करीब छः महीने हो गए उमेश पन्त की किताब ‘इनरलाइन पास’ के आये. हिन्द युग्म से प्रकाशित इस यात्रा वृत्तान्त को जिसने भी पढ़ा वह इसका हमसफ़र बन गया. इस किताब की यह विस्तृत समीक्षा श्रीश के. पाठक ने लिखी है- मॉडरेटर
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बड़ी मुश्किल से हम गर्भ के कोकून से निकलते हैं और फिर ज़िन्दगी की ज़द्दोज़हद से लड़ते-भिड़ते पुनः एक कम्फर्ट जोन का कोकून गढ़ लेते हैं l ये जड़ता तभी टूटती है कभी-कभी जब हम टूर पर निकलते हैं, ट्रेवेल करते हैं, तीर्थ पर निकलते हैं l दुनिया के सभी धर्म किसी न किसी बहाने अपने अनुयायियों से यात्रा करने को कहते हैं l धर्मों के भीतर उपजे दर्शन को ये इल्म है कि इंसान ज़िंदगी के दूर्घर्षों में खपकर इक इनर्शिया पाल सकता है, सो तीर्थ, हज आदि जरुरी बना दिए गए l बहुत आखिरी में जाकर एहसास आता है कि मुकाम से अधिक सफ़र में वो बात थी, जिसकी तलाश में हर ज़िन्दगी लाश हुए जाती है l
उमेश पन्त जी की लिखी इनरलाइन पास एक उम्दा यात्रा वृत्तान्त है l किताब का नाम ही काफी था खरीदने के लिए, पन्ने तो जब खुले तो खुलती गयीं मन की कितनी ही परतें l हिन्दयुग्म से प्रकाशित इस पुस्तक की पन्नों की गुणवत्ता अच्छी है और वर्तनी के दोष नगण्य हैं l उमेश पन्त जी की ट्रेनिंग पत्रकारिता की है जो कि जब तब उनके सूक्ष्म अवलोकन में दिखती है l पत्रकारिता में रोजमर्रा की झंझटें हैं, उमेश जी का व्यक्तित्व इतने से संतुष्ट नहीं हो सकता तो फिर लेखक अवतार लेता है और कई पड़ावों के बाद आयी यह पुस्तक स्वागतयोग्य है l लेखक के हस्ताक्षर के साथ शुरू हुई यह पुस्तक बिंदास ‘यात्रागोई ’ को समर्पित है l युवा पत्रकार जिसके हाथ कलम पर उतने ही सटीक हैं जितनी की दृष्टि पैनी है और उतनी ही आकर्षक है फोटोग्राफी l उमेश जी उत्तराखंड (पिथौरागढ़ ) से ही हैं, अपने राज्य की और ऊँचाईयाँ छूना चाहते हैं खासकर जब काम के सिलसिले में दिल ले लेने वाली दिल्ली में रहते रहते एक यंत्रणा का आभास होता है जो यंत्रवत काम से उपजता है l लिखते हैं –‘जितना हम शहर में रहते हैं, उससे भी ज्यादा शहर हममें रहने लगता है, हम चाहें या ना चाहें …!’ सच है आज के शहरों में शाम औ सहर की तासीर में वो बात ही नहीं जो होनी चाहिए, बस हर तरफ लोग भागते दिखाई पड़ते हैं l धीरे-धीरे यह शहर ज़ज्ब हो जाता है ज़ेहन में और हम अपनी सामाजिकता को टीशर्ट-जींस बनाकर बस पहन लेते हैं l
हाँ, शहरों में अजनबी होकर भी जिया जा सकता है पर शहर आज को मार देते हैं और फिर वजूद को भी l अजनबी बनकर जीने में जीवन कटता तो रहता है पर फिर पाँचों ज्ञानेन्द्रियाँ अपने अर्थ को तरसने लगती हैं l मन तो करता ही है ना कि कोई अजनबी भी अपनी और देखकर मुस्कुरा दे l सांस भर सांस तो हो…, पर बस सांस भर लेने को ही थोड़ी कहते हैं; ज़िन्दगी l ज़िन्दगी को एक इनरलाइन पास चाहिए जो अपने ससीम को असीम से संस्पर्श कराये l तो दिल्ली से दो युवा चल पड़ते हैं शहर की बेवफा चिलचिलाती अजनबीयत को छोड़ ठन्डे पहाड़ों के रिश्तों की गर्माहट की चुस्की लेने l
