‘अवध का किसान विद्रोह’ पुस्तक का एक अंश

भारतीय इतिहासकारों ने पोपुलर इतिहास लेखन को हमेशा खारिज किया. अगर काम हिंदी में हुआ हो तो उसे देखने काबिल भी नहीं समझा. सुभाष चन्द्र कुशवाहा की किताब ‘अवध का किसान विद्रोह’ उस विद्रोह को विस्तार से समझाती है जिसके बारे में मॉडर्न इण्डिया की किताबों में पढ़ा था. बाबा रामचंद्र के बारे में. बहुत शोधपूर्ण और रोचक शैली में लिखी गई यह किताब इतिहास और लोक दोनों का पाठ है. इसी किताब का एक अंश- मॉडरेटर

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सदियों से सांगठनिक तौर पर गरीब किसानों में एकता का अभाव रहा है । संख्याबल में बहुतायत में होते हुए भी अपने शोषण, उत्पीड़न और बदहाली के विरूद्ध उनकी एकता और संघर्ष, इतिहास के बहुत कम काल खंड में दिखाई-सुनाई देती है। हर बार एकता और संघर्ष की शुरुआत को अभिजात्यवर्गीय समुदाय द्वारा नेस्तनाबूद कर दिया जाता रहा है। यह स्थिति आदि से आज तक बनी हुई है। इसके बावजूद हम किसान विद्रोह को समझना चाहते हैं। जानना चाहते हैं कि अन्नदाता के प्रति कुलीनतावादी समाज का यह रवैया, इतिहास को अन्यायपरक बनाने में कितना सुसंगठित और ताकतवर रहा है। संविधान की न्यायपरकता, अगर अब भी आभासी है तो इसका कारण वहीं ढूंढा जा सकता है । हमारे इतिहास में कुछ ऐसे किसान विद्रोह दर्ज हुए हैं, जिनका बार-बार अध्ययन, छद्म को समझने और भविष्य के संघर्ष की सही दिशा तलाशने में हमारी मदद कर सकते हैं। हमें बता सकती हैं कि वे कौन सी ताकतें हैं जो औने-पौने दाम पर भूमि अधिग्रहण को बढ़ावा देती हैं और गन्ना किसानों को मिल मालिकों के रहमो-करम पर छोड़ देती हैं।

        अवध किसान विद्रोह, स्वतंत्र भारत के प्रथम प्रधानमंत्री की पहली गंवई पाठशाला थी जिसने उन्हें यहां की भूख, गरीबी, बदहाली से साक्षात्कार कराया था । उन्हें भारत को समझने और समझाने का अवसर प्रदान किया। जवाहरलाल नेहरू ने जितना अवध किसान आंदोलन को दिया नहीं, उससे कहीं ज्यादा, अपने लिए ग्रहण किया। अपनी राजनैतिक पकड़ को मजबूत बनाया और स्वयं को एक वैचारिक रूप से प्रतिस्थापित प्रधानमंत्री के पद तक ले जाने में सफल हुए। आज भी उसी साक्षात्कार के बल पर, रायबरेली लोकसभा क्षेत्र, नेहरू खानदान से जुड़ा हुआ है।

        प्रथम विश्वयुद्ध  में भारत का धन और खून, दोनों बहा था। इस युद्ध की विभीषिका को नजरअंदाज कर भारत के राष्ट्रपिता ने युद्ध में पूर्ण सहयोग दिया था और देश की जनता से सहयोग देने की अपील की थी। बिना किसी विशेष और पर्याप्त प्रशिक्षण के देश के गरीब नौजवानों को फ्रांस और जर्मनी के मोर्चे पर भेजा गया था। जो जिंदा बचे रह गये, उन्हें युद्ध खत्म होते ही दूध की मक्खी की तरह सेना से बाहर कर, वापस भेज दिया गया । एक ओर उनकी आजीविका छिनी गई तो दूसरी ओर उनके परिवार वालों से ‘लड़ाई चंदा’ के नाम पर तालुकेदारों और जमींदारों को बचा-खुचा रक्त निचोड़ने को खुला छोड़ दिया गया । प्राकृतिक आपदाएं तो अपनी जगह पर थी हीं, औपनिवेशिक सत्ता की तालुकदारों के माध्यम से राजस्व वसूली और आम जनता की जमीनों से बेदखली, घूस सदृश्य ‘नजराना’ की बार-बार मांग जैसे दुखों के पहाड़ से दूरी ने कहने-सुनने के सारे दरवाजे बंद कर दिए थे। ऐसे समय में वैश्विक स्तर पर रूस में हुई बोल्शेविक क्रांति और विदेशी मोर्चों से घर लौटे नौजवानों की समझ ने गंवई हवा को विद्रोही बना दिया । उन्हें लगा कि अब किसानों का जमाना आ गया है इसलिए अन्याय का प्रतिकार होना ही चाहिए । भूखे मरना है तो लड़कर मरने से क्या गुरेज ?

