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अल्लाह करे मीर का जन्नत में मकाँ हो

आज यश चोपड़ा का जन्मदिन है. यश चोपड़ा जिसने कई पीढ़ियों को ग्रेसफुली रोमांस करने के अंदाज सिखाये. आज जब से प्रकाश के. रे का यह लेख पढ़ा आप लोगों को पढवाना चाहता था. देर हुई लेकिन सोने से पहले पढ़ लीजियेगा. अच्छा लगेगा- मॉडरेटर

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देश की आज़ादी की पूर्व संध्या पंजाब और बंगाल के लोगों के लिए हिंसा और हत्या का भयावह अँधेरा लेकर आई थी. इस अँधेरे में जलंधर का चोपड़ा परिवार भी सकून का सुबह ढूंढ रहा था. अभी कुछ ही समय पहले परिवार ने अपने मुखिया लाला विलायती राज चोपड़ा को बंगाल में हुए एक हादसे में खो दिया था. यह बड़ा परिवार अभी संभलने की कोशिश कर ही रहा था कि बंटवारे के स्याह बादल चारो ओर घिरने लगे थे. लाहौर, अमृतसर और जलंधर में बसे परिवार के विभिन्न हिस्से तारीख़, सियासत और किस्मत की बिसात पर बिखरे हुए थे. फ़िरकापरस्त ताक़तें इस माहौल में अपनी रोटी सेंकने में लगी हुई थीं. आसपास के आर्यसमाजी लड़कों की तरह चोपड़ा परिवार का एक किशोर भी राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का सदस्य बन गया था और उनकी शाखाओं, अखाड़ों और कसरतों में सक्रिय भागीदारी करने लगा था. उसकी सक्रियता धीरे-धीरे ख़तरनाक हदों को लांघने की कोशिश करने लगी थी जिससे उसका परिवार अभी तक अनजान था. लेकिन एक दुर्घटना ने किशोर की अवांछित हरकतों को सबके सामने उजागर कर दिया. एक शाम उस किशोर की भाभी ने खाना बनाने के लिए तंदूर में ज्यों-ही आग लगाया, एक बड़े विस्फोट से समूचा घर दहल उठा. उस तंदूर में उस किशोर ने दंगों में इस्तेमाल के लिए बनाये बम छुपाये हुए थे. ग़नीमत रही कि जान-माल का विशेष नुकसान नहीं हुआ. इन्हीं दिनों किशोर ने लूटेरों के गिरोह के साथ एक घड़ी की दूकान में लूट-पाट की और लूट का एक हिस्सा घर में छुपा दिया जो उसकी माँ के हाथ पड़ गया. बेटे की इन हरकतों से परेशान माँ ने पहले तो उसकी जमकर पिटाई की और असामाजिक तत्वों से उसे दूर रखने के लिए उसके बहन-बहनोई के यहाँ दिल्ली से सटे रोहतक शहर भेज दिया. इन्हीं दिनों चोपड़ा परिवार के एक सदस्य को अपनी पत्नी और बच्चों के साथ लाहौर छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा. उस सदस्य ने बिखरी ज़िंदगी को फिर से सँवारने की उम्मीद में अपने एक भाई के साथ बंबई का रुख किया. कुछ ही साल बाद उस किशोर को भी उसने बंबई बुला भेजा और अपने साथ फिल्म निर्माण और निर्देशन के काम में लगा दिया. लाहौर से बंबई आये इस व्यक्ति का नाम बी आर चोपड़ा था और बम बनाने वाले किशोर का नाम यश राज चोपड़ा था. एक और भाई जो बी आर के साथ बंबई आया था उसका नाम धर्म राज चोपड़ा था जो बाद में बड़ा नामचीन सिनेमैटोग्राफर बना. तुरंत ही एक और सहोदर राजकुमार फिल्म वितरण के व्यवसाय से जुड़ गए. चोपड़ा बंधू- बी आर और यश राज- अगले बीस सालों तक साथ में और फिर उसके अगले तीस सालों से अधिक समय तक अलग-अलग बैनर के बतौर बॉम्बे सिनेमा के सबसे प्रभावशाली और मज़बूत नाम होने वाले थे.

कुल अस्सी साल की उम्र में से यश जी ने साठ साल सिनेमा को दिए जिसके शुरूआती पन्ने बड़े दिलचस्प हैं जिन्हें यश जी को याद करते हुए पलटना रोमांचक अनुभव है. जलंधर में 1950 में बी ए की पढ़ाई पूरी करने के बाद बंबई आए. बी आर उन्हें इंजीनियरिंग की पढ़ाई के लिए लन्दन भेजना चाह रहे थे लेकिन यश जी को बंबई का माहौल बहुत रास आ गया था और वे फ़िल्मों से जुड़ना चाहते थे. बी आर उन दिनों शोले (1953) बना रहे थे जिसकी यूनिट के साथ यश जी को भी रख लिया गया. बड़े भाई का मानना था कि वे किसी और के साथ फ़िल्मों के बारे में अधिक सीख सकेंगे. यह सोचकर उन्होंने यश जी को आई एस जौहर के साथ लगा दिया. लेकिन कुछ समय बाद प्रसिद्ध चरित्र अभिनेता जीवन ने बी आर को सलाह दी कि वे यश चोपड़ा को अपने साथ ही रख कर सिखाएं. बी आर अपनी अगली फिल्म चांदनी चौक (1954) बना रहे थे. इस फिल्म में पहली बार यश चोपड़ा को बतौर सहायक काम दिया गया और उनका वेतन नियत किया गया. अगले साल बी आर ने अपना बैनर स्थापित किया और उसके तीन फ़िल्मों- एक ही रास्ता (1956), नया दौर (1957) और साधना (1958) -में यश राज ने बड़े भाई को सहयोग दिया. लेकिन वे किसी भी फिल्म में मुख्य सहायक नहीं होते थे, उन्हें तीसरा सहायक ही रखा जाता था. इन फ़िल्मों की भारी सफलता ने बी आर फ़िल्म्स को लोकप्रिय और विश्वसनीय बैनर के रूप में स्थापित कर दिया.

सहायक निर्देशक के तौर पर काम करते हुए यश चोपड़ा को लगभग सात साल हो चुके थे और वे अबतक ज़रूरी अनुभव हासिल कर चुके थे. बी आर ने बैनर की अगली फिल्म के निर्देशन का जिम्मा यश चोपड़ा और अपने एक अन्य सहायक ओ पी बेदी को सौंपा लेकिन फ़िल्म पर काम शुरू होने से पहले ही बेदी ने बी आर फ़िल्म्स को छोड़ दिया. अब निर्देशन की पूरी जिम्मेवारी यश जी की थी और उनका मासिक वेतन 500 रुपये तय किया गया. सामाजिक मुद्दों को बेबाकी से उठाने की अपनी छवि को बरक़रार रखते हुए बी आर फ़िल्म्स ने धूल का फूल (1959) में ‘अवैध’ संतान का मुद्दा उठाया. फ़िल्म में शादी से पहले बनने वाले सम्बन्ध के बारे में कोई भी निर्णय नहीं दिया है, बल्कि उसे स्वाभाविक घटना के तौर पर प्रस्तुत किया गया है. फ़िल्म में मूल बहस ऐसे सम्बन्ध से पैदा हुए बच्चे की जिम्मेवारी को लेकर है जिसमें ‘माँ’ को यह अधिकार मिलता है, न कि ‘पिता’ को जो उसकी जिम्मेवारी से मुकरता रहता है. फ़िल्म ‘अवैध’ माने जाने वाले ऐसे बच्चे को पूरा सम्मान देती है जिसे साहिर के लिखे गीत के माध्यम से पेश किया गया है- ‘न हिन्दू बनेगा, न मुसलमान बनेगा, तू इंसान की औलाद है, इंसान बनेगा’. फ़िल्म ने तब शानदार कारोबार किया था और आज भी इसके गाने बड़े चाव से सुने जाते हैं.

इस फ़िल्म को मशहूर लेखक पंडित मुखराम शर्मा ने लिखा था और इसका नाम कवि प्रदीप ने सुझाया था. दिलचस्प बात है कि बी आर ने फ़िल्म के प्रचार के दौरान पोस्टरों पर बड़े-बड़े अक्षरों में ‘पं मुखराम शर्मा की धूल का फूल’ लिखवाया था जो एकदम नई बात थी. बी आर या यश राज के नाम से फ़िल्म का प्रचार करने से अधिक लाभ हो सकता था क्योंकि इनकी लोकप्रियता कहीं अधिक थी. और यह भी कि तब भी लेखकों को इंडस्ट्री में बहुत सम्मान नहीं दिया जाता था. बहरहाल, इस फ़िल्म ने यश चोपड़ा के निर्देशन के क्षेत्र में आने का उद्घोष कर दिया था. फ़िल्म की कहानी और निर्माण से सम्बंधित तत्वों का निर्णय तो बी आर ने किया था लेकिन शूटिंग के दौरान वे कभी भी सेट पर नहीं आते थे. वहाँ निर्देशक को पर्याप्त स्वतंत्रता थी. तब यश जी की उम्र 26 बरस थी. इस फ़िल्म के दौरान बी आर ने नियम बनाया कि एक समय में दोनों में से एक ही व्यक्ति निर्देशन करेगा और दोनों बारी-बारी से निर्देशन करेंगे. यश राज के निर्देशन में दूसरी फ़िल्म धर्मपुत्र (1961) थी जो आचार्य चतुरसेन शास्त्री के उपन्यास पर आधारित थी लेकिन उसमें व्यापक बदलाव किये गए थे. इस फ़िल्म से महान पृथ्वीराज कपूर के बेटे शशि कपूर का व्यस्क रोल में आगमन भी हुआ था. सांप्रदायिक सद्भाव और विभाजन पर आधारित तथा मधुर गीतों से सज्जित यह फ़िल्म व्यावसायिक रूप से सफल नहीं हो पाई लेकिन उसे समीक्षकों ने बहुत सराहा और राष्ट्रीय पुरस्कार से सम्मानित किया गया.