उमेश लिखते हैं –“चलते-चलते दिमाग भी एक यात्रा पर निकल पड़ता है l ” यकीनन ऐसा होता है l तो फिर लेखक की यह यात्रा शुरु होती है एक सतत चिंतन से l बकौल उमेश- “यह यात्रा जहाँ से शुरू होती है वहां शंकाओं और सवालों का एक ढेर पड़ा था l ऐसा ढेर जो लगातार आपकी चेतना को सोखता रहता है l खुशी, सेल्फ सटिसफैक्शन, करियर, टाइम मैनेजमेंट, बैंक बैलेंस, सेविंग्स l तीस की तरफ तेजी से बढ़ती उम्र के पड़ाव में एक वक़्त आता है जब ये सारी चीजें ज़िन्दगी के सीधे सपाट रास्ते पर कहीं से जैसे मलबे की तरह आ जाती हैं और सफ़र में अड़चनें पैदा करने लगती हैं l लगने लगता है कि ज़िन्दगी में कुछ तो कमी है l पर क्या … ” यात्रा में इसका निदान मिल सकता है l कम से कम लेखक को तो यह निदान भरपूर मिला l आगे के पृष्ठों में पाठकों को भी शिद्दत से यह बात एहसास में आती है l एक-एक पल यों महसूसना, चलते जाना…यही तो जीवन है l एक सैलानी का मन रोमानी भी हो तो फिर तो क्या कहने l उमेश कहते हैं-‘घुमक्कड़ी किसी ऐसे प्रेमी से मन भर मिल आना है जो आपका कभी नहीं हो सकता l ’
भारत का यात्री यात्रा पर निकले और घुमक्कड़ शास्त्र के पुरोधा को याद ना करे, हो ही नहीं सकता l कम से कम उमेश इस त्रुटि से बचते हैं l अपने पहले पाठ ‘यात्रा मोड’ से पहले वे राहुल सांकृत्यायन को उद्धृत करते हैं मानो देवता से आशीर्वाद ले रहे हों l यह केवल शरीर की यात्रा नहीं है, मन की यात्रा है, उसके कई परतों के उमड़ने-घुमड़ने की यात्रा है सो सांकृत्यायन स्मृति के प्रथम पृष्ठ पर होने चाहिए, जो वो हैं l आदि कैलास-ओम पर्वत यात्रा कागज पर ही काफी उंचाई पर दिखती है l अगले पृष्ठ पर जो मैप है वह धारचूला से शुरू होकर आदि कैलास, नवीडांग तक का सफ़र उकेरता है l यह उपयोगी है, लेखक के साथ पाठक जब इस यात्रा में शामिल होता है तो बारम्बार पीछे पन्ने पलटकर देखता पढ़ता रहता है कि कितनी उंचाई पर पहुचें हम l
यात्रा से पहले ही कई यात्राएँ शुरू हो जाती हैं जो असल यात्रा की तैयारियां समेटे होती हैं l पुस्तक के अंत में दी हुई संक्षिप्त व महत्वपूर्ण सन्दर्भ सूची भी इसकी एक तैयारी के नमूने को बयाँ करती है l मन की एक यात्रा तो और पहले शुरू हो जाती है जो आगामी यात्रा की जरुरत को और भी बढ़ाती जाती है l उमेश जी के शब्दों में – “यात्राओं की अच्छी बात यह होती है कि वो आपको अंतराल देती हैं l वो लम्हे देती हैं जिनमें आप बीतते हुए को थामकर देख सकें l शहर आपके उस नितांत निजी स्पेस पर लगातार घाव कर रहे होते हैं, यात्राएँ मरहम की तरह उन घावों को भरने का काम करती हैं l ” सचमुच यात्रा तो हम बाहर कर रहे होते हैं, पर भीतर से संवाद काफी अरसे बाद शुरू होता है इस बहाने l मन बार-बार अपनी प्रतीति बताता है, समक्ष को मन किसी अतीत के सुन्दरतम से या तो जोड़ रहा होता है या संजो रहा होता है भविष्य में सुन्दरतम बन आगत के यात्रा समक्ष से पुनः जुड़ने के लिए l इस प्रक्रिया में हम स्वयं को घोल लेते हैं और एहसास भरे पुरे बनते जाते हैं l
