सिल्विया प्लाथ की कविताएं

रश्मि भारद्वाज एक समर्थ कवयित्री ही नहीं हैं बहुत अच्छी अनुवादिका भी हैं. अभी हाल में उन्होंने सिल्विया प्लाथ की कविताओं के अनुवाद किये थे जो ‘कृति ओर’ नामक पत्रिका में प्रकाशित हुए थे. आज जानकी पुल पर- मॉडरेटर 
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एक पागल लड़की का प्रेम गीत : दर्द और अवसाद की कवियत्री- सिल्विया प्लाथ                    रश्मि भारद्वाज
अमेरिकी कवियत्री सिल्विया प्लाथ ( 1932-1963 ) की कविताओं में दर्द, संवेदना, अवसाद और स्त्री मन बहुत ही शिद्दत से अभिव्यक्त हुआ है। उनका जन्म 27 अक्टूबर 1932 को बोस्टन में हुआ था। उनकी प्रमुख कृतियाँ थीं- उपन्यास The Bell Jar (1963), और कविता संग्रह-The Colossus (1960), Ariel (1965). मृत्यु उपरांत प्रकाशित Collected Poems के लिए उन्हे 1982 के पुलित्तजर पुरस्कार से सम्मानित किया गया। मरणोपरांत यह पुरस्कार पाने वाली वह पहली साहित्यकार थीं।
 
पति टेड ह्यूज से प्रेम विवाह के बाद अलगाव की पीड़ा और जीवन की कठिन परिस्थितियों से तारतम्य नहीं बिठा पाने का नतीजा यह हुआ कि वह गहन अवसाद की शिकार हो गयी और मात्र 31 वर्ष की उम्र में अत्यंत ही यंत्रणादायक तरीके से मौत को गले लगाया। मौत, अंधकार, मृत्युतुल्य अवसाद, अतिशय यातना वाली स्थितियाँ सिल्विया की कविताओं में बार-बार आती हैं। उनके बिम्ब बहुत अमूर्त हैं और कविता अपने अर्थ के साथ एकदम से  संवाद नहीं करती बल्कि उन्हे गहनता से समझने के लिए गंभीर अध्ययन की आवश्यकता पड़ती है। लेकिन एक बार अर्थ तक पहुँच जाने के बाद भावनाओं और संवेदनाओं का एक ऐसा अद्भुत सागर प्रतीक्षारत होता है जिसकी अथाह जलराशि के विस्तार में जितना डूबा जाए, उतनी ही बार मानवता को समझ पाने की नवीन और सघन अंतदृष्टि प्राप्त होती है। अंतिम कविता Edge (कगार) आत्महत्या से कुछ दिनों पहले लिखी गयी उनकी आखिरी कविता थी जिसमें उन्होने शायद अपनी ही पूर्वाभासी मौत का बहुत भयंकर चित्र खींचा है, हालांकि उन्हें बच्चों से बहुत प्रेम था। उनके जन्म के बाद लिखी गयी कविताओं में उनकी यह प्रसन्नता परिलक्षित होती है। तभी तो खुले ओवन में अपना सर रखने से पहले सिल्विया ने किचेन के दरवाजे को अच्छी तरह सीलबंद किया था ताकि विषैली गैस  बगल के कमरे में सोये उनके दोनों बच्चों- 3 साल की फ्रिडा और 1 साल के निकोलस को कोई नुकसान नहीं पहुंचा सके।  पढ़िये उनकी कुछ कविताएँ-
आईना        
रुपहला और सटीक, मैं नहीं रखता कोई पूर्वाग्रह
जो कुछ भी देखता हूँ, समा लेता हूँ खुद में अविलंब 
हूबहू वैसा ही, प्रेम या नापसंदगी से अप्रभावित 
मैं क्रूर नहीं बस सच्चा हूँ
एक नन्हे से देवता की आँख जैसा चौकोर
मैं अक्सर निमग्न रहता हूँ ध्यान में अपने सामने वाली दीवार को देखकर    
यह गुलाबी और चितकबरा है, मैंने इसे इतने लंबे अरसे से देखा है                         
कि यह मुझे लगता है मेरे हृदय का ही एक अंश लेकिन झिलमिलाता हुआ 
चेहरे और अंधकार हमें करते रहते हैं विलग अक्सर

