाकयुद्ध करते रहते थे। यह भी कुछ-कुछ ऐसा ही ओटला है, जिस पर परस्पर सम्वाद-कटुता की जगह केवल कविताओं को ही स्थान मिल पाएगा।
कविता शुक्रवार’की पहली प्रस्तुति में कुमार अम्बुजकी तीन नई कविताएं दी जा रही हैं, जो उन्होंने इसी वर्ष जनवरी में लिखी हैं। उनकी विचारधारा का झुकाव किधर है, यह सभी जानते हैं। वे अभी भी मार्क्सवाद के अध्ययन में रुचि रखते हैं और लेखन के लिए वामपंथी नजरिये को जरूरी समझते हैं। उनके प्रकाशित कविता संग्रह ‘किवाड़’, ‘क्रूरता’, ‘अनंतिम’, ‘अतिक्रमण’ और ‘अमीरी रेखा’ हैं। एक कहानी संग्रह ‘इच्छाएँ’, एक डायरी संकलन ‘थलचर’ और एक निबंध संग्रह ‘मनुष्य का अवकाश’ है। उन्हें भारत भूषण अग्रवाल पुरस्कार, श्रीकांत वर्मा सम्मान, वागीश्वरी पुरस्कार, माखनलाल चतुर्वेदी पुरस्कार और गिरिजाकुमार माथुर सम्मान मिला है। वे अपने स्वभाव के संकोच को सोचने-लिखने में ध्वस्त करते रहते हैं। आइए, पढ़ते हैं कुमार अम्बुज की नई कविताएं।
राकेश श्रीमाल
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1
धरती का विलाप
 
(फासिज्म मुर्दाबाद)
 
दुख उठाने के लिए स्त्रियाँ ही बची रह जाती हैं
मानो उनका जीवनचक्र हैः सुख देना, दुख सहना
और नये दुखों की प्रतीक्षा करना
पार्श्व में संगीत गूँजता है विलाप की तरह
एकॉर्डियन और गिटार अपना काम करते हैं
बंदूकें अपना
 
 
विस्थापन की मुसीबत में नदी भी एक दिन
आदमियों, गलियों और पेड़ों को घेर लेती है
मगर बाढ़ में घिरी एक अकेली स्त्री
किसी दूसरी जमीन पर जाने से इनकार कर देती है
डूबते घर के सेहन में टूटी कुर्सी पर बैठकर
निष्कंप देखती है गूँगा हाहाकार और मृत्यु
जैसे वह जानती है कि नौकाएँ भी दुखों को
इस पार से महज उस पार ही लेकर जा सकती हैं
 
 
एक उम्रदराज़ घर प्रलय के बीच में खड़ा होकर
अपनी खिड़कियों से परदे हटाकर झाँकता है
लोगों की परछाइयाँ नदी की अतिशयोक्ति में झिलमिलाती हैं
वह देखता है घर से बाहर कदम रखते ही हर जगह
हर आदमी शरणार्थी हो जाता है
खेल के मैदान में सूखते रहते हैं कपड़े
ओस, नमी, आँसू और खून उन्हें पूरी तरह सूखने नहीं देते
रंगशालाएँ और सभागार बदल जाते हैं शरणस्थलियों में
ईर्ष्या, नफरत और क्रूरता अंतिम वक्त तक पीछा करती है
सारे पात्र अभिनय करने की कोशिश कर रहे हैं
केवल घटनाएँ हैं जो बिना अभिनय के घट रही हैं
 
 
अचानक पति का साथ छूटता है तो याद आता है बेटा बचा है
जब बेटा छूटता है तो याद आता है पति पहले ही छूट चुका है
नृशंसता के युग में हर आकांक्षा, हर जगह बरबाद हो जाती है
घरों के भीतर गृहस्थी का टूटा-फूटा सामान भी नहीं दिखता
रात में सैक्सोफोन की आवाज बारिश को स्तब्ध करती है
और औंधे मुँह गिरकर कीचड़ में सन जाती है
गिटार से वायलिन की जुगलबंदी हवा में है
लेकिन हवा में तैरती उमस
हर संगीत को विफल कर देती है
 
 
आदमी तकलीफें झेलता चला जाता है अपनी छाती पर
और बैठे-बैठे ही या धीरे से लुढ़कते हुए अकस्मात
सूचित करता हैः बस, बहुत हुआ
अब रंगमंच पर खाली कुर्सियों का सूनापन
उनकी आकांक्षा, उनका अवसाद आपके सामने है
वहीं आप संगीत की उदासी में थिरक सकते हैं
या लड़खड़ाकर गिर सकते हैं
हाथ में हाथ डालकर चलते रहने से भी
न अकेलापन खत्म हो पाता है, न निर्वासन, न भय
लैम्प की रोशनी का उजास गिरता है जीवित चेहरों पर
देख सकते हैं कि थकान और आतंक की स्याही अमर है
प्रिय चीजें अधूरे स्वेटर की तरह उधड़ती रहती हैं
सूखते सफेद चादरों पर बनते हैं उँगलियों के निशान
जैसे कोरे कैनवस पर हल्के हाथों से
लगाया जा रहा हो रक्तिम ब्रश
 
