कला शिविर का रोज़नामचा  -गीताश्री 

जानी-मानी लेखिका गीताश्री आजकल जम्मू के पहाड़ी नगर पटनीटॉप में एक कला शिविर में गई हुई हैं. आने वाले कुछ दिनों तक उनका रोजनामचा नियमित रूप से जानकी पुल पर प्रकाशित होगा. यह पहली किस्त है- मॉडरेटर
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उनको मालूम नहीं कि बर्फ गिरने से पहले वे दस्तावेज़ों और चित्रों में बदल दिए जाएंगे. देश के विभिन्न हिस्सों से आए चित्रकारों का एक दल कौतुहल से उनके घरों और रहन सहन को निहार रहा हैं. सलीम अभी अभी मवेशियों को हांकता हुआ वापