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  • बहुत से भारतीय भाषाओं के लेखक भारतीय अंग्रेजी लेखकों से भी ज्यादा पहचाने जाते हैं

     अर्शिया सत्तार भारत और अंतरराष्ट्रीय लेखकों के लिए स्थापित संगम हाउस रेजीडेंसी के संस्थापकों में से एक हैं। यूनिवर्सिटी आव शिकागो से इंडियन क्लासिकल लिट्रेचर में पीएच.डी. अर्शिया का संस्कृत की कथासरित्सागर और वाल्मिकी रामायण का अनुवाद पेंग्विन बुक्स से प्रकाशित हो चुका है। बच्चों के लिए दो किताबें लिखने के अलावा वह अंतर्राष्ट्रीय स्तर की एक नामचीन लेखिका हैं। उनसे नबीना दास की खास बातचीत   prairieschooner.unl.eduमें छपे इस इंटरव्यू का अनुवाद किया है  अर्पिता शर्मा ने
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    संगम हाउस के बारे में कुछ बताएं।
    वर्ष 2007 में डी डब्ल्यू गिब्सन के साथ लेडिंग हाउस (आजकल राइटर्स ओमी)’ में काम करते हुए मुझे महसूस हुआ कि भारत में भी लेखकों के लिए ऐसा कुछ शुरू किया जाना चाहिए। दो कारण थे, पहला, भारतीय लेखक, विशेषकर देशी भाषाओं में लिखने वालों को ऐसे रेजीडेंसी कार्यक्रमों का पता ही नहीं लग पाता है और दूसरा, चूंकि रेजीडेंसी आनेजाने का खर्च वहन नहीं करती इसलिए भारतीय लेखक विदेश जाने के कई अच्छे अवसर खो देता है।

    इतने समय के बाद भारत में संगम का देशी भाषाओं और अंग्रेजी लेखन में कोई योगदान रहा है!
    इस सर्दी में संगम हाउस का पांचवा सीजन होगा। हमारा प्रयास विविध भाषाओं और समुदायों के हर विधा के लेखकों के बीच साहित्यिक माहौल का पोषण करना रहा है। भारत में रहने के कारण हम उम्मीद करते हैं कि इस देश के लेखने पर भी संगम का असर जरूर होगा। मगर हम अंतर्राष्ट्रीय कायक्रमों से भी जुड़े हुए हैं, जहां कई देशों के लेखकों को आगे लाने की जिम्मेदारी है, और हमारा विशेष प्रयास भारतीय लेखकों को लेकर है।

    संगम हाउस को विदेशों में पहचान कैसे दिलवाई?
    सबसे पहले तो डी डब्ल्यू गिब्सन के कई यूरोपीय कला काउंसिलों और प्रकाशन घरों से संबंध काम आए। राइटर्स ओमी के पूर्व सदस्यों ने भी सहयोग दिया। भारत सहित अंतर्राष्ट्रीय स्तर के भी कई लेखकों से वाचिक समर्थन प्राप्त हुआ। आजकल तो हम फेसबुक पर भी हैं। दिनदिन हमें कई आवेदन मिल रहे हैं।

    देशज भाषाओं के लेखकों का चुनाव तो बेहद मुश्किल रहता होगा!
    चौंकाने वाली बात यह है कि भारत में अंग्रेजी के अलावा दूसरी भाषाओं में लिखने वाले लेखकों के लिए धन उगाहना बहुत कठिन है। हम कुछ व्यक्ति विशेष के पास भी किसी देशी भाषा में लिखने वाले का सहयोग करने की प्रार्थना करते हैं। कई भाषाओं के लिए कई चयन समितियां भी हैं। जैसे हमारा फंड बढ़ता है,हम अन्य भाषाओं के लेखकों को भी आमंत्रित करते हैं।

    अंग्रेजी भाषा के मुकाबले भारतीय भाषाओं के लेखकों को मिलने वाले अवसर आदि के बारे में क्या कहना है?
    हिंदी, बांग्ला, मलयालम, तमिल और उडिय़ा सहित ऐसी कई भारतीय भाषाएं हैं, जिनका ठोस साहित्यिक इतिहास और प्रकाशन परंपरा रही है। बहुत से भारतीय भाषाओं के लेखक भारतीय अंग्रेजी लेखकों से भी ज्यादा पहचाने जाते हैं। हालांकि यह बात भी सही है कि रॉयल्टी और कॉपीराइट के मामले में वे अंग्रेजी वालों के मुकाबले कम सुरक्षित हैं।

    क्लासिकल संस्कृत से आपका जुड़ाव?
    मैंने हिन्दू पौराणिक कथा और महाकाव्यों में शोध किया है। संस्कृत मैंने इसलिए सीखी ताकि मैं अपने मन मर्जी से पढ़ सकूं। पौराणिक गाथाओं/मिथकों और महाकाव्यों को बारबार पढऩे के लिए लोगों की जिज्ञासाएं बढ़ती ही जा रही हैं। हर साल रामायण की बिक्री से मिलने वाली रॉयल्टी को देख मुझे आश्चर्य होता है।

    ‘हमलोग’ से साभार 

    5 thoughts on “बहुत से भारतीय भाषाओं के लेखक भारतीय अंग्रेजी लेखकों से भी ज्यादा पहचाने जाते हैं

    1. सांपों के देश से चलो कुछ तो सीखा उन्होंने……

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     अर्शिया सत्तार भारत और अंतरराष्ट्रीय लेखकों के लिए स्थापित संगम हाउस रेजीडेंसी के संस्थापकों में से एक हैं। यूनिवर्सिटी आव शिकागो से इंडियन क्लासिकल लिट्रेचर में पीएच.डी. अर्शिया का संस्कृत की कथासरित्सागर और वाल्मिकी रामायण का अनुवाद पेंग्विन बुक्स से प्रकाशित हो चुका है। बच्चों के लिए दो किताबें लिखने के अलावा वह अंतर्राष्ट्रीय स्तर की एक नामचीन लेखिका हैं। उनसे नबीना दास की खास बातचीत   prairieschooner.unl.eduमें छपे इस इंटरव्यू का अनुवाद किया है  अर्पिता शर्मा ने
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    संगम हाउस के बारे में कुछ बताएं।
    वर्ष 2007 में डी डब्ल्यू गिब्सन के साथ लेडिंग हाउस (आजकल राइटर्स ओमी)’ में काम करते हुए मुझे महसूस हुआ कि भारत में भी ल
    ेखकों के लिए ऐसा कुछ शुरू किया जाना चाहिए। दो कारण थे
    , पहला, भारतीय लेखक, विशेषकर देशी भाषाओं में लिखने वालों को ऐसे रेजीडेंसी कार्यक्रमों का पता ही नहीं लग पाता है और दूसरा, चूंकि रेजीडेंसी आनेजाने का खर्च वहन नहीं करती इसलिए भारतीय लेखक विदेश जाने के कई अच्छे अवसर खो देता है।

    इतने समय के बाद भारत में संगम का देशी भाषाओं और अंग्रेजी लेखन में कोई योगदान रहा है!
    इस सर्दी में संगम हाउस का पांचवा सीजन होगा। हमारा प्रयास विविध भाषाओं और समुदायों के हर विधा के लेखकों के बीच साहित्यिक माहौल का पोषण करना रहा है। भारत में रहने के कारण हम उम्मीद करते हैं कि इस देश के लेखने पर भी संगम का असर जरूर होगा। मगर हम अंतर्राष्ट्रीय कायक्रमों से भी जुड़े हुए हैं, जहां कई देशों के लेखकों को आगे लाने की जिम्मेदारी है, और हमारा विशेष प्रयास भारतीय लेखकों को लेकर है।

    संगम हाउस को विदेशों में पहचान कैसे दिलवाई?
    सबसे पहले तो डी डब्ल्यू गिब्सन के कई यूरोपीय कला काउंसिलों और प्रकाशन घरों से संबंध काम आए। राइटर्स ओमी के पूर्व सदस्यों ने भी सहयोग दिया। भारत सहित अंतर्राष्ट्रीय स्तर के भी कई लेखकों से वाचिक समर्थन प्राप्त हुआ। आजकल तो हम फेसबुक पर भी हैं। दिनदिन हमें कई आवेदन मिल रहे हैं।

    देशज भाषाओं के लेखकों का चुनाव तो बेहद मुश्किल रहता होगा!
    चौंकाने वाली बात यह है कि भारत में अंग्रेजी के अलावा दूसरी भाषाओं में लिखने वाले लेखकों के लिए धन उगाहना बहुत कठिन है। हम कुछ व्यक्ति विशेष के पास भी किसी देशी भाषा में लिखने वाले का सहयोग करने की प्रार्थना करते हैं। कई भाषाओं के लिए कई चयन समितियां भी हैं। जैसे हमारा फंड बढ़ता है,हम अन्य भाषाओं के लेखकों को भी आमंत्रित करते हैं।

    अंग्रेजी भाषा के मुकाबले भारतीय भाषाओं के लेखकों को मिलने वाले अवसर आदि के बारे में क्या कहना है?
    हिंदी, बांग्ला, मलयालम, तमिल और उडिय़ा सहित ऐसी कई भारतीय भाषाएं हैं, जिनका ठोस साहित्यिक इतिहास और प्रकाशन परंपरा रही है। बहुत से भारतीय भाषाओं के लेखक भारतीय अंग्रेजी लेखकों से भी ज्यादा पहचाने जाते हैं। हालांकि यह बात भी सही है कि रॉयल्टी और कॉपीराइट के मामले में वे अंग्रेजी वालों के मुकाबले कम सुरक्षित हैं।

    क्लासिकल संस्कृत से आपका जुड़ाव?
    मैंने हिन्दू पौराणिक कथा और महाकाव्यों में शोध किया है। संस्कृत मैंने इसलिए सीखी ताकि मैं अपने मन मर्जी से पढ़ सकूं। पौराणिक गाथाओं/मिथकों और महाकाव्यों को बारबार पढऩे के लिए लोगों की जिज्ञासाएं बढ़ती ही जा रही हैं। हर साल रामायण की बिक्री से मिलने वाली रॉयल्टी को देख मुझे आश्चर्य होता है।

    \’हमलोग\’ से साभार 

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