इस साल उन्मोचन शृंखला की पाँच पुस्तकों का प्रकाशन हुआ है। वाणी प्रकाशन से प्रकाशित इन पुस्तकों में से भारत की सारस्वत साधना – राधावल्लभ त्रिपाठी तथा भारतीय ज्ञान-परम्परा : सातत्य और संवर्धन – बलराम शुक्ल पुस्तकों पर यह विस्तृत और सुचिंतित टिप्पणी की है प्रचण्ड प्रवीर ने। आप भी पढ़ सकते हैं- मॉडरेटर
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साल २०२६ की महत्त्वपूर्ण वैचारिक उपलब्धियोँ मेँ उन्मोचन शृङ्खला की पाँच पुस्तकेँ गिनी जाएगी। इस शृङ्खला की दो पुस्तकेँ सीधे तौर पर भारतीय ज्ञान-परम्परा से जुड़ती हैँ।
१. भारत की सारस्वत साधना – राधावल्लभ त्रिपाठी
२. भारतीय ज्ञान-परम्परा : सातत्य और संवर्धन – बलराम शुक्ल
आचार्य राधावल्लभ त्रिपाठी ने भारत की ज्ञान-परम्परा को उसके प्रमुख व्यक्तिनिष्ठ सूत्रोँ से या कहा जाय कि प्रमुख ऐतिहासिक व्यक्तित्वोँ और कृतित्वोँ से परिचय कराया है। शृङ्खला के अन्तर्गत श्री बलराम शुक्ल की पुस्तक ‘भारतीय ज्ञान-परम्परा : सातत्य और संवर्धन’ इस अर्थ मेँ महत्त्वपूर्ण है कि यह भारत की ज्ञान परम्परा के विषय-परिचय का अधुनातन उपक्रम है। श्री बलराम शुक्ल पुस्तक की भूमिका मेँ परम्परा का अर्थ सुस्पष्ट करते हैँ कि यह ‘साध्य’ परिघटना है जिसका स्वरूप है – निरन्तर परिवर्धन और उन्नततर ज्ञान का समावेशीकरण। परम्परा मेँ अंशतः स्वीकार और अंशतः परिहार का विवेक सदा जागृत रहा है। पूरी पुस्तक मेँ भारतीय ज्ञान-परम्परा के वैचित्र्य और विरोधी लगने वाले विचारोँ पर भारतीय मौलिक दृष्टि का विचार किया गया है।
प्रायः पाश्चात्त्य पद्धति मेँ ढला आज का मानस इस विचित्रता को पिछड़ापन, मूढ़ता या निरर्थक समझ का आगे बढ़ जाना पसन्द करता है। यह उसे बहुत बाद मेँ समझ आता है कि आधुनिक संसदीय प्रजातन्त्र और आधुनिक न्यायपालिका, यहाँ तक कि निरीश्वरवादी मार्क्स का चिन्तन भी अब्राहमिक पन्थोँ की मूलभूत अवधारणाओँ से ही प्रेरित और संचालित है। जिसे शृङ्खला सम्पादक औपनिवेशिक मानसिकता कहते है, नीत्शे के शब्दोँ मेँ भारतीयोँ की आत्मविस्मृति से उपजी दास मानसिकता है जिसने अब्राहमिक पन्थोँ की अवधारणाओँ को विना जाँचे-परखे स्वीकार कर लिया है। सवाल उठता है कि भारतीय ज्ञान-परम्परा है क्या? बहुत से महानुभाव बड़े गर्व से भ्रामक भाषण देते हैँ कि भारतीय दर्शन मेँ आपस मेँ इतना विरोध है कि कोई भी अवधारणा इसे व्याख्यायित नहीँ कर सकती। कुछ बेशर्मी और अल्पज्ञान से समाजशास्त्रीय चश्मेँ से ज्ञान-परम्परा को समझने का प्रयत्न करते हैँ। परन्तु इन उपक्रमोँ से निरर्थकता के अलावा कुछ हासिल नहीँ होता। ऐसे निरर्थक उपक्रम भारतीयोँ के लिये बहुत घातक होते हैँ क्योँकि यहीँ ग्राम्य और नागर विचारोँ का स्पष्ट भेद प्रारम्भ होता है। दुःखद स्थिति यह है कि भारतीय नागर विचार चिन्तन अभी भारतीय न होकर, पाश्चात्त्य भी न होकर, मूल्यविहीन और अराजक चिन्तन से गुजर रहा है। बहुतेरे विचारोँ को समझने की कुञ्जी वे खो चुके हैँ और भ्रामक विचारधाराओँ की खटारा बस की पीठ पर लटके-लटके दुर्घटना को प्राप्त होने को अभिशप्त हैँ।
