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  • बातचीत
  • अशोक वाजपेयी और महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय

    अशोक वाजपेयी जी ने अनेक संस्थाओं की स्थापना में योगदान दिया। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय उनमें से एक है। वे इस विश्वविद्यालय के संस्थापक कुलपति थे। कवि-संपादक पीयूष दईया से लंबी बातचीत में उन्होंने उसी विश्वविद्यालय को लेकर, अपने कार्यकाल को लेकर अनेक अनकही बातें कही हैं। कल यानी सोलह जनवरी को अशोक वाजपेयी का जन्मदिन है। वे 85 वें वर्ष में प्रवेश करेंगे। उनके जन्मदिन पर विशेष- मॉडरेटर

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    प्रस्ताव

    जहाँ तक महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय के जन्म की बात है, विश्व हिन्दी सम्मेलन का एक प्रस्ताव सम्भवतः आठवें दशक में आया था कि एक अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय की स्थापना की जाये। विश्वविद्यालय की जो कल्पना है, उसके नाम में ही ‘विश्व’ लिखा हुआ है, उसको अलग से ‘अंतरराष्ट्रीय’ कहने की क्या ज़रूरत थी, यह स्पष्ट नहीं था। यह पता था कि विश्व हिन्दी सम्मेलन में एक ऐसे विश्वविद्यालय की स्थापना का प्रस्ताव पारित हुआ था और उस पर विचार हो रहा है। शायद उसकी कोई समिति बनी थी, जिसकी बैठक में शिवमंगल सिंह सुमन आये थे। सुमन जी मुझे जानते थे; मंत्रालय एक ही था—उस समय शिक्षा विभाग मानव संसाधन विकास मंत्रालय में था, संस्कृति विभाग भी। वह आये, लेकिन न मैंने कुछ ख़ास पूछा कि क्या हो रहा है, न उन्होंने बताया। हम लोग इधर-उधर की गप्प करते रहे।

    इस बीच, जाहिर है, उस विश्वविद्यालय का विधेयक तैयार कर लिया गया और संसद में पास कर दिया गया।  महत्त्वपूर्ण निश्चय ये थे कि इसकी स्थापना वर्धा में होगी और यह ‘महात्मा गांधी’ के नाम पर विश्वविद्यालय होगा। मोटे तौर पर इतना मुझे पता था।

    एक दिन, तब के शिक्षा सचिव श्री दासगुप्त, एकाएक मेरे कमरे में आये। मैं उस समय संस्कृति विभाग में संयुक्त सचिव था। उन्होंने कहा, ‘‘मैं आपसे पूछने आया हूँ कि अगर आपको इस अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय के कुलपति का पद प्रस्तावित किया जाये तो क्या आप उसको स्वीकार करेंगे?’’ मैंने कहा, “बहुत ही अप्रत्याशित है। मैंने सोचा नहीं।” मेरा कार्यकाल समाप्त होने जा रहा था। यहाँ अलग परिस्थितियाँ थीं—अर्जुन सिंह और नरसिम्हा राव के बीच की राजनैतिक रकाबत या मतभेद को लेकर यह बात थी कि मैं अर्जुन सिंह के निकट हूँ, इसलिए मेरी आगे कोई पदोन्नति होगी इसकी संभावना थोड़ी कम लग रही थी। यह सन् 1997 की बात है। श्री दासगुप्त ने कहा, “आप विचार करिये।” अब शिक्षा सचिव खुद आपके कमरे में आएँ और आपसे कहें! खैर, मैंने इस प्रस्ताव पर बहुत गंभीरता से विचार नहीं किया, क्योंकि मेरी ऐसी कोई रुचि नहीं थी। बात आयी-गयी हो गयी। एकाध महीने बाद एक दिन वह यकायक आये। उन्होंने कहा, ‘‘मैंने आपसे कहा था, आपने उस पर कुछ सोचा?’’ मैंने कहा, “नहीं, मैंने नहीं सोचा।” कहने लगे, ‘‘आप मेरे साथ चलिये। इसी के बारे में एक बैठक हो रही है। हम चाहते हैं कि आप उस बैठक में भाग लें।’’ मैंने कहा, “चलिये।” उनके कक्ष के बग़ल में एक कमरे में ‘खोज समिति’ की बैठक हो रही थी। बैठक में यू.आर. अनन्तमूर्ति, नामवर सिंह और अलीगढ़ विश्वविद्यालय के संभवतः कोई हिन्दी विभागाध्यक्ष थे। मैं उनका नाम भूल गया हूँ। ये तीन लोग थे। अनन्तमूर्ति ने मुझसे कहा, ‘‘अशोक, हम लोगों की, सबकी, एक मत यह राय है कि इस विश्वविद्यालय का कुलपति तुम्हें होना चाहिए। चूँकि हमको दो नाम और बताने हैं, तो तुम्हीं बताओ वे दो नाम कौन हो सकते हैं।’’ मैंने कहा, “मुझे तो आप मानकर चल रहे हैं।” उन्होंने कहा, ‘‘नहीं। यह तय है कि तुमको ही होना है। तुमसे बेहतर कोई नहीं होगा। तुम्हारा प्रशासनिक अनुभव है। शिक्षा का अनुभव है, संस्थाएँ चलाने-बनाने का अनुभव है। ये सब अनुभव एक साथ कहाँ किसको मिलते हैं?” कुछ बातचीत होती रही। नामवर जी भी थे ही। उन लोगों की सहमति से ही बातचीत हो रही होगी। हालाँकि, मेरा ख्याल यह है कि मेरा नाम अनन्तमूर्ति के ज़ेहन में आया होगा। शायद नामवर सिंह ने भी उस पर सहमति व्यक्त की होगी। वे बोले, ‘‘आप बताइए, दूसरे दो नाम कौन-से होंगे।’’ मैंने सुधीर चन्द्र और कृष्णकुमार के नाम सुझाये। इन तीन नामों की पैनल बना दी गयी। यह स्पष्ट ही था कि मेरा नाम पहला है और उसी नाम की सिफ़ारिश राष्ट्रपति को भेजेंगे। तब तक शिक्षा मंत्री बोम्मई हो गये थे। उस समय इन्द्रकुमार गुजराल की सरकार थी, जो थोड़े वक्त के लिए ही रही थी। इस बीच मुझे यह पता चला कि एक प्रस्ताव प्रधानमंत्री कार्यालय में भी विचाराधीन है कि मुझे संस्कृति सचिव बनाया जाये। लेकिन इसमें कुछ ऐसी तकनीकी बाधा थी, जो मेरे मन में कभी स्पष्ट नहीं हो पायी। जो भी हो।

     

    स्वीकृति

    यह वह समय था जब मुझे नोबल पुरस्कार फ़ाउण्डेशन की तरफ़ से नोबल पुरस्कार समारोह में शामिल होने का न्यौता मिला था। मेरा कार्यकाल 15 सितम्बर 1997 को खत्म होने वाला था। पहले मैंने सोचा कि शायद यह निमंत्रण मुझे इसलिए मिला है कि मैं संस्कृति विभाग में संयुक्त सचिव हूँ। वहाँ दिसम्बर में जाना था, लेकिन तब तक मैं पद पर नहीं रहूँगा, इसलिए मैंने स्वीडिश राजदूत को फ़ोन किया कि अगर आपने मुझे संयुक्त सचिव के नाते निमंत्रण भेजा है तो मैं नहीं हूँ, आप किसी और को बुला लें। उन्होंने कहा, ‘‘नहीं, नहीं। वह आपको नाम से भेजा है। इसलिए नहीं कि आप संयुक्त सचिव हैं।” नोबल पुरस्कार फ़ाउण्डेशन दुनियाभर से पन्द्रह-सोलह लोगों को चुनता है। जैसे, टाइम्स लिटरेरी सप्लीमेंट के सम्पादक और स्मिथसोनियन संग्रहालय के निदेशक भी थे—यह वहाँ जाकर पता चला था। उन्होंने कहा, ‘‘आप ही को जाना है।’’ उन्होंने मुझे खाने पर बुलाया। मैं गया। एक तरफ़ मुझे वहाँ जाना था और दूसरी तरफ़, उत्तर भारत के संगीत के इतिहास पर रोटेरडम में स्थित एक अंतरराष्ट्रीय संगीत संस्थान एक आयोजन कर रहा था। इस आयोजन में बीज वक्तव्य देने के लिए उन्होंने मुझे आमंत्रित किया था। मैंने सोचा था कि इसी दौरान दोनों जगह चला जाऊँगा। जाने के कोई तीन-चार दिन पहले मुझे प्रधानमंत्री के प्रमुख सचिव एन.एन. वोरा का फ़ोन आया। बाद में वोरा जी इंडिया इंटरनेशनल सेंटर के निदेशक और फिर उसके अध्यक्ष भी बने। उन्होंने मुझसे कहा, ‘‘आप जाकर केबिनेट सचिव से मिल लीजिये।’’ मैं गया। दक्षिण के थे, उनका नाम मुझे याद नहीं आ रहा है। उन्होंने कहा, ‘‘सभी लोग इसमें सहमत हैं कि तुम ही सबसे योग्य संस्कृति सचिव हो सकते हो, लेकिन हम तुमको आई.ए.एस. में रहते ऐसा पदोन्नत नहीं कर पा रहे हैं। तुम अगर आई.ए.एस. से इस्तीफ़ा दे दो तो हम अशोक वाजपेयी के रूप में तुम्हें संस्कृति सचिव नियुक्त कर देंगे।” मैंने कहा, “ठीक है। मैं सोचकर बताता हूँ।” उन्होंने कहा, ‘‘दोपहर तक मुझे फ़ोन करके बता देना।’’ अब मैं किससे सलाह लेता? मैंने रज़ा साहब से सलाह ली, उन्हें फ़ोन किया। उनका कहना था, ‘‘ठीक है। आई.ए.एस. से इस्तीफ़ा देने में तुम्हें क्या दिक्कत है? संस्कृति सचिव होकर तुम बड़ा काम कर पाओगे।’’ वगैरह। मैंने बता दिया। और इस ग़लतफ़हमी के साथ प्रवास पर चला गया कि शायद मेरी नियुक्ति संस्कृति सचिव के रूप में होने जा रही है। विदेश में कोई खबर नहीं मिली। तब तक इधर औपचारिक चिट्ठी आ गयी थी कि मुझे नियुक्त किया जा रहा है और किस तारीख से। मैंने शिक्षा सचिव से कहा था कि मैं अभी विदेश जा रहा हूँ, लौटकर आऊँगा तब आपको बताऊंगा। उन्होंने कहा कि ठीक है। हम लोग लंदन या पेरिस होकर लौट रहे थे—एयर इंडिया की उड़ान में टाइम्स ऑफ़ इंडिया का एकाध दिन पहले का अख़बार मिला। उसमें खबर थी कि डॉ. अय्यर को संस्कृति सचिव नियुक्त कर दिया गया है। जाहिर है, मुझे संस्कृति सचिव बनाने वाले प्रस्ताव को नहीं माना गया होगा। बाद में पता चला कि उसमें कुछ कानूनी बाधा आयी। अब मेरे पास विकल्प था। उन दिनों सेवा-निवृत्ति की आयु 58 वर्ष थी। मैं 56 वर्ष का हो चुका था। डेढ़ वर्ष और था। अब डेढ़ वर्ष के लिए मैं वापस मध्य प्रदेश सरकार में जाऊँ—वहाँ मुख्य सचिव वगैरह हो जाता या इस तरह का कुछ और। दूसरा विकल्प यह था कि अगर मैं विश्वविद्यालय में जाऊँ तो मेरा पाँच वर्ष का कार्यकाल होगा। मैंने सोचा, “चलो, चलते हैं।” कुलपति पद स्वीकार करने के पीछे एक पक्ष यह भी था कि एक नया विश्वविद्यालय स्थापित करने का अवसर भला कितने लोगों को मिलता है? मुझे मिल रहा है। मैंने स्वीकृति दे दी।