        अवध के तमाम जिलों में 1920-22 में एक साथ फूट पड़े स्वतःस्फूर्त किसान विद्रोह ने वर्षों से राख के अंदर दबी आग को कुरेद दिया। जनता के सूख चुके अरमान धधक उठे । बाजार लूटे गये । तालुकेदार और जमींदारों के घरों पर आक्रमण हुए। थाने फूंके गये और सोवियतें जैसी किसान सभाएं गठित की गई ।

        जिस समय अवध जल रहा था, उस समय पूरे देश में विद्रोह का ताप महसूस किया गया । मजदूर, किसान, आदिवासी, हर किसी ने विद्रोह का झंडा उठा लिया । ऐसे समय में तत्कालीन राष्ट्रीय राजनीति ने अपने को अप्रासंगिक होने से बचाने के लिए, मजबूरी बश स्वयं को जनता के साथ जोड़ने का भ्रम पैदा किया ।

        संयुक्त प्रांत में जो किसान विद्रोह भड़का, उसने पूरे देश के सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक परिदृश्य को गहराई से प्रभावित किया । यहां के संघर्ष की कमान भूतपूर्व सैनिकों, साधुओं और निम्नजातियों के हाथों  में होना एक अभूतपूर्व घटना थी। अभी इस तथ्य का समाजशास्त्रीय विश्लेषण, जनअंन्दोलनों की सफलता, असफलता के कारकों के रूप में किए जाने की जरूरत है।

        ‘चौरी चैरा विद्रोह और स्वाधीनता आंदोलन’ में मैंने इस तथ्य का उल्लेख किया है कि प्रथम विश्वयुद्ध में संयुक्त प्रांत के पूर्वी जिलों से बहुसंख्यक जवान सेना में भर्ती हुए थे। युद्ध समाप्त होते ही उन्हें सेवा से हटा दिया गया था। चैरी चैरा विद्रोह का भगवान अहीर, करहिया विद्रोह का बृजपाल सिंह और झुनकू सिंह, सेना के जवान रह चुके थे। सूरज प्रसाद उर्फ छोटा रामचन्द्र के गिरफ्तारी के दिन गोसाईंगंज रेलवे स्टेशन पर किसानों का नेतृत्व करने वाला पहली ब्राहमण रेजीमेंट का एक सिपाही, तीन रिबन मेडल लगाये हुए था- 1914-15 का रिबन, जी.एस. रिबन और सहयोगी दलों का रिबन।

        अवध क्षेत्र से सेना में भर्ती का सिलसिला, पुराना था। रायबरेली जिले का सीताराम पांडेय, 1812 में बंगाल नेटिव आर्मी में भर्ती हुआ और 48 साल की सेवा के बाद सूबेदार के पद से 1860 में सेवानिवृत हुआ। उसकी आत्मकथा का अनुवाद ‘फ्राम सेपाय टू सूबेदार’ एक अद्वितीय रचना है। प्रथम विश्वयुद्ध में ऐसे सैकड़ों सैनिकों ने देश और दुनिया का भ्रमण किया था। बाहरी सीख और समझ के आधार पर उन्होंने और उनकी औलादों ने अपने गांव गिरांव के अत्याचारों के विरुद्ध जनता को गोलबंद करने का काम शुरू किया ।

   इसी प्रकार साधू या फकीर वेषधारी बाबा रामचन्द्र, छोटा रामचन्द्र, देवनारायण, रघुनंदन साधू, रहमत अली, फारूख अहमद नामक फकीर, शाह मुहम्मद नईम अता, रामगुलाम पासी, मदारी पासी, इशरबदी, रघुबीर कलवार, देव पासी, गरीब दास पासी और गोसाईंगंज रेलवे स्टेशन पर दिखे बंगाली साधू की भूमिका भी किसान विद्रोह के अगुओं में दर्ज हुई।