भारतीय विचार परम्परा से परिचय का अभी तक का सर्वस्वीकृत तरीका मैसूरु हिरियण्णा (1871–1950) की ‘आउटलाइन ऑफ इण्डियन फिलॉसफी’ (१९३२) या रामचन्द्र दत्तात्रेय राणडे (१८८६-१९५७) की ‘अ कन्सट्रक्टिव सर्वे ऑफ उपनिषदिक फिलॉसफी’ या पाण्डुरङ्ग वामन काणे (१८८०-१९७२) की ‘धर्मशास्त्र का इतिहास’ या चन्द्रधर शर्मा की ‘भारतीय दर्शन: आलोचना या अनुशीलन’ आदि माना जाता है। मैँ यहाँ सर्वपल्ली राधाकृष्णन की पुस्तक का नाम नहीँ लेना चाहता क्योँकि भूतपूर्व राष्ट्रपति पर उनकी चर्चित पुस्तक ‘भारतीय दर्शन- भाग २’ के कई अनुच्छेद उनके शिष्य के शोधग्रन्थ की मूल पाण्डुलिपि से सीधे-सीधे उठा लेने का आरोप लगा था और अन्त मेँ यह मामला न्यायालय से बाहर सौदे मेँ रफा-दफा किया गया था।
मानक पुस्तकोँ से ज्ञान-परम्परा का यह परिचयात्मक तरीका विशिष्ट विषयोँ के अनुगत होने के कारण कुछ न्यून जान पड़ता है। मेरा मानना है कि आचार्य राधावल्लभ त्रिपाठी की ‘भारत की सारस्वत साधना’ और श्री बलराम शुक्ल की ‘भारतीय ज्ञान-परम्परा’ ये दो ऐसी पुस्तकेँ हैँ जो कि भारतीय वाङ्मय से परिचित होने के लिए अब मूलभूत पुस्तकोँ मेँ गिनी जाएँगी। यह नहीँ कहा जा रहा है कि भारतीय ज्ञान परम्परा के हरेक पक्ष को इन दो पुस्तकोँ मेँ समेट ही लिया गया है, अपितु यह कहा जा रहा है कि परम्परा से परिचित होने के लिये इन पुस्तकोँ का विषय-विस्तार पूर्व मानकोँ से कहीँ अधिक है और यह प्रयास रुचिकर प्रतीत होता है।
बलराम शुक्ल यह प्रतिपादित करते हैँ कि ज्ञान-परम्परा स्वयं को पुनर्जीवित करती है। भारत मेँ बहुधा विचारोँ के साम्य के लिये वृक्ष-पत्र का सहारा लेते हैँ वहीँ यूरोपीय पद्धति मेँ समुद्र का उदाहरण लिया जाता है। जिस तरह के वृक्ष से पत्ते झड़ते हैँ और नये पत्ते निकलते हैँ, जहाँ हर पत्ता अन्य पत्तोँ की तरह ही है और उससे भिन्न भी है, उसी तरह भारतीय ज्ञान-परम्परा मेँ पूर्व और पर मेँ साम्य भी है भिन्नता भी है। भारतीय ज्ञान-परम्परा के सम्बन्ध मेँ लेखक भूमिका मेँ ही परम्परा के स्वतः नवीनीकरण की निम्न चार प्रविधियोँ को केन्द्रीय कथ्य बताते हैँ: —
१. कई बार परम्परा की सीमाएँ पुरानी होने के कारण अपर्याप्त होने लगती हैँ। वह इन सीमाओँ का विस्तार कर लेती हैँ।