    सीताकान्त महापात्र

    मेरे संस्कृति सचिव बनने के सन्दर्भ में सीताकान्त महापात्र की भूमिका यह थी कि मुझसे एक चूक हुई थी। वह जब सेवारत थे तब मैंने अपनी चरित्रावली पूरी करके उनसे आकलन के लिए नहीं भेजी थी। मुझे इन सब चीज़ों का बहुत ज़्यादा ख्याल नहीं रहता था। मैं भूल गया। जब वह चले गये तो ऐसा अनौपचारिक रूप से सम्भव था कि वह फिर भी लिख देते। आखिर इसमें कोई ग़ैर क़ानूनी बात नहीं हो रही थी। वे ऐसा कुछ करने पर मजबूर नहीं थे, जो भी उनकी राय थी वे लिख देते। उन्होंने ऐसा करने से इनकार किया। उसके पीछे एक पृष्ठभूमि यह थी कि वह बहुत ही आत्मरत व्यक्ति थे। संस्कृति सचिव के रूप में उन्होंने अनेक अवसरों का शोषण किया—छोटे-छोटे देशों में जाकर अपने कविता संग्रहों के अनुवाद इत्यादि कराने का और भी बहुत कुछ। इस तरह की हरकत करने में उनको कोई संकोच नहीं होता था, लेकिन मेरे मामले में उनको हुआ। आकलन के लिए जो आधार बनता है उसमें यह कमी थी कि उन्होंने कुछ लिखा ही नहीं था।

    दो काम एक साथ

    मैंने 29 दिसम्बर 1997 को कार्यभार सँभाला। मैं विश्वविद्यालय का पहला कर्मचारी था। तब कोई था नहीं। काम शुरू हुआ। ‘काम शुरू हुआ’ का मतलब यह था कि न कोई सहायक था, न कोई दफ्तर था। बस मैं था। धीरे-धीरे कुछ अता-पता करके कि किसको लिया जा सकता है, कैसे क्या किया जा सकता है, काम करना शुरू किया। 

    एक तरफ़ पहले बने अधिनियम में विश्वविद्यालय की परिकल्पना और दूसरी तरफ़ इसका बनाया गया ढाँचा—विश्वविद्यालय के लक्ष्यों और संरचना के बीच बहुत ही बुनियादी अन्तर्विरोध था। अधिनियम में कहा गया था कि यह अधिनियम इस उद्देश्य से बनाया जा रहा है कि हिन्दी को अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा मिले—यह मूल लक्ष्य था, लेकिन जो ढाँचा बनाया गया था वह किसी भी सामान्य विश्वविद्यालय के ढाँचे की तरह ही था। एक तरफ़ विश्वविद्यालय के अपने अकादेमिक लक्ष्य होते हैं, उनमें यह लक्ष्य नहीं होता कि किसी भाषा या किसी ज्ञान के अनुशासन को अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा दिलाने का लक्ष्य है। इसमें था। इस विश्वविद्यालय को दो काम एक साथ करने थे। इसको एक विश्वविद्यालय होना था और किसी अर्थ में, जैसे ब्रिटिश कौंसिल ब्रिटेन की संस्था है जो अंग्रेज़ी की प्रतिष्ठा और उसके प्रचार-प्रसार के लिए प्रयत्न करती है वह भी विश्वविद्यालय को करना था। ऐसा करने के लिए संरचना में जो कुछ होना चाहिए था वह नहीं था। यह बात मुझे शुरुआत में ही समझ में आ गयी थी।

    तीन बीज शब्द

    मैंने सोचना शुरू किया कि विश्वविद्यालय के नाम में तीन बीज शब्द हैं। एक है—‘महात्मा गांधी’। हमारे समय में महात्मा गांधी विकल्प का नाम हैं। यह मेरी समझ थी कि इस विश्वविद्यालय को एक वैकल्पिक विश्वविद्यालय बनना चाहिए। दूसरा बीज शब्द था—‘अंतरराष्ट्रीयता’। यह भी एक विचित्र स्थिति है कि नाम में विश्वविद्यालय हो, और अंतरराष्ट्रीय हो। विश्वविद्यालय का मतलब ही है अंतरराष्ट्रीय। मैंने यह माना कि हमारा बुनियादी काम एक अंतरराष्ट्रीय संस्था बनने का है। तीसरा बीज शब्द था—‘हिन्दी’। आमतौर पर विश्वविद्यालय किसी भाषा पर केन्द्रित नहीं होते। इसका मतलब है कि इस विश्वविद्यालय में हिन्दी को वह सब करना है जो और विश्वविद्यालय नहीं करते। अब यह कैसे किया जाये, यह बुनियादी कठिनाई थी।

    चार विद्यापीठ

    विश्वविद्यालय की संरचना में चार विद्यापीठों की कल्पना थी—भाषा विद्यापीठ, साहित्य विद्यापीठ, संस्कृति विद्यापीठ और अनुवाद विद्यापीठ। इस सन्दर्भ में मुझको यह ज़रूरी लगा कि विशेषज्ञों के परामर्श से परिकल्पना को मूर्त रूप दिया जाय। जहाँ तक मुझे याद है, मैंने चार आयोजन किये—साहित्य सम्बन्धी आयोजन इलाहाबाद में, भाषा सम्बन्धी हैदराबाद में, संस्कृति सम्बन्धी दिल्ली में और अनुवाद सम्बन्धी आयोजन पटना में। स्थानीय लोगों के अलावा और विशेषज्ञों को बुलाकर दो-दो दिन के आयोजन किये। इन आयोजनों में सुझाव मिले कि सम्बन्धित पीठ के अन्तर्गत हमको क्या करना चाहिए, कैसे करना चाहिए। एक तरह की कार्य-योजना, प्रारूप भी बनाया। बाद में पुस्तिका भी प्रकाशित की थी जिसमें सारे सुझाव दिये गये थे।    

    नयी पद्धति

    मेरे पास स्टाफ़ वगैरह कुछ नहीं था, लेकिन जो आयोजन किये थे, उनके द्वारा मैं व्यक्तिगत रूप से यह खोज भी कर रहा था कि ऐसे कौन से लोग हैं जिनको अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय में अध्यापक के रूप में ला सकें। योग्य लोगों में से अधिकांश किसी न किसी  विश्वविद्यालय में वर्षों से थे, वहाँ पदोन्नति के कगार पर थे। वे अपनी पदोन्नति और अपना सब पुराना सम्बन्ध छोड़कर वर्धा आएँगे, यह कठिन लग रहा था। कठिन हुआ भी।

    मेरी सोच थी कि इस अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय की फ़ैकल्टी का स्तर बहुत ऊँचा होना चाहिए। इसमें बड़ी कठिनाई थी, क्योंकि हिन्दी विभागों का क्रमशः अध:पतन तेज़ हो चुका था। बड़े अध्यापक ज़्यादातर रिटायर हो गये थे या रिटायर होने के क़रीब थे। ज़्यादातर विभागों की हालत काफ़ी ख़राब थी। वहाँ एकाध दो लोग प्रतिभाशाली थे पर बाक़ी सब? किसी व्यक्ति को प्रोफ़ेसर या अध्यापक बनाएँ तो क्या वह ऊंचे पाये का है? अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय के लिए ऐसे व्यक्ति होने चाहिए जिनको अंतरराष्ट्रीय जगत की भी कुछ समझ हो, कि दुनिया में क्या हो रहा है, दुनिया में ज्ञान के क्षेत्र में क्या हो रहा है। अगर वह साहित्य विद्यापीठ में हो, तो उसको पता हो कि साहित्य में क्या हो रहा है। इस विश्वविद्यालय के लिए सिर्फ़ हिन्दी का ज्ञाता या अध्येता होना काफ़ी नहीं है। यह भी सोचा कि अध्यापकों का चयन करने के लिए क्या कोई ऐसी नयी पद्धति विकसित कर सकते हैं जिसमें अन्ततः हम जो लोग चुनें वे बिल्कुल निष्पक्ष भाव से चुनें—श्रेष्ठता, उत्कृष्टता के मानदण्डों के आधार पर चुनें।

