यह जवान हो चुके चैत का मौसम है!

वरिष्ठ लेखक राकेश कुमार सिंह का लेखन किसी परिचय का मोहताज नहीं है. एक ज़माने में उनका उपन्यास आया था ‘पठार पर कोहरा’. बहुत प्रभावित हुआ था. बाद में उनके अनेक उपन्यास आए. उनकी अच्छी चर्चा भी हुई. सबसे प्रभावित करता है उनका पलामू जिले में अपने गाँव को लेकर उनका दैनंदिन का लेखन. फेसबुक पर जब भी उनके गाँव पर उनकी टिप्पणियां पढता हूँ, उनकी खींची तस्वीरें देखता हूँ तो न जाने क्यों अपना गाँव याद आ जाता है. चैत के महीने पर उनका लिखा यह पढ़ा तो साझा करने से खुद को रोक नहीं पाया. मन गाँव जाने को हो आया. यह गेंहूं के कटने और उसकी दौनी का मौसम है. गाँव की वह धूल बहुत याद आती है जिससे इस मौसम में पूरा गाँव भर जाता था. फ़िलहाल राकेश जी की यह टीप पढ़िए- प्रभात रंजन

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जब रक्तपलाश के फूलों का रंग गहरा उठे, जब पलाश वृक्ष तले झड़ते फूलों की चादर बिछने लगे, जब प्याज की फसल में फूल खिल उठें, जब बंजारे बगीचे में डेरा डालने लगें, जब अच्छी गेंहू की फसल की कटाई करते हमारे मुखिया जी के चेहरे पर मुस्कान खिली हो और जब बडों की बाहें थकने के बाद देर शाम तक बच्चे अरहर की पिटाई (पकी छिमियों से दाने अलगाते) करते दिखें…तो कैलेंडर देखने की जरूरत नहीं। यह जवान हो चुके चैत का मौसम है।जलते दिन और गुलाबी ठंड वाला मौसम..!गाँव के लिए रब्बी का नवान्न खेत-खलिहान से घर लाने का मौसम।

जब पहाड़ों पर उतरती सांझ सुरमई हो उठे, जब गेहूँ की बालियों की शक्ल में पछुआ हवा के संग सरसराती नाचने लगीं हों स्वर्णकिन्नरियां, जब देर रात कहीं दूर…किसी शिवालय पर ढोलक की थाप के साथ हवा में तैरती आती स्वरलहरी कानों में… “इहे ठईंयां मोतिया हेराईल हो रामा /इहे ठईंयां” का रस घोलने लगे, जब ढलती रात में खेतों की ओर से… “रच्च खच्च” की लय-तान सुनाई दे और शाम को गेहूँ की फसल से उफनते खेत सुबह ठूंठों से भरे दिखने लगें, जब मुंहअंधेरे महुए के गाछ तले झारखंड की जीवनरेखा फुलियां (महुआ) की पीली चादर पसरी दिखने लगे, हौले-हौले सिहरती भोर में जब नींद उचटे और मंद पछुआ बयार से दरख्तों से झड़े पत्ते उधियाने की धीमी खरखराहट सुनाई देने लगे, जब उसी भोर अश्वत्थ के नवजात पत्तों की आपसी थपकी की तालियां सुनाई देने लगे, शाल्मली के फूल अपने पीछे अपनी अगली पीढ़ी के बीज छोड़ते विदा होने लगें और जब प्रात: की प्रभाती गाती पवन में महुए की घुलती मदिर गंध बिन कुछ पिए कई बोतलों का नशा तारी करने लगे तो यकीन किजिये चैत उफन उठा है। गरमाती पछुआ हवा वाले दिन,हलकी उमसदार शाम और सिहरती भोर का मौसम है यह। गांव में चैत विचर रहा है। यह “पीत पात सब झर चुके, कुसुम भए सब राख / बैठ अटारी पर गौरैया झार रही है पांख” का मौसम है।

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