        हम देखते हैं कि अवध किसान विद्रोह ने एक ओर तत्कालीन समय की सामाजिक, राजनैतिक और आर्थिक नीतियों की सीवन उधेड़ कर पर्त-दर-पर्त अलग-अलग कर दिया तो दूसरी ओर राष्ट्रवादी सोच और उसके अगुवों के वर्गाधार को स्पष्ट करते हुए, वर्ग और जाति की विकृतियों को भी सामने किया । उसने इस सामाजिक यथार्थ को हमें साफ-साफ और सच्चाई से समझने में मदद की । सिर्फ यही वह आंदोलन था जिसने तत्कालीन राष्ट्रवादियों के वर्ग चरित्र को नंगा किया । इसने इस देश में सर्वहारा मुक्ति के लिए ऊंच और नीच जाति के भेद के विरुद्ध संघर्ष करने की अनिवार्यता को भी सामने रखा। अवध किसान विद्रोह के तेवर को, अहिंसा और असहयोग आंदोलन के सिद्धांत में डुबोकर, राष्ट्रवादी प्रवचनों के सहारे ‘स्वराज’ की फंतासी में उलझाकर जब नष्ट किया जा रहा था, तब अवध के भूखे किसानों को उनके द्वारा दिखाये जा रहे ‘स्वराज’ के स्वप्न से कुछ खास लगाव न था। यहां तक की जब रायबरेली, फैजाबाद, प्रतापगढ़ और सुल्तानपुर के किसान विद्रोह को लगभग नियंत्रित कर लिया गया था और शहरी कांग्रेसियों की इन क्षेत्रों में चहलकदमी तेज थी तब भी एक सभा में, जिसकी अध्यक्षता स्वयं जवाहरलाल नेहरू कर रहे थे, एक किसान ने खड़ा होकर कहा था-‘खाये के मिले, हम स्वराज नाहीं चाहित ।

        किसान आंदोलनों के क्रांतिकारी तेवर को दबाने, उसे असहयोग आंदोलन के दिवास्वप्न, ‘स्वराज’ की गिरफ्त में उलझाने और कुलीनतावादियों को लाभ पहुंचाने की नीति को तब भी अपनाया गया था और आज भी आजादी के 69 साल बाद अपनाया जा रहा है । मगर यह आजादी है किसके लिए ? इस प्रश्न का उत्तर अभी अवध किसान आंदोलन में तलाशे जा सकते हैं । यह विद्रोह, राष्ट्रीय राजनीति के जिस सफलता को हमारे सामने रखता है, वहीं इस देश में क्रांति की वास्तविक असफलता को भी उजागर करता है। यह सामाजिक दोगलापन आज तक जारी है । अब तो किसान आत्महत्याओं का दौर और तेज हुआ है । अवध किसान विद्रोह का मूल्यांकन और उसके आधार पर जातिवादी, कुलीनतावादी मूल्यों का संवर्द्धन, आज भी वर्ग एवं जाति युद्ध की स्थितियां बनाये हुए है।

 इसलिए उस अवध किसान विद्रोह का फिर-फिर मूल्यांकन, हाशिये के समाज की मुक्ति के मार्ग तलाशने के लिए जरूरी जान पड़ता है। तमाम असफलताओं के बावजूद अवध किसान विद्रोह ने हमें बहुत कुछ दिया है । बेशक इसके लिए बहुत ज्यादा कीमत भी वसूली है ।

        हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि इस धरती का राष्ट्रवाद सदा गरीब विरोधी रहा है । कभी संगीनों से तो कभी कर्जों से गरीबों को मारता रहा है। प्राकृतिक आपदाओं से हिफाजत की समग्र नीतियां इसलिए भी नहीं बनाई गईं कि इससे जाति और वर्ग की खाइयों का कम होना संभव था। यहां का राष्ट्रवाद सदा इन खाइयों में ही फावड़ा चलाता रहा है। अवध का किसान विद्रोह इसलिए भी खेड़ा और चम्पारन जैसे किसान आंदेालनों से भिन्न है। वैसे तो दक्षिण का मोपिला विद्रोह और राजस्थान का भील विद्रोह का वर्ग चरित्र भिन्न है तब भी उसके कई तंतु, अवध किसान विद्रोह में पाये जाते हैं ।

