कुमार अनुपम की नई कविताएँ

फेसबुक पर उड़ती ख़बरों से पता चला है कि कुमार अनुपम को भारतभूषण अग्रवाल पुरस्कार मिला है. वे सबसे अच्छे युवा कवि हैं या नहीं मैं इस बहस में नहीं पड़ना चाहता, लेकिन इतना जरूर है कि वे कुछ अलग किस्म के कवि हैं, ‘दुनिया के छोटे-छोटे पेंच दिखाने वाले’, बार-बार इस बात की याद दिलाने वाले कि ‘यह हमारा देश है और हम इसके नागरिक हैं’. डिस्टोपियाई दुस्स्वप्न के इस कवि को जानकी पुल की तरफ से बधाई. साथ ही, उनका धन्यवाद कि उन्होंने अपनी नई कविताएँ हमें आपसे साझा करने के लिए दी- प्रभात रंजन 
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1.
कतरा कतरा कुछ
छत से यह छिपकली मेरी देह पर ही गिरेगी
बदलता हूँ लिजलिजी हड़बड़ाहट में अपनी जगह
एक पिल्ला कुँकुआता है और मेरी नींद सहमकर
दुबक जाती है बल्ब के पीछे अँधेरी गुफा में
यह मच्छर जो इत्मीनान से चूस रहा है मेरा खून डेंगू तो नहीं दे रहा
(कैसे खरीद पाऊँगा महँगा इलाज)
लगता है कोई है जो खड़का रहा है साँकल
अगर
दिनभर की कमाई 26 रुपये 45 पैसे गये
तो मेरे कान में बोलेगा
अपनी खरखराती सरकारी आवाज में उत्पल दत्त-
-“गरीब!
उसकी अमीर कुटिलता
बर्दाश्त करने की निरुपाय निर्लज्जता कहाँ से लाऊँगा
ये क्यों बज रहा है पुलिस-सायरन
मेरी ही गली में बार बार
ठीक ही किया
जो पिछवाड़े का बल्ब जलता भूल गया
(इस बार तो कट कर ही रहेगा बिजली का कनेक्शन, तय है)
कतरा कतरा कुछ
मुझमें भरता समुद्र हुआ जा रहा है।
2.
उसका देखना
बीमार था भाई और अस्पताल भरा हुआ
खुले आकाश के नीचे
नसीब हुआ उसे किसी तरह एक बेड
बेहद जद्दोजहद के बाद
ऐसा आपातकाल था
ड्रिप की सीली-सी आवाज थी जब बुदबुदाया-
हमारे देखने की सीमा तो देखिये!
वह चाँद देख रहा था और तारे
अब उसका बोलना बर्फ हो रहा था-
और जमीन पर थोड़ी ही दूरी पर
चलता हुआ आदमी तो ओझल हो जाता है
यकायक हमारी निगाह से
भैया,  देखिये जरा कितने पेंच हैं इस दुनिया में!
वह बहुत मासूम दिख रहा था और खतरनाक तरीके से गम्भीर
अब मैं
उसे बीमार कहकर शर्मिंदा हो रहा हूँ।
3.
जिनके हक को रोशनी दरकार है
वे देर रात तक खेलते रहते हैं
कैरम लूडो या सोलहगोटी
अधिकतम एकसाथ रहने की जुगत करते हैं
जबकि दूकानें उनकी जागती रहती हैं
वे मुड़ मुड़कर देखते हैं बार बार
अँधेरे में से गुजरती एक एक परछाईं
अपनी आश्वस्ति पर सन्देह करते हैं
एक खटका उन्हें लगा रहता है
पुलिस सायरन से भी
जिससे महसूस करना चाहिए निशाखातिर
उससे दहल जाता है उनका कलेजा
एक दूसरे को समझाते हैं कि हम लोकतन्त्र में हैं
यह हमारा ही देश है
और हम इसके नागरिक
लेकिन तीसरा अचानक
बुदबुदाने लगता है वे जवाब
जिस पर उसे यातनाएँ दी गयी थीं
पुलिसिया बेहूदा सवालों की ऐवज
जब वह यही सब बोला था तफ्तीश में और तब से
वह साफ साफ बोलने के काबिल भी नहीं रहा
दाढ़ी ही तो रखते हैं पहनते हैं टोपी
पाँचों वक्त पढ़ते हैं नमाज
यह जुर्म तो नहीं है हुजूर
चीखती है उनकी खामोशी
जिसे नहीं सुनती है कोई भी कोर्ट
हम आतंकवादी नहीं हैं जनाब
मेहनतकश हैं
दुरुस्त करते हैं घडि़याँ सिलते हैं कपड़े
बुनते हैं चादर पालते हैं बकरियाँ
आपके लिए सब्जियाँ उगाते हैं
हम गोश्त नहीं हैं आपकी दस्तरखान में सजे हुए
हमें ऐसे मत देखिये
लेकिन मिन्नतें उनकी
बार बार साबित कर दी जाती हैं
एक खास कौम का जुर्माना इरादतन
उन्हें जेलें नसीब होती हैं या एनकाउंटर
बचे रहने की जिद में वह क्या है
जो उन्हें कट्टर बनाता है
कभी सोचिये कि
दरगाहों के लिए
जिनकी आमदनी से निकलती है चिरागी
मोअज्जिन की सदाओं से खुलते
जिन खुदाबंद पलकों के दर
उनके गिर्द
क्यों लगे हैं मायूसी के स्याह सियासी जाले
उनके ख्वाब में भला किस देश का पल सकता है भविष्य
इसे सवाल नहीं
मुस्तकबिल की सचाई की तरह सुनें!
सिर्फ रात होने से ही नहीं घिरते हैं अँधेरे
उनके हक को रोशनी दरकार है
जिनकी दरूद-सीझी फूँक से
उतर जाती है हमारे बच्चे को लगी
दुनिया की तीखी से तीखी नजर।
4.
साथ
चाँद
तुम्हारी किरचें टूट टूटकर
बिखर रही हैं तारों की तरह
यह किस समुच्चय की तैयारी है
वह बावड़ी जिसके जल में
देखा था एक दिन हमने सपनों का अक्स
उस पर रात घिर आयी स्थायी रंग लिये
रोज की ही तरह
हमारी खिलखिलाहट की चमक
गिरती रही चक्कर खाते हुए पत्ते की तरह उसी जल में
दरअस्ल
घरेलू आदतों से ऊब गयी थी वह बदलना चाहती थी केंचुल
अपने समय में छूटती जाती साँस की-सी असमर्थता
से घबराना मेरा नियम बन गया था
अब हम
किसी मुक्ति की तलाश में भटकते संन्यासी थे
और एक दिन
उसने बदल दिया अपनी मोबाइल का वह रिंगटोन
जो मुझे प्रिय था
और रिबन बाँधना कर दिया शुरू जो उसे तो
कभी पसन्द नहीं था
मैं भी पहनने लगा चटख रंग के कपड़े जो आईने में
मुझ पर नहीं फबते रहे थे कभी
फिर भी
अचानक नहीं हुआ यह
कि
मैं किसी और के स्वप्न में रहने लगा हूँ
वह किसी और की आँखों में बस गयी है
और हम
अपने बढ़ते हुए बच्चे के भविष्य में
अब भी साथ रहते रह रहे हैं। 
 

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