मेरे एक दशक के अनुभव का हिमाचल

स्वतंत्र मिश्र एक गंभीर लेखक पत्रकार हैं और बड़े घुमंतू भी. उनके हिमालय यात्राओं के सफरनामे की पहली क़िस्त- मॉडरेटर 
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रीना और शब्द की छुट्टियां घर बैठे-बैठे ही एक-एक करके जाया हो रहीं थीं। अब कुछ ही दिन और बचे थे स्कूल के खुलने में सो दोनों मुझसे इस बात को लेकर नाराज भी हो रहे थे कि मैं उन्हें इस बार कहीं दिल्ली से बाहर घुमाने नहीं ले गया था। यह वाजिब भी था क्योंकि हम हर गर्मी की छुट्टियों में कहीं न कहीं जरूर घूमने जरूर जाते रहे हैं। यों तो हम कभी भी छुट्टियों और धन दोनों के योग मिलते ही कहीं घूमने को निकल ले सकते हैं पर ऐसा योग कम ही बनता है। खैर, रीना स्कूल में पढ़ाती है और शब्द पढ़ाई के लिए स्कूल जाते हैं इसलिए दोनों की छुट्टियां एक साथ शुरू और खत्म हो जाती हैं। इस बार मई का महीना बीत चुका था, जून का भी महीना भी आधा गुजर चुका था और हम कहीं नहीं जा सके थे। इसकी एक वजह तो यह भी थी कि मैं अपने भांजे की शादी में पूरे एक सप्ताह की छुट्टी खर्च कर आया था। खैर यह कार्यक्रम तो दो माह पहले से ही तय था। 

घूमने न जा पाने की जो बड़ी वजह बन रही थी वह यह कि शुक्रवार’ (पर्ल ग्रुप की साप्ताहिक पत्रिका जो अब पाक्षिक हो चुकी है) की माली हालत लगातार बिगड़ती चली जा रही थी। इसी क्रम में शुक्रवारके तात्कालिक संपादक विष्णु नागर ने भी इस्तीफा दे दिया। उनके रहते हुए ही हमारी पगार अनियतकालीन हो चुकी थी, पर उनके छोड़ते ही मानों सब ताश के पत्तों की तरह एक-एक करके बिखरने लगा था। पगार अब 15-20 दिन की बजाय दो-दो महीने देर हो चुकी थी। इस ग्रुप के प्रिंट मीडिया के कर्मचारी कुछ ज्यादा ही अनिश्चय के गिरफ्त में फंसे हुए मालूम पड़ रहे थे। इसी ग्रुप की हिंदी-अंग्रेजी पत्रिका मनी मंत्रअब बंद हो चुकी है और इसके कर्मचारियों को कंपनी ने विदा कह दिया है। इसी ग्रुप की दूसरी पत्रिका ंिबंदियाऔर इनके लिए डिजाइनिंग और मार्केटिंग-सकुर्लेशन की टीम से भी लोगों को एक-एक करके विदा किया जा रहा है। खैर, इन विकट परिस्थितियों में हमें यह समझ में आया कि नागर जी ने हमें और हमारे अधिकारों को बचाने के लिए प्रबंधन से बहुत संघर्ष किया होगा। नागर जी के जाने के बाद दूसरे संपादक जो मनी मंत्र के पहले संपादक बनाए गए थे- वे पगार के बारे में पूछने पर कहते कि इस बारे में आप मुझसे न पूछें। हां, वे पत्रकार को एक्टिविस्टन होने की हिदायत साफ-साफ देते थे। इस हिदायत का मतलब क्या लगाया जाए, पता नहीं। ऐसा इसलिए कि शुक्रवार का कोई भी पत्रकार किसी सामाजिक बदलाव के लिए प्रतिबद्ध दल का सक्रिय सदस्य नहीं है। गरीबों, दलितों, वंचितों, औरतों और बच्चों के प्रति संवेदनशील होकर रिपोर्ट लिखना अगर हमारी पत्रिकारिता का हिस्सा रहा है तो जाहिर सी बात शुक्रवार की पहचान भी बाजार और समाज में इसी बूते बनी। खैर, अब हमारे पास नौकरी खोजने के अलावे कोई विकल्प नहीं रह गया था, सो घूमने के ख्याल से दिल्ली से बाहर जाने को मेरा मन नहीं हो रहा था। दूसरी ओर रीना और शब्द का दबाव था और हमने इन दोनों दबावों से निकलने का एक रास्ता यह निकाला कि हम दो दिनों के लिए धर्मशाला और कांगड़ा घूम आते हैं और अक्टूबर की छुट्टियों में एक सप्ताह के लिए किसी लंबी यात्रा पर जाएंगे।