२. परम्परा की परिधि वर्तमान आवश्यकताओँ की दृष्टि मेँ अतिव्यापक होने लगती हैँ। उसे इन्हेँ सङ्कुचित करना पड़ता है।
३. परम्परा अपनी सीमाओँ को पुनः परिभाषित करके उसे नये अर्थोँ मेँ ग्रहण करती है।
४. युगोँ से चले आ रहे अपने कुछ आचरणोँ का परित्याग कर उनको पूर्णतः भी छोड़ देती हैँ।
यह मौलिक प्रविधियाँ ही पुस्तक की आधारभूत संरचना (अर्वाचीन विकास, पुनरुत्थान के वर्तमानकालिक प्रयास, परम्परा के प्रायोगिक प्रमाण, भारतीय परम्परा की विश्वदृष्टि) को बनाती है। भाषा, दर्शन, धर्मशास्त्र, काव्य, नवजागरण इत्यादि मेँ उपर्युक्त चार प्रविधियोँ का निदर्शन है।
श्री बलराम शुक्ल वैयाकरण के रूप मेँ प्रतिष्ठित हैँ पर वे भारत के उस प्रज्ञा परम्परा से जुड़ने का प्रयास करते हैँ जहाँ प्राज्ञ पुरुष कहे जाने के लिये सभी जीवन के सभी विषयोँ से परिचय न्यूनतम अहर्ता होती है। वर्तमान मेँ जिस तरह ज्ञान का विस्फोट हुआ है और ज्ञान के विस्तृत आयाम (तकनीक और विज्ञान, गणित, समाज विज्ञान, आयुर्विज्ञान, दर्शन, भाषा, राजनीति, अर्थशास्त्र, ललित कला, नाट्य-फिल्म, स्थापत्य आदि) इतने फैले हैँ कि अब कोई आचार्य हेमचन्द्र सूरि, कोई वाचस्पति मिश्र, कोई जयन्तभट्ट नहीँ हो सकता। अब किसी को ‘कलिकालसर्वज्ञ’ की उपाधि नहीँ दी जा सकती। किन्तु फिर भी सीमित क्षेत्रोँ मेँ भी ऐसी विशद प्रतिभाएँ अभी भी दृश्यमान हैँ जो विविध भाषाओँ, आधुनिक तकनीक, दर्शन, साहित्य आदि पर असाधारण अधिकार रखती हैँ। उदाहरण के लिये बहुत कम ही ऐसे प्राध्यापक मिलेँगे जो अपने क्षेत्र के ही उद्भट विद्वान होँ।
प्रसङ्गवश, आचार्य राधावल्लभ त्रिपाठी अपनी पुस्तक मेँ पण्डितकवि और कविपण्डित को जो समीकरण बताते हुए एक बड़ी रोचक उक्ति प्रस्तुत करते हैँ: —
विद्वत्कवयः कवयः केवलकवयमस्तु केवलं कपयः।
(विद्वान् होने के साथ जो कवि होँ, वे ही वास्तविक कवि हैँ, केवल कवि तो केवल कपि ही हैँ।)
तर्केषु कर्कशधियो वयमेव नान्ये, काव्येषु कोमलधियो वयमेव नान्ये
(तर्कोँ मेँ कर्कश बुद्धि वाले भी हम ही हैँ कोई और नहीँ, कविता मेँ भी कोमल बुद्धि वाले हम ही हैँ कोई और नहीँ।)
कोई मुझसे पूछे कि भारत-दुर्दशा का साधारण लक्षण क्या है और उपलक्षण (पहचान) क्या है? मैँ कहना चाहूँगा कि भारत-दुर्दशा का साधारण लक्षण यह है कि कोई भी महाजन (समाज मेँ प्रतिष्ठित व्यक्ति) अपने प्रतिबद्ध नैतिक आचरण के लिये नहीँ जाना जाता है। भारत-दुर्दशा का उपलक्षण यह है कि इतने विशाल देश के सभी जाने-माने कवि पूर्वोक्त उक्ति के अनुसार ‘कपि’ मात्र हैँ, क्योँकि उनके पास आधुनिक विज्ञान, एआइ, कम्प्यूटर, गणित, अर्थशास्त्र, दर्शन आदि की मूलभूत समझ नदारद है। पण्डितकवि का अभाव ही किसी भी संस्कृति की दुर्दशा का उपलक्षण है। अब कोई कह सकता है कि आप नैतिकता के लिये प्रसिद्ध महाजन के अभाव को भारत-दुर्दशा का प्रमाण कैसे मान सकते हैँ? इसके लिये उन्हेँ बलराम शुक्ल जी का ग्रन्थ पढ़ना चाहिये जहाँ वे बताते हैँ कि मीमांसकोँ की दृष्टि मेँ ‘अनुपलब्धि’ भी एक प्रमाण है। हालाँकि मीमांसकोँ से मतभेद रखा जा सकता है, हम आगे बढ़ते हैँ।
