सुशील दोषी की यादों में जसदेव सिंह

मशहूर क्रिकेट कमेंटेटर जसदेव सिंह की स्मृति में यह लेख दूसरे लिजेंडरी कमेंटेटर सुशील दोषी ने लिखा है। टीवी-पूर्व दौर इन दोनों कमेंटेटरों का क्या आकर्षण था पुराने लोगों को याद होगा। जसदेव सिंह को श्रद्धांजलि स्वरूप ‘दैनिक हिंदुस्तान’ से साभार- मॉडरेटर

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जसदेव सिंह का जाना सचमुच अखर गया। बतौर कमेंटेटर मेरी प्रतिभा निखारने में उनका काफी हाथ रहा। सन 1968 में मैंने अपनी हिंदी कमेंट्री की शुरुआत की थी। तब तक मैंने किसी हिंदी कमेंटेटर को सुना नहीं था। सुनता भी कैसे? तब अखिल भारतीय स्तर पर हिंदी कमेंट्री होती ही नहीं थी। मैं तो इंजीनियरिंग कॉलेज का विद्यार्थी था। पर चूंकि जसदेव सिंह दिल्ली में आकाशवाणी में अफसर थे, तो उनकी निगाहों से इस विधा की प्रतिभा का छिपना असंभव था। टेलीविजन तो अखिल भारतीय स्तर पर सन 1982 के एशियाई खेलों के वक्त आया। उसके पहले रेडियो ही हम भारतीयों के मनोरंजन का प्रमुख साधन था। पूरा देश रेडियो सुनता था और रेडियो का ऊंचा कलाकार तुरंत सितारा-पुरुष बन जाता। अमीन सयानी और जसदेव सिंह जैसे नामों को सितारा-हैसियत प्राप्त थी। पर जसदेव सिंह जमीन से जुडे़ अद्भुत व्यक्ति थे। वह कहते, ‘जीना तो एक बार ही है, कोई खास काम करके जाना है।’ खास काम उन्होंने किया भी। पहले से प्रचलित इंग्लिश भाषा की खेल कमेंट्री के मुकाबले हिंदी कमेंट्री की शुरुआत कराने और उसे स्थापित कराने का विशिष्ट कार्य।
दो क्षेत्र जसदेव सिंह के सदैव ऋणी रहेंगे। पहला क्षेत्र है खेलों का। देश की भाषा हिंदी में खेलों की हृदयस्पर्शी कमेंट्री करके उन्होंने खेलों को पग्गड़धारी किसानों से लेकर चौके-चूल्हे के पास काम करती गृहणियों तक पहुंचा दिया। हॉकी और क्रिकेट जैसे खेलों को लोकप्रिय बनाने में भी उनका बड़ा हाथ रहा। पान वाले की दुकान पर रेडियो के सामने सैकड़ों की भीड़ कमेंट्री सुनने के लिए जमा हो जाती थी। जसदेव सिंह सभी के पसंदीदा कमेंटेटर हुआ करते। हिंदी-उर्दू के मिश्रण से बनी उनकी बोली दिल से निकलती और सीधे दिल में असर करती थी।
हिंदी भाषा को उसका उचित स्थान दिलाने में जसदेव सिंह की कोशिशें भी काफी कारगर साबित हुईं। उनकी भाषा, शैली व कला के कारण हिंदी वहां पहुंची, जहां पहुंचने की कोई कल्पना भी नहीं कर सकता था। जैसे मुंबई के धनाढ्य मालाबार हिल में रहने वाले अंग्रेजीदां लोगों में जसदेव सिंह का नाम आदर से लिया जाता था। सरकार ने उनकी सेवाओं को दृष्टिगत रखते हुए उन्हें पद्मश्री और पद्म भूषण से सम्मानित किया। खेलों की कमेंट्री हो या राजपथ से 26 जनवरी की परेड का वर्णन, जसदेव सिंह बेमिसाल रहे। उन्होंने स्कंद गुप्त, मनीष देब, रवि चतुर्वेदी, मुरलीमनोहर मंजुल और जोगा राव जैसे अनेक हिंदी कमेंटेटरों को तैयार किया। मुझे भी उन्होंने लगातार प्रोत्साहित किया और हिंदी का काम आगे बढ़ाने का वह हौसला देते रहे।
कुछ वर्षों पहले उन्हें एक कार्यक्रम में इंदौर बुलाया था। मेरा गृह नगर इंदौर ही है। मैंने देखा, 4,000 दर्शक उनके नाम से ही जमा हो गए। सभा स्थल के हॉल के बाहर तक लोग खड़े थे। उनकी लोकप्रियता देखकर मैं दंग रह गया था। उस कार्यक्रम में उन्होंने अपने अनेक संस्मरण भी सुनाए कि कैसे उन्हें ‘ओलंपिक ऑर्डर’ सम्मान मिला, कैसे पद्मश्री व पद्म भूषण प्राप्त हुआ और वह कैसे अपने प्रशंसकों का शुक्रिया अदा कर सकेंगे? इन्हीं ऊहापोहों में वह लगे रहते थे। उनसे मुंबई में भी अक्सर मुलाकात हो जाया करती थी। धर्मयुग  के संपादक डॉ. धर्मवीर भारती का जसदेव सिंह और मुझ पर हमेशा आशीर्वाद रहा। केवल इसलिए कि हम लोग हिंदी को स्थापित करने के काम को आगे बढ़ा रहे थे। जसदेव ने धर्मयुग  में कई बरसों तक कॉलम भी लिखा, जो काफी लोकप्रिय था।
मैं उन्हें हमेशा कहता था कि हिंदी कमेंटेटर के रूप में आपने जो सम्मान कमाया और अपना स्थान बनाया है, वह अमिट है। आखिरी दम तक उनकी आवाज में वही खनक थी। मुझे चूंकि वह अनुज ही मानते थे, अत: घुड़की लगाते रहते थे। दिल्ली में आकाशवाणी या दूरदर्शन पर कमेंट्री करने के लिए मैं आता रहता हूं। कोशिश करके उनसे मिलता जरूर था। 87 वर्ष की उम्र यूं तो कम नहीं होती, पर प्रियजन के जाने का सदमा तो बर्दाश्त करना ही पड़ता है। जब-जब भारत में मातृभाषा हिंदी व हिंदी कमेंट्री की बात होगी, तब-तब जसदेव सिंह का नाम लिया जाएगा।
(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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