टाॅय ट्रेन की सवारी

इससे पहले मैंने और रीना ने हिमाचल की तीन यात्रा पूरी की थी। पहली यात्रा हमने 2004में शब्द के बिना की थी और शब्द जब हमसे पूछता है कि मैं शिमला, कुफरी, मनीकरण, मनाली, रोहतांग की इन फोटो में क्यों नहीं दीखता हूं? हम उसे अब तक यही जबाव देते रहे हैं कि हम इस दुनिया का सबसे अच्छा बच्चा ढूंढने इस यात्रा में गए थे। हम तुम्हें हिमाचल से लेकर आए हैं। दरअसल मैंने और रीना ने दो साल की मोहब्बत के बाद घर बसाने की सोची तो इसके लिए हम दोनों के घर वाले तैयार नहीं थे। मैंने पढ़ाई खत्म करके पत्रकारिता का रुख किया ही था और भागलपुर में दैनिक जागरणकी कुछ महीने चाकरी करने के बाद दोबारा दिल्ली 2004 की जनवरी में वापसी की और 10 महीने के बाद वरिष्ठ पत्रकार मित्र अनिल चमडि़या के घर बैठकर शादी की तारीख तय की और इसकी खबर जैसे ही मैंने अपने मंझले भाई को दी तो एक बार लगा कि उसके पांव के नीचे की जमीन बहुत तेजी से सरक गई हो। नतीजा यह हुआ कि वे आज भी मेरी शादी और मुझसे सहज नहीं हो पाए हैं। मेरा यह भाई पिता की मृत्यु के बाद सेंट स्टीफेंस काॅलेज, दिल्ली का खर्च उठाने में मां का सहयोग करते रहे। खैर इस पर फिर कभी चर्चा करना ठीक होगा। अनिल जी के यहां मेरे बहनोई किशन कालजयी भी मौजूद थे और उनका और सपना भाभी का यह प्रस्ताव था कि हम दोनों शादी के दूसरे ही दिन कहीं 7-8 रोज के लिए घूमने को दिल्ली से बाहर निकल जाएं। स्वभाववश किशन जी ने मेरे हनीमून का खर्च उठाने की बात की, पर वे कुल खर्च का एक चैथाई ही दे सके। वे जमालपुर, बिहार से अपनी संभावनाओं की जमीन तलाशने दिल्ली कुछ महीने पहले ही आए थे। उनके लिए अपने दोनों बच्चों की पढ़ाई और जमालपुर और दिल्ली दो-दो जगहों का खर्च निकालना बहुत मुश्किल हो रहा था। उनकी पत्नी और बच्चे उन दिनों जमालपुर में ही रह रहे थे। इन परिस्थितियों में 10 साल पहले की गई उनके 2000 रुपये की मदद हमारे लिए बहुत बड़ी मदद थी। हमने 14 नवंबर को गुरुद्वारे में शादी की और 15 नवंबर की अल्लसुबह पुरानी दिल्ली से कालका के लिए ट्रेन ले ली। रीना का भाई गुड्डू हमें सुबह-सुबह स्टेशन छोड़ने गया था। गुड्डू ने उन दिनों एक सफेद रंग की सेकेंडहैंड सैंट्रो कार ली थी, जिसकी खबर बहुत दिनों तक उसके घर के किसी सदस्य को नहीं थी। आज उसके पास आॅडी, इनोवा और स्विफ्ट तीन-तीन गाडि़यां है। हम 10-11बजे के आसपास कालका पहुंच गए और वहां से शिमला के लिए लगभग 12.10 बजे दोपहर में टाॅय ट्रेन ली। लगभग पांच घंटे की इस यात्रा में घने जंगलों, वादियों और घाटियों से होती हुई हमारी ट्रेन शाम कोई सवा पांच या साढ़े पांच बजे के आसपास शिमला पहुंच गई। ट्रेन स्टेशन पर रुकती पर वहां खाने को तले हुए पकौड़ों, चाय और बिस्कुट के अलावा कुछ भी नहीं मिलता था। यह भी अजीब बात ही लगी कि हरी भरी वादियों में रेलवे स्टेशन इतना सूखा और निर्जन क्यों था? ट्रेन के शिमला पहुंचने से पहले ही ठंडे-ठंडे हवा के थपेड़ों ने हमें स्वेटर पहनने को मजबूर कर दिया था। शिमला स्टेशन से बाहर आते ही हमने लेखक गृह के बारे में पूछा तो यात्रियों की सहायता के लिए वहां लगे एक स्थानीय मजदूर ने हमसे हमारा सामान अपने सिर पर रखकर पीछे-पीछे चले आने को कहा। मैंने कहा कि मुझे आप रास्ता बता दीजिए मैं चला जाऊंगा। उसने मुझसे कहा –बाबूजी, जिद मत करो। मैदान से आए हो पहाड़ के कठिन रास्तों में सामान लेकर कहां चल सकोगे।दरअसल, शादी का खर्च खुद ही वहन करने के बाद हमें जो शगुन के बतौर यार-मित्रों से पैसे मिले थे उसी के भरोसे अगले 8-10 दिन गुजारने थे। सो, हम पैसों के मामले में कदम फूंक-फूंककर चलना चाह रहे थे। रीना पहले भी पहाड़ों में घूम चुकी थी इसलिए उसने स्थिति को भांपते हुए कुली करने को कहा। अब हम पहाड़ के पतले और छोटी कद के उस वीर के पीछे चल पड़े। लेखक गृह पहुंचते ही हमें कमरा दिखाया गया। वह हाॅलनुमा कमरा था। जिसमें दो पलंग जोड़कर डबलबेड का भ्रम तैयार किया गया था। बेड पर खूब सारे कंबल भी रखे हुए थे। इस कमरे का किराया सिर्फ दस रुपये था। कमरे में सामान रखने के बाद हमने वहां के केयरटेकर से कहकर आलू का पराठा और चाय मंगवाई। यहां आलू पराठा, ब्रेड और चाय के अलावा और कुछ मिलता भी नहीं था। दो साल पहले जब शिमला गया तो पता चला कि लेखक गृह बहुत खस्ता हालत में है। वहां अब कोई ठहरने नहीं जाता है। हमारे खाना खत्म करते ही वहां कुछ और लोग आ धमके। हमसे सामने के कमरे में शिफ्ट करने को कहा गया। यह कमरा किशन जी की सिफारिश से हमें मिला था। टाॅयलेट काॅमन था और उसकी कमोड पर बैठने पर शिमला के तापमान का अहसास ऊपर से बूंद-बूंद टपकते ठंडे पानी से हो रहा था। इन सब परेशानियों के बाद भी हम बहुत खुश थे और नये जीवन का आनंद ले रहे थे।

