जीवन भर की दोस्ती की सच्ची कहानी

शालिनी श्रीनेत आजकल कुछ सच्चे किरदारों से मिलकर उनकी उनके बारे में लिख रही हैं जिनका जीवन अपने आप में कम अफसाना नहीं रहा. ऐसी ही एक कहानी एक लोक-कलाकार और एक चित्रकार, सिरेमिक कलाकार की प्रेम कहानी आज प्रस्तुत है- मॉडरेटर

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मेरा नाम अज्ञेश है। मैं छत्तीसगढ़ के राजनंदगांव से हूं। पढ़ाई बस पांचवीं तक हुई है। पिता देवीलाल नाग छत्तीसगढ़ी नाचा लोकनृत्य करते थे। मैं गर्मियों की छुट्टियों में पिताजी के साथ दिल्ली घूमने आई थी। तब मैं तेरह साल की थी। पिताजी हबीब तनवीर के साथ थिएटर करते थे। तब एक नाटक ‘मिट्टी की गाड़ी’ का रिहर्सल चल रहा था।

दासी का रोल जिस लड़की को करना था वह आ नहीं रही थी। हबीब जी ने मुझसे रोल करने को कहा। तीन दिन रिहर्सल के बाद मेरा टेस्ट लिया गया तो हबीब जी ने कहा – यह लड़की कर लेगी। मेरा पहला शो आइटीओ पर हुआ। इसके बाद लगातार थिएटर करती रही और मुझे इसमें मजा भी आने लगा। ‘शाजापुर की शांतिदेवी’ नाटक के रिहर्सल के दौरान मेरी शादी तय की जा रही थी मगर मैं शादी करना नहीं चाहती थी। मुझे देखने लड़के वाले आए तो मैं उनके सामने स्कर्ट पहनकर थप-थप करती आ गई। बावजूद इसके उन लोगों ने मुझे पसंद कर लिया। मैं सीढ़ी लगाकर घर से बाहर उतर गई और कहा कि तब तक नहीं आउंगी जब तक ये लोग चले नही जाएंगे। जब वो चले गए तो मैं घर लौटी और अपने बाल काट लिए कि मैं अच्छी न लगूं और इस तरह मैंने अपनी सगाई तोड़ ली। आस-पड़ोस वाले चिढ़ाने लगे कि जीनत अमान बन रही हैं।

कुछ वर्ष बाद हबीब जी पूरे ग्रुप के साथ भोपाल शिफ्ट हो गए। हम लोग भारत भवन में रिहर्सल करते थे। वहां पेंटिंग और सिरेमिक आर्ट के कलाकार भी आते थे। एक आर्टिस्ट सीरज (जो अब मेरे पति हैं) हमारे रिहर्सल वाले कमरे से होते हुए बाहर जा रहे थे। हम रिहर्सल कर रहे थे इसलिए मैंने कहा- दरवाजा बंद कर देना। वे बोले- जी,बंद कर दूंगा।

उसके बाद सीरज रोज उधर से गुजरते, मुझसे हाय-हैलो करते और मेरे दोस्त देखते ही चिढ़ाने लगते- आ गया तेरा आशिक। यह सच्चाई भी थी, सीरज मुझे मन ही मन पसंद करने लगे थे। एक दिन सीरज ने मुझे अंग्रेजी में चिट्ठी दी। चिट्ठी पाकर मैं परेशान हो गई। सोचने लगी कि चिट्ठी में पता नहीं क्या लिखा है, दोस्तों को दिखाऊं कि नहीं। फिर मैं सीरज के ही पास गई और उनसे ही कहा- मैं ज्यादा पढ़ी-लिखी नहीं हूं। अंग्रेजी तो बिल्कुल नहीं आती। उन्होंने वह चिट्ठी खुद पढ़कर सुनाई। वह एक लवलेटर था। जिसमें लिखा था- दोस्ती चाहता हूं, जीवन भर के लिए…

सीरज मुझसे बहुत प्यार करते थे… यह उनकी आंखों में दिखता था… लेकिन मैंने कभी इस तरह सोचा नहीं… क्योंकि सीरज मुझसे दस साल छोटे थे। उम्र की बात करती तो कहते कि मुझे इससे कुछ लेना-देना नहीं। मैंने कहा कि तुम तो बहुत पढ़े-लिखे हो, मुझसे शादी क्यों करना चाहते हो? सीरज ने कहा- क्योंकि आप मुझे पसंद हैं। उनको मैंने बहुत समझाया। तीन साल हां-ना चलता रहा। वे मुझे बहुत चिट्ठियां लिखते थे। मैंने उनको बस एक चिट्ठी लिखी और शादी के लिए हां दी। हां, सुनते ही सीरज ने अचानक एक दिन मुहुर्त निकलवाया। उनके दोस्त अखिलेश मुझे स्कूटर से अपने घर ले आए जहां उनकी पत्नी अर्चना जी ने शादी की सारी तैयारी कर रखी थी। तीन घंटे के अंदर शादी हो गई। सीरज के बहन-भाई सुहाग का सामान लेकर आए थे। मेरी तरफ से कोई नहीं था। शादी के बाद मैं अपने घर और सीरज गेस्ट हाउस…।

अजेश जी 
अजेश जी

Posted 8th December 2016 by prabhat Ranjan
हम तीन साल अलग-अलग रहे। घर के लोगों को पता भी नहीं था। हबीब जी की पत्नी को किसी दोस्त से पता चला । उन्होंने मेरी मां को बताया और मां ने पिता जी को। पिताजी ने एक हफ्ते तक किसी से बात नहीं की। मैंने इस बीच देश के बाहर जापान, जर्मनी, लंदन और पेरिस में भी थिएटर किया। सीरज के घरवाले कहते- कायस्थों में लड़कियां मर गई थीं क्या… जो आदिवासी से शादी कर ली? सीरज के माता-पिता मेरा नाटक देखने आते थे। एक बार उन्होंने कहा- कब तक अलग रहोगे? फिर कुछ दिनों बाद हम साथ रहने लगे। मेरा आखिरी नाटक था ‘राजरक्त’। फिर मैंने बेबी प्लान किया और थिएटर छोड़ दिया। अब मेरा बेटा नौ साल का है, अब मैं फिर से थिएटर करने की सोच रही हूं। मरने से पहले एक बार और थिएटर करने का मन है।

Labels: ajesh shalini shrinetra अजेश शालिनी श्रीनेत्र

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