        अवध किसान विद्रोह पर तमाम लेखकों ने गंभीरता से काम किया है। उन्होंने किसानों के वर्ग शत्रुओं को भी कमोबेश नेस्तनाबूद किया है। इसके बावजूद कुल मिलाकर अवध किसान विद्रोह की सारी बागडोर बाबा रामचन्द्र के हाथों में पकड़ाते हुए संभ्रांत शहरी नेताओं तक ने अपनी कलम को विराम दे दिया है । जिस विस्तार से सूरज प्रसाद उर्फ छोटा रामचन्द्र और मदारी पासी पर ध्यान केन्द्रित किया जाना चाहिए था, वह नहीं किया गया है । ऐसा प्रचारित किया गया है कि जमींदारों के अभिन्न मित्र, बाबा रामचन्द्र का ही अवध किसान आंदोलन पर एकमात्र प्रभाव था। इस तथ्य को समझने के लिए स्वयं बाबा के इस कथन पर गौर किया जाना चाहिए, जो उन्होंने गौहन्ना सभा में कहा था-‘एक साधू, जो स्वयं को रामचन्द्र (सूरज प्रसाद उर्फ छोटा रामचन्द्र) कहता है, आप से कहता है कि लगान न दें । सरकार निश्चय ही यह सोच रही है कि यही वह बोलने वाला आदमी है जो सब कुछ करा रहा है।  आप लोग इस आदमी के बहकावे में न आयें और लगान दें (किसानों ने लगान देने का वादा किया )। आप लोग कभी भी किसी सभा में लाठी लेकर न जाएं ।… यह स्थानीय आदमी, आप के ऊपर गोली चलवा रहा है। यह दोगला आदमी स्वराज प्राप्त करने के रास्ते में अवरोध पैदा कर रहा है। अगर आपका दिमाग बदल दिया जाये तो आप एक दिन में स्वराज प्राप्त कर सकते हैं ।’

 उपरोक्त कथन से साफ है कि किसानों पर बाबा के अलावा दूसरे किसान नेताओं का प्रभाव कम न था। बाबा रामचन्द्र के बजाय, छोटा रामचन्द्र ही सब कुछ करा रहा था, कम से कम फैजाबाद और सुल्तानपुर क्षेत्र में ।

       यह सही है कि अशिक्षित किसानों के बीच फकीरों, बाबाओं की पहुंच आसानी से बन जाती है। यह धर्म के विशेषाधिकार एवं स्वीकार्यता के कारण तो है ही, देवता और दानव के निर्माण की कुलीनतावादी दृष्टि की देन भी है । ऐसे आंदोलनों से लेकर सत्ता नेतृत्व के निर्धारण तक, यही दृष्टि कार्य करती रही है। निम्नजातियों के नायकों को हम ‘बदमाश’,‘दुष्ट’, ‘ढांेगी’, ‘कपटी,’ ‘दोगला’ और ‘बुरे आचरण’ वाला कह कर किनारे लगा देते हैं । चैरी चैरा के क्रांतिकारियों को गांधी ‘हूलीगन्स’ कहते हैं। गणेश शंकर विद्यार्थी को ‘असहयोग आचरण से गिरा हुआ’ कहा जाता है। अवध किसान विद्रोह में ऐसी तमाम नीतियों को बहुत चालाकी से स्थापित किया गया है ।

        ऐसे में मुझे लगा कि डी.एन.धनगरे, एम.एच सिद्दिकी, कपिल कुमार, सुशील श्रीवास्तव, जैसे तमाम लेखकों के अंग्रेजी भाषा में किए गए महत्वपूर्ण कार्यो के साथ-साथ, हिन्दी में कुछ किया जाना चाहिए । हिन्दी भाषी पाठकों के बीच, किसान आंदोलन में शामिल हाशिये के समाज के बलिदानों को एक बार फिर पाठकों के सामने रखा जाना चाहिए । यह विचार ‘चैरी चैरा विद्रोह और स्वाधीनता आंदोलन’ लिखने के बाद ही उमड़-घुमड़ रहा था। हिन्दी भाषा में ब्रिटिश कालीन भारतीय इतिहास का लेखन न के बराबर हुआ है। जहां कोई प्रयास हुआ भी है वहां कुलीनतावादी या सामंती दृष्टि ने हाशिये के समाज के योगदान एवं पीड़ा का सतही मूल्यांकन करने की रस्म निभाई है । गरीब और हाशिये के समाज के क्रांतिकारी किसान नायकों को किनारे किया गया है । ‘उत्तर प्रदेश में किसान आंदोलन’, डाॅ. महेन्द्र प्रताप ने 1988 में हिन्दी में पहला प्रयास किया था मगर यहां भी किसानों के वास्तविक नायकों पर प्रकाश नहीं डाला गया । मेरा प्रयास इस उपेक्षा के प्रति एक अपेक्षा के रूप में समझा जाना चाहिए ।