    मेरे मित्र वागीश शुक्ल आई.आई.टी. में गणित के अध्यापक थे। मैंने उनसे कहा कि क्या कोई ऐसी पद्धति हो सकती है जो आमतौर पर शिक्षा-क्षेत्र में अध्यापकों को चुनने की पद्धति से अलग हो। उन्होंने एक बहुत ही बढ़िया नयी पद्धति प्रस्तावित की। आमतौर पर विश्वविद्यालयों में अध्यापकों के तीन स्तर होते हैं—प्रोफ़ेसर, रीडर, एसोसिएट प्रोफ़ेसर और लेक्चरर। हमने इस पद्धति के अनुसार, इन तीनों के लिए, एक साथ विज्ञापन निकाला, जिसके तीन या चार हिस्से थे : आवेदन के साथ अपना संक्षिप्त जीवन और कार्यवृत्त दें। संक्षेप में यह बताएँ कि आपकी नज़र से इस विश्वविद्यालय को पहले दस वर्ष में क्या करना चाहिए। तीसरे खण्ड में, बिना नाम के, चार अंश दिये हुए थे—कविता औैर गद्य, दोनों, के—उस पर व्याख्यात्मक टिप्पणी करना थी। भाषा विद्यापीठ में नियुक्ति के उम्मीदवार को भाषिक संरचना इत्यादि पर टिप्पणी करना और साहित्य विद्यापीठ के उम्मीदवार को साहित्यिक विश्लेषण करना। संस्कृति विद्यापीठ के उम्मीदवार को उन्हीं अंशों की सांस्कृतिक ध्वनियों की व्याख्या करनी थी और अनुवाद विद्यापीठ के उम्मीदवार को इन अंशों का किसी और भाषा में अनुवाद करना था। ये चार खण्ड थे। जब विज्ञापन निकला तो एक प्रोफ़ेसर ने—मुझे नाम याद नहीं है (दिल्ली विश्वविद्यालय में या कहीं कानून के प्रोफ़ेसर थे), ने कहा, यह पद्धति ऐसी है कि इसको यू.जी.सी. को सब विश्वविद्यालयों में लागू कर देना चाहिए। लेकिन इसके अन्तर्गत—प्रोफ़ेसर, रीडर और लेक्चरर—तीनों पदों के लिए, आशा के विपरीत, बहुत कम आवेदन आये। जहाँ तक मुझे याद है, दो सौ से भी कम आवेदन थे।  हमने आवेदकों के नाम और नम्बर हटाकर एक विशेषज्ञ समिति बैठायी कि वह पहली नज़र में देख-पढ़कर कि इन आवेदनों को आगे चुनाव की प्रक्रिया में शामिल करने न करने के सन्दर्भ में जाँच-परख लें, क्योंकि कुछ लोगों ऐसे भी होंगे जिनको पहली ही दृष्टि में ख़ारिज किया जा सकता है। इस प्रक्रिया से गुजर कर बहुत ही छोटी, क़रीब साठ-सत्तर लोगों की, सूची बनी। इन साठ-सत्तर लोगों को मैंने एक चिट्ठी लिखी और कहा कि अब हम आपको एक सामूहिक वक्तव्य के लिए आमंत्रित कर रहे हैं। आप अपना विषय खुद चुनें कि किस विषय पर आप बोलना चाहेंगे। बीस मिनट बोलना है। बीस मिनट से कम बोलेंगे, तो नम्बर कटेंगे और बीस मिनट से ज़्यादा बोलेंगे, तो नम्बर कटेंगे। साहित्य अकादेमी के सभागार में इन सामूहिक वक्तव्यों के लिए दो दिन का आयोजन किया, जिसके लिए विशेषज्ञों की एक नयी समिति बनायी ताकि वे वक्तव्यों की जाँच परख कर सकें। सिर्फ़ एक व्यक्ति पिछली विशेषज्ञ समिति से था ताकि एक तरह की निरन्तरता बनी रहे। उन वक्तव्यों के आधार पर, इस विशेषज्ञ समिति ने, नम्बर दिये। पहले चरण में मिले नम्बर और दूसरे चरण में मिले नम्बरों को मिलाकर एक ऐसी सूची बनायी कि चयनित लोगों को अधिनियम में निर्धारित चयन समिति में बुलाएँगे, लेकिन उसका अवसर इसलिए नहीं आया कि उस समिति में एक विज़िटर का प्रतिनिधि होता है और उसका चयन समिति में होना अनिवार्य है। वह प्रतिनिधि राष्ट्रपति की मंजूरी से होता है, लेकिन मंत्रालय की सिफ़ारिश पर। हमने पहली सूची भेजी, उस पर कोई कार्रवाई नहीं हुई। दूसरी सूची भेजी, उस पर भी कार्रवाई नहीं हुई। क्योंकि तब तक अटल बिहारी वाजपेयी की सरकार आ गयी थी और मुरली मनोहर जोशी अपने वैचारिक पूर्वग्रहों के कारण मेरे विरुद्ध थे। मेरी ख्याति/कुख्याति तो थी ही कि मैं इस सबका विरोधी हूँ। उन्होंने लटका दिया, वह अवसर ही नहीं आने दिया। मेरा कार्यकाल समाप्त हो गया। मैं इस पद्धति में से चुने गये लोगों में से किसी की नियुक्ति नहीं कर सका।

    नये पाठ्यक्रम

    चूँकि वहाँ पढ़ाई शुरू हो गयी थी, तो पढ़ाने के लिए अध्यापक कहाँ से आएँ। मैंने एक पद्धति अपनायी कि हम देशभर में से अच्छे अध्यापकों को एक-एक हफ्ते के लिए, ‘अतिथि अध्यापक’ के रूप में, बुलाते थे। स्थायी तौर पर बुलाने के लिए हर एक विद्यापीठ के लिए जो विचाराधीन सूची थी, उसमें से जो सबसे ऊपर था, उसको अस्थायी तौर पर नियुक्त कर दिया कि जब चयन समिति होगी, उसके सामने जैसा होगा तब होगा—अभी तो ये पढ़ाएँ। खुद मैंने भी कुछ कक्षाएँ लीं क्योंकि पढ़ाने का एक विषय विश्व कविता भी थी।

    कुछ पाठ्यक्रम बनाये। मसलन, संस्कृति विद्यापीठ के अन्तर्गत ‘स्त्री-अध्ययन’ का पाठ्यक्रम बनाया और एक पाठ्यक्रम अहिंसा पर। विशेषज्ञों को बैठाकर ये पाठ्यक्रम बने थे। उस समय देश के किसी और विश्वविद्यालय में अहिंसा या स्त्री अध्ययन पर पाठ्यक्रम नहीं थे—एम.ए. से लेकर शोध तक। एक और पाठ्यक्रम बहुत दिलचस्प है। ऐसा बहुत कहा जाता रहा है कि हिन्दी और उर्दू एक ही अंचल की भाषाएँ हैं और सहोदर भाषाएँ हैं। मैंने कहा कि हम एम.ए. का एक ऐसा कोर्स बनाएँ जिसमें हिन्दी और उर्दू को संयुक्त रूप से पढ़ा जाए। अगर 18वीं या 19वीं शताब्दी पढ़ें तो मीर, ग़ालिब को भी पढ़ें और पदमाकर, देव, भारतेन्दु हरिश्चन्द्र को भी पढ़ें। हिन्दी और उर्दू के विशेषज्ञों, दोनों, को बुलाया। पाठ्यक्रम में यह था कि दोनों भाषाएँ अपनी-अपनी लिपि में ही पढ़ें—उर्दू वाले अरबी लिपि में पढ़ें, हिन्दी वाले देवनागरी में पढ़ें। विशेषज्ञों ने पाठ्यक्रम बनाया। हमने हिन्दी-उर्दू, दोनों, की एक संयुक्त बैठक की। उर्दू के विशेषज्ञों में शमीम हनफ़ी जैसे लोग थे। उन्होंने कहा, “यह पाठ्यक्रम हिन्दी में चल जायेगा, लेकिन उर्दू में नहीं चल पायेगा।” मैंने पूछा, “क्यों?” उन्होंने कहा, “हिन्दी में उर्दू साहित्य का अधिकांश देवनागरी में आ गया है, लेकिन हिन्दी का दस प्रतिशत भी उर्दू में नहीं आया है। न अनुवाद हुआ है, न लिप्यन्तरण हुआ है।” मैंने कहा कि कोशिश करते हैं। बाद में वह पाठ्यक्रम लागू हुआ, लेकिन शायद एक ही छात्र ने उसमें दाखिला लिया। फिर वह, एक तरह से, अपने आप ही खत्म हो गया। वह नहीं हुआ सो नहीं हुआ। 

    एक वैकल्पिक विश्वविद्यालय

    हिन्दी अध्यापकों की, शायद औरों में भी होती होगी, पर, मुझे हिन्दी अध्यापकों का ज़्यादा पता है—आकांक्षा या तो खुद ऐसी जगहों पर जाने की होती है या उनका कोई रिश्तेदार या उनका कोई छात्र वगैरह इन जगहों पर आ जाए इसकी। लेकिन इस नयी पद्धति के हिसाब से उसमें ऐसी कोई गुंजाइश नहीं थी—अगर मैं ख़ुद भी चाहूँ तो हस्तक्षेप नहीं कर सकता था : मैंने ऐसी पद्धति बनायी थी—इस पद्धति से जो आएगा सो आएगा।

    फिर ऐसा प्रवाद व्यापक था कि यह कैसा विश्वविद्यालय है जिसमें पढ़ाई नहीं हो रही है! दो-तीन साल पढ़ाई नहीं हुई। मेरी अपनी दृष्टि यह थी कि पढ़ाई—तथाकथित पढ़ाई—हमारा सबसे निचला सरोकार होगी। इतने सारे विश्वविद्यालयों में हिन्दी की पढ़ाई हो ही रही है, तो हम पढ़ाई पर इतना ज़ोर क्यों दें? हमारा ज़ोर वैकल्पिक पढ़ाई और शोध पर होना चाहिए। बल्कि उन दिनों मैंने प्रधानमंत्री को एक लम्बी चिट्ठी लिखी थी, जिसमें इन अंतर्विरोधों की ओर इशारा किया था। मैंने यह भी कहा कि भावात्मक उद्वेलन के तहत विश्वविद्यालय को वर्धा में रखा गया है। वर्धा में कोई अंतरराष्ट्रीय विश्वविद्यालय नहीं बन सकता। महात्मा गांधी के समय वर्धा में अंतरराष्ट्रीय महत्त्व का सेवाग्राम बना था, लेकिन वह महात्मा गांधी के कारण बना था—अब कोई ऐसा है ही नहीं। वहाँ ऐसा कोई बौद्धिक या अकादेमिक स्थानीय संसाधन नहीं है जिसका उपयोग विश्वविद्यालय कर सके। इसको किसी बड़े केन्द्र के पास होना चाहिए था—दिल्ली के पास रख दें, चाहे बेंगलुरु या मुम्बई के पास। विश्वविद्यालय की संरचना को, असल में, एक विश्व हिन्दी संस्थान के रूप में परिकल्पित करना चाहिए था—हिन्दी में विश्व स्तर की शोध करने व कराने के लिए; ताकि दुनियाभर में हो रही इस तरह की शोध के साथ कुछ तालमेल भी बैठ सके या बैठाया जा सके। बाक़ी दूसरे अकादेमिक कामों के लिए एक दूसरे किस्म के विश्वविद्यालय की ज़रूरत थी। दोनों काम साथ नहीं कर सकते। हिन्दी का प्रचार-प्रसार और हिन्दी को अंतरराष्ट्रीय प्रतिष्ठा कैसे दिलाएँगे? यह सब प्रधानमन्त्री को लिखा था, लेकिन उनका जवाब नहीं आया। जब मैं उनसे मिला, तो उन्होंने कहा, “आपकी बात ठीक है, लेकिन हंगामा हो जायेगा। यह नहीं हो सकता।”  नहीं हुआ।