यात्रा रोमांचक है, यात्री साहसी, रोमानी और लेखन सहज l एक रोमांचक पड़ाव पर सनसनीखेज सर्वाइवल के बाद इंसानों को देखना भर राहत से भर देता है l झुण्ड के झुण्ड इंसान दिल्ली में नज़र तो आते हैं पर जैसे दिखाई कोई नहीं पड़ता l पहाड़ में वह सब दिखाई देता है l “जब आप किसी खतरे में अकेले पड़ गए होते हैं तो इंसानी बू कितनी राहत देती है, यह ऐसे मौकों पर पता चलता है l ” जाने कितने सच समझ आते हैं ज़िन्दगी के वो भी सहसा l इस दुनिया की एक खूबसूरती इसका विरोधाभासी होना भी है l दो कोंट्राडिक्ट करते मायने इंसान को स्तब्ध करते हैं और उसमें और भी ज्यादा साहस और धीरज भरते हैं l सफ़ेद और काले का घना रिश्ता देखकर मन भूरा हो जाता है पर मकसद पूरा हो जाता है l एक जगह उमेश लिखते हैं –”कमाल की बात थी कि यह इलाका इस वक़्त जितना खतरनाक हो गया था उतना ही खूबसूरत भी लग रहा था l … अगर पहाड़ों के दरकने का खतरा नहीं होता तो बारिश में भीगती वादी में भीगता यह वक्त ज़िन्दगी के सबसे खूबसूरत लम्हीं में शुमार होता l ” पर जितने में हम होते हैं हमारा उतना ही होता है l यात्राएँ यों ध्यान का विज्ञान समझाती हैं l ध्यान से हर क्षण को पीना आ जाता है l
यात्रा के हर क्षण में हम पूरे होते हैं l चीजें शिद्दत से असर करती हैं l कहीं भीतर वजूद में अपनी जगह बना जम जाती हैं रूपांतरित हो l पर आगे बढना होता है l समक्ष के समक्ष विगत को छोड़ना होता है l यात्राएँ हर क्षण अनुपम समक्ष प्रस्तुत करती रहती हैं l मन पर व्यतीत अतीत हावी रहता है, समक्ष को भीतर आने नहीं देता l पर ऐसी यात्राओं के अनुपम दृश्य एक झटके के साथ मन की जड़ता तोड़ देते हैं और हम होश में आ वर्तमान में आ जाते हैं l फिर समझ आता है उस छूटे हुए को मन में निहारने में अभी का कितना कुछ हर क्षण छूटा जाता है l “यात्राओं की एक तल्ख़ सच्चाई यही है कि रास्ते में मिले सुख-दुःख आपको रास्ते में ही कहीं छोड़ देने होते है l ” साक्षी भाव सहज सध जाता है l
पहाड़ के दैनंदिन सघर्ष आपको ईमानदार मेहनती और साहसी बनाते हैं l वे बच्चे जो थोड़े से पैसों के लिए लेखक के बैग लेकर आते हैं उन संघर्षों में से जो एक आम शहरी के लिए किसी विराट दुर्घर्ष से कम नहीं हैं, इसके जीवंत उदात्त उदाहरण हैं l “बच्चों को मेहनताना देकर हमने अपना सामान देखा l ” सभी कुछ यथावत l लेखक आश्चर्यचकित होते हैं l ऐसी ईमानदारी जो जान खेलकर भी निभाई जाती हो l कठोर पहाड़ जीवन के सूत्र सरलता से सीखाते हैं l शिक्षा का संघर्ष यहाँ का रोजमर्रा का है l यह संघर्ष किसी ब्रूकर टी वाशिंगटन के संघर्ष से कम नहीं हैं l रोज पहाड़ उतरकार माँ के साथ जाते बच्चे l नीचे फिसलने का डर, ऊपर से पत्थर सर पर गिरने का डर l पर जिजीविषा देखिये, कुलांचे मार आगे बढ़ रहे बच्चे उस पथ पर जहाँ सैलानियों के छक्के छूट रहे हैं l जहाँ पहाड़ ही सरकार हों, वहां सरकार भी लाचार है l सड़कें महफूज नहीं, बनती-बिगड़ती रहती हैं l उमेश दर्ज करते हैं :