 
नेपथ्य में से रेलगाड़ी शोकाकुल सवारियाँ ढोकर लाती है
लाचारी का धुआँ पटकथा को काला कर देता है
नदी किनारे और भूरी जमीन पर बिखरी लाशें
करती हैं अपनों के रुदन का इंतजार
और अपनी उन कब्रों का जो उन्हें कभी नसीब नहीं होतीं
सुनसान पठारों पर भी गश्त जारी है जहाँ मरण का शोक
मिट्टी में मिलकर धूल-धूसरित हो गया है
 
 
दो प्रेमी, दो बच्चे, दो भाई चले जाते हैं अलग रास्तों पर
एक स्त्री की मृत्यु उन्हें कुछ देर के लिए इकट्ठा करती है
एक स्त्री अपने सन्निपात में
अपना दुख बताने की कोशिश में बार-बार होती है नाकाम
एक स्त्री उसे सांत्वना देते हुए अपने ही संताप में गिर पड़ती है
एक स्त्री का अनश्वर आर्तनाद उठता है
वही है अंत, वही है अनंत
वही बचा रहता है।
 
(थियो एंजेलोपोलस की फिल्म ‘द वीपिंग मीडो-2004’ के लिए आदरांजलि)
2
एक अधूरी कहानी
 
 
हम कौन हैं की तरह यह एक जटिल सवाल है
कि आखिर कहाँ है इनकी जमीन, कितना है इनका रकबा
क्या ये इस घर में, इस पेड़ के नीचे, इस नदी किनारे
इस तलहटी में जीवन भर रह सकते हैं
या तुम्हारे द्वारा खींच दिए घेरे के निशान से बाहर
ये एक कदम भी रख देंगे तो हो जाएँगे निर्वासित
 
 
जैसे वस्तुओं को, जानवरों को नहीं पता होता
वे कहाँ के लिए ले जाए जाते हैं
इन लोगों को भी नहीं पता वे किस सफर में हैं
उन्हें बस अंदेशा है, जिसमें नये अंदेशे जुड़ते जाते हैं
वे आशंका की सवारी में ही कर रहे हैं यात्रा
और जान चुके हैं कि जब तक सफर में हैं
बस, तब तक ही वे शरणार्थी नहीं हैं
 
 
यह समय भी हो गया है कुछ अजीब
इसमें शीत, धुएँ, धुंध, बादल के कई परदे हैं
मशक्कत के बाद कभी झीनी-सी धूप झाँकती हैं
तो इनकी परछाईं भी ठीक से नहीं बनती
जबकि कल तक इन सबका एक घर था
आग थी, पानी था, बिस्तर था,
इंतजार था, एक खुली जगह थी, आसमान था
फैली हुई बाहें थीं, उगते हुए पौधे थे और तारे
एक देह थी जिसमें छिप सकते थे
एक कोना था जहाँ सुबक सकते थे
 
 
इन्हें अंदाजा है जो पीछे छूट गए वे मारे जा चुके हैं
जो आगे जा रहे हैं मरने के लिए जा रहे हैं
जो अभी जिंदा हैं, खुश दिखते हैं या नाराज
इनमें बस एक समानता हैः
ये सभी मौत को पीछे छोड़कर आए हैं
और जानते हैं उनके लिए हर शब्द का,
हर चेष्टा, हर चीज का पर्यायवाची मृत्यु है
वे बताएँगे किस तरह हर चीज में से झाँकती है मृत्यु
पेड़ से, खिड़की से, टूटी दीवार से, अँधेरे से, रोटी से,
सहानुभूति से, कुर्सी और हथेली की ओट से
वे तर्जनी से दिखा देंगे हर जगह मृत्यु हैः
सड़क पर, आकाश में, हँसी में, तुम्हारी आँखों में,
चाय की केतली में, कचहरी में, इस किताब में,
इन कपड़ों में, पाताल में, इस सवाल में
सब जगह मृत्यु है और हमलावर है
जिससे भी कहा जाता है तुम जिंदा रहोगे
सुबह उसकी ही लाश सबसे पहले मिलती है
 
 
ये लोग जिंदा होकर भी इकट्ठा नहीं होते
एक-एक करके मरते चले जाते हैं
यही पुरातन कहानी है जो हर बार नयी हो जाती है
 
 
विस्थापन और अनिश्चितता ने इन्हें पूरी तरह बदल दिया है
अब इनमें से इनका कुछ भी पुराना बरामद नहीं किया जा सकता
याददिलाही का कोई निशान नहीं बचा, माथे की चोट वैसी नहीं रही,
जो नये घाव हैं उनका कोई जिक्र पहचान पत्र में नहीं
तसवीर खींचों तो किसी दूसरे ही आदमी की तसवीर निकलती है
पसीने की गंध बदल गई है इतनी कि अंतरंग क्षणों में
इनका प्रिय इन्हें किसी और नाम से पुकारने लगता है
तब विश्वास हो जाता है कि अजनबीयत ही इनका हासिल है
 
