‘कुछ पाने की ज़िद’ है मनोज बाजपेयी की संघर्ष गाथा

वरिष्ठ पत्रकार पीयूष पांडे ने प्रसिद्ध अभिनेता मनोज बाजपेयी की जीवनी लिखी है। पेंगुइन रैंडम हाउस से प्रकाशित इस जीवनी में मनोज बाजपेयी के प्रेरक जीवन के बारे में पीयूष पांडे ने काफ़ी प्रामाणिक लिखा है। इस जीवनी की समीक्षा लिखी है वरिष्ठ पत्रकार राठौर बिचित्र मणि सिंह ने। आप भी पढ़ सकते हैं-

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मायानगरी की सुनहरी दुनिया लाखों युवाओं को आकर्षित करती है। मायानगरी में छा जाने का सपना लिए देश के हजारों युवा रोज मुंबई पहुंचते हैं, और फिर शुरु होती है संघर्ष की अंतहीन दास्तां। बहुत कम किस्मतवालों को फिल्मी दुनिया में वो मुकाम मिलता है, जिसका सपना लिए वो मुंबई पहुंचते हैं। लेकिन, कुछ लोग ऐसे भी होते हैं, जो ‘कुछ पाने की ज़िद’ दिल में लगे इतनी मेहनत कर डालते हैं कि कामयाबी को झक मारकर उनके पास आना पड़ता है। ऐसी ही एक शख्सियत का नाम है-मनोज बाजपेयी। पत्रकार पीयूष पांडे ने मनोज बाजपेयी की जीवनी लिखी है, और इसे पढ़ते हुए इस बात का अहसास बार-बार होता है कि मनोज का जीवन संघर्ष की वो प्रेरक कहानी है, जिसे बॉलीवुड में नाम और दाम कमाने के इच्छुक हर युवा को हर छोड़ने से पहले एक बार ज़रुर पढ़ लेना चाहिए।

पीयूष पांडे वरिष्ठ पत्रकार हैं। उनका मनोज बाजपेयी से पुराना परिचय है। लेकिन, इस जीवनी को लेकर जितना शोध किया गया है, वो चौंकाता भी है और पाठकों को आश्वस्त करता है कि मेहनत से लिखी गई किताब को पढ़ने में आया आनंद अलग ही होता है। दरअसल, मनोज बाजपेयी की यह जीवनी एक फिल्मी सितारे की जीवनी नहीं है। मनोज बाजपेयी की यह जीवनी बिहार के एक छोटे से गांव से निकले एक युवा की संघर्ष की ऐसी कहानी है, जिसे ऐतिहासिक संदर्भ और अनूठी किस्सागोई दिलचस्प बनाते हैं। पीयूष बिहार के लाल मनोज की जड़े खोजते हुए बताते हैं कि उनकी तरक्की से उत्तर प्रदेश का रायबरेली इठला सकता है क्योंकि उनके परदादा रायबरेली से उस वक्त बिहार पहुंचे थे, जब अवध में किसान क्रांति हो रही थी। पीयूष मनोज की जड़े खोजते हुए उनके और मोहनदास करमचंद गांधी के बीच संयोग का अद्भुत तार खोज निकालते हैं। पीयूष गांव के किसान परिवार के एक बच्चे की कहानी सुनाते हुए जब बताते हैं कि मनोज के किसान पिता भी एक जमाने में पुणे फिल्म इंस्टीट्यूट में ऑडिशन देने पहुंचे थे तो पाठक चौंक जाते हैं।

इस किताब में 21 अध्याय हैं, जिसके शुरुआती अध्याय मनोज की पारिवारिक पृष्ठभूमि और मनोज के फिल्मी लत लगने के किस्सों से पटी पड़ी है। मनोज बाजपेयी कैसे बेतिया में फिल्म देखते हुए एक थिएटर में ऐसी लड़ाई में उलझ गए कि चाकू चल गए, उनके खिलाफ एफआईआर हो गई और उन्हें गोरखपुर भागना पड़ा-ऐसे तमाम किस्से किताब के शुरुआत में है।

मनोज बाजपेयी के दिल्ली पहुंचने, वहां टिके रहने की जद्दोजेहद और फिर दिल्ली रंगमंच का सितारा बनने की कहानी तफ्सील से है। इसके बाद मनोज बाजपेयी के मुंबई पहुंचने, स्वाभिमान सीरियल मिलने फिर सत्या मिलने और तमाम दूसरे महत्वपूर्ण वाक्यों की विस्तार से चर्चा है। मनोज के इश्क की कहानियां हैं और बतौर फैमिली मैन मनोज बाजपेयी की भूमिका का जिक्र है।

लेखक ने मनोज बाजपेयी, उनके माता-पिता, भाई-बहन, दोस्त-यार और समीक्षकों से बात, उनके अलग अलग इंटरव्यू, ब्लॉग आदि के आधार पर किताब को गढ़ा है। फिल्म में मनोज के जीवन से जुड़े कई दिलचस्प किस्से हैं, जो किताब की पठनयीता बढ़ाते हैं तो मनोज से जुड़े कई भ्रम भी दूर करत हैं। मसलन, इंटरनेट पर कई जगह पढ़ने को मिलता है कि मनोज बाजपेयी ने पहली शादी बिहार की एक लड़की से की और सफल होने के बाद छोड़ दिया। मनोज और राम गोपाल वर्मा के बीच मतभेद की वजह की सैकड़ों कहानियां इंटरनेट पर हैं। ये जीवनी तमाम भ्रांतियों को दूर करती है। वो भी पुख्ता तथ्य और सबूत के साथ।

मनोज बाजपेयी की इस जीवनी को उन लोगों के मनोज के विषय में अनुभव और खास बनाते हैं, जो उनसे बहुत करीब से जुड़े रहे हैं। लेखक ने अनुराग कश्यप, अनुभव सिन्हा, पीयूष मिश्रा, मकरंद देशपांडे, पंकज त्रिपाठी, प्रकाश झा समेत कई नामचीन लोगों से बात की और उनकी बातों को मनोज की कहानी में इस तरह पिरोया है कि यह सब लोग कहानी का हिस्सा मालूम होते हैं।

पीयूष ने मनोज बाजपेयी के स्थापित होने की कथा को कुछ जल्दबाजी में कहा है, और शायद इसकी एक बड़ी वजह ये है कि लेखक मान चुका है कि मुंबई में स्थापित होने के बाद मनोज ने संघर्ष भले किया लेकिन वो संघर्ष उनके मुंबई पहुंचने तक के संघर्ष से कहीं छोटा है। फिर, शब्द सीमा भी एक वजह हो सकती है। बतौर अभिनेता मनोज बाजपेयी अपनी भूमिकाओं की तैयारी कैसे करते हैं, इसे और विस्तार से बताया जा सकता था।

पेंगुइन इंडिया ने पुस्तक को प्रकाशित किया है और हिन्दी के बाद अंग्रेजी और मराठी संस्करण प्रकाशित होने वाला है।

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