जोहरा की वीर जारा हमनें यहीं देखी

दूसरे दिन हम 9 बजे ही सुबह टैक्सी करके घूमने निकल गये। यहां एक झाखू मंदिर है जो बहुत ऊंचाई पर है जिसे दो किलोमीटर दूर माल रोड से घन देवदार के ऊंचे-ऊंचे पेड़ों के पार आसानी से देखा जा सकता है। यहां महिलाओं के लिए कुछ-कुछ प्रतिबंध जैसा भी लिखा था, इस समय याद नहीं आ रहा है कि क्या-क्या लिखा था। महिलाओं के माहवारी के दौरान मंदिरों में प्रतिबंध की बात तो मैं दर्जनों जगह पढ़ी है। उनसे तो आज भी गांवों और कई घरों में इस दरमियान बहुत छुआछूत भरा व्यवहार किया जाता है। इसके बाद हम एडवांस स्टडीज पहुंचे। जहां शिमला समझौते की नींव रखी गयी थी। 1971 में भारत-पाकिस्तान युद्ध के बाद बांग्लादेश का जन्म हुआ और जिसके समझौतों पर भारत-पाकिस्तान के बीच हस्ताक्षर हुए। आज यह जगह दुनिया भर के विद्वानों के लिए विचार-विमर्श और बौद्धिक प्रवास का केंद्र सा बन गया। शिमला में इस समय पर्यटकों की भीड़ कम थी। यहां लक्कड़ बाजार और निचले हिस्से में बने बस स्टैंड से ऊपर माॅल रोड के लिए इलेक्ट्रिक रोपवे का निर्माण हो चुका है। लक्कड़ बाजार में लकडि़यों के बर्तन और खिलौने मिलते हैं। मैंने शिमला की ठंड से बचने के लिए नीले रंग की जैकेट खरीद ली थी। सूर्यास्त के समय टैक्सीवाला हमें एक बहुत ऊंचाई पर बने और थोड़े निर्जन में बने दुर्गा के किसी मंदिर में ले गया। यहां से सूर्य को डूबते हुए देखना अच्छा लग रहा था। यहां पहुंचने के बाद हड्डियों को चुभने वाली ठंडी हवा चलने लगी और हम वापिस लेखक गृह वापिस हो गए। केयर टेकर हमें देखते ही खुश हो उठा, मानों हम परदेशी न होकर उसके अपने सगे बेटे-बहू हों। उसने हमें ठंड से ठिठुरते देख फटाफट चाय बनाकर दी। चाय में चीनी और खूब सारा दूध पाकर हमें ऐसा लगता रहा कि हम लेखक गृह शिमला में न होकर पश्चिमी उत्तर प्रदेश या हरियाणा के किसी गांव में हों। बाद में हमें अहसास हुआ कि पहाड़ों में काम करने की ऊर्जा शायद इसी खूब सारी चीनी वाली चाय से मिलती होगी। हमें यहां प्रमोद रंजन और एस. आर. हरनोट दो नए लेखक दोस्त भी मिले। प्रमोद रंजन शिमला के उसी लेखक गृह में टिके हुए थे। उन दिनों उन्होंने दिव्य हिमाचल या किसी अखबार की नौकरी छोड़ रखी थी। इन दिनों दिल्ली से निकलने वाली बहुजन समाज की पत्रिका फाॅवर्ड प्रेसका संपादन कर रहे हैं। उन्होंने मुझसे हरनोट जी के दफ्तर चलने को कहा। हरनोट जी ने हमारा गर्मजोशी से स्वागत किया और अगले दिन कुफरी जाने के लिए हिमाचल पर्यटन की बस की टिकट फोन पर ही बुक करवा दी। हरनोट जी लेखक मित्रों के लिए यह सब चुटकियों में करते रहते हैं। प्रमोद रंजन ने माल रोड पर स्थित सिनेमा हाॅल में लगी वीर जाराफिल्म की टिकट बुक करवा दी। यहीं सिनेमा हाॅल के साथ ही हरनोट जी का दफ्तर हुआ करता था। वीर जारा में काम कर चुकी जोहरा सहगन ने अभी-अभी 11 जुलाई 2014 को 102 की उम्र में दुनिया को अलविदा कह दिया।

यहां स्कीइंग होती है