        इस कार्य के लिए मैं विगत तीन सालों से अभिलेखों और पुस्तकों को जुटाने में लगा रहा। मुम्बई, दिल्ली, तीन मूर्ति भवन, लखनऊ के अभिलेखागारों के अलावा तत्कालीन अखबारों का परीक्षण किया । ब्रिटिश एवं अमेरिकी अखबारों में अवध किसान आंदोलन के बारे में विस्तार से और निरंतर लिखा गया। ब्रिटिश लाइब्रेरी न्यूज पेपर्स आर्काइब्स से सैकड़ों समाचार पत्रों को पढ़ने और अवध किसान आंदोलन को समझने में मदद मिली। इस किताब में पहली बार दर्जनों विदेशी अखबारों में छपे समाचारों को शामिल किया गया है।

 रायबरेली के मुंशीगंज कांड में मारे गये किसानों और स्वतंत्रता सेनानियों के बारे में जो तथ्य उपलब्ध हैं, उनमें बड़ा घालमेल है। मैंने इस घालमेल को कम करने का प्रयास किया है । मुंशीगंज स्मारक पर मारे गये मृतकों के क्रमांक 6 पर दशरथ बनिया का नाम दर्ज है और पता अज्ञात लिखा है। दशरथ बनिया ने दैनिक ‘प्रताप’ केस में गवाही दी थी।  गवाहों की सूची में उनका नाम क्रमांक 7 पर दर्ज है और पिता का नाम दुर्गा बनिया, महेशगंज, खोजनपुर लिखा हुआ है। स्मारक पर मृतकों का नाम लिखते समय ऐतिहासिक तथ्यों से छेड़छाड़ की गई है। स्मारक पर दर्ज मृतक सूची में महावीर पुत्र कल्लू अहीर का नाम है जबकि यह नाम घायलों की सूची में भी है। जगन्नाथ पुत्र जानकी ब्राह्मण, झकरासी मुंशीगंज गोली कांड में घायल होकर सरकारी अस्पताल में भर्ती हुए थे। 23 जनवरी, 1921 को प्रातः 10 बजे वह अस्पताल से मुक्त किए गए थे। बख्तावर पुत्र ठाकुर, बरुत सिंह का पुरवा, भी घायल अवस्था में सरकारी अस्पताल में भर्ती थे और 28 जनवरी, 1921 की शाम 4 बजे मुक्त हुए थे। क्रमांक 17 पर बिन्दादीन पुत्र बेनीमाधो बनिया का नाम दर्ज है जबकि बिन्दा सिंह पुत्र बेनी माधव सिंह, सरायदामू, ने दैनिक प्रताप केस में गवाही दी थी । इन दोनों नामों में थोड़ा बहुत अंतर होने के बावजूद, दोनों एक ही व्यक्ति हैं। बिन्दादीन को सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। 15 जनवरी, 1921 को उनके शरीर से एक गोली निकाली गई थी। ओरी पुत्र मातादीन मुराई का नाम भी स्मारक पर दर्ज मृतकों की सूची में है जबकि यह नाम दैनिक प्रताप केस के गवाहों में भी है। इन्हें भी सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया गया था। स्मारक पर दर्ज नामों में एक नाम कल्लू पुत्र बुधई पासी का भी है जबकि कलुवा पुत्र बिंदई पासी, जिजौली, ने भी दैनिक प्रताप मामले में गवाही दी थी। ये दोनों नाम भी एक ही व्यक्ति के हैं। कल्लू पुत्र बुधई पासी घायल अवस्था में सरकारी अस्पताल में भर्ती हुए थे और 21 जनवरी, 1921 को अस्पताल से मुक्त हुए थे। ठाकुर, 32 वर्ष घायल अवस्था में सरकारी अस्पताल में भर्ती हुए थे और 12 जनवरी, 1921 को मुक्त हुए । शिवनारायण पुत्र शीतलदीन ब्राह्मण घायल अवस्था में सरकारी अस्पताल में भर्ती रहे। 22 जनवरी, 1921 को वह अस्पताल छोड़कर चले गये। मृतक सूची में दर्ज बदलू पुत्र ईश्वरदीन तमोली और दैनिक प्रताप केस के गवाहों में बदल पुत्र इन्दी तमोली, पूरे तमोली, उतरपारा, एक ही व्यक्ति हैं । इन्हें भी घायल अवस्था में सरकारी अस्पताल में भर्ती कराया गया था।