आचार्य राधावल्लभ त्रिपाठी संस्कृत के प्रतिष्ठित विद्वान है और काव्यशास्त्र उनका प्रिय विषय रहा है। उनका ग्रन्थ मुख्यतः सूचनापरक है जिसमेँ वे ऐतरेय महीदास से कलाशास्त्र, पाणिनि से व्याकरण, कौटिल्य से अर्थशास्त्र, वात्स्यायन से कामसूत्र, भरतमुनि से नाट्यशास्त्र, भर्तृहरि से वैयाकरण दर्शन, शङ्कराचार्य से केवलाद्वैत, वामन से संरचनावादी सौन्दर्यशास्त्र, आनन्दवर्धन से ध्वनि-सिद्धान्त, कुन्तक से अलङ्कार, अभिनवगुप्त का काश्मीर शिवाद्वयवाद और सौन्दर्यशास्त्र से होते हुए पण्डितराज जगन्नाथ और गोपीनाथ कविराज तक विद्वानोँ के कृतित्व और मत-मतान्तर का परिचय है। अन्तिम आलेख मेँ राधावल्लभ त्रिपाठी पाश्चात्त्य दृष्टि से भारतवर्ष के आकलन की आलोचना भी करते हैँ। इस क्रम मेँ वह ग्यारहवीँ सदी से अठारहवीँ सदी को संस्कृत का उन्नत काल भी गिनाते हैँ, जिसके लिये वे सन्दर्भित काल के उपलब्ध ग्रन्थोँ की गणनात्मक बहुलता की ओर ध्यान दिलाते हैँ, जिनका परित्याग ज्ञान-परम्परा ने कबका कर दिया। उनका यह तर्क इसलिये भी गले नहीँ उतरता क्योँकि मध्यकाल से पहले के महान आचार्योँ की तुलना मेँ स्वयं त्रिपाठी जी ने बहुत अल्पमात्रा मेँ तुलनीय प्रतिभाओँ की ओर ध्यान दिलाया है। किन्तु ऐसी कुछ मिलती-जुलती स्थापनाओँ की अनदेखी करने से हमेँ इस पुस्तक के विपुल सूचनात्मक और तथ्यात्मक आयामोँ की प्रशंसा करनी होगी। यह हर विद्यार्थी को अवश्य जानना चाहिए कि किस तरह भरतमुनि के प्राचीन ‘नाट्यशास्त्र’ (५०० ईसापूर्व से २०० ईस्वी तक) और उस पर दसवीँ सदी के काश्मीरी आचार्य अभिनवगुप्त की टीका ‘अभिनवभारती’ लुप्त हो चुकी थी और किन महान प्रयासोँ इन ग्रन्थोँ को ढूँढ निकाला गया है। इतना ही नहीँ भरतनाट्यम् का पुनरुत्थान भारतविदोँ के लगन और अनुसन्धान का ही फल है। परम्परा के पुनरुज्जीवन मेँ पाश्चात्त्य विद्वानोँ के प्रयास का भी योगदान है। यह सभी को जानना चाहिए कि अभी भी वेद ठीक से नहीँ समझे जाते हैँ और उनकी तुलना अधिक ग्राह्य समझे जाने वाले ‘तान्त्रिक पाठ्य’ भी बिखरे हैँ या लुप्तप्राय हैँ। तन्त्रदर्शन से जुड़ी कई पाण्डुलिपियाँ खोजी जानी शेष है। भारत की सारस्वत साधना मैँ बौद्धोँ के वज्रयान, शैवोँ के तन्त्रदर्शन, जैनोँ का व्याकरण – जैसे कई विषय सारस्वत साधना का विषय नहीँ बने हैँ, किन्तु व्यावहारिक बात यह है कि हर पुस्तक की अपनी सीमा है। दूसरी बात यह भी है कि भारत की निगम परम्परा (वैदिक चिन्तन) की अपेक्षा आगम परम्परा (तान्त्रिक सम्प्रदाय) सदा गुह्य ही रही है। तन्त्रोँ के अठारह शैवागम और चौँसठ भैरवागम की पाण्डुलिपियाँ शायद ही भारत मेँ किसी के पास उपलब्ध हैँ।