    एक दूसरे स्तर पर, महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय को एक वैकल्पिक विश्वविद्यालय बनाने के लिए, मैंने बौद्धिक प्रयत्न करना शुरू किया। अब यह किसको बताता कि पढ़ाने का काम कैसे शुरू करें जब फ़ैकल्टी ही नियुक्त नहीं कर सकते? मेरे पास, पूरे कार्यकाल में, कोई कुलसचिव नहीं था, कोई वित्तीय अधिकारी नहीं था। मेरे कार्यकाल के डेढ़ वर्ष में मेरे पास कार्यकारी परिषद् नहीं थी। यह सब जान कर भी मुरली मनोहर जोशी और मानव संसाधन विकास मंत्रालय इस बारे में कुछ नहीं करना चाहते थे। मुझे दबाना चाहते थे।

    तीन पत्रिकाएँ

    काम करने के लिए जिस व्यावहारिक ढाँचे की दरकार होती है वह सब मेरे पास नहीं था। लेकिन मैंने कुछ प्रयत्न करना शुरू किये। हमारे यहाँ विश्वविद्यालय पत्रिकाएँ नहीं निकालते, यदि निकालते भी हैं तो उनकी कभी कोई कीर्ति नहीं बनती। पहले शायद ‘विश्व भारती’ भर थी। रवीन्द्रनाथ टैगोर, हजारीप्रसाद द्विवेदी और इस तरह के लोगों के कारण ‘विश्व भारती’ पत्रिका महत्त्वपूर्ण थी। बाक़ी विश्वविद्यालयों की कोई पत्रिका कभी महत्त्वपूर्ण नहीं हुई। कहीं हुई हो, तो मुझे पता नहीं। मैंने एक पत्रिका सोची—‘बहुवचन’। दूसरी पत्रिका अंग्रेज़ी में  ‘हिन्दी’ नाम की सोची। ऐसी कोई पत्रिका नहीं है जो हिन्दी से अंग्रेज़ी में अनुवाद पर एकाग्र हो और दुनिया भर में हिन्दी के बारे में हो रहे शोध और अध्ययन को एकत्र करने का मंच बने। तीसरी पत्रिका के लिए मेरा सोच यह था कि हिन्दी में इतनी पुस्तकें निकलती हैं, जो सिर्फ़ साहित्य की ही नहीं बल्कि ज्ञान की दूसरी शाखाओं, दूसरे अनुशासनों के बारे में भी है। जैसे, खेतीबाड़ी के बारे में, पर्यावरण के बारे में, विज्ञान के किसी पक्ष के बारे में किताबें हो सकती हैं। उन किताबों की नियमित समीक्षा के लिए—‘पुस्तक-वार्ता’। ये तीन पत्रिकाएँ निकालीं। 

    सौ विश्वविद्यालयों को उपहार

    इस दौरान मैंने एक-दो विदेश यात्राएँ कीं और उन विश्वविद्यालयों में जाकर देखा जिनमें हिन्दी के विभाग थे। इससे दो बातें समझ में आयीं। इन विश्वविद्यालयों में ज़्यादातर काम मध्यकालीन साहित्य या प्राचीन साहित्य या बहुत हुआ तो छायावाद इत्यादि तक सीमित था। एक पोलेण्ड का क्रेको विश्वविद्यालय भर अपवाद था, जहाँ आधुनिक और लगभग समकालीन हिन्दी साहित्य पर कुछ विचार-विमर्श, शोध हो रहा था। मैंने सोचा कि यह थोड़ा विचित्र है। मैंने वहाँ यह सवाल पूछा कि क्या मन में यह जिज्ञासा नहीं होती कि जिस भारत के बारे में शोध कर रहे हैं, उसमें यह जानें कि आज क्या हो रहा है? जिस हिन्दी में शोध कर रहे हैं, उस हिन्दी में आज क्या लिखा जा रहा है? इन प्रश्नों का उनके पास कोई सन्तोषप्रद उत्तर नहीं था। वह कहते थे कि हमारे पास जानकारी कम होती है। मैंने तय किया कि विश्वविद्यालय की ओर से  इनको हिन्दी की कुछ अच्छी पत्रिकाएँ उपहार स्वरूप भेजना शुरू करूँगा। एक समिति बनायी। विश्व भर के विश्वविद्यालयों के सौ विभागों में हिन्दी पढ़ाई जाती है, उन्हें हिन्दी की सत्रह-अठारह पत्रिकाएँ भिजवायीं जाएं। यह तय हुआ कि इन पत्रिकाओं का वार्षिक शुल्क और पत्रिकाओं को भेजने में आने वाला खर्च विश्वविद्यालय देगा। ये उपहार हमने सौ विश्वविद्यालयों को देना शुरू किया।

    दूसरे क़िस्म के काम

    हमने पाया कि इस समय पढ़ाई-लिखाई में पुस्तकें खोज कर पढ़ने की वृत्ति थोड़ी शिथिल हो रही है और हर चीज़ को दृश्य में परिवर्तित करने का उत्साह बहुत हो गया है। हमने सोचा कि सौ पोस्टर्स का एक संग्रह प्रकाशित करें जो लेखकों पर ही नहीं प्रवृत्तियों पर भी हो, पत्रिकाओं पर हो, पुस्तकों के पहले संस्करण पर भी हों। एक रूप बनना शुरू हुआ। मसलन, मान लीजिए, बर्लिन में कोई छायावाद पढ़ा रहा है, तो वह पोस्टर संग्रह जो हम उस विभाग को उपहार के रूप में दे आये होंगे, उसमें से वह ऐसे पाँच या सात पोस्टर चुनकर कक्षा में लगा सकता है जहाँ छात्र देख पाएँ कि सुमित्रानंदन पंत कैसे दिखते थे या महादेवी कैसी दिखती थीं और उनके बारे में कुछ बुनियादी जानकारी हो। जैसे, ‘परिमल’ का पहला संस्करण या ‘अनामिका’ का पहला संस्करण या ‘कामायनी’ का पहला संस्करण कैसा था। मगर वह भी अधूरा रह गया। आठ-दस छबि संग्रह ही बने। दूसरी बात थी कि हिन्दी अंचल में ‘अभिलेखन’ का बहुत अभाव है। सोचा कि कुछ लेखकों के छबि संग्रह बनाएँ। छः-सात बन पाये।

    हिन्दी में रीडर्स/संचयिताओं की कोई परम्परा नहीं थी। मैंने सोचा कि आधुनिक काल के बड़े लेखकों की संचयिताएँ  तैयार करें। निराला, हजारीप्रसाद द्विवेदी, फणीश्वरनाथ रेणु, रघुवीर सहाय, त्रिलोचन, श्रीकान्त वर्मा, अज्ञेय आदि की संचयिताएँ बनायीं। ये सब काम किसी और विश्वविद्यालय ने नहीं किये थे। न पहले किये थे और न उसके बाद किये। यह सब एक तरह से, दूसरे क़िस्म का काम था।

    अभिलेखन के काम करने के सन्दर्भ में यह ख्याल आया कि एक वृत्ति के रूप में अब दृश्यता लगभग केन्द्रीय हुई जा रही है, लेकिन हमारे पास बड़े लेखकों-कवियों की, उनकी अपनी आवाज़ में, कोई सामग्री नहीं है। मैंने एक फिल्मकार से कहा कि एक आयोजन कर के इस बात को मूर्त रूप दिया जाय। हमने भोपाल में आयोजन किया और उस समय जीवित तीस-चालीस कवियों को आमंत्रित किया। उन कवियों में से अधिकांश अब नहीं हैं। शिवमंगल सिंह सुमन, लक्ष्मीकान्त वर्मा, नरेश मेहता, नेमिचन्द्र जैन, विष्णु खरे, चन्द्रकान्त देवताले, मंगलेश डबराल आदि। इन सब लोगों का दृश्य-श्रव्य माध्यम से काव्य-पाठ रिकार्डेड है। इन रिकॉर्डिंग्स की सीडी बनायीं। आठ या दस सीडी का एक सेट था। इससे छात्र सुन सकते हैं कि कोई कवि कविता कैसे पढ़ता है। हमारे यहाँ इसके अवसर बहुत ही कम हैं। 

    मैंने विश्वविद्यालय में लेखकों की पाण्डुलिपियों के संग्रह की एक योजना शुरू की थी, जिसके अन्तर्गत इलाहाबाद के कुछ लेखकों की पाण्डुलिपियाँ प्राप्त की गयी थीं। अमरीका से आये नरेन्द्र शर्मा के परिवार ने नरेन्द्र जी की बहुत सारी पाण्डुलिपियाँ दी थीं। उसका एक छोटा आयोजन भी हम लोगों ने किया था। यह सब काम बोधिसत्व कर रहे थे। अब मुझे पता नहीं कि वे पाण्डुलिपियाँ कहाँ हैं, किस स्थिति में हैं।

    हमने मौखिक अभिलेखन की भी योजना शुरू की थी। पहली परियोजना कवि-अनुवादक नीलाभ को दी थी। हिन्दी के अलग-अलग केन्द्रों में जो बहसें हुई हैं, उसका जो माहौल है, वहाँ जो लोग हैं उनसे बात करके अभिलेखन की एक योजना थी। एक तरह से स्वातंत्र्योत्तर दृश्य के साहित्यिक केन्द्रों में जो बचा हुआ था—किस तरह की गोष्ठियाँ होती थीं, किस तरह से बहसें और विवाद होते थे इत्यादि पर उन्होंने काम किया था। मेरे कार्यकाल के बाद चार खण्डों में यह प्रकाशित भी हुआ।

    हमने पटना में फ़णीश्वरनाथ रेणु, सागर में नंददुलारे वाजपेयी, बनारस में जयशंकर प्रसाद, दिल्ली में अज्ञेय और जैनेन्द्र कुमार की स्मृति में व्याख्यानमालाएँ स्थापित की थीं। मेरे रहते कुछ व्याख्यान हुए। बाद में मुझे पता नहीं कि क्या हुआ—वे चल रही हैं, या नहीं चल रही हैं, मुझे ख़बर नहीं।

    एक अंतरराष्ट्रीय व्याख्यानमाला फ़ादर कामिल बुल्के की स्मृति में भी शुरू करने की बात थी, जो उस समय तक नहीं हो पायी थी, कि अंतरराष्ट्रीय स्तर का हिन्दी का कोई विद्वान आकर दो-तीन व्याख्यान दे। यह व्याख्यानमाला मेरे रहते शुरू नहीं हो पायी थी। मुझे नहीं पता कि बाद में उसका क्या हुआ।