“बच्चों ने बताया कि वो धारचुला में पढ़ते हैं और कल से स्कूल खुल रहा है l वो लोग कोशिश कर रहे हैं कि वो आज ही लमारी तक पहुँच जाएँ l लमारी हमारे आज के पड़ाव बूदी से भी दूर था l तय था बच्चों और उनकी माँ को तेज चलते हुए आगे बढ़ जाना होगा l इतने छोटे बच्चे बिना चेहरे पे शिकन लिए मुस्कुराते हुए आगे बढ़ते जा रहे थे l उनके पास कोई शिकायतें नहीं थीं l एक उमंग थी जो बढ़ती ही चली जाती थी l शहरों में नाजों से पलने वाले बच्चों से एकदम अलग थे ये बच्चे l सहूलियतों से दूर, पर ज़िन्दगी से काफी नज़दीक l ”
हालाँकि मन की एक यात्रा तो ऐसी है जो हर यात्रा के साथ शुरू तो होती है पर लौटना नहीं जानती l वह तो आगे बढ़ती रहती है और आगे की ऐसी ही यात्राओं के लिए फिर-फिर तैयार करती रहती है l पर सभी यात्राओं का एक रिटर्निंग पॉइंट होता है l लेखक की इस यात्रा का भी है l फिर से उसी रोजमर्रापन में समाने की ज़द्दोज़हद शुरु होगी l
“यह लौटना यात्राओं का एक ऐसा सच है जिसे चाहे-अनचाहे हमें अपनाना तो होता है l ऐसी यात्राओं के बाद जहाँ हम लौट रहे होते हैं, जिसे हम घर कहते हैं उसकी अवधारणा ही बहुत अर्थहीन लगने लगती है l”
सच है, यात्राएँ स्वयं का इतना सहज विस्तार कर देती हैं कि घर की सीमायें छोटी पड़ जाती हैं l जब सभी कुछ संवाद और समानुभूति जग जाती है फिर घर की अवधारणा निश्चित ही बेबस नज़र आती है l घर से इतर का सामजिक जीवन जिसे अब बस बाजार नियंत्रित करता है, लेखक ने एक स्थान पर बेहद ठोस ढंग से अत्यावश्यक विमर्श छेड़ा है, यथा:
“पहाड़ वालों का दिल्ली जाना, बिहार वालों का दिल्ली जाना, यूपी वालों का दिल्ली जाना…ये सब उसी ढर्रे की तरफ मजबूरन ही सही बढ़ जाने की अदृश्य प्रक्रिया है l और सबको दिल्ली जाने को मजबूर कर दिया जाना एक बड़ी पूंजीवादी व्यवस्था को अबूझ-अनजाने आत्मसात कर लिए जाने की एक अदृश्य प्रक्रिया है l एक ऐसी प्रक्रिया जिसके तहत आप अपनी ज़िंदगी किसी कम्पनी, किसी फर्म, किसी सरकार या किसी व्यक्ति का नौकर बनकर गुजार देंगे l यह करना ही सर्वमान्य होगा l ….आप जिन उत्पादों की निर्माण प्रक्रिया का हिस्सा होंगे उन्हीं उत्पादों को घुमा-फिराकर आपको बेच दिया जायेगा l …एक ऐसी जीवनशैली आप खुद पर लाद देंगे जहाँ आप अपनी हैसीयत से ज्यादा खर्च करके ही फिट हो पाएंगे l आप पर बैंकों के कर्जे चढ़ते रहेंगे और आप अपनी पूरी ज़िन्दगी उन कर्जों को चुकाने में बिता देंगे l खुशी खुशी या मजबूरन l ”
इस यात्रा-वृत्तान्त की भाषा में वही प्रवाह है जो लेखक की यात्रा में है l जब तब दृश्य जीवंत हो गये हैं l एक शहरी उलझनों में जकड़े मन प्राण शरीर को इस वृत्तान्त से अदम्य प्रेरणा मिलती है कि किसी यात्रा पर अवश्य निकल जाएँ l लेखक की यह सफलता सबसे बड़ी है l इस किताब को पढ़ा और पढ़ाया जाना चाहिए l यह आज के समय की एक जरुरी किताब है जो भारी भरकम बौद्धिकता से दूर होते हुए भी दर्शन के महत्वपूर्ण सूत्र समझा देती है l सहज ही, क्योंकि लेखक की मंसा दर्शन नहीं है l फिर भी यात्राओं से दर्शन कैसे निकाल बाहर करेंगे तभी तो इसे तीर्थ कहते हैं l तीर्थ जो समझा दे कि आप असीम हो, सबसे सम्बंधित हो l यात्रा का हासिल हम सभी पाठकों का भी हासिल है –
“उमंग और दृढ़ इच्छाशक्ति ”