भारतवर्ष एक विचित्र संक्रमण काल से गुजर रहा है। लम्बी दासता, ढेरोँ महामारियाँ, बहुतेरे अकाल और उसके पश्चात मिली स्वतन्त्रता के बाद के पचास-साठ साल तक जो घोर दरिद्रता और अभाव रहा है, उसकी अनुभूति ‘जेन जी’ मेँ नगण्य है। नई पीढी को ये नहीँ मालूम कि अस्सी के दशक तक भारत की बड़ी आबादी विना चप्पल के और विना समुचित आहार के रहा करती थी। साठ के दशक की हरित क्रान्ति से पहले भारत खाद्यान्न मेँ आत्मनिर्भर तक नहीँ था। एक समय था कि खाने के लिये लाल गेहूँ विदेशोँ से आयात करना पड़ता था। सदियोँ की दासता मेँ भी, घोर दरिद्रता मेँ भी, नाना प्रकार की कठिन परिस्थितियोँ मेँ भी भारत के विद्वानोँ ने ज्ञान को संरक्षित करने की बड़ी कोशिशेँ की हैँ। हम इसमेँ कई बार चूकेँ और कहेँ तो अपनी ज्ञान भण्डार से हाथ भी धो बैठे। वहीँ कई विद्वान पिछले सौ-डेढ़ सौ साल से किसी-किसी महाराजा के पुस्तकालय से, किसी कुटिया से सदियोँ पुरानी सँभाली पाण्डुलिपियोँ से अपने ज्ञान-परम्परा से जुड़ने का प्रयास कर रहे हैँ। पाण्डुलिपियोँ के संरक्षण के लिये बकायदा बड़े संस्थान खोले गये।
प्रश्न यह नहीँ है कि भारतीय ज्ञान-परम्परा का क्या करेँ? आज का स्वाभाविक प्रश्न यह है कि पाश्चात्त्य ज्ञान-परम्परा ने तुम्हारा क्या कल्याण किया? क्या इससे तुम, तुम्हारा परिवार, तुम्हारे परिजन, तुम्हारे गुरुजन, तुम्हारा समाज सुखी और समृद्ध हुआ है? तथ्य यही है कि आधुनिक ज्ञानार्जन (कहेँ एमबीए, एमबीबीएस, बीटेक, एलएलबी आदि) करने के बाद भी भारत मेँ अधकचरी पीढी ही तैयार होती है जिसे न तो भारत का बोध है, न समाज की चिन्ता है और न ही ज्ञान के विषयोँ के अन्तर्सम्बन्धोँ का भान है। लेकिन ऐसा नहीँ है कि विद्यार्थियोँ को इसकी जिज्ञासा नहीँ होती। यह हमारे शिक्षातन्त्र की वैचारिक विफलता है कि हम सर्वाङ्गीण विकास के लिये समुचित व्यवस्था नहीँ कर पाते हैँ। मेरा मानना है कि ऐसी आधारभूत पुस्तकेँ उनके लिये उपयोगी होँगी। इतना ही नहीँ, जो भी साहित्यकार या कवि बनना चाहते हैँ, उनके लिए भी परम्पराबोध होना अनिवार्य है वरना आप अमरीका या ब्रिटेन मेँ कविता मेँ बैठ कर वैश्विक कविता लिख कर बुकर की प्रतीक्षा करेँ। दूसरा रास्ता यह है कि परम्पराबोध होने से आम भारतीय से जुड़कर नई पीढ़ी भारतीय परम्परा के सातत्य और संवर्धन मेँ योगदान दे। मैँ समझता हूँ कि यह दूसरा रास्ता ही धर्म है जो कि अर्थ और अन्ततः अविरोधी सुख देगा।