17 नवंबर की सुबह शिमला से 13 किलोमीटर दूर कुफरी के लिए हम हिमाचल पर्यटन की बस में निकल पड़े। रास्ते में देवदार के नुकीले पत्तों वाले पेड़ को देखने पर कक्षा 9 में पढ़ाया गया भूगोल का वह यह अध्याय याद आने लगा जिसमें यह लिखा होता था कि बर्फ से बचाव के लिए हिमालयी क्षेत्रों के पेड़ों के पत्ते नुकीले होते हैं। यह सब हम नौंवी कक्षा में कई बार याद करते थे और आज जब इस यथार्थ से हम बावस्ता हो रहे थे तो लग रहा था कि भारतीय स्कूली शिक्षा व्यवस्था कितनी रटंत और अव्यावहारिक है। इन कुदरती बातों को समझने-समझाने के लिए एक बच्चे के पीछे यमदूत की तरह घर के बड़े-बुजुर्ग से लेकर शिक्षक तक पिल पड़तेेे हैं। देढ़-दो घंटे के घुमावदार रास्तों से होकर हम कुफरी पहुंचे। यहां हमें घोड़े और खच्चर पर सवारियों को ढोने वाले नेपाली लड़कों ने बताया कि यहां किस-किस फिल्म की शूटिंग हुई है। यही बात हमें उत्तराखंड के धनोल्टी में टैक्सी वाले ने वहां किन फिल्मों की शूटिंग हुई के बारे में बताया था और ऐसी बात उत्तराखंड के सतताल में नौका विहार करते हुए भी हमें बताया गया था कि खून भरी मांगकी शूटिंग यहीं हुई थी। यह सब जानकर मुझे लगा कि वे ऐसा इसलिए बताते हैं क्योंकि वे यह जानते हैं कि फिल्में हमारे जीवन का हिस्सा हैं। दूसरा यह कि पहाड़ों में पर्यटकों में ज्यादातर जवान या बच्चे शामिल होते हैं जो अभी फिल्मों के मोह में कहीं न कहीं फंसे हुए ही होते हैं। मैंने यहां घोड़े के साथ जूते हुए नेपाली और स्थानीय लोगों का शोषण नंगी आंखों से देखा। इससे पहले हमें हर ओर यह सुनने को मिलता कि इमानदारी इस राज्य की खासियत है। यह सही है कि वहां की आम जनता इमानदार है लेकिन पैसों से पैसे बनाने का टूल वहां भी मैदानों या दुनिया के किसी पूंजीवादी मुल्क की ही तरह था- अधिकतम काम और न्यूनतम मजदूरी। इन मजदूरों को ठेकेदार तब 30-50रुपये देता था जबकि दिनभर में तीन-चार चक्कर में घोड़े वाले की एक घोड़े से कमाई 700-800 रुपये से कम नहीं रही होगी। घोड़े जिस रास्ते से होकर हमें ले जा रहा था वह पत्थर और कीचड़ से व्याप्त था। घोड़े के ऊपर बैठे सवारियों का संतुलन बना रहे इसलिए वह कभी हमसे आगे तो कभी पीछे झुकने को कह रहा था। रीना डर रही थी और बार-बार अपने पीर को याद कर रही थी। हमें घोड़े वालों ने बताया कि जब यहां बर्फ गिर जाती है तब स्कीइंग की प्रतियोगिता आयोजित की जाती है। फिलहाल यहां बर्फ के नामोनिशान भी नहीं थे। इन रास्तों से निकलकर जब हम बाहर एक मैदान में पहुंच गए तो हमें उंगलियों से दूर इशारा करके दिखाया कि वो सेब के बगीचे हैं। हमने पूछा कि साहब सेब कहां हैं? जवाब मिला- सेब का सीजन खत्म हो चुका है। खैर, इन सबसे निपटकर हमने इस जगह खिली धूप और हरी-भरी प्रकृति का आनंद लिया। फोटोग्राफी की, खाना खाया। वहां से वापसी में शाम हो गई थी। हरनोट जी के साथ बैठकर चाय पी और अगले दिन मनाली जाने की इच्छा जताई। उन्होंने फोन करके अगले दिन सुबह की हिमालचल पर्यटन की बस में टिकट और मनाली में व्यास होटल में कमरा भी बुक करवाया दिया।