    दो वाजपेयी

    महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय का कुलपति रहते हुए एक दिलचस्प वाक़या यह हुआ कि तब के प्रधानमंत्री श्री अटलबिहारी वाजपेयी से एक मुलाक़ात हुई। उसका सन्दर्भ यह है कि उस मुलाक़ात के दस-पन्द्रह दिन पहले एनडीटीवी पर ‘हिन्दी दिवस’ के उपलक्ष में हिन्दी पर कोई आधा घंटे का कार्यक्रम था, जिसमें पंकज पचौरी ने मुझसे बात की थी। वह कार्यक्रम ‘फ़ोन इन’ था—फ़ोन आते थे और लोग प्रश्न पूछते थे। जब कार्यक्रम समाप्त हो रहा था, उन्होंने मुझसे पूछा, ‘‘हमारे प्रधानमंत्री भी कवि हैं, आप भी कवि हैं। आपकी प्रधानमंत्री की कविता के बारे में क्या राय है।’’ मैंने कहा, “एक वाजपेयी को दूसरे वाजपेयी के बारे में राय नहीं देनी चाहिए।” हँसी-ठहाके में मामला ख़त्म हो गया। बाद में अटल जी से मुलाक़ात हुई। मैं उनके निवास, 7, रेसकोर्स रोड, पर गया था। वह सामने बैठे थे। उनके बग़ल में एक मेज़ थी और उधर एक दूसरी कुर्सी थी। मैं सामने बैठने लगा। उन्होंने कहा, ‘‘नहीं। अशोक जी, यहाँ आइए, बग़ल में बैठिए। एक वाजपेयी का दूसरे वाजपेयी के बग़ल में बैठना तो वर्जित नहीं है।” न जाने उनको यह कहाँ से पता चल गया होगा! जैसा भी रहा हो।

    दो प्रस्ताव

    विश्वविद्यालय की समस्याओं के अलावा मैंने अटल जी को दो सुझाव दिये। एक, वे एक भारतीय भाषा आयोग बनाएँ। हमारी भाषाओं में क्या हो रहा है और उनकी क्या स्थिति है, उसमें ज्ञान उत्पादन की क्या स्थिति है, आईटी को लेकर क्या तैयारी है, शिक्षा के क्षेत्र में क्या हो रहा है, कानून में क्या हो रहा है, इत्यादि को लेकर—यह प्रस्ताव था कि जैसे बहुत सारे राष्ट्रीय आयोग हैं, ऐसा भाषा का एक राष्ट्रीय आयोग बना दिया जाये। दूसरा प्रस्ताव यह था कि राष्ट्रीय कलाकार-लेखक कल्याण कोष स्थापित किया जाये। लेखक-कलाकार बीमार पड़ते हैं, और वित्तीय कठिनाइयों में होते हैं, उनको आसानी से मेडिकल उपचार नहीं मिलता क्योंकि बड़ा खर्चीला होता है। इसका एक कोष बना दिया जाये, जिसमें सरकार कुछ योगदान दे, राज्य सरकारों से योगदान ले और जो संगीत की कम्पनियाँ हैं, प्रकाशक हैं, उनको भी प्रोत्साहित किया जाये कि वे भी योगदान दें। वे दोनों प्रस्ताव मान गये। उन्होंने अपने निजी सचिव, आई.ए.एस. अफ़सर शक्ति सिन्हा, को बुलाया। उनसे कहा, ‘‘ये प्रस्ताव हमको करना हैं। ये ब्यूरोक्रेसी में खो न जायें।’’ मैं बड़ा मुदित मन चला आया, कि हो गया। आगे जाकर कुछ हुआ नहीं। मैंने प्रधानमंत्री को चिट्ठियाँ लिखीं। एकाध नाराज़ चिट्ठी भी लिखी कि मैं हिन्दी में चिट्ठी लिखता हूँ, शायद आपके कार्यालय में कोई हिन्दी पढ़ने वाला नहीं है, तो मैं अब अंग्रेज़ी में लिख रहा हूँ। उसके पहले उनके एक संयुक्त सचिव सुधीन्द्र कुमार कुलकर्णी ने एक बार मुझे बुलाकर कहा, “आप इसका केबिनेट नोट बनाकर दीजिए। आज प्रधानमंत्री ने इसके बारे में पूछा था कि क्या हुआ। आप जानते हैं कि केेबिनेट नोट कैसे बनाना है।” मैंने केबिनेट नोट बनाकर भेज दिया। उसके बाद उनको चिट्ठी भी लिखी। प्रधानमंत्री के प्रमुख सचिव को भी चिट्ठी लिखी। कोई जवाब नहीं आया, कुछ भी नहीं हुआ।

    एक और प्रसंग। यह हुआ कि उन्हीं दिनों या उसके अगले या पिछले वर्ष—मुझे ठीक से कालक्रम याद नहीं है—लंदन में विश्व हिन्दी सम्मेलन हो रहा था। वह एक मात्र विश्व हिन्दी सम्मेलन है जिसमें मैं गया। बाद में दो-तीन बार मुझे आधिकारिक प्रतिनिधि मंडल में शामिल किया गया। मैं नहीं गया। मेरे हिसाब से यह सम्मेलन बहुत ही बड़ा, व्यर्थ और खर्चीला पाखण्ड है। उससे कुछ होता नहीं। हिन्दी की प्रतिष्ठा और अंतरराष्ट्रीय मान्यता में एक इंच भी वृद्धि नहीं होती।

    ‘हिन्दी दिवस’ आ रहा था और उसके पहले हम लोग लंदन जा रहे थे। मैंने प्रधानमंत्री को एक चिट्ठी लिखी कि बहुत अच्छा हो अगर आप हिन्दी और दूसरी भारतीय भाषाओं को एक साथ रखकर यह घोषणा करें कि भाषा का एक राष्ट्रीय आयोग बनाएँगे। यह प्रस्ताव मैंने पहले भी दे रखा था। उस समय मेरे पास कोई संसाधन नहीं थे, मैं अपने घर से काम करता था। मैंने वह चिट्ठी अपने ड्राइवर से 7, रेसकोर्स रोड भिजवा दी। मुझे याद है, 2 या 3 सितम्बर की बात है। 4 सितम्बर को पी.एम.ओ. से फ़ोन आ गया कि प्रधानमंत्री ने आपका पत्र देखा है और वे घोषणा करना चाहते हैं। उन्होंने कहा कि वाजपेयी साहब से कहिये कि घोषणा का प्रारूप भी बनाकर भेज दें। इसका ख्याल रखें कि इस समय आचार संहिता लागू हो गयी है तो उस घोषणा में उसका कोई उल्लंघन न हो। मैंने भेज दी।

    मैं लंदन से लौटकर आया। मुझे कोई सूचना नहीं  थी। मैं किसी सिलसिले में बिलासपुर गया था, वहाँ के विश्वविद्यालय में कुछ था। वहाँ एक चैनल ने मेरा इंटरव्यू लिया, उसमें कहा कि प्रधानमंत्री ने 14 सितम्बर को यह घोषणा की है कि एक भारतीय भाषा आयोग बनेगा। मैंने कहा, ‘‘अच्छा! मुझे पता नहीं था।’’ मैंने सोचा कि चलो हो गया।

    गृह मंत्रालय के अन्तर्गत एक राजभाषा विभाग है। इस विभाग में मेरा ही एक बैचमेट सचिव था। उसका फ़ोन आया, ‘‘भई ये मामला हमारे पास काहे को भिजवा दिया तुमने? यह मानव संसाधन विकास मंत्रालय में जाना चाहिए।’’ मैंने कहा, “हाँ, बिल्कुल ठीक है।” मैंने फिर चिट्ठी लिखी। वह मामला मानव संसाधन विकास मंत्रालय चला गया। उस समय के शिक्षा सचिव काव थे। उनसे जब-तब मुलाक़ात होती रहती थी। एक मुलाक़ात में उन्होंने कहा, “आपने जो प्रस्ताव दिया है वह नहीं हो पायेगा।” मैंने कहा, “क्यों, क्या हुआ।” कहने लगे, ‘‘क्योंकि आप सीधे प्रधानमंत्री के पास चले गये।’’ मैंने कहा, “मैंने जिस दिन प्रधानमंत्री से समय माँगा था, ठीक उसी दिन मैंने एक चिट्ठी मानव संसाधन विकास मंत्री को भी लिखी थी कि मुझे मिलने का समय दीजिए। प्रधानमंत्री कार्यालय से मुझे दस-पन्द्रह दिन बाद ही समय मिल गया और मानव संसाधन विकास मंत्री से दस महीने बाद मिला, तो मैं क्या करूँ! उन्होंने कहा, “वह नहीं होगा।” और मामला ख़त्म! 

    इस प्रसंग का दिलचस्प पक्ष यह है कि थोड़े दिन बाद मानव संसाधन विकास मंत्रालय में एक भारतीय भाषा प्रोन्नति परिषद् बनी। उसके अध्यक्ष प्रधानमंत्री थे। दो वर्ष तक उसकी कोई बैठक नहीं हुई और सारे सदस्यों का कार्यकाल समाप्त हो गया। मैं इस परिषद् का सदस्य हूँ, इसकी मुझे कोई औपचारिक सूचना भी नहीं मिली। जब कार्यकाल समाप्त हो गया और उसका पुनर्नवीकरण हुआ तब सूचना मिली। एक बैठक प्रधानमंत्री निवास पर हुई, जिसकी अध्यक्षता अटलबिहारी वाजपेयी ने की। मैंने कई सुझाव दिये। मसलन, जिस तरह यूनेस्को में एक इकाई संसार की एनडेंजर्ड लैंग्वेज़ पर ध्यान रखती है वैसे ही हमको एक इकाई भारत में बनानी चाहिए, जिससे यह पता लगे कि कौन-सी भाषा में अब ख़तरा है कि वह लुप्त हो सकती है। इस तरह के कई सुझाव थे—सब सुने गये, मान भी लिये गये। लेकिन तब तक अटल जी की सरकार का कार्यकाल समाप्त हो गया, और उसके मिनिट्स भी जारी नहीं हुए। मैंने कोशिश की। बाद में उस समय की संयुक्त सचिव—एक बंगाली महिला—को चिट्ठी भी लिखी। कोई जवाब नहीं आया।

    इन प्रसंगों में नौकरशाही नहीं, भारतीय जनता पार्टी की आन्तरिक राजनीति भी सक्रिय रही होगी। इस प्रस्ताव की जो भी मूल्यवत्ता हो, आया तो एक भाजपा विरोधी से—इसकी भी कोई भूमिका रही होगी, मुझे नहीं मालूम। तीन बार भाषाओं के लिए कुछ करने का प्रस्ताव माना जाकर भी कार्यान्वित नहीं हुआ।