        यहां यह भी स्पष्ट करना है कि रायबरेली स्वतंत्रता सेनानी इतिहास प्रकाशन समिति द्वारा प्रकाशित पुस्तक ‘भूला जनपदः बिखरा इतिहास’ के पृष्ठ 141 पर मारे गये कुछ लोगों का नाम-बदल (बेला मेला), शिवबालक (खुरहटी), पंचम पासी, सुक्खी, दुक्खी (दोनों सगे भाई), नान्हू नाई, बलद पुत्र ईश्वरदीन तमोली, सुरजू पुत्र पूरन (जगतपुर), रामअधीन (कितूली), बुधई (कांटीहार), बख्तावर और विश्वनाथ, लिखा हुआ है । इस प्रकार स्मारक पर लिखे नामों में बदल (बेला मेला), शिवबालक (खुरहटी), पंचम पासी और सुक्खी, दुक्खी (दोनों सगे भाई) नाम हैं ही नहीं ।

        रायबरेली जनपद के कुछ स्थानीय लोगों ने किसान विद्रोह पर काम किया था लेकिन उसे स्थानीय और हिन्दी में होने के कारण गंभीरता से नहीं लिया गया था। श्रीराम सिंह का कार्य-‘रायबरेली किसान आंदोलन की यज्ञ भूमि,’ और मदारी पासी पर सुशीला सरोज का कार्य-‘क्रांतिवीर मदारी पासी एवं एका आंदोलन’ भी अपने आप में कम महत्वपूर्ण नह‘ीं है। मदन मोहन मिश्र ने ‘भूला जनपदः बिखरा इतिहास’ पुस्तक में भी रायबरेली के किसान आंन्दोलनों पर विस्तार से चर्चा की है मगर तथ्यात्मक गलतियों की वजह से इसको गंभीरता से नहीं लिया जा सकता । इसी प्रकार उत्तर प्रदेश सूचना विभाग द्वारा भी एक पुस्तक प्रकाशित की गयी है-स्वतंत्रता संग्राम के सैनिक, जिला रायबरेली, जो तमाम तथ्यात्मक गलतियों से भरा पड़ा है । ‘क्रांतिवीर मदारी पासी एवं एका आंदोलन’ पुस्तिका के रूप में शायद, यह पहली किताब है जो मदारी पासी पर केन्द्रित है लेकिन इसमें भी कई तथ्यात्मक गलतियां हैं । मदारी पासी पर सामग्री तलाशते समय मुझे ब्रिटेन के दो समाचार पत्रों में एका आंदोलन पर महत्वपूर्ण समाचार देखने को मिले हैं जिनको इस पुस्तक में स्थान दिया है।

         इस पुस्तक को तैयार करते समय तत्कालीन राजनीति, यानी भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की ढुलमुल नीति का पड़ताल करना भी उद्देश्य रहा । एक ओर कांग्रेस स्वयं को किसानों से जोड़ना चाहती थी तो दूसरी ओर किसानों के विद्रोही तेवर पर लगाम लगाना चाहती थी । यानी कांग्रेस की स्थिति ‘गुड़ खाय, गुलगुले से परहेज’ जैसी थी। यहां तक कि स्वयं कांग्रेस द्वारा शुरू किए गए असहयोग आंदोलन एवं किसानों के विद्रोह को दबाने के लिए सरकार द्वारा शुरू किए गए अमन सभाओं में शुरू-शुरू में तो सबसे ज्यादा बढ़-चढ़कर कांग्रेसी सामंतों ने ही भाग लिया था । लेकिन अमन सभा का कोई खास प्रभाव तो पड़ा नहीं लिहाजा नवम्बर  1921 के प्रथम सप्ताह तक आते-आते कांग्रेसी सामंतों ने उससे किनारा करना शुरू कर दिया ।

        अवध के गुर्साइंगंज रेलवे स्टेशन किसान विद्रोह का संबंध छोटा रामचन्द्र से है।  राष्ट्रीय अभिलेखागार, नई दिल्ली के 1921 की अभिलेखीय सूचियों में पत्रावली संख्या 58-59, पार्ट बी, फरवरी/1921 होम डिपार्टमेंट में ‘रिपोर्ट आॅन द डिस्टरबेन्स एट गोर्साइंगंज’ नामक पत्रावली का उल्लेख है। जब इस पत्रावली की मांग की गई तो बताया गया कि यह पत्रावली यहां नहीं है। गृह मंत्रालय से यहां आई ही नहीं । मैंने सूचना के अधिकार के अंतर्गत जब गृह मंत्रालय से इस संबंध में जानना चाहा तो उन्होंने अपने पत्र संख्या ए-43020/01/2015-आर टी आई दिनांक 12-10-2015 द्वारा एक राजनैतिक जवाब भेजा कि यह सूचना यहां उपलब्ध नहीं है तथापि यह राज्य सरकार के पास उपलब्ध हो सकती है। पाठक स्वयं समझ सकते हैं कि जिस पत्रावली पर होम डिपार्टमेंट दर्ज है, वह राज्य सरकार के पास कैसे होगी? बाद में मुझे गुसाईगंज विद्रोह से संबंधित कुछ जरूरी अभिलेख उ.प्र.राज्य अभिलेखगार की पत्रावली संख्या 50/1921 में मिले मगर होम डिपार्टमेंट की पत्रावली संख्या  58-59, पार्ट बी, फरवरी/1921 अनुपलब्ध ही रही ।

         इस पुस्तक में पहली बार कुछ भूले-बिसरे किसान नायकों पर विशेष ध्यान दिया गया है। मदारी पासी और छोटा रामचन्द्र पर पर्याप्त सामग्री दी गई है। इस पुस्तक को तैयार करने में सुप्रसिद्ध इतिहासकार प्रो. हरिशंकर श्रीवास्तव, पूर्व विभागाध्यक्ष, गोरखपुर विश्वविद्यालय, गोरखपुर और प्रो.पी.के. श्रीवास्तव, प्रमुख इतिहासकार, पाश्चात्य इतिहास विभाग, लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ ने मार्ग दर्शन दिया । इतिहासकार अजय कुमार मिश्र ने कुछ संदर्भ उपलब्ध कराये । वरिष्ठ पत्रकार फिरोज नकवी और अरविन्द कुमार सिंह, राज्य सभा टीवी, ने भी कुछ सुझाव दिए । इसके अलावा मेरी पत्नी आशा कुशवाहा ने पाण्डुलिपि को अंतिम रूप देने में सहयोग प्रदान किया । कुछ पुस्तकों को उपलब्ध कराने में मेरा भतीजा अनुभव कुशवाहा, बेटा अंकित कुशवाहा और बहनोई अनिल मौर्य ने सहयोग किया । ताहिरा हसन, ने समय-समय पर हौसला अफजाई की। रायबरेली परिवहन कार्यालय के कर्मचारी रविन्द्र सिंह ने कुछ दस्तावेज ढूंढने में मेरी मदद की । इनके अलावा राष्ट्रीय अभिलेखागार, नई दिल्ली, नेहरू स्मारक संग्रहालय एवं पुस्तकालय, तीन मूर्ति भवन, नई दिल्ली, महाराष्ट्र सरकार शासकीय अभिलेखागार, मुम्बई, उ0प्र0 शासकीय अभिलेखागार, लखनऊ की डाॅ. मीरा देवी, अंजनी सिंह और अमिताभ पांडेय द्वारा जो सहयोग प्रदान किया गया, उसे भुलाया नहीं जा सकता । सेहंगो पश्चिम गांव के वर्तमान प्रधान श्री विनोद कुमार चैधरी और बछरावां के पत्रकार कंचन द्विवेदी को भी भुला नहीं सकता जिन्होंने सेहंगो विद्रोह की सामग्री इकट्ठा करने में मेरा सहयोग किया था।

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पुस्तक राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित है. 

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