बी आर चोपड़ा ने यश राज को बैनर की पहली रंगीन और बड़े बजट की फ़िल्म वक़्त (1965) को निर्देशित करने को कहा. सदाबहार मनोरंजक फ़िल्म के रूप में प्रतिष्ठित यह फ़िल्म कई मायनों में बंबई सिनेमा के इतिहास में मील का पत्थर है. यह पहली ऐसी फ़िल्म थी जिसमें बड़े स्टार कलाकारों की भरमार थी. साज-सज्जा और तड़क-भड़क के मसले में भी इस फ़िल्म ने अपने सारे पूर्ववर्ती फ़िल्मों को बहुत पीछे छोड़ दिया. इसी समय बम्बईया फिल्में स्टूडियो की सीमित चारदीवारी से निकल कर आउटडोर और पर्यटन स्थलों का रुख कर रही थीं. वक़्त की पूरी शूटिंग रमणीक स्थलों पर पूरे चमक-दमक के साथ हुई थी. देश के विभाजन की त्रासदी को भूकंप की तबाही में बिछड़े परिवार के रूपक में प्रस्तुत करती यह फ़िल्म मेलोड्रामा पर यश चोपड़ा के स्वाभाविक पकड़ का जबरदस्त उदहारण है. इसी फ़िल्म से क्लासिक ‘यश चोपड़ा टच’ की शुरुआत होती है जो उनके आखिरी फ़िल्म तक में जारी रही है. चोपड़ा बैनर सामाजिक और व्यापक महत्व के मुद्दों पर फ़िल्म बनाता रहा था. इसी कड़ी में यश चोपड़ा के निर्देशन में बनी अगली फ़िल्म आदमी और इंसान (1969) एक बाँध निर्माण में हो रहे भ्रष्टाचार के ज़रिये इस भीषण समस्या को रेखांकित करती है. हर फ़िल्म की तरह इसमें भी रोमांस की कोमल और सुन्दर उपस्थिति है जिसके आलोक में विषय-वस्तु को फ़िल्म खंगाल रही है. लेकिन यश राज की अगली फ़िल्म में पिछली तमाम फ़िल्मों से बिलकुल उलट एक अज़ीब किस्म के सस्पेंस को पेश किया गया. इत्तेफ़ाक़ (1969) एक महीने के अन्दर बनी गयी थी जब बैनर आदमी और इंसान की कलाकार सायरा बानो की बीमारी से उबरने का इंतज़ार कर रहा था ताकि बचा हुआ कुछ डबिंग का काम पूरा किया जा सके. ये दोनों फिल्में बहुत कामयाब रहीं. उल्लेखनीय है कि लगभग दस साल पहले बी आर चोपड़ा कानून बना चुके थे जिसमें कोई गाना नहीं था और न ही किसी तरह के बेजा ग्लैमर का प्रयोग किया गया था. ठीक वैसे ही इत्तेफ़ाक़ में कोई गाना नहीं था और यश चोपड़ा ने कहानी में कोई चमक डालने की कोशिश नहीं की.

तीनों भाईयों की यह टीम बंबई फ़िल्म जगत में अपने पाँव जमा चुकी थी. लेकिन 38 साल के यश राज का अभी तक अविवाहित रहना बड़े भाई को रास नहीं आ रहा था. आखिरकार 20 अगस्त, 1970 को दिल्ली की पामेला सिंह के साथ यश चोपड़ा विवाह के बंधन में बंध गए और हनीमून के लिए बाहर चले गए. उन्हीं दिनों उनके मन में अपने भाई की छत्र-छाया से मुक्त हो कर ‘अपने पंखों से उड़ने’ की आकांक्षा पलने लगी थी और जल्दी ही यश राज फ़िल्म्स नाम से एक बड़े बैनर की शुरुआत होनी थी. भाईयों के अलगाव को लेकर फ़िल्मी दुनिया में कई तरह की बातें तब भी की गयीं और आज भी की जातीं हैं, लेकिन दोनों भाईयों ने कभी भी इस बाबत या एक-दूसरे के ख़िलाफ़ नहीं बोला. अलग होने के बाद भी दोनों मिलते-जुलते रहे और एक-दूसरे के कार्यक्रमों में शामिल होते रहे. उन फ़िल्मों की डी वी डी जो दोनों ने साथ बनाई थीं, उनमें उन फ़िल्मों के बारे में दोनों भाईयों की आपसी बातचीत है जो उन्हें जानने-समझने के लिए बहुत ज़रूरी हैं. और उन्हें जानना-समझना इसलिए ज़रूरी है क्योंकि हमारे सिनेमा के सौ साल के इतिहास के बड़े हिस्से में बी आर और यश जी के कदमों के निशाँ हैं.

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