कहानी सुनने सुनाने की चीज है पढऩे और पढ़ाने की नही

कल काशीनाथ सिंहको ‘रेहन पर रग्घू’ उपन्यास पर साहित्य अकादेमीपुरस्कार दिए जाने की घोषणा हुई. उनको जानकी पुल की ओर से बहुत बधाई. इस मौके पर पेश है उनसे एक बातचीत. हम युवा आलोचक पल्लव के आभारी हैं कि उन्होंने तत्परता से यह बातचीत हमें उपलब्ध करवाई.
रामकली सर्राफ : आपकी कहानियों में तो है ही लेकिन आप जो कथा रिपोर्ताज लिख रहे हैं संतो घर में झगरा भारी, पांड़े कौन कुमति तोहे लागी… आदि में भी गँवईमन झाँक रहा है, उस पर आप क्या कहना चाहेंगे?
काशीनाथ सिंह : बुनियादी निर्माण तो हमारे गँवई मन का ही है, इसलिए वह भाषा वो मुहावरे, वो लोकोक्तियाँ,  वो मन, वो संस्कार कहीं-न-कहीं हमारी रचनाओं पर आज भी प्रभाव जमाए हुए हैं।

रामकली सर्राफ : आपकी पहचान आज के कथा साहित्य में एक खास किस्म की बन चुकी है। कथा भाषा को लेकर तथा कथा स्थल को लेकर (अस्सी, लंका के संदर्भ में) एक बात बताना चाहेंगे कि क्या ये स्थल एक ऐसे रूपक के समान तो नहीं हैं जहाँ से हम पूरे वैश्विक परिस्थिति और परिवेश को देख सकते हैं?(संदर्भ- संतो घर में झगरा भारी, पांड़े कौन कुमति तोहे लागी, कौन ठगवा लूटल नगरिया हो)
काशीनाथ सिंह : ये अच्छी बात की है आपने। दरअसल मैं कहानी से संस्मरण की तरफ आया और संस्मरण से कथा रिपोर्ताज की ओर। इसमें एक संगत रही है। मेरे दिमाग में था कि जब व्यक्ति पर संस्मरण हो सकता है तो स्थल पर क्यों नहीं?व्यक्ति पर जिस तरह लिखा जा सकता है उस तरह से उस स्थल पर भी लिखा जा सकता है। जहाँ मैं रहा था। 20-25 वर्षों तक उस स्थल को देखा। एक तरह से देखा जाय तो जैसे मेरा सम्पर्क बना था विश्वविद्यालय से पहले वैसे ही अस्सी से सम्पर्क बना रहा। रोज-ब-रोज आना-जाना रहता था। अस्सी को बदलते हुए देख रहा था, लोग बदल रहे थे। 90 के बाद मैंने कथा रिपोर्ताज लिखने की शुरुआत की। पहला रिपोर्ताज सन् १९९१ में देख तमाशा लकड़ी का (हंस में) अस्सी पर था। अस्सी बदल रहा था, कारण चाहे भूमंडलीकरण रहा हो या और…। विदेशी आ रहे थे घाट के किनारे के मकान लॉज बनने शुरू हो रहे थे, वे हमारे बीच रह रहे थे, हमारे जीवन को प्रभावित कर रहे थे, इनमें महिलाएँ भी थी और पुरुष भी थे। देखिए, कहने को तो यह मोहल्ला है लेकिन रिफ्लेक्ट कर रहा है पूरे देश को। विदेशियों में आस्ट्रेलिया, नाइजेरिया, हंगरी से थे जो अपनी संस्कृति के साथ हमारे बीच में थे। इस वजह से हम सांस्कृतिक धरातल पर एक दूसरे से मिल रहे थे। मुझे लग रहा था कि वस्तुत: यह है एक मोहल्ला, लेकिन है नहीं मोहल्ला, यह है पूरा देश। अमेरिका पर टिप्पणियाँ हैं।
कैथरीन महिला जो बनारस पर शोध कर रही है,  बनारस के प्रति क्या धारणा है?  यह व्यक्त करती है। उसकी प्रतिक्रिया होती है लोगों में। भूमंडलीकरण के दौरान अस्सी सूचक है देशी-विदेशी परिप्रेक्ष्य में। बड़ा फलक है। अस्सी को एक मोहल्ला मानकर न देखा जाए।
बनारस को मिनी भारत कहा जाता है। तमिल, कन्नड़, बंगाली, असमिया, सिंधी, इसाई सभी रहते हैं। यह मिनी भारत है। इस कारण यह संभव हो सकता है कि विदेशियों और भारत के सांस्कृतिक टकराव के लिए चुना और देखा…

रामकली सर्राफ : डॉ. साहब! आपके रचना स्थल और पात्र बिल्कुल निश्चित हैं तथा जीवित हैं, क्या आपको उनकी आलोचना का शिकार नहीं होना पड़ता है? क्या रचनाकार के लिए यह कम चुनौतीपूर्ण कार्य है कि हम उसी समय की कहानी उसी समाज के लोगों के बीच रहकर उन्हे खड़ा करके कहते हैं? यों कहें कि आप हिन्दी कथा साहित्य में कबीरा खड़ा बाजार में लिए लुकाठी हाथ, जो घर जारे आपणाँ चले हमारे साथ की चुनौती को स्वीकार कर रहे हैं और दे भी रहे हैं। इसमें आपको कैसा अनुभव होता है? क्योंकि दौर तो घर बनाने का है और बचाने का है और इसमें आपकी कहानियाँ घर जलाकर साथ आने की बात करती है?
काशीनाथ सिंह : जी, साहस किया था उसे लेकर…। प्रेमचंद ने अपने कहानी में (मोटेराम शास्त्री) एक ब्राह्मण को खड़ा किया था नाम बदलकर। उन पर मुकदमा भी हुआ। तो ऐसे में जीवित पात्रों को लेकर रचनाओं में सीधे-सीधे इस्तेमाल… (विस्मय) मेरी जानकारी में हिन्दी के किसी लेखक ने मेरे पहले ऐसा नही किया है सीधे-सीधे जीवित पात्रों को लेकर। हाँ… डर तो था ही, गालियाँ मिली, धमकियाँ मिली, मारने तक की बात आयी। ऐसा मेरे किसी खास रचना के साथ नहीं हुआ बल्कि चाहे संतों, असंतों, घोंघा बसंतों हो, देख तमाशा लकड़ी का हो, संतों घर में झगरा भारी हो… सभी के साथ हुआ। मुश्किल तो बहुत था। जिस रिपोर्ताज में पप्पू का जिक्र है उस पप्पू पर संस्कृत पढऩे वाले बच्चों ने पत्थर मारा था।
कर्फ्यू लगा हुआ था, कारण दूसरा था लेकिन… धीरे-धीरे फिर पात्रों को ऐसा लगा, अहसास हुआ कि वे इतने महत्त्वपूर्ण है कि लोग देखने आ रहे हैं तो महत्व के कारण सम्मान दे रहे हैं। कौन है गया सिंह,  दीनबंधु तिवारी कौन है? तो कौन है पप्पू चाय दुकानवाला? तो जैसे उन्हें महत्त्व का ज्ञान हुआ अब गाली के बदले सम्मान मिलने लगा।

रामकली सर्राफ : कथा भाषा को लेकर सवाल खड़े किए गए, श्लीलता-अश्लीलता का आरोप लगा, आपको विरोध झेलना पड़ा?
काशीनाथ सिंह : कथा भाषा को लेकर उन पात्रों की तरफ से कोई विरोध नहीं था, क्योंकि मैंने उन्हीं शब्दों को उन्हीं बातों में रखा था जिसे उन्होंने कहा था। बातों में सच्चाई थी इसलिए उन्हें इनका विरोध नहीं था। विरोध तो साहित्यिक रुचि के पाठकों को लगा, विरोध लेखकों का था उन पाठकों का था जो यह मानते हैं कि साहित्य बहुत अभिजात्य था। विरोध उनका था जो साहित्य को शराफत भरा मानते थे।

रामकली सर्राफ : हाँ… मैं पाठकीय प्रतिक्रियाओं के संदर्भ में पूछ रही थी।
काशीनाथ सिंह : सडक़ के पाठकों के साथ ऐसा नहीं था उन्हें तो लग रहा था कि इसमें उनकी जिन्दगी बोल रही है।

रामकली सर्राफ : इधर बीच आपकी कहानियों में एक चीज देखने को मिल रही है लगभग कहानियों के शीर्षक कबीर के पदों की पंक्तियाँ हैं- इसके पीछे आपकी क्या चिन्तन पद्धति है? मुझे लगता है कि आपकी रचनाओं में पैठी साहसिकता है, जो बार-बार आपको उधर ले जाती है?
काशीनाथ सिंह : ये मेरी चिन्तन पद्धति नहीं है बनारस की एक परम्परा रही है जो बड़ी शालीन है। यह लोक परम्परा है जबकि दूसरी ओर तुलसी ब्राह्मणवादी परम्परा के प्रतिनिधि कवि है और कबीर उनके ठीक उलटे छोटी जातियों के कवि हैं। सम्प्रदाय विरोधी और साहस का काम करने वाले कवि हैं। शीर्षक चुनने के लिए कबीर से बल मिलता रहा है, इसलिए मैं कबीर की ओर लौटता हूँ। आँखिन देखी बात कबीर कहते हैं और मैं भी आँखिन देखी ही कहता था।

रामकली सर्राफ : ऐसा लगता है कि प्रेमचंद से आप ज्यादा प्रभावित नहीं हो पाए। ऐसा क्यों?
काशीनाथ सिंह : नयी कहानी प्रेमचंद की खिलाफत का आन्दोलन था। नये कहानीकार प्रेमचंद की कहानियों को पुरानी कहानी कहने लगे। कफन, पूस की रात, सवा सेर गेहूँ में आधुनिक  तत्त्व की तलाश की जाने लगी। नयी कहानी के तत्त्व भी तलाशे जाने लगे। विरोध के नाम पर प्रेमचंद की प्रासंगिकता शुरू हो गयी थी।
अपने समय में अपने समकालीनों के बीच मैंने ही सबसे ज्यादा प्रेमचंद की चर्चा की। प्रेमचंद ने शक्ति दी, प्रेमचंद ने बड़ा साहस प्रदान किया। वो कौन-सी चीज है जिसने प्रेमचंद को प्रेमचंद बनाया? देखिए, कहानी सुनने सुनाने की चीज है पढऩे और पढ़ाने की नही। श्रवणीयता बुनियादी चीज है। इसको मैंने समझा और ये हमारे लेखन में भी है। मेरे सभी कथा रिपोर्ताज में मिलेगी। हमारे यहाँ भी श्रवणीयता बुनियादी चीज है।

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कहानी सुनने सुनाने की चीज है पढऩे और पढ़ाने की नही

9 thoughts on “कहानी सुनने सुनाने की चीज है पढऩे और पढ़ाने की नही”

  1. यह सच है कि काशीनात सिंह जी को काशी का अस्सी पर ही साहित्य अकादमी मिल जाना चाहिए था, लेकिन ऐसा हो न सका। लेकिन अंततः उन्हें यह पुरस्कार मिला। हलांकि यह पुरस्कार न भी मिलता तब भी वे अपने पाठकों के बीच उतने ही लोकप्रिय होते। हां यह जरूर है कि पुरस्कार मिलने पर उनके पाठकों में खुशी की एक लहर है। यह लेखक सचमुच डिजर्व करता है। काशी जी को बधाई के साथ ही प्रभात भाई का आभार….

  2. आप को बधाई /आप को याद नहीं होगा आप बिलासपुर आये थे एक शोध की मौखिकी के लिये

  3. Pingback: 티비위키

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कहानी सुनने सुनाने की चीज है पढऩे और पढ़ाने की नही

कल काशीनाथ सिंहको ‘रेहन पर रग्घू’ उपन्यास पर साहित्य अकादेमीपुरस्कार दिए जाने की घोषणा हुई. उनको जानकी पुल की ओर से बहुत बधाई. इस मौके पर पेश है उनसे एक बातचीत. हम युवा आलोचक पल्लव के आभारी हैं कि उन्होंने तत्परता से यह बातचीत हमें उपलब्ध करवाई.
रामकली सर्राफ : आपकी कहानियों में तो है ही लेकिन आप जो कथा रिपोर्ताज लिख रहे हैं संतो घर में झगरा भारी, पांड़े कौन कुमति तोहे लागी… आदि में भी गँवईमन झाँक रहा है, उस पर आप क्या कहना चाहेंगे?
काशीनाथ सिंह : बुनियादी निर्माण तो हमारे गँवई मन का ही है, इसलिए वह भाषा वो मुहावरे, वो लोकोक्तियाँ,  वो मन, वो संस्कार कहीं-न-कहीं हमारी रचनाओं पर आज भी प्रभाव जमाए हुए हैं।

रामकली सर्राफ : आपकी पहचान आज के कथा साहित्य में एक खास किस्म की बन चुकी है। कथा भाषा को लेकर तथा कथा स्थल को लेकर (अस्सी, लंका के संदर्भ में) एक बात बताना चाहेंगे कि क्या ये स्थल एक ऐसे रूपक के समान तो नहीं हैं जहाँ से हम पूरे वैश्विक परिस्थिति और परिवेश को देख सकते हैं?(संदर्भ- संतो घर में झगरा भारी, पांड़े कौन कुमति तोहे लागी, कौन ठगवा लूटल नगरिया हो)
काशीनाथ सिंह : ये अच्छी बात की है आपने। दरअसल मैं कहानी से संस्मरण की तरफ आया और संस्मरण से कथा रिपोर्ताज की ओर। इसमें एक संगत रही है। मेरे दिमाग में था कि जब व्यक्ति पर संस्मरण हो सकता है तो स्थल पर क्यों नहीं?व्यक्ति पर जिस तरह लिखा जा सकता है उस तरह से उस स्थल पर भी लिखा जा सकता है। जहाँ मैं रहा था। 20-25 वर्षों तक उस स्थल को देखा। एक तरह से देखा जाय तो जैसे मेरा सम्पर्क बना था विश्वविद्यालय से पहले वैसे ही अस्सी से सम्पर्क बना रहा। रोज-ब-रोज आना-जाना रहता था। अस्सी को बदलते हुए देख रहा था, लोग बदल रहे थे। 90 के बाद मैंने कथा रिपोर्ताज लिखने की शुरुआत की। पहला रिपोर्ताज सन् १९९१ में देख तमाशा लकड़ी का (हंस में) अस्सी पर था। अस्सी बदल रहा था, कारण चाहे भूमंडलीकरण रहा हो या और…। विदेशी आ रहे थे घाट के किनारे के मकान लॉज बनने शुरू हो रहे थे, वे हमारे बीच रह रहे थे, हमारे जीवन को प्रभावित कर रहे थे, इनमें महिलाएँ भी थी और पुरुष भी थे। देखिए, कहने को तो यह मोहल्ला है लेकिन रिफ्लेक्ट कर रहा है पूरे देश को। विदेशियों में आस्ट्रेलिया, नाइजेरिया, हंगरी से थे जो अपनी संस्कृति के साथ हमारे बीच में थे। इस वजह से हम सांस्कृतिक धरातल पर एक दूसरे से मिल रहे थे। मुझे लग रहा था कि वस्तुत: यह है एक मोहल्ला, लेकिन है नहीं मोहल्ला, यह है पूरा देश। अमेरिका पर टिप्पणियाँ हैं।
कैथरीन महिला जो बनारस पर शोध कर रही है,  बनारस के प्रति क्या धारणा है?  यह व्यक्त करती है। उसकी प्रतिक्रिया होती है लोगों में। भूमंडलीकरण के दौरान अस्सी सूचक है देशी-विदेशी परिप्रेक्ष्य में। बड़ा फलक है। अस्सी को एक मोहल्ला मानकर न देखा जाए।
बनारस को मिनी भारत कहा जाता है। तमिल, कन्नड़, बंगाली, असमिया, सिंधी, इसाई सभी रहते हैं। यह मिनी भारत है। इस कारण यह संभव हो सकता है कि विदेशियों और भारत के सांस्कृतिक टकराव के लिए चुना और देखा…

रामकली सर्राफ : डॉ. साहब! आपके रचना स्थल और पात्र बिल्कुल निश्चित हैं तथा जीवित हैं, क्या आपको उनकी आलोचना का शिकार नहीं होना पड़ता है? क्या रचनाकार के लिए यह कम चुनौतीपूर्ण कार्य है कि हम उसी समय की कहानी उसी समाज के लोगों के बीच रहकर उन्हे खड़ा करके कहते हैं? यों कहें कि आप हिन्दी कथा साहित्य में कबीरा खड़ा बाजार में लिए लुकाठी हाथ, जो घर जारे आपणाँ चले हमारे साथ की चुनौती को स्वीकार कर रहे हैं और दे भी रहे हैं। इसमें आपको कैसा अनुभव होता है? क्योंकि दौर तो घर बनाने का है और बचाने का है और इसमें आपकी कहानियाँ घर जलाकर साथ आने की बात करती है?
काशीनाथ सिंह : जी, साहस किया था उसे लेकर…। प्रेमचंद ने अपने कहानी में (मोटेराम शास्त्री) एक ब्राह्मण को खड़ा किया था नाम बदलकर। उन पर मुकदमा भी हुआ। तो ऐसे में जीवित पात्रों को लेकर रचनाओं में सीधे-सीधे इस्तेमाल… (विस्मय) मेरी जानकारी में हिन्दी के किसी लेखक ने मेरे पहले ऐसा नही किया है सीधे-सीधे जीवित पात्रों को लेकर। हाँ… डर तो था ही, गालियाँ मिली, धमकियाँ मिली, मारने तक की बात आयी। ऐसा मेरे किसी खास रचना के साथ नहीं हुआ बल्कि चाहे संतों, असंतों, घोंघा बसंतों हो, देख तमाशा लकड़ी का हो, संतों घर में झगरा भारी हो… सभी के साथ हुआ। मुश्किल तो बहुत था। जिस रिपोर्ताज में पप्पू का जिक्र है उस पप्पू पर संस्कृत पढऩे वाले बच्चों ने पत्थर मारा था।
कर्फ्यू लगा हुआ था, कारण दूसरा था लेकिन… धीरे-धीरे फिर पात्रों को ऐसा लगा, अहसास हुआ कि वे इतने महत्त्वपूर्ण है कि लोग देखने आ रहे हैं तो महत्व के कारण सम्मान दे रहे हैं। कौन है गया सिंह,  दीनबंधु तिवारी कौन है? तो कौन है पप्पू चाय दुकानवाला? तो जैसे उन्हें महत्त्व का ज्ञान हुआ अब गाली के बदले सम्मान मिलने लगा।

रामकली सर्राफ : कथा भाषा को लेकर सवाल खड़े किए गए, श्लीलता-अश्लीलता का आरोप लगा, आपको विरोध झेलना पड़ा?
काशीनाथ सिंह : कथा भाषा को लेकर उन पात्रों की तरफ से कोई विरोध नहीं था, क्योंकि मैंने उन्हीं शब्दों को उन्हीं बातों में रखा था जिसे उन्होंने कहा था। बातों में सच्चाई थी इसलिए उन्हें इनका विरोध नहीं था। विरोध तो साहित्यिक रुचि के पाठकों को लगा, विरोध लेखकों का था उन पाठकों का था जो यह मानते हैं कि साहित्य बहुत अभिजात्य था। विरोध उनका था जो साहित्य को शराफत भरा मानते थे।

रामकली सर्राफ : हाँ… मैं पाठकीय प्रतिक्रियाओं के संदर्भ में पूछ रही थी।
काशीनाथ सिंह : सडक़ के पाठकों के साथ ऐसा नहीं था उन्हें तो लग रहा था कि इसमें उनकी जिन्दगी बोल रही है।

रामकली सर्राफ : इधर बीच आपकी कहानियों में एक चीज देखने को मिल रही है लगभग कहानियों के शीर्षक कबीर के पदों की पंक्तियाँ हैं- इसके पीछे आपकी क्या चिन्तन पद्धति है? मुझे लगता है कि आपकी रचनाओं में पैठी साहसिकता है, जो बार-बार आपको उधर ले जाती है?
काशीनाथ सिंह : ये मेरी चिन्तन पद्धति नहीं है बनारस की एक परम्परा रही है जो बड़ी शालीन है। यह लोक परम्परा है जबकि दूसरी ओर तुलसी ब्राह्मणवादी परम्परा के प्रतिनिधि कवि है और कबीर उनके ठीक उलटे छोटी जातियों के कवि हैं। सम्प्रदाय विरोधी और साहस का काम करने वाले कवि हैं। शीर्षक चुनने के लिए कबीर से बल मिलता रहा है, इसलिए मैं कबीर की ओर लौटता हूँ। आँखिन देखी बात कबीर कहते हैं और मैं भी आँखिन देखी ही कहता था।

रामकली सर्राफ : ऐसा लगता है कि प्रेमचंद से आप ज्यादा प्रभावित नहीं हो पाए। ऐसा क्यों?
काशीनाथ सिंह : नयी कहानी प्रेमचंद की खिलाफत का आन्दोलन था। नये कहानीकार प्रेमचंद की कहानियों को पुरानी कहानी कहने लगे। कफन, पूस की रात, सवा सेर गेहूँ में आधुनिक  तत्त्व की तलाश की जाने लगी। नयी कहानी के तत्त्व भी तलाशे जाने लगे। विरोध के नाम पर प्रेमचंद की प्रासंगिकता शुरू हो गयी थी।
अपने समय में अपने समकालीनों के बीच मैंने ही सबसे ज्यादा प्रेमचंद की चर्चा की। प्रेमचंद ने शक्ति दी, प्रेमचंद ने बड़ा साहस प्रदान किया। वो कौन-सी चीज है जिसने प्रेमचंद को प्रेमचंद बनाया? देखिए, कहानी सुनने सुनाने की चीज है पढऩे और पढ़ाने की नही। श्रवणीयता बुनियादी चीज है। इसको मैंने समझा और ये हमारे लेखन में भी है। मेरे सभी कथा रिपोर्ताज में मिलेगी। हमारे यहाँ भी श्रवणीयता बुनियादी चीज है।

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अमावस्या से पूर्णमासी तक

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