    ज़मीन और इमारतें

    मोटे तौर पर वर्धा में ज़मीन निर्धारित कर दी गयी थी, लेकिन ज़मीन का क़ब्ज़ा नहीं मिला था। विश्वविद्यालय के नाम ज़मीन का आवंटन नहीं हुआ था। वह सब करने-कराने में एक-डेढ़ साल लगा। वहाँ डेढ़-दो साल में बहुत बार गया। मुम्बई सचिवालय गया। अन्ततः मैंने शरद पवार से कहा। शरद पवार ने मुझे अपने घर बुलाया। वे मुख्यमंत्री भी रह चुके थे। मैंने उनसे बात की। उन्होंने मुख्य सचिव को फ़ोन किया। तब जाकर वह ज़मीन मिली। यह ज़मीन मिलते-मिलते और इसकी चहारदीवारी बनाते-बनाते मेरे कार्यकाल का लगभग अन्तिम वर्ष आ गया। मैंने सोचा कि भूमि पर इमारतें बनाने के लिए एक राष्ट्रीय वास्तु स्पर्धा करना चाहिए। जूरी में आगा ख़ाँ फ़ाउण्डेशन (जिनेवा में आर्किटेक्चर का एक बड़ा फ़ाउण्डेशन) से आग्रह किया। उन्होंने अपना एक प्रतिनिधि भेजा। एक प्रदर्शनी की। जूरी ने प्रदर्शनी में  देखकर दो हिस्सों में चुना—विश्वविद्यालय की मुख्य इमारतें, छात्रावास और दूसरे किस्म की रिहायशी इमारतें। मेरे कार्यकाल के लगभग अन्त में उनके लिए आदेश मिल पाया जिनको हमने नियुक्त किया था। बाद में उनको बहुत कठिनाइयाँ हुईं। एक ने छोड़ भी दिया, वह अलग बात है।

    लीला सॉफ्टवेयर

    निर्धाारित किये गये पाठ्यक्रमों में एक अनिवार्य तत्त्व यह रखा था कि चाहे किसी भी विद्यापीठ में क्यों न पढ़ रहे हों, कम्प्यूटर का एक बुनियादी प्रशिक्षण लेना अनिवार्य होगा।

    ‘लीला’ नाम से एक योजना बनी। यह था कि हम कम्प्यूटर के सन्दर्भ में भी हस्तक्षेप करें। कंप्यूटर की अपनी प्रविधियाँ हैं, उसमें हिन्दी को कैसे डाला जाये। इसलिए ‘लीला’ नाम से एक सॉफ्टवेयर बना।

    दो काम और

    अपने लिए मैंने दो काम और तय किये थे। हिन्दी में व्याकरण को लेकर बहुत उलझन है। व्यापक तौर पर ऐसा है कि जैसे हमारा व्याकरण व्यवहार में तो बदलता है लेकिन शास्त्र में नहीं बदलता। यह तय किया कि हिन्दी का एक नया व्याकरण बनाएँगे जिसमें तमाम व्याकरणों की मदद लेंगे—मानक रूप और उसके अलावा प्रचलित रूप की। एक उदाहरण देता हूँ। हिन्दी में मानक रूप यह होगा कि ‘मुझे वहाँ जाना है’ लेकिन प्रचलित रूप, ख़ासकर पंजाबी और मराठी में, जब लोग हिन्दी बोलते हैं तो कहते हैं—‘मैंने वहाँ जाना है’। भले यह मानक रूप नहीं है, लेकिन प्रचलित है : हिन्दी बोलने वाले भी ऐसा कर सकते हैं। ‘मैंने बात की’ ऐसा होना चाहिए, लेकिन प्रचलित रूप है, ‘मैंने बात करी’। इस तरह के प्रचलित रूपों को भी शामिल करें। यह व्याकरण ऐसा हो जो आगे जाकर संशोधित, परिवर्धित हो। यह इसका एक हिस्सा था।

    दूसरा था कि हिन्दी का एक नया कोष बनाएँ। ‘हिन्दी शब्द सागर’ की भूमिका रामचन्द्र शुक्ल ने लिखी और वह भूमिका ही हिन्दी साहित्य का इतिहास के रूप में बनी। प्रयत्न किया जाए कि एक कोष बने। जैसे ऑक्सफ़ोर्ड डिक्शनरी हर वर्ष कुछ नये शब्द शामिल करती है, उनकी घोषणा होती है और वे कोष में शामिल हो जाते हैं, वैसे ही हिन्दी के लिए भी करें। हमारा एक काम यह भी होना चाहिए।

    ये सब काम कहीं नहीं लिखे थे, बल्कि ये सब काम विश्ववि़द्यालय के माने ही नहीं जाते। हिन्दी विभागों के तो कतई नहीं माने जाते थे।

    दस वर्ष की योजना और कटु अनुभव

    भारत सरकार के मानव संसाधन विकास मंत्रालय के अन्तर्गत एक विशेषज्ञ संस्था शिक्षा इत्यादि के बारे में शोध करती थी और तरह-तरह से सर्वेक्षण आदि करती थी। महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिन्दी विश्वविद्यालय का कुलपति रहते हुए मैंने उस संस्था से आग्रह किया कि वे हमारी दस वर्ष की एक योजना बना दें कि हमको क्या करना चाहिए। अपने अधिनियम में जो लक्ष्य इत्यादि हैं, उनको ध्यान में रखते हुए। और वर्तमान परिस्थिति को भी ध्यान में रखते हुए कि हम कैसे, क्या करें। अपनी ओर से मैंने उनको यह भी सुझाया कि उसमें परामशर्दाता के रूप में नामवर सिंह, वागीश शुक्ल इत्यादि को रख सकते हैं। बाद में शायद उसकी कोई रिपोर्ट भी आ गयी थी पर शायद मेरे रहते नहीं आयी थी।

    लगभग एक साल अपने घर से ही काम करता रहा था। जब देखा कि मेरे पास न रजिस्ट्रार है, न वित्तीय अधिकारी है, तो मुझको  ही जाकर विश्वविद्यालय अनुदान आयोग से अनुदान लेना है, मुझको ही जाकर सारी चीज़ें समझानी हैं क्योंकि मेरे पास कोई था ही नहीं। मैंने अपूर्वानन्द से आग्रह किया कि वे साथ आ जाएँ। वह अकादेमिक अधिकारी के रूप में आये थे। उनसे कुछ प्रशासनिक काम भी लेना शुरू हो गये।

    हमारी पहली कार्यकारिणी में अच्छे लोग थे। विद्यानिवास मिश्र, रामस्वरूप चतुर्वेदी, कृष्णा सोबती, मृणाल पाण्डे, विष्णुकान्त शास्त्री थे। अच्छे लोग थे। इनमें से एकाध दो को छोड़कर, बाक़ी सबने पूरा समर्थन दिया। पूरा सहयोग दिया। लेकिन विश्वविद्यालय को लेकर फैलने वाले प्रवादों का प्रतिकार करने की कभी कोई कोशिश नहीं की।

    इनमें से विद्यानिवास मिश्र की विद्वत्ता का बहुत आदर था, लेकिन उनका अपने रिश्तेदारों को हर जगह ठूँसने का अदम्य उत्साह भी था। कुल मिलाकर, वह ठीक नहीं था। हिन्दी विभाग के मैनेजर पाण्डे और इस तरह के लोग कहने लगे थे कि एक ऐसा विश्वविद्यालय है जिसमें पढ़ाई ही नहीं होती!

    मैं पढ़ाई को जितना टाल सकता था उतना टालना चाहता था। मुझे लगता था कि इस विश्वविद्यालय का मुख्य काम पढ़ाई नहीं होना चाहिए। हम बिना अध्यापक के कैसे पढ़ा लेंगे, और ऐसा क्या पढ़ा लेंगे जो जे.एन.यू. या इलाहाबाद विश्वविद्यालय या बनारस विश्वविद्यालय में नहीं पढ़ाया जा रहा है? लोग वहाँ छोड़कर हमारे पास क्यों आएँगे? न हमारे पास साधन हैं, न हमारी इमारतें बनी हैं, न हमारे पास प्रशासनिक स्टाफ़ है और न अकादेमिक स्टाफ़ है। इसका कोई ज़िक्र भी नहीं होता था।

    अधिकांश की दबी-छुपी आकांक्षा यही थी कि उनका कोई भतीजा, उनका कोई बहनोई आदि यहाँ आ जाए और नौकरी पा जाये। उस ज़माने में मैंने हिन्दी के अकादेमिक जगत की, बहुत ही हताश करने वाली, बुद्धि-विरोधी और अनैतिक कार्यवाही देखी है। इसमें ज़्यादातर विद्वान लोग शामिल थे। नामवर सिंह शामिल थे। नामवर जी को पछतावा होता था कि मेरे कुलपति होने में उनकी किंचित भूमिका क्यों रहीं! जे.एन.यू. में उन्होंने नवाचार किया था, लेकिन वे दूसरे किस्म के नवाचार को पहचानने तक में असमर्थ थे।

    मुझे लगता है कि तब तक नामवर जी अपनी संकीर्णता में पूरी तरह से लिप्त हो चुके थे। वह लगभग कपिला वात्स्यायन हो गये थे—इस अर्थ में कि कोई मुझसे बेहतर न कर पाये; ऐसा न कर जाये कि उनका काम थोड़ा धूमिल पड़ जाये। हो सकता है यह सही न भी हो, मेरी अतिरंजित प्रतिक्रिया हो। पर उसने मुझे बहुत कटु बनाया। 

    हमने शोधकर्ताओं का एक वार्षिक समागम करना शुरू किया। निर्मला जैन और इस तरह के लोगों को बुलाया। इसलिए कि जो लोग शोध कर रहे हैं उनका भी एक मंच बनना चाहिए। हिन्दी में शोध की दुर्गति को देखते हुए, कि उनको एक तरह का पीयर प्रेशर बने, वे अपने में सीमित रहकर ही शोध न करें, यह भी जानें कि दूसरे लोग किस तरह का शोध कर रहे हैं। ऐसा भी एक समागम शुरू किया था।

    नेतृत्व के स्तर

    इसी बीच एक भयानक दुर्घटना हुई। 2002 में, गुजरात में, मुसलमानों का नरसंहार। मैं बहुत क्षुब्ध हुआ। हम बड़ौदा गये—मैं, अपूर्वानन्द, महाश्वेता देवी और के. सच्चिदानन्दन। वहाँ मेरी तबियत थोड़ी खराब हो गयी, मैं लौट आया। लेकिन वे लोग आगे अहमदाबाद गये। वहाँ का भयावह दृश्य देखा। फिर दिल्ली में लेखको-कलाकारों का जमावड़ा शुरू किया। दो-चार सभाएँ हुईं, जिसमें बहुत लोग शामिल थे। नामवर सिंह, उस्ताद रहीम फ़हीमुद्दीन डागर और चित्रकार आदि शामिल थे। हम लोग मार्च करके राष्ट्रपति भवन गये। राष्ट्रपति को एक ज्ञापन दिया जिसमें नरेन्द्र मोदी सरकार को भंग करने की माँग की—साम्प्रदायिक विद्वेष में उसकी भूमिका के कारण। यह तय किया कि इतनी बड़ी घटना को लेखक-कलाकार जिस तरह देखते हैं, उसका एक संचयन तैयार किया जाये। मैंने बहुत सारे लेखकों और कलाकारों को एक चिट्ठी लिखी। पहले मैंने, कुलपति के रूप में, एक चिट्ठी, देश भर के कुलपतियों को लिखी कि यह हमारी संवैधानिक व्यवस्था पर हमला है और इस समय चुप नहीं रहना चाहिए। अपनी आवाज़ उठानी चाहिए—हम बौद्धिक जगत् के नेतृत्व के स्तर पर हैं। किसी ने कोई जवाब नहीं दिया। एक ने भी जवाब नहीं दिया।