गर्म और ठंडे पानी का संगम

सुबह कोई सात बजे हम मनाली के लिए बस में सवार हो गए थे। उस जमाने में भी हिमाचल की सड़के अच्छी थीं पर आज जितनी नहीं। आज तो हिमाचल के हर इलाके में खूब चैड़ी-चैड़ी सड़के बनाई जा रही हैं जिनपर सरकारी बसें नहीं बल्कि आज के नए उग आए मध्य वर्ग और युवाओं को लांग-ड्राइव के सुख के लिए बड़ी-छोटी गाडि़यां दौड़ाई जा सके। शिमला से बाहर निकलते वक्त स्कूल जाते गोरे-गोरे बच्चे और बच्चियां हमें हाथ हिलाकर बाइ-बाइ कर रहे थे, ऐसे जैसे हम उनके घर से विदा ले रहे हों। हम बस की खिड़कियों से खाई को देखकर सिहर भी उठते लेकिन बस का ड्राइवर माथे पर पंजाबी शैली में अंगोछा बांधकर धैर्य के साथ हमें अपनी मंजिल पहुंचाने में जुटा रहा। मनीकरण से पहले या बाद में यह ठीक-ठीक अब याद नहीं लेकिन हमारी बस समशी नाम की एक बस्ती में भुट्टीको वीवर्स को-आॅपरेटिव सोसायटी लिमिटेडके आगे खड़ी हुई थी जहां से हमने शाॅल और गर्म कपड़े खरीदे थे। यहां मैंने अपने लिए एक सस्ता और गर्म स्वेटर खरीदा। रीना ने मेरी मां और अपने लिए दो गर्म शाॅल खरीदा। यहां खरगोश की तरह अंगूरा नाम के एक प्राणी से भी परिचय हुआ। हमें यह पता चला कि अंगूरा नाम से देश के हर बाजार में बिकने वाले मफलर इस प्राणी के बाल से बनाए जाते हैं। रास्ते में कई जगहों पर भेंड के झुंड को हांकती हुई महिलाएं दिखी जो पारंपरिक पोशाक पहने हुए किसी सौंदर्यलोक से उतरी हुई परी से कम नहीं मालूम पड़ रही थीं। पर हकीकत में तो इनके जीवन से सौंदर्य कहीं दूर चला गया दिख रहा था। इन औरतों की जिम्मेदारी मेहनत-मजूरी करके अपने घर के पांच-छह सदस्यों के परिवार के लोगों के भरण-पोषण की थी। वे अपने छोटे बच्चों को कमर से टिकाए हुए एक द

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