शर्मिला बोहरा जालान की कहानी ‘सिर्फ कॉफी’

शर्मिला बोहरा जालान समकालीन हिंदी कहानी में अपने अंडरटोन के साथ मौजूद हैं. कोलकाता में अलका सरावगी के बाद जो कथा पीढ़ी विकसित हुई उसमें वह सबसे सशक्त लेखिका हैं. भाषा, कहाँ सब में. फिलहाल उनकी एक छोटी सी कहानी- मॉडरेटर

===============

मंजरी को कहीं भी जाना होता सबसे पहले उनकी दुकान को पार करना पड़ता। वह पूरे दिन में कई-कई बार वहाँ से गुजरती। कभी दोनों बच्चों को स्कूल बस तक छोड़ने, लाने, कभी साग-सब्जी खरीदने,कभी रसोई गैस की खोज-खबर लेने। घरेलू जीवन के हज़ार काम लगे रहते।

उनकी दुकान छोटी ही तो थी पर ऐसी जिसमें हर घरेलू चीजें मिल जातीं । राशन, कुछ दवाएँ, साथ ही पाउडर, क्रीम, शैम्पू वगैरह । वह राहगीर की तरह जो सड़क पर चलते हुए आसपास के माहौल पर नज़र डाल लेता है, उनकी दुकान को देख लेती और आगे बढ़ जाती । उसने कभी भी वहाँ से कुछ नहीं ख़रीदा । जरूरत नहीं पड़ी । राशन की उसकी एक दुकान सब्जी-मंडी में ही तय हो गयी थी जिससे हर महीने फोन पर सामान लिखवा देने से सौदा घर आ जाता था । दवा उसके पति अपने दफ्तर के बगल की उस दुकान से ले आते जहाँ उन्हें छूट मिल जाती थी । रही बात कॉस्मैटिक की तो वह ज्यादा कुछ इस्तेमाल नहीं करती । बच्चों के लिए व स्वयं के लिए जो क्रीम-पाउडर आवश्यक होता, वह सब एक बार ही उसके पति किसी बड़ी दुकान से उठा लाते ।

उस दिन सुबह से ही मूसलाधार बारिश हो रही थी । मंजरी ने देखा कि घर में चीनी नहीं थी । न जाने ऐसा कैसे हुआ ? महीना अभी ख़त्म भी नहीं हुआ । पर चीनी तो लानी ही पड़ेगी, बच्चों ने खीर की फरमाइश की है । फिर मंजरी का चाय के बिना नहीं चलता । फीकी चाय कभी नहीं पी सकती वह हाथ में फूल पत्ती की डिजाइन व रंग का छाता लिए सड़क पर आ गयी । छाता खोला तो लगा सिर के ऊपर गहरे हरे रंग के बड़े-बड़े पत्तों के गुच्छे छा गए हों । वह मजबूती से छाता पकड़े सड़क पर जमे पानी से स्वयं को बचाती संभलती उनकी दुकान के सामने आ खड़ी हो गयी । बोली, चीनी, दो किलो । जरा जल्दी । कुछ क्षण बाद अंदर से आवाज आई,अंदर आ जाइए । पानी जोर से गिर रहा है । वह सरक कर अंदर आ गयी । दुकान खाली पड़ी थी । सिर्फ दो स्टाफ थे जो सामान उठाने-रखने में व्यस्त थे । अंदर से दुकान नई-नई लग रही थी । लगा दुकान का मालिक सफाई पसंद है और व्यवस्थित भी ।

फिर वही आवाज – राजेश बाबू कब आएँगे ? मंजरी चौंकी । दुकान के मध्य एक सज्जन बैठे थे – गौर वर्ण, बड़ी-बड़ी आँखे । आकर्षक, पर गंभीर । उन्होंने ही सवाल किया था । हो न हो वही दुकान के मालिक थे । उन्हें कैसे पता मैं राजेश को पत्नी हूँ, व राजेश यहाँ नहीं हैं । मंजरी के मन में कई और सवाल उठ रहे थे, तभी वह बोल पड़े, “राजेश बाबू हमारी दुकान से कभी-कभी सिगरेट लेते थे ।”

“क्या ?” मंजरी चौंकी, “पर वह तो पीते नहीं ।”

“हाँ खुद के लिए नहीं दफ्तर के अपने साथी बासु के लिए ।” मंजरी को बात समझ में नहीं आई, “किस बासु के लिए, मुझे तो कभी नहीं बताया !” उसके पास उस समय वहां ठहरने का वक्त नहीं था । पानी तो पड़ ही रहा था पर अँधेरा भी हो गया था । पींकू और सोनाली घर पर अकेले थे । उसने हड़बड़ा कर कहा, “अच्छा सामान दे दीजिए, मुझे ज़रा जल्दी है ।” जाते-जाते मंजरी बोल गयी, “हाँ उनका कलकत्ता रहना तय हो गया है ।”

विश्व मंदी के कारण प्राइवेट कम्पनी में काम करने वाले राजेश बाबू का तबादला आनन-फानन में कलकत्ता हो गया । दफ्तर में काम करने वाले लोगों में से कई की तो छंटनी हो गयी और कइयों को दूसरे शहर भेज दिया गया । वैसे इस शहर में आए हुए भी अभी एक डेढ़ वर्ष ही तो हुए थे । पर करें भी क्या ? आय भी तो आधी कर दी गयी । मंजरी के पति राजेश बाबू  स्वयं कलकत्ता तुरन्त चले गए और योजना यह बनायी कि वहाँ रहने की व्यवस्था तथा स्कूलों की खोजबीन कर बच्चों और पत्नी को बुला लेंगे ।

मंजरी घर आ गयी । उसने अपने कपड़ों पर नज़र दौड़ायी । फ़िरोजी रंग की सलवार कमीज़ उसने पहन रखी थी और यह रंग उस पर खूब फबता था । उसे यह सोचकर अच्छा लगा कि वह जब दुकान में खड़ी थी अच्छी ही लग रही थी ।

दूसरे दिन उसे लगा, आज की सुबह अन्य दिनों की सुबह से एकदम भिन्न व निराली सुबह है । चमकीली सुबह । उसे राजेश की याद आई । राजेश के जा के बाद वह थोड़ी चुप और गुमसुम-सी हो गयी थी । वैसे वह जिस कॉलोनी में थी, कई परिवारों से उसकी पहचान हो गयी थी । बगल के फ़्लैट में रहने वाली रीता आंटी और उनकी बहू से उसे थोड़ा सहारा भी था पर वह अपने में रहने वाली लड़की थी और इन दिनों थोड़ी अनमनी सी । दस-ग्यारह वर्षों के शादीशुदा जीवन में पहली बार राजेश के बिना अकेली रह रही थी । घर गृहस्थी संभालना उसके बूते की बात थी । वह पढ़ी-लिखी थी, कुछ महीने शिक्षिका भी रह चुकी थी, सो घरेलू जीवन जीते हुए भी वह उन स्त्रियों की तरह घरेलू नहीं थी जो रसोई तथा घर की साज सज्जा, सफाई तक ही सीमित होती हैं ।

वह बैंक से पैसे निकाल सकती थी । रेलवे व हवाई जहाज की टिकट बनवा सकती   थी । कम्प्यूटर चलाना जानती थी । साथ ही शेयर का काम भी समझती थी । कई तरह की भागदौड़ कर सकती थी । कुछ महीनों से कर भी रही थी पर उसे हर समय कुछ पूछने कुछ समझने की जरूरत महसूस होती । वह तुरन्त राजेश को फोन मिलाती और राजेश तुरंत डांट  देता । कहता, “क्या छोटी-छोटी बातों के लिए फोन करती हो ।” मंजरी जानती थी राजेश की मानसिक स्थिति ठीक नहीं है । वह अपने दफ्तर से काफी दूर एक पी.जी. में रुका हुआ था । उसे ढंग का खाना नसीब नहीं हो रहा था, साथ ही जिस इलाके में पी.जी. था वहाँ ढेरों पेड़ होने के कारण रात में मच्छरों का हमला होता और नींद भी पूरी नहीं हो पाती, सो राजेश का चिड़चिड़ापन बना ही रहता । वह घर ढूंढने में लगा था, किराए के फ़्लैट के दाम कुछ कम न थे । मंजरी का फोन आते ही उस पर बरसने लगता । मंजरी को कल की बारिश के बाद आज का दिन सुहाना लगा क्यों ?

वह पींकू को छोड़ने स्कूल बस स्टॉप पर गयी । लौटते वक्त उसकी आँखे उस दुकान की तरफ चली गयी । कल जिस व्यक्ति से बात हुई थी आज भी वह वहीं बैठे थे । एकदम तरोताजा लग रहे थे । मंजरी की आँखे उनसे टकरा गई । उसने झट से आँखे चुरा ली और जल्दी-जल्दी घर आ गई । वह हाँफ रही थी । उसने स्वंय को दर्पण में देखा । दो बच्चों के होने के बाद भी वह आकर्षक तो थी पर इतनी घरेलू लग रही थी कि उसे स्वयं पर गुस्सा आ गया । उसे घरेलूपन से बेहद चिढ़ थी । बचपन से ही वह कुछ बनने-करने का सपना देखती आयी थी । पर विवाह जल्दी हो गया । राजेश ने उसे आगे बढ़ने तो दिया पर घर सम्भालते हुए बस बी.एड. ही कर पायी और कुछ महीने शिक्षिका का काम किया । बच्चे हो गए तो सब छूट गया । जैसे भी हो उसका मन आम घर सँभालने वाली औरतों की तरह नहीं था ।

उसके जीवन में कुछ अलग घटे इसका सपना वह देखती थी । उसे अपना चेहरा देख अपने रूप-रंग की फ़िक्र हुई । तभी उसके मन में  आया, राजेश वहाँ कलकते में अकेला है और उसे यहाँ अपने श्रृंगार की पड़ी है । वह दर्पण के सामने से हट गई । उसे राजेश की याद सताने लगी । न जाने उसे कैसा खाना मिलता होगा । कुछ बोलता बताता भी नहीं कि दफ्तर में मन लग भी रहा है या नहीं ! उसने तुरन्त उसे फ़ोन लगाया ।

“हैलो कौन ?”

“मैं मंजरी ।”

“बोलो ।”

“कैसे हो?”

“ठीक चल रहा है।”

“खाना ठीक से खाते हो ?”

“यही पूछने के लिए फ़ोन किया था  ।”

“मन हुआ बात करने का ।”

“काम हो तो फ़ोन किया करो । दफ्तर मैं हूँ, रखता हूँ ।”

राजेश ने लाइन काट दी । उसकी रुखाई देख मंजरी रोने-रोने को हो गयी । बहुत उदास । राजेश को क्या हो गया ? वह ठीक से बात भी नहीं करता । बैंक से पैसे निकालने हैं, उसे बताना था पूछना था । एक बार और कर के देखूँ ? नहीं । एकदम बिफर पड़ेगा ।

मंजीर पहली बार राजेश से बिना बताए बैंक से पैसे निकालने गयी । घर लौटते समय उनकी दुकान की तरफ़ नज़रे चली गयीं । वे बाहर ही खड़े थे । उसे देखते ही दूर से नमस्कार किया । पास आने पर बोले,  “परेशान हैं ?”

“हाँ, नहीं तो ।” हड़बड़ा कर मंजरी ने कहा और जल्दी-जल्दी घर आ गयी । घर आते ही फ़ोन की घंटी बजी । राजेश का फ़ोन था । मंजरी ने कहा, “बैंक गयी थी, रूपए निकालने ।” राजेश जोर से बोला, “ कुछ दिन पहले ही तो निकाले थे । ख़त्म हो गए ? इतनी जल्दी ? यह तुम क्या कर रही हो ?

मंजरी को गुस्सा आ गया, “क्या कर रही हूँ ? तुम्हारे सामने भी तो लग रहे थे । सोनाली के स्कूल में फंक्शन है – फिर तुम्हें पता है, पिछले साल पींकू के पैर में चोट लग गयी थी । दो-तीन डॉक्टर के पास जाना पड़ा ।”

वह बोला, “हिसाब तो नहीं माँग रहा । पर इस बार पैसे टिकाना ।” ऐसा कह फ़ोन रख दिया । मंजरी तनाव में थी । न जाने राजेश को क्या हो गया, वह कुछ समझना-सुनना नहीं  चाहता । मंजरी का मन कर रहा था कि वह किसी से बात करे । किससे ? औरतों से बात कर के कोई फायदा नहीं, वे उलटी-सीधी बातें कर परेशानी बढ़ा देंगी । ओह । इन बातों के बीच यह भूल गयी कि आज पींकू को लाने खुद जाना पड़ेगा । उसकी छुट्टी जल्दी होगी और बस वाले ने कहा हम नहीं ला पाएंगे ।

मंजरी घर से निकल पड़ी । स्कूल पहुंची पींकू को लिया । वहाँ उसने किसी से भी कोई बात नहीं की । घर आयी । पींकू रास्ते भर स्कूल की बात बताता रहा, “आज फिर नकुल ने मुझे धक्का दिया । मैंने भी उसकी किताब फाड़ डाली ।”

मंजरी हाँ-हूँ करती पींकू का बस्ता पकड़े उनकी दुकान के सामने से गुजरी कि आवाज आई, “पींकू पाँव कैसा है तुम्हारा ? एकदम ठीक हो गए हो लगता है । चाल तो तुम्हारी पहले जैसी हो गयी है ।”

मंजरी ने चेहरा ऊपर किया, “बोली हाँ अब बिल्कुल ठीक है । पहले की तरह चलने लगा है ।”

मंजरी ने ध्यान दिया वह उसे देख मुस्कराए थे और उसे उस क्षण उनका मुस्कराना अजीब-सा सुकून दे गया । वह हल्की हो गयी । तनावभरा चेहरा ढीला पड़ गया । वह वहाँ खड़ी हो उनसे बात करने लगी । नहीं-नहीं राजेश की बात करने का उसका बिल्कुल मन नहीं हुआ पर वे राजेश का हालचाल पूछने लगे थे सो उसने संक्षेप में कहा, “ठीक से बात कहाँ हो पाती है, पता नहीं खाना-पीना ठीक भी हो रहा है कि नहीं, हड़बड़ी में फोन रख देते हैं ।”

वे बोले, “चिन्ता मत कीजिए । थोड़े दिन में ठीक हो जाएगा ।”

“कैसे न करूँ चिन्ता ! वह मेरा हालचाल भी नहीं पूछते । मैं भी तो यहाँ परेशान हूँ । दो छोटे बच्चे हैं । रसोई गैस को लेकर भी परेशान हो रही हूँ । फिर सोनाली के लिए एक साइंस ग्रुप के टीचर को खोजना है… और भी कई तरह की बातें हैं ! कैसे क्या सँभालू ।”

वे बोले, “क्यों परेशान होती हैं, गैस और टीचर समझिए दोनों का बन्दोबस्त हो गया, मेरा नौकर गैस ला देगा और मेरी दुकान में एक अच्छे टीचर आते हैं, ग्राहक हैं भाई हमारे । और कोई छोटी-मोटी परेशानी  हो तो कहिए ।” मंजरी झेंप गयी । बोली, “नहीं मैं सँभाल लूँगी ।” वे ज़ोर देकर बोले, “मानता हूँ आप सँभाल लेंगी और आप ही तो सँभालती हैं । पढ़ी-लिखी हैं शिक्षिका हैं, पर अभी परेशान हैं । राजेश जी इस दुकान में आते थे । हमारा भी तो कुछ फ़र्ज़ बनता है !” वह कुछ भी बोल न पायी ।

कुछ दिन निकल गए । शायद कुछ महीने । मंजरी की राकेश से बात होती पर एकदम संक्षिप्त । वह रोज़ सोचती कि उसे ढेर सारी छोटी-छोटी बातें बताएगी । यह कहेगी कि उन्होंने रसोई-गैस का इन्तज़ाम कर दिया, सोनाली के लिए एक टीचर की खोज कर भेज चुके,  कई तरह के छोटे-मोटे काम पर उसकी मदद कर रहे हैं । पर फोन पर वह कुछ नहीं बोल पाती । एक तो राजेश के मूड का डर लगा रहता दूसरे यह संशय बना रहता कि कहीं राजेश यह न कहे कि सुधा आंटी से मदद न लेकर उनसे काम क्यों करवा रही हो । अब राजेश को इतनी दूर से यह कैसे फोन पर समझाया जाए कि सुधा आंटी अपने हज़ार झंझट पाले रहती हैं और उनके पास तो दुकान के स्टाफ़ हैं, जिनसे वे तुरन्त काम करवा लेते हैं । दिन भर में एक बार उनसे फोन पर बात हो जाती है । मंजरी राजेश को क्या कहेगी कि उनसे कब और कैसे फोन पर बात शुरू हुई । वह तो उनका नाम भी नहीं जानती । पूछा नहीं । बस ‘आप’ से काम चल जाता है । शुरू के कुछ दिन तो नमस्कार और आप कैसे हैं, कैसी हैं में निकल गए । कुछ दिनों बाद मंजरी आते-जाते उन्हें देखने लगी । एक दिन पाया उनका चेहरा तनाव में है । वह उसी समय वहाँ खड़ी हो उनका हालचाल पूछना चाह रही थी पर उसे वह उचित नहीं लगा । घर गयी और उनकी दुकान का बिल खोजने लगी । बिल मिला, साथ ही दुकान का फोन नम्बर भी । काँपते हाथ से फोन करे न करे द्वन्द से निकल फोन कर डाला । फोन उन्होंने ही उठाया था- “कौन ?”

“मैं मंजरी”

“हाँ । कहिए ।”

“कुछ परेशान हैं ?”

“कुछ नहीं, बस ऐसे ही ।”

“फिर भी…”

“घर में बड़ा हूँ न । दो छोटे भाई हैं । फिर उनकी पत्नियाँ । संयुक्त परिवार । झगड़ा हो जाता है । औरतें बहुत झगड़ा करती हैं । कुछ नहीं समझती । बोलिए क्या करूँ ?”

मंजरी बोली, “ठीक है रखती हूँ ।” मंजरी को उनसे बात कर अच्छा लगा । वे तुरन्त अपनी घरेलू बात कह बैठेंगे ऐसा उसने सोचा नहीं था । मंजरी को इसलिए अच्छा लगा कि उन्होंने अपने मन की उलझन उसके सामने रख डाली पर मंजरी को कहीं कुछ बुरा भी लग रहा था । उसे थोड़ा गुस्सा भी आया । किस बात पर, यह वह सोचने लगी । हाँ अन्त में उन्होंने जो कहा उस पर । वह जब बोले – ‘औरतें बहुत झगड़ती हैं’, उनकी आवाज़ बदल गयी थी । मंजरी को ऐसा भी लगा कि उस समय उनके सामने कोई औरत होती तो वे उस पर हाथ भी उठा सकते थे । उनके स्वर में करुणा व समझ नहीं, आग थी सो मंजरी ने तुरन्त कहा रखती हूँ ।

मंजरी उनसे बात करने लगी थी । इस एहसास के साथ कि राजेश को यह सबकुछ पता नहीं है । वह कभी उनसे उनका हालचाल पूछती, कभी अपना सुनाती, कभी सोनाली की चर्चा, कभी पींकू की । एक दिन उन्होंने मंजरी को अपना मोबाइल नम्बर दे डाला । फिर उसी पर बात होने लगी । इन दिनों मंजरी दोपहर में उनसे बात करती, रात को राजेश से । राजेश से एक दो पंक्ति में बात कर फोन रख देती ।

राजेश को उसमें कुछ बदलाव नज़र आया पर वह पूछ नहीं पाता । एक दिन मंजरी परेशान थी, राजेश ने उससे पूछ डाला, “क्या बात है आजकल तुम्हें मेरी चिंता नहीं होती ! न मेरी खाने-पीने की बात पूछती हो न कलकत्ता आने की ।” मंजरी बोली, “क्या होगा पूछ कर तुम कुछ भी ठीक से नहीं बताओगे ।” राजेश ने उस दिन धीरे से कहा, “मंजरी मुझे यहाँ अच्छा नहीं लग रहा है ।”

मंजरी परेशान हो गयी । सब कुछ कितना अच्छा चल रहा था । अच्छी नौकरी थी, बच्चे ठीक से पढ़-लिख रहे हैं पर यह तबादला । क्या करें ? तभी उनका फोन बजा । मंजरी की सुस्त आवाज सुनकर वह बोले, “कुछ परेशान हैं ?” मंजरी बोली, “हाँ ।” वह बोले, “मैं भी । … चलिए बाहर एक-एक कप कॉफ़ी पीते हैं मन हल्का हो जाएगा ।” मंजरी उनके इस प्रस्ताव से चौंकी पर उसमें तुरंत न जाने कहाँ से साहस आ गया, स्वयं से उबरकर बोली, “कहाँ ?”

मंजरी ने सोच तो लिया कॉफ़ी पीने जाएगी पर बात क्या करेगी ? इन दिनों उन दोनों ने जो भी बातचीत की, वे बातें पींकू सोनाली और संयुक्त परिवार की थी । आज क्या बात होगी ? क्या जाना ठीक होगा ? जब वह छोटी थी और स्कूल में पढ़ती थी, उसने एक दिन एक प्रेम कहानी पढ़कर सोचा था कि वह भी कभी प्रेम करेगी । आज उनके न्यौते पर इतना क्यों सोच रही है कि जाना चाहिए या नहीं । कितने दिन हो गए उसे घर से बाहर निकल एक कप कॉफ़ी पिए । हर्ज ही क्या है जाने में ! सच तो यह है कि उसका मन होता है उनसे मिलने का, उनसे बात करने का उनके साथ बैठने का । फोन पर कितनी बात हो सकती है ! जिस दिन उनसे बात नहीं हो पाती, उसका मन कैसा-कैसा रहता है । वह भी तो यह सोच रही थी कि काश किसी दिन उनके साथ दो घंटे बिताने का मौका मिले, फिर आज मन क्यों डगमगा रहा है ?

मंजरी ने हाँ कर दी । बच्चों के स्कूल रहने के दौरान समय तय हुआ, वह भी घर से दूर एक खुले रेस्तरां में । रेस्तरां का माहौल मनमोहक था और वहाँ कोई भी नहीं था । वह वहाँ पहले से आकर बैठे हुए थे । मंजरी को एक क्षण यह लगा कि किसी ने देख लिया हो तो ! कौन देखेगा ? इस शहर में उसे जानता ही कौन है ? हो सकता है उसे नहीं पर उनको लोग जानते हों । यह सब अब सोचने से क्या होगा ? अब घर से निकालकर आ गई है और वे सामने उसका इन्तजार कर रहे हैं तो कॉफ़ी पी ली जाए । वह उनके सामने आ खड़ी हो गई । वे हड़बड़ा कर उठे बोले, “मैं शायद जल्दी आ गया ।” मंजरी बोली, “और मैं एकदम समय पर ।” दोनों हंस पड़े । उन्होंने बैठने को कहा । मंजरी से बैठा नहीं जा रहा था पर वह बैठ गई । दोनों आमने-सामने आ गए । मंजरी ने नजरें उठाईं तो देखा वह उसे ही देख रहे थे । मंजरी संकोचवश सिंकुड़ गई । दोनों चुप बैठे थे । तभी उन्होंने मेनू कार्ड उठाया । पूछे, “क्या लेंगी ?” वह बोली, “कुछ नहीं सिर्फ    कॉफ़ी ।”

“सिर्फ कॉफ़ी । कॉफ़ी तो तुरंत खत्म हो जाएगी ।”

“हर्ज ही क्या है ।”

“फिर भी । कुछ और लीजिए जिसमें थोडा वक्त लगे । और थोडा ज्यादा समय का साथ मिल सके ।”

मंजरी झेंप गई । बोली, “जल्दी ख़त्म होना ही अच्छा है । तभी तो दूसरी यात्रा शुरू होगी ।”

“मतलब । आप तो फिलॉसॅफी कह रही हैं ।”

“नहीं, नहीं । बच्चों के आने का समय हो जाएगा । बस फिर हड़बड़ी मच जाएगी ।”

“चलिए कॉफ़ी ही सही, पर एक नहीं दो कप ।”