अब मैं हूँ एक झील, एक औरत झुकी हुई है मुझ पर
उसे तलाश है अपने अस्तित्व की मेरे विस्तार में
फिर वह उनकी तरफ देखती है जो कहते हैं उससे झूठ , चाँद और मोमबत्तियाँ
मैं देखता हूँ उसकी पीठ खुद की तरफ और पूरी ईमानदारी से करता हूँ उसे भी प्रतिबिम्बित
उसके आँसू और हाथों की अकुलाहट मुझे ईनाम की तरह मिलते हैं
मैं जरूरी हूँ उसके लिए, वह जाती है वापस बार –बार आने के लिए
हर सुबह अंधेरे के बाद देखता हूँ मैं उसका ही चेहरा
मुझमें खो दी हैं उसने एक युवती और मुझसे  ही एक बूढ़ी होती औरत बढ़ती है उसकी ओर दिन प्रतिदिन एक भयंकर मछ्ली की तरह
बांझ
गर्भाशय झंकृत करता है अपने बीज
चंद्रमा ने अपदस्थ कर लिया खुद को वृक्ष से और अब

उसके पास कहीं और जाने का स्थान नहीं

मेरी हथेली के परिदृश्य में कोई रेखाएँ नहीं
सभी राहें एकत्र हो तब्दील हो गयी हैं एक गिरह में
मैं हूँ वह गिरह

मैं हूँ गुलाब जो तुम प्राप्त करते हो
यह देह
यह गजदंत

अशुभ जैसे कि एक बच्चे की चित्कार
मकड़ी की तरह, मैं बुनती हूँ दर्पण
मेरी छवि के लिए ईमानदार

जो और कुछ नहीं बस उत्सर्जित करता है रक्त
इसे चखो, गाढ़ा लाल
और मेरे वन

मेरी शवयात्रा 
और यह पहाड़ी
और यह चमकती है शवों के चेहरे से
पागल लड़की का प्रेम गीत 

मैं बंद करती हूँ अपनी आँखें और मृत हो जाता है यह संसार 
मैं उठाती हूँ अपनी पलकें और सब लौट जाता है फिर एक बार 
( सोचती हूँ, तुम्हें गढ़ा हैं मैंने अपने जेहन में )

तारे होते हैं नृत्यरत आसमानी और लाल 
और अनियंत्रित अंधकार लेकर आता है रफ्तार   
मैं बंद करती हूँ अपनी आँखें और मृत हो जाता है यह संसार

देखा है यह स्वप्न कि सम्मोहित कर मुझे तुमने लिटाया है सेज पर 
और गीतों से कर मंत्रमुग्ध, चूमा है बेसुध
(सोचती हूँ, तुम्हें गढ़ा हैं मैंने अपने जेहन में)

आसमां से ईश्वर होता है निरस्त, बुझ जाती है आग नर्क की
फरिश्ते और शैतान, मिट जाता है सबका आकार
मैं बंद करती हूँ अपनी आँखें और मृत हो जाता है यह संसार

सोचती थी लौटोगे तुम कभी, जैसा कह कर गए थे 
लेकिन बढ़ती उम्र के साथ भूलती हूँ तुम्हारा नाम 

(सोचती हूँ, तुम्हें गढ़ा हैं मैंने अपने जेहन में)

इससे तो बेहतर था कि मैं चुनती पपीहे का प्यार 
जब आता बसंत तो वह मुझे फिर से लेता पुकार
मैं बंद करती हूँ अपनी आँखें और मृत हो जाता है यह संसार
( सोचती हूँ, तुम्हें गढ़ा हैं मैंने अपने जेहन में )

कगार
वह पूर्ण थी
उसके मृत शरीर
ने ओढ़ रखी है मुस्कान उपलब्धि की
उसके पहने गए चोगे के सिलवटों में
यूनानी होने का भ्रम झाँकता है
उसके नंगे पैर यह कहते लग रहे
कि हम बहुत दूर चल चुके, अब खत्म है यात्रा
मृत बच्चों के शरीर लिपटे हैं जैसे कि
कुंडली मारे एक सफ़ेद सांप
दूध से भरे नन्हें पात्रों पर
जो अब खाली है
औरत ने उन्हे फिर से अपनी देह में समेट लिया है
उन गुलाब की पंखुड़ियों की तरह
जो समेट लेता है खुद को सोते हुए बगीचे के साथ
जब फैली होती है रातरानी की तीक्ष्ण गंध
चाँद के पास दुख मनाने जैसा कुछ नहीं
वह ताकता है अपने हड्डियों के नकाब से
उसे आदत है ऐसी चीजों की
उसका अंधकार चीखता है
खींचता है  
अनुवाद- रश्मि भारद्वाज


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