हम सब भी इंसान रूप में कुछ-कुछ गधे ही हैं

सदन झा इतिहासकार हैं. आधुनिक इतिहास के गहरे अध्येता, सिम्बल्स को लेकर बहुत अच्छा काम कर चुके हैं. यूपी के गधा विमर्श में उन्होंने एक अलक्षित पहलू की तरफ ध्यान दिलाया है. पढने लायक- मॉडरेटर

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हर दफे चुनाव कुछ नये शगूफे लेकर आता है। फिर, यूपी चुनाव की बड़ी अहमियत जो ठहरी।  आजकल गदहों के बारे में बहुत बातें हो रही है। हिंदुस्तान में ऐसा हमेशा नहीं होता। खासकर गंगा जमुनी तहजीब में तो नहीं ही। हम घोड़े की बात करने में शान समझते हैं। हाथी पालने को नवाबी विरासत के साथ जोड़ शेखी बघारते हैं। गाय तो खैर हैं ही, कामधेनु और माता। जब कोई दांव न चल रहा हो तो राजनेता उनके सम्मुख नतमस्तक हो लेते हैं। पर, भला गदहा यह भी कोई बात करने लायक जीव है? क्या जमाना आ गया है! घर का जो सबसे नामुराद हो वह तो यूँ ही गदहा हो जाता है। फिर, इतना बात उसके लिये नहीं किया करते।यदि कोई सही मायने में उपाश्रयित रहा है तो वह है गदहा। और, गंगा जमुनी तहजीब में हम जितना गदहा गदहा करेंगे, लोग हमको उतना बड़ा गदहा समझेंगे। पर, खैर यहां यह जोड़ देना चाहिये कि गदहा भले ही उपहास का पात्र हो लेकिन खच्चर से एक पायदान उपर हुआ करता है। खच्चर तो गाली के संदर्भ में ही उपयोग में आता है। गदहा तो फिर भी मासूमियत लिये हुए बेवकूफ के ही अर्थ में हमारे उपहास और विनोद का प्रतीक रहा है।

मैं कम से कम इसी अर्थ में गदहे को मुल्ला नसरुद्दीन के साथ जोड़कर पढ़ा करता था। मुल्ला हमेशा गदहे की ही सवारी किया करते। मुझे शुरु शुरु में यह गुदगुदाता। कौतूहल भी जगाता। क्या मुल्ला को इतना गया गुजरा दिखाना लाजिमी था कि उन्हें एक घोड़े के काबिल भी न समझा जाय?

खैर, गदहे को देखने का मेरा नजरिया पहले पहल तब बदला जब पहली बार परदेस जाने का मौका मिला। वह भी दक्षिण अफ्रीका। यदि यूरोप या अमरीका गया होता तो शायद अपनी औपनिवेशिकता में बना रहता। पर, यहां मामला कुछ और था। वहां सेमिनार भी दक्षिण-दक्षिण की साझी विरासत पर था। तो जनाब एक पूरा पेपर एक बहुत ही सुन्दर और तेज महिला ने गदहे के उपर प्रस्तुत कर दिया। उन्होने बताया कि कैसे यदि गदहा कुछ अफ्रीकी संस्कृति में उपहास का नहीं आदर का पात्र माना जाता है।

पर, मुल्ला बाली गुत्थी फिर भी बनी रही। भला कोई भला मानस गदहे की सवारी करता है क्या? लेकिन एक बार संयोग से मिस्र जाने का मौका मिला। यह मत समझ लीजियेगा कि मैं अपने परदेश भ्रमण से आपको प्रभाबित करने का भौंडा प्रयास कर रहा हूँ। यकीन मानिये बहुत कम दफे ही पासपोर्ट की उपयोगिता सिद्द हो पायी है अब तक। खैर, तो मिस्र में सड़कों पर तो मुझे बहुतेरे मुल्ला नसरुद्दीन मिले गदहे की सवारी करते हुए। एकदम सामान्य सी बात। और तब मुझे लगा कि हमने मुल्ला नसरुद्दीन और उनके गदहे को तो अरब से ले आये पर, पढ़ने में अपनी ही नवाबी संकुचित मूल्यबोध में जकड़े रहे। लब्बोलुबाब यह कि गदहे को देखें तो कुछ आदर तो दें। इसलिये नहीं कि हमारे चारो तरफ तो यही पसरे हैं। बल्कि इसलिये कि हम सब कभी न कभी, कहीं न कहीं और किसी न किसी के लिये तो गदहे रहे ही हैं। जनम भले ही मानव रुप में हुआ हो।

लेखक संपर्क: sadanjha@gmail.com 

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