कॉफ़ी का आर्डर दिया जा चुका था । दोनों थोड़ी देर फिर गुमसुम रहे । अचानक वे बोलने लगे, “यह जो मेरा व्यवसाय देख रही हैं न, मैंने ही खड़ा किया है । खर्चा पानी का जुगाड़ इधर-उधर से कैसे किया क्या बताऊँ, पर दस वर्ष हो गए । धंधा चल पड़ा । घर में बड़ा हूँ । बहुत तरह का काम संभालना पड़ता है । कोई कुछ नहीं समझता । दोनों भाई तो ठीक है, डांट भी सकता हूँ । पर उनकी स्त्रियाँ कोई कुछ समझने को तैयार नहीं । काम का झगड़ा । उसने लाल रंग पहना मैंने सफ़ेद इसका झगड़ा । सचमुच ये औरतें कुछ नहीं समझतीं, जब देखो तेरा-मेरा करती हैं ।

मंजरी बीच में बोल पड़ी, “पर कभी आपने ये सोचा ऐसा वे क्यों करती हैं ?”

वे मंजरी की बात पर विशेष ध्यान न दे उत्तेजना में बोले जा रहे थे, “औरतों को इतनी छूट नहीं देनी चाहिए । उनका जीवन घर और रसोई तक ही है, वहीं तक रहे तभी अच्छा है । मंझले की आदत है हर छोटी-छोटी बात का निर्णय अपनी औरत से पूछ कर लेता है । अब आप ही बताइए औरतों में क्या इतनी बुद्धि होती है कि वे सही राय दे सकें ! वे तो बस श्रृंगार तक ही रहे तो अच्छा है । हर बात में चूं-चां करना मुझे नहीं सुहाता । मेरी घरवाली तो मुझसे डरती है । जानती है कि मुझे यह सब पसंद नहीं । मजाल है उसकी किसी बात में बीच में बोले । ऐसा करने का उसका एक कारण यह भी है वह गाँव की है । सीधी । पर मँझले और छोटे की औरतें शहर की लड़कियाँ हैं बी.ए. पास । एक बात कहुं मुझे तो इन वर्षों में यह भी लगने लगा है कि औरतों को इतना पढ़ाने का क्या फायदा ! इतनी छूट क्यों दी जाए ?”

मंजरी उन्हें एकटक देख रही थी । मंजरी को वे नजर नहीं आ रहे थे । उसे नजर आ रहे थे रघू काका । उसका बचपन भदोई में गुजरा था । पड़ोस में जो परिवार रहता था उसमें जो काका थे वे काकी को जब तब पीट देते थे । कहते, “बहुत पर निकल आए हैं । मंदिर जाओगी । जानता हूँ किसका दर्शन करोगी !” कुछ वर्षों बाद पता चला उनका किसी स्त्री से सम्बन्ध था । मंजरी की कॉफ़ी ख़त्म हो गयी थी । वह उठ कर खड़ी हो गयी बोली, “चलती हूँ ।”

वे बोले, “अरे, अभी एक कप कॉफ़ी बाकी है । अच्छा, आज मन नहीं है तो जिद नहीं करूँगा । बची हुई कॉफ़ी फिर कभी पर कह कर जाइए कब ?” मंजरी धीरे से बोली, “कभी  नहीं ।” वह तेजी से वहाँ से निकल गयी ।

=================

दुर्लभ किताबों के PDF के लिए जानकी पुल को telegram पर सब्सक्राइब करें

https://t.me/jankipul

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *

1 mins
WordPress Center Ankara Escort: Beypazarı Escort, Pursaklar Escort, Etimesgut Escort İstanbul Escort: Esenyurt Escort, Bahçelievler Escort, Maltepe Escort Bursa Escort: Gürsu Escort, Keles Escort, İznik Escort What are the best budget smartphones available in 2025? Reason Why Everyone Love Travel Doubts About Lifestyle You Should Clarify Bitcoin, Ethereum, ERC20 crypto wallets with exchange Real Estate Portal for WordPress Zxeion – WordPress Security & Firewall & Hide My WP WooCommerce Sale Badge UberPanel – Sliding Panel Plugin for WordPress WooCommerce Autoresponder WordPress User Feedback ABBUA Admin WordPress PlayLab – On Demand Movie Streaming Platform Easy View Shortcode in WPBakery Page Builder