    दूसरी चिट्ठी बहुत सारे लेखकों और कलाकारों को लिखी थी। सोमनाथ होर और कई लोगों को। सोमनाथ होर ने अपना एक रेखांकन ही भेज दिया था। यह चिट्ठी, जाहिर है, किसी लेखक मित्र ने ही मानव संसाधान मंत्रालय में भिजवा दी। वहाँ से मुझे एक चिट्ठी आयी कि यह पत्र आपके द्वारा लिखा हुआ प्रतीत होता है, आप इसके बारे में स्थिति स्पष्ट करें। मैंने स्थिति स्पष्ट करते हुए चार बातें कहीं। पहली बात यह कही कि यह पत्र मैंने कुलपति के रूप में नहीं लिखा है, और न अपने दफ्तर से लिखा है। इसमें मेरे निवास का पता है : मैंने इसे एक नागरिक के रूप में लिखा है। दूसरी बात यह कि मैं यह मानता हूँ कि कुलपति एक स्वतन्त्र नागरिक है, वह भारत सरकार का अधिकारी या कर्मचारी नहीं है, इसलिए उसे यह पूरा अधिकार है कि वह ऐसे किसी मामले पर अपनी राय व्यक्त करे। तीसरी बात मैंने लिखी कि मैं इस ओर ध्यान आकर्षित करना चाहूँगा कि वर्तमान मानव संसाधन मंत्री डॉ. मुरली मनोहर जोशी वर्षों से भारतीय जनता पार्टी में सक्रिय रहे हैं, भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष रहे हैं, और उसके साथ-साथ वह इलाहाबाद विश्वविद्यालय में भौतिकीशास्त्र के प्रोफ़ेसर भी रहे हैं और इस पर कभी कोई आपत्ति नहीं की गयी है। मेरे पत्र का कोई जवाब नहीं आया, लेकिन उससे तनातनी और बढ़ गयी। उन्होंने मेरे कार्यकाल में कोई कार्य परिषद् नामजद नहीं की, कोई अधिकारी भी नहीं दिये। चूँकि विजिटर्स नॉमिनी नहीं हुए, तो मैं किसी तरह की फैकल्टी भी नियुक्त नहीं कर सका। नामवर जी के बहुत ही सक्रिय प्रोत्साहन से यह प्रवाद पूरे हिन्दी जगत् में फ़ैल गया कि मैंने कुछ किया ही नहीं। इसमें नामवर जी की बड़ी भूमिका थी।

    न्यायिक जाँच

    मेरे बाद श्री गोपीनाथन कुलपति बने। वे एकाध वर्ष रहे होंगे, उसके बाद सरकार चली गयी। कांग्रेस, यू.पी.ए., की सरकार आ गयी। अर्जुन सिंह मानव संसाधन मंत्री बने। अर्जुन सिंह के मन में, पता नहीं कहाँ से, यह बात किसी ने घर करा दी कि मैंने अपना राजनैतिक पाला बदल लिया है। यह बात मुझे उनके बड़े विश्वस्त, तब के शिक्षा सचिव और मेरे जूनियर रह चुके, सुदीप बैनर्जी ने बतायी कि पता नहीं अर्जुन सिंह जी को क्यों ऐसा भ्रम हो गया है, आप एक बार मिलकर उसको दुरुस्त कर दीजिए। मैं उनसे मिलने गया। मैंने उनसे कहा कि मुझे ऐसा पता चला है। आप न्यायिक जाँच करा लीजिए कि मैंने क्या किया है। अगर आपको लगता है कि कोई वित्तीय अनियमितता मैंने की है, उसकी भी न्यायिक जाँच करा लीजिए। अकादेमिक विशेषज्ञों से जाँच करा लीजिए कि मैंने क्या किया है, क्या नहीं किया है। अर्जुन सिंह ने कहा, “ठीक है, मैं देखता हूँ।”

    मेरे पास सुदीप बैनर्जी का फ़ोन आया कि जाँच के लिए एक समिति बना देते हैं ताकि इस तरह की बातें साफ़ हो जाएं। आप बताएँ कि किन नामों को रखा जाए। मैंने कहा, उन्हीं को रख दीजिए, यू. आर. अनन्तमूर्ति और कृष्णकुमार को, एकाध कोई और नाम। ये नाम राष्ट्रपति को भेज दिये गये। राष्ट्रपति के यहाँ किसी से गोपीनाथन ने जाकर रोना रोया या जो भी कहा, ‘भई, ये अशोक जी के मित्र लोग हैं, ये कैसे जाँच करेंगे।’ मुझे फिर सुदीप बैनर्जी का फ़ोन आया। मैंने कहा, आप लोग तय कर लो। जिसको करना है, कर लो। मुझे क्या फ़र्क़ पड़ता है। उस समय नेशनल बुक ट्रस्ट के अध्यक्ष बिपिनचन्द्र, केरल के किसी विश्वविद्यालय के कुलपति के.एम. पणिक्कर और विश्वनाथ त्रिपाठी की एक समिति नियुक्त हुई। उन्होंने जाँच की, मुझे भी बुलाया। उन्होंने रिपोर्ट दी। रिपोर्ट ने न केवल मुझ पर लगाये गये सारे आरोप आधारहीन बताये बल्कि मेरे द्वारा ली गयी नवाचारी पहल आदि की प्रशंसा की और गोपीनाथन की बहुत निन्दा की।

    वह रिपोर्ट राष्ट्रपति के यहाँ ही गयी होगी। कुछ होना नहीं था, क्योंकि गोपीनाथन को उस रिपोर्ट के आधार पर हटाया नहीं जा सकता था। उस समय उनका कार्यकाल समाप्त हो गया होगा तो रिपोर्ट समाप्त हो गयी थी, उसकी कोई सार्वजनिक अभिव्यक्ति या उसका सार्वजनिक प्रकाशन ज़रूरी नहीं माना गया—वह आन्तरिक क़िस्म की जाँच की रिपोर्ट थी। उसके बाद जो हुआ वह बहुत दिलचस्प है। गोपीनाथन का कार्यकाल समाप्त हो रहा था। नये कुलपति का चुनाव करने के लिए एक खोज समिति बननी थी। सुदीप बैनर्जी ने मुझसे सलाह ली, यह ध्यान में रखते हुए कि कौन लोग हो सकते हैं। तब तक विभूति नारायण राय उनके मित्र हो गये थे। अन्ततः विभूति नारायण राय कुलपति बन गये।

    दुःखद प्रसंग

    मेरे कार्यकाल में निर्मल वर्मा कुलाधिपति थे। फिर नामवर सिंह थे। नामवर सिंह ने मुझसे शायद तीन बार कहा होगा। दो बार मैंने अनसुना कर दिया। तीसरी बार मैंने झुंझलाकर कहा, ‘‘छोड़िए, आप क्यों इसमें लगे हुए हैं, इससे क्या होना है, इसका कोई मतलब नहीं।’’ हुआ यह था कि वे मुझे यह बता रहे थे कि वे विभूति नारायण राय से यह कह रहे हैं कि अशोक जी पहले ही संस्थापक कुलपति हैं, उन्हें डी लिट आनेरिस कस्ज़ा देना चाहिए। अब मैं इतना अबोध नहीं हूँ, कि मान लूँ कि नामवर सिंह, जो कुलाधिापति हैं, वह कुलपति से कहें और कुलपति उनकी न माने, अपने किसी निजी विद्वेष के कारण? बहरहाल, तीसरी बार जब उन्होंने कहा, तो मैंने कहा, ‘‘जरा सोचिए नामवर जी, आप क्यों इस सब में पड़े हैं, काहे को अपनी जुबान डालते हैं इन चीज़ों में।’’ फिर वह चुप हो गये। वह एक दुःखद प्रसंग है। अब इसका क्या करें! है सो है।

    सत्ता और स्वायत्तता के प्रश्न

    ऐसा है कि राजनीति ने कभी शिक्षा व्यवस्था को स्वतन्त्र छोड़ा नहीं। पहले भी राजनीति हस्तक्षेप करती रही है लेकिन एक बचाव की परिस्थिति यह थी कि वह हस्तक्षेप सीमित होता था क्योंकि कुलपतियों का क़द बड़ा ऊँचा होता था, उनकी सामाजिक और अकादेमिक हैसियत भी ऊँची होती थी। हम लोग जब छात्र थे तब हमारे कुलपति बड़े-बड़े लोग थे—उनके कामकाज में आसानी से हस्तक्षेप करना सम्भव नहीं था। थोड़ा-बहुत इधर-उधर अपने किसी के लिए सिफ़ारिश कर दी कि इसको ले लीजिए, उसको ले लीजिए, इस तरह के दखल होते थे। लेकिन कुल मिलाकर, राजनीति शैक्षणिक अन्तर्वस्तु में हस्तक्षेप नहीं करती थी। वह यह नहीं कहती थी कि आप यह मत पढ़ाइए, वह मत पढ़ाइए—ये करिये, वो करिये। विश्वविद्यालयों को एक तरह की स्वायत्तता थी। वह धीरे-धीरे क्षरित हुई। विश्वविद्यालयों पर नियंत्रण करने का काम विश्वविद्यालय अनुदान आयोग करने लगा। चूँकि वहाँ से अनुदान मिलना है इसलिए उनका दबाव बहुत ज़्यादा ठोस दबाव था। और बजाय इसके कि विश्वविद्यालयों को अपने-अपने ढंग से विकसित होने दिया जाये, उनकी अलग-अलग स्वायत्तता की रक्षा की जाये, वह, सब धान ढाई पसेरी वाले अन्दाज़ में एक तरह से सब चीज़ें एक जैसी होने लगें, के फेर में पड़ गयी—एक ही जैसे इम्तिहान हों, एक ही जैसे पाठ्यक्रम हों, एक ही जैसे सब हों। यह ‘एक ही जैसे होने की बात’ ने विश्वविद्यालयों की शिक्षा व्यवस्था को बहुत ही क्षत-विक्षत किया है।