 
अपनी जगह से उजड़े निष्कासित आदमी को
आप किसी भी नाम से पुकारें, वह चौंककर
इस तरह देखेगा जैसे वही उसका नाम रहा हो
और जब उससे कभी कोई दुलार से कहता है कि आओ,
यह मेरा घर है लेकिन इसे तुम अपना ही समझो
तो याद आता हैः हाँ, उसका तो अब कोई घर नहीं है
 
 
उसी वक्त बगल से ठसाठस भरी एक रेलगाड़ी गुजरती है
हर डिब्बे से उठती है रुदन की आवाज
मातम है कि कभी खत्म ही नहीं होता
रेल की सीटी और धड़-धड़ की आवाज भी
उसी मातम का हिस्सा हो जाती है
टूट चुके हैं आँसुओं के नियम
अवसाद एक नैतिक सूचना भी नहीं देता
और जुट जाता है भीतर की तलाशी में
उदासी अपने सूनेपन में सब देखती रहती है चुपचाप
कि लोहे और सोने पर जंग लग रहा है एक साथ
गुम हुई चीजें कहीं मिलती भी हैं तो पहचान में नहीं आतीं
आदमियों के बारे में यह बयान पहले ही दिया जा चुका है
 
 
अंत में वे बच्चों को
अपनी त्रासदियाँ किसी कहानी की तरह सुनाते हैं
और उसे अधूरा छोड़ देते हैं क्योंकि यह अधूरी ही है
वे कहते हैं- यह अब उस तरह पूरी होगी
जैसे मेरे बच्चो, हम चाहेंगे और तुम चाहोगे।
3
जब एक पोस्टर का जीवन
 
 
जिन चीजों के लिए हमें
एक मिनट का भी इंतजार नहीं करना चाहिए
उनके लिए हम एक साल, दस साल, बीस साल
न जाने कितने वर्षों तक इंतजार करते चले जाते हैं
जैसे प्रतीक्षा करना भी जीवन बिताने का कोई उपाय है
जब ऋतुओं के अंतराल में पतझर आता है
हम आदतन अगले मौसम का इंतजार करने लगते हैं
लेकिन देखते हैं हतप्रभ कि अरे, यह तो पलटकर
वापस आ गया है पतझर
 
 
सब कुछ नष्ट होते चले जाने के दृश्य
चारों तरफ चित्रावली की तरह दिखते हैं
मुड़कर देखने पर दूर तक कोई दिखाई नहीं देता
न किसी के साथ चलने की आवाज आती है
तो कुछ इच्छाएँ प्रकट होती हैं, कहती हैं हम अंतिम हैं
हमें एक पुराना नीला फूल खिलते हुए देखने दो
देर रात में उस लैम्पपोस्ट के नीचे से गुजरने दो
दोस्त के साथ बचपन के शहर में रात का चक्कर लगाओ
यह जानते हुए कि उस पौधे की प्रजाति खत्म हो चुकी है
लैम्पपोस्ट का कस्बा कब का डूब में आ गया
और दोस्त को गुजरे हुए बीत गया है एक जमाना
इच्छाओं से कहता हूँ: तुम अंतिम नहीं हो, असंभव हो
 
 
आगे चलते हुए वह एक अकेला बच्चा मिलता है
जो रास्ते में मरी एक चिड़िया को देखकर
इस तरह रोने बैठ जाता है
जैसे जिंदगी में पहली ही बार अनाथ हुआ हो
प्रतीक्षा भरी इस अनिश्चित दुनिया में
वह भोर के तारे को उगता हुआ देखता है
और उसे अस्त होते हुए भी
वह समझ लेता है कि यतीम होते चले जाने के
इस रास्ते से ही गुजरकर सबको निकलना है
 
 
सभ्यता की राह में फिर दिखती हैं वे दीवारें
जिन पर लगाये पोस्टर फाड़ दिए गए हैं
दरअसल, चलते-चलते हम आ गए हैं उस जगह
जहाँ एक पोस्टर तक का जीवन खतरे में है
और सबको अंदाजा हो जाता है
कि अब मनुष्यों का जीवन
और ज्यादा खतरे में पड़ चुका है।
 
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रेखांकन : चरण शर्मा
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ये तीनों रेखांकन वरिष्ठ चित्रकार चरण शर्मा के हैं। वे विषय-विशेष पर चित्रों की सीरीज बनाते हैं, जो अंतरराष्ट्रीय पटल पर भी पसन्द किए जाते रहे हैं। फिलहाल कोरोना के इस कालखंड को मुंबई के अपने स्टूडियो में शिद्दत से अनुभव कर अपनी स्केच बुक में उकेर रहे हैं।

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