बलराम शुक्ल ने अपनी पुस्तक मेँ ‘भर्तृहरि’ के शब्दब्रह्मवाद पर अधिक जोर दिया है। उसकी तुलना मेँ उन्होँने वेदाङ्ग (शिक्षा, व्याकरण, छन्द, निरुक्त, कल्प और ज्योतिष) को बहुत कम स्थान दिया है। मुझे लगता है इन पुस्तकोँ की न्यूनता यही है कि हमने आधुनिक चुनौतियोँ को प्रकाश मेँ नहीँ रखा है और परम्परा का ढोल मात्र बजाया है। यदि हम व्याकरण की अनसुलझी गुत्थियाँ, आधुनिक शिक्षा-शास्त्र की एआइ के युग मेँ चुनौतियाँ, ज्योतिष की मौलिक समस्याएँ, कल्पोँ पर पुनर्विचार को सामने रखेँ तो नया मार्ग प्रशस्त होगा।
इसी सन्दर्भ मेँ यदि हम ईशोपनिषद् के विद्या और अविद्या के द्वन्द्व को देखेँ (मन्त्र ९ : वे अन्धकार मेँ प्रवेश करते हैँ जो अविद्या की उपासना करते हैँ और जो विद्या की उपासना मेँ ही रत हैँ वे मानोँ उससे भी अधिक अन्धकार मेँ प्रवेश करते हैँ ), तो जहाँ शङ्कराचार्य बृहदारण्यक उपनिषद् के व्याज से विद्या का अर्थ उपासना और अविद्या का अर्थ कर्म से लेते हैँ, वहीँ अन्य व्याख्याकार विद्या का अर्थ उपासना और अविद्या का सांसारिक ज्ञान से लेते हैँ। तदुनसार मैँ अविद्या का अर्थ छह वेदाङ्ग तथा उससे जुड़ी संसार की समस्त आधुनिक विद्यायेँ और विद्या का अर्थ ‘संहिता’ लेना उचित समझता हूँ। कहने का आशय है कि हमेँ वेदाङ्ग पर भी ध्यान देना चाहिए। क्या यह निराशाजनक नहीँ है कि हमेँ ज्योतिष (खगोलविज्ञान) , कल्प (धर्मसूत्र, श्रौतसूत्र, गृह्यसूत्र, शुल्बसूत्र), छन्द और शिक्षा की मूलभूत जानकारी नहीँ है। ऐसा इसलिये कहने को विवश हूँ क्योँकि यदि गैलेलियो के चार सौ साल के बाद भी आज भी भारत के अधिकांश विद्यार्थियोँ को आकाश मेँ दूरबीन के साथ नहीँ छोड़ा जाता है। बिरले ही कोई मिलेगा जिसने बृहस्पति के चन्द्रमा और शनि के वलय को किसी दूरबीन से देखा होगा। भारत मेँ जो ‘शिक्षा’ (=उच्चारण शास्त्र) अत्यन्त उच्च और अविश्वसनीय तरीके से समृद्ध थी, उसका हाल यह है कि बिरले ही कोई घोष-अघोष, अल्पप्राण-महाप्राण जैसी मूलभूत बातेँ समझता है। हमनेँ छन्द का ज्ञान खो दिया और साथ ही संगीत मेँ ही साधारण शिक्षा भुला दी। अच्छे-अच्छे विद्वान वैदिक छन्द और मात्रिक छन्द मेँ भेद नहीँ जानते हैँ जबकि यह पिङ्गल ने अपने छन्दशास्त्र मेँ स्पष्ट लिखा है। अब भारत मेँ जब तक कोई विशेष प्रयास न करे, तब तक उसका संगीत ज्ञान सुनने और सुन कर सिर हिलाने तक सीमित हो गया है। यह सब इसलिये हुआ है कि हमने अपनी ज्ञान-परम्परा और स्कूली शिक्षा मेँ नाट्य को बेदखल कर दिया है। मैँ भरतवाक्य याद दिलाना चाहूँगा कि नाट्य मेँ समस्त कलाएँ समाहित होती हैँ। यदि भारतवर्ष के शैक्षणिक उपक्रमोँ मेँ किसी स्तर पर भी नाट्य को अनिवार्य रूप से समाहित करेँ तो सम्भव हैँ हम वेदाङ्ग की परम्परा से जुड़ेँगे और जीवन का सर्वाङ्गीण विकास हो सकेगा।