    कारण ये बताये जाते थे कि इतना बड़ा देश है, छात्र एक प्रान्त से दूसरे प्रान्त में जायेंगे—इधर से उधर आएँगे तो दिक्कत होगी। मान लीजिए, हैदराबाद में पढ़ा हुआ छात्र दिल्ली आएगा,  उसको वही पाठ्यक्रम पढ़ने के लिए आगे मौक़ा मिलना चाहिए। लेकिन ऐसे कितने लोग इधर से उधर जाएँगे? दूसरा यह है कि अगर जाएँगे तो वह नये क़िस्म का पाठ्यक्रम सीखें। आखिर कोई पाठ्यक्रम दूसरे किसी पाठ्यक्रम का विरोधी भी नहीं होता। इस तरह के तर्क दिए भी जाते रहे हैं।

    शिक्षा व्यवस्था को ध्वस्त करने में जितनी भूमिका राजनीति व सत्ता की है, उससे कम भूमिका स्वयं अकादेमिक विद्वानों की नहीं है। वह भी तरह-तरह के मोह-मत्सर और पूर्वग्रहों से ग्रस्त रहे हैं। उनका आचरण भी, कुल मिलाकर, बड़ा निर्मल-उज्ज्वल नहीं रहा है। इस समय यह आम बात है कि हरेक विश्वविद्यालय में ऐसा दुश्चक्र चला हुआ है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से सहानुभूति रखने वाले या उसकी दृष्टि का समर्थन करने वाले लोग बड़ी संख्या में विश्वविद्यालयों में भर गये हैं। यह काम पहले वामपंथियों ने भी किया था, लेकिन इतने बड़े स्तर पर नहीं कर पाये थे क्योंकि उनकी कभी इतनी बड़ी सरकार नहीं बनी थी।

    नामवर सिंह और परिसर के भीतर

    नामवर सिंह की बड़ी भारी कीर्ति और उसकी व्याप्ति का एक बड़ा कारण यह था कि वह अपने क़द और विशेषज्ञता के कारण लगभग हर जगह चयन समिति में होते थे और लगभग हर जगह वह किसी वामपंथी को चुनते थे। उनके उपकृत तरह-तरह के वामपंथी अध्यापकों की संख्या बहुत बढ़ गयी थी, जो सब उनके ध्वजावाहक हैं, क्योंकि आखिर उन्होंने नौकरी दिलायी है। पाठ्यक्रमों में शामिल लेखक आदि भी वही रहे हैं। हिन्दी के अकादेमिक जगत की यह स्थिति है। विज्ञान आदि विषयों में इतना घालमेल नहीं होता है जितना हिन्दी, संस्कृत या भाषायी विभागों में होता है। उदयप्रकाश जैसे प्रतिभाशाली व्यक्ति को जे.एन.यू. में नौकरी नहीं मिली। इस तरह के बहुत सारे उदाहरण हैं।

    साहित्यिक, सांस्कृतिक परिसर के भीतर के  लोग भी लगातार रोड़े डालते रहे। जबकि इनमें ज़्यादातर समझदार लोग रहे हैं जो जानते रहे होंगे कि मैं जो काम कर रहा हूँ वह रचनात्मक है और अन्ततः उससे हिन्दी भाषा और साहित्य अपने उत्कर्ष की ओर ही जायेगा। शायद हिन्दी साहित्य, रचनात्मकता और उत्कर्ष उनके सरोकारों में से नहीं हैं। कुछ के अगर हैं भी तो उनमें एक तरह का स्पर्धा भाव है। दूसरा यह है कि हम अकादेमिक जगत् के लोग हैं, यह कहाँ से बाहर का एक आदमी आ गया है जो कुछ भी अनाप-शनाप करता रहता है और इसको क्या हक़ है? आखिर बीस-पच्चीस वर्ष तो मेरी निन्दा ‘अफ़सर कवि’ के रूप में होती थी। दो उदाहरण देता हूँ। अकादेमिक जगत् में मदन सोनी या उदयन वाजपेयी की आलोचना या उनकी जगह क्यों नहीं है? मुझे थोड़ी-बहुत जगह मिलती है, वह एक तरह से जिसको हम लोग बुन्देलखण्डी में कहते हैं—बरियाबट के देनी पड़ती है। लेकिन बाक़ी को? यह दुनिया जिन लोगों ने बनायी है वे अपने को बहुत खुले दिमाग़ का कहने से नहीं चूकते थे, लेकिन अन्दर-अन्दर वे ख़ासे संकीर्ण हैं।

    विद्यानिवास मिश्र और निर्मल वर्मा

    मेरा कार्यकाल इसलिए नहीं बढ़ाया जा सकता था क्योंकि कार्यकाल बढ़ाये जाने का प्रावधान सीधे-सीधे नहीं था। एक बात यह थी कि अधिनियम में कार्यकाल बढ़ाने का कोई प्रावधान नहीं था। दूसरा यह कि अगर प्रावधान न होते हुए भी बढ़ाया जाता तो उसके लिए उस समय जो राजनैतिक शक्तियाँ सत्तारूढ़ थीं वे बढ़ायेंगी, ऐसा कभी सोचा ही नहीं जा सकता।

    विद्यानिवास मिश्र ने पलटा खाया। पलटा यों खाया कि तब तक वह राज्यसभा के सदस्य हो गये थे, उनकी दिलचस्पी नहीं थी। असल में, विद्यानिवास जी बहुत सारी चीज़ों से सहमत नहीं भी रहे होंगे, पर उन्होंने विरोध नहीं किया। भाषा वगैरह को ले कर हम जो कर रहे थे उसके वह बड़े समर्थक थे। उनकी सलाह से भी कर रहे थे। लेकिन दूसरी चीज़ों में उनकी सलाह नहीं मानता था; उनकी सलाह वैसी न रही होगी जैसा मैंने किया। उनमें एक क़िस्म का दुचित्तापन था, हालाँकि, मेरे पूरे कार्यकाल में, उनके समर्थन में कोई कमी नहीं थी। लेकिन, दूसरी तरफ़, उनकी बड़ी रुचि अपने रिश्तेदारों, पंक्ति-पावन ब्राह्मणों को—इनको, उनको—जगह दिलवाने में थी। उनके सार्वजनिक जीवन का यह दुर्भाग्यपूर्ण पक्ष था।

    मेरे विश्वविद्यालय में रहते मध्य प्रदेश का एक भी व्यक्ति वहाँ नहीं रहा। लेकिन विद्यानिवास जी का यह था कि फ़लाँने जी को लीजिए, और सब वही उत्तर प्रदेश के! उनमें कभी खुलापन नहीं था। आगे जाकर विभूति नारायण राय का कार्यकाल खत्म होने पर गिरिश्वर मिश्र को कुलपति बनवाया जो उनके चचेरे भाई थे। चयन समिति में मैं था और कपिला जी भी थीं। बैठक में वे काग़ज़ पर नाम नहीं देख सकीं तो कपिला जी ने कहा कि इन नामों में विद्यानिवास जी के भाई कौन हैं। जाहिर है, वे उन्हीं के नाम पर अड़ी रहीं। जहाँ तक मुझे याद है, मैंने सुधीर चन्द्र और कृष्ण कुमार के नाम सुझाये थे।

    मुझ से सन्दर्भित ब्यौरों को जानने वाले निर्मल वर्मा थे। तब तक निर्मल से मेरे वैचारिक क़िस्म के मतभेद इतने गहरे हो गये थे कि निर्मल बचाव में कुछ कहेंगे या समझकर कुछ कहेंगे इसकी आशा नहीं की जा सकती थी। यह सही है कि उन्होंने मेरे कार्यकाल को बढ़ाने के लिए चिट्ठी लिखी थी, लेकिन उन्होंने कभी विश्वविद्यालय में जो हुआ, जितना वह जानते थे, उसका कभी कोई ज़िक्र नहीं किया।

    राजनीति, राजनेता और प्रशासक 

    प्रशासकीय सेवा में हैं, तो राजनीति से साबका पड़ेगा ही। मैंने पाया कि राजनीति से आतंकित न हों, राजनीति से कोई निजी लाभ लेने की कोशिश न करें और अपनी एक दृष्टि बनाएँ और उस दृष्टि को चरितार्थ करने में अगर राजनीति का सहयोग मिल सकता है तो लेने में संकोच न करें। राजनीति को सामान्यीकृत नहीं किया जा सकता, जैसे सब राजनेताओं को भी एक ही थैली के चट्टे-बट्टे नहीं माना जा सकता।

    मेरा एक सौभाग्य यह रहा कि मेरी प्रशासनिक सेवा के अधिकांश में मेरा जिन राजनेताओं से सम्पर्क हुआ, उन्होंने कोई अतिचार या अतिक्रमण करने की कोशिश नहीं की। बीच-बीच में ऐसे छोटे-छोटे प्रसंग आते रहते थे जिसमें कभी कोई तनाव हो जाए या कुछ हो जाए। मसलन, अर्जुन सिंह के साथ ही। उनके राजनैतिक जीवन के अन्तिम चरण में मैं अलग हो गया था। क्योंकि उन्हीं के कारण मेरा प्रशासन में इतना अहित हो गया था। वे उसके लिए जिम्मेदार नहीं थे, यह भी सही है। उनकी छवि खुद ही धूमिल होना शुरू हो गयी थी, तो मैंने अपने को दूर ही रखा।

    यह भी सही है कि मैंने उनसे कभी कोई निजी लाभ नहीं लिया। यह भी कभी नहीं कहा कि मेरे भाई के लिए कुछ कर दीजिए या मेरी बहिन की ये समस्या है। मैंने किसी राजनेता से कभी नहीं कहा—न अपने लिए कहा, न किसी और के लिए कहा। मेरे परिवार ने भी इसमें बहुत बड़ी भूमिका निभायी कि उन्होंने भी कभी मुझ पर इस तरह का हल्का-फ़ुल्का, सीधा-उल्टा, प्रत्यक्ष-परोक्ष कोई दबाव नहीं डाला कि मैं कुछ कर दूँ, या किसी के लिए कह दूँ।

    सौभाग्य से, शायद मेरा समय ऐसा था जहाँ राजनीति भी कुछ मर्यादाओं के अन्दर रहती थी। इधर-उधर अपवाद होते रहते थे, लेकिन, कुल मिलाकर, एक मर्यादा थी। अब पूरी तरह से अमर्यादित है इसलिए आज का समय प्रशासकों के लिए और पदासीन बहुत सारे लोगों के लिए बहुत ज़्यादा मुश्किल है। सारा कुछ उनका ही नैतिक पतन नहीं है—उस नैतिक पतन के लिए अगर उनमें कुछ प्रतिरोध है, तो वह बड़े तनाव की स्थिति में होगा, इसमें कोई शक नहीं।

    • (१६ जनवरी २०२५ को अशोक वाजपेयी ८५वें वर्ष में प्रवेश कर रहे हैं। सम्प्रति उनके द्वारा बोले-लिखे जा रहे आत्म-वृत्तान्त से एक अंश।)

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