भारतीय ज्ञान-परम्परा के जिस अङ्ग का सर्वाधिक तथा अविश्वसनीय स्तर का ह्रास हुआ, वह है भारत की चिकित्सा पद्धति। जैसा मैँने सुना है और पढ़ा है कि आज से चालीस-पचास साल पहले ऐसे-ऐसे वैद्य हुआ करते थे जो नब्ज पकड़ते ही विना रोगी के कुछ कहे अपने-आप सारी व्याधियोँ का लेखा-जोखा सुना देते थे। आज यह स्थिति है कि हर दूसरा डॉक्टर पिछली ब्लड रिपोर्ट यहाँ तक कि एमआरआइ को भी स्वीकार नहीँ करता बल्कि कमीशन के चक्कर मेँ और इन्श्योरेंस की जाल मेँ ग्राहक का दोहन करता है। बलराम शुक्ल यह सूचना देते हैँ कि भारतवर्ष मेँ आखिरी प्रसिद्ध मौलिक ग्रन्थ – वैद्यजीवन (लोलम्बिराज, १७वीँ सदी), आयुर्वेदप्रकाश (माधव, १७८६), योगतरङ्गिणी (त्रिमल्ल, १७६१), भैषज्यरत्नावली (गोविन्ददास, १८वीँ सदी) आदि हैँ। यह किसी भी बौद्धिक विमर्श से बाहर हैँ और भारतीय डॉक्टरोँ के लिए अछूत हैँ। यदि कोई आयुर्वेदिक डॉक्टर रोगी को पानी भी चढ़ाने लगे तो भारत के सभी अँग्रेजीदाँ डॉक्टर हड़ताल करने लग जाते हैँ। क्या भारत मेँ आयुर्वेद का पारम्परिक ज्ञान स्वास्थ्य-मित्रोँ की पद्धति नहीँ विकसित कर सकता है, जो कि कमसे कम मूलभूत उपचार मेँ सहायक हो? क्या हम लुटेरे और धोखेबाज बीमा तन्त्र से विछिन्न स्वतन्त्र स्वस्थ जीवन की कल्पना नहीँ कर सकते? वस्तुतः आयातित विधि व्यवस्था और सावर्जनिक स्वास्थ्य व्यवस्था जो कि भारत की पारम्परिक पद्धति से सर्वथा भिन्न है, भारत-दुर्दशा का प्रत्यक्ष-प्रमाण है।
गजानन बालकृष्ण पळसुले (१९६१) मेँ भाषा विज्ञान के सम्बन्ध मेँ पाश्चात्त्य भाषाविज्ञानियोँ की उपलब्धियोँ के मूल मेँ भारतीय भाषाशास्त्रियोँ द्वारा अन्वेषित क्रियामूलोँ को बताते हुए उनकी आलोचना ‘दादा के कन्धे पर चढ़ कर किसी पोते द्वारा अपनी लम्बाई पर किये जाने वाला गर्व’ से कहते हैँ। मैँ समझता हूँ कि ज्ञान के कई क्षेत्रोँ मेँ ऐसी बात है। साथ ही यह भी कहना चाहूँगा कि लगभग वैसी बात ज्ञान के हर क्षेत्र मेँ कहना दम्भ ही होगा क्योँकि आधुनिक भौतिक विज्ञान, रसायन विज्ञान, तकनीक, यहाँ तक कि कम्प्यूटर साइंस मेँ भी विश्व-स्तर पर भारतियोँ का मौलिक योगदान नगण्य है। इसका बहुधा कारण यह भी रहा है कि भारतीय प्रतिभा पश्चिम मेँ बहुल-संसाधनोँ मेँ अधिक फल-फूल रही है। किन्तु भारतीय विज्ञान संस्थान, भारतीय आयुर्विज्ञान संस्थान जैसे कतिपय संस्थान अभी भी कटिबद्ध होकर अपना योगदान दे रहे हैँ। लेकिन कब तक देते रहेँगे जब तक हमारे पास नैतिक रूप से उच्च विद्यार्थी नहीँ होँगे?
भारतवर्ष मेँ कई ऐसे जिज्ञासु हैँ जो सहज रूप से भारतीय परम्परा को जानना-समझना चाहते हैँ। लेकिन अक्सर यह होता है कि वे अँग्रेजीदाँ पुस्तकेँ पढ़ कर शेल्डेन पॉलोक और वेण्डी डॉनिगर जैसी भारत-द्वेषी और हेय धारणा बनाते हैँ। भारतवर्ष की ज्ञान-परम्परा मेँ आधुनिक सङ्घर्ष का लेखा-जोखा भी बलराम शुक्ल अपनी पुस्तक मेँ बताते हैँ। भारतीय ज्ञान-परम्परा को अँग्रेजी मेँ या पाश्चात्त्य तरीके से क्या कठिनाई आ सकती है, इसका बेहतरीन उदाहरण बौद्ध दर्शन के अध्ययन मेँ मिलता है। बहुत से उत्साही यह कहेँगे कि बौद्ध दर्शन अनात्मवाद है, आत्मा का निषेध करते हैँ इसलिये वे पुनर्जन्म को नहीँ मानते। उनके लिये ‘जातक कथाएँ’ भी क्षेपक हैँ। किन्तु जब वह मूल पालि या संस्कृत या हिन्दी मेँ त्रिपिटक पढ़ेँगे तो समझ सकेँगे कि विशिष्टाद्वैतवादी जिसे जीव कहते हैँ (आत्मा के ऊपर आणवमल की तरह महत, बुद्धि और अहंकार से बना सूक्ष्म शरीर), करीब-करीब वैसी ही अवधारणा बुद्ध के द्वारा प्रयुक्त पद ‘सत्त्व’ मेँ हैँ। बुद्ध पुनर्भव का प्रयोग करते हैँ और प्रतीत्यसमुत्पाद से द्वादश-निदान की बात करते हैँ जिससे जन्म-मरण का चक्र टूटे। उनके लिये यही निर्वाण है। बुद्ध ने कूटस्थ ‘आत्मा’ का तथा आत्मा और ब्रह्म के समीकरण का दार्शनिक निषेध किया , पुनर्भव का नहीँ। भगवान् बुद्ध ने ब्रह्म पर मौन रखा है, लेकिन कर्मफल को स्वीकारा है। बौद्धोँ और जैनोँ ने कोई इतर धर्मशास्त्र या समाजशास्त्र या अर्थशास्त्र व्यवस्था न देकर वेदसम्मत धर्मसूत्रोँ, धर्मशास्त्रोँ और अर्थशास्त्रोँ को ही माना है।
मैँ समझता हूँ इन पुस्तकोँ का उद्देश्य पाठकोँ की सङ्ख्या मेँ वृद्धि करना न होकर, भारतीयोँ मेँ आत्मबोध लाना है। हमारे समय मेँ जब एलएलएम के प्रयोग से नियमोँ की उपयोगिता सन्दिग्ध समझी जानी लगी है, हमेँ यह सचेत होना चाहिए कि कृत्रिम बुद्धिमता भले ही हमसे बुद्धि मेँ बढ़-चढ़ कर हो, किन्तु ज्ञान चेतना मेँ विश्रान्त होता है। इस समय की चुनौतियाँ बहुविध हो चुकी हैँ और इसके लिये हमेँ कहीँ अधिक सङ्घर्ष करना पड़ेगा। मुझे आशा है ये दो पुस्तकेँ इस उपक्रम मेँ सहायक होँगी।
(श्रावण कृष्ण दशमी, विक्रम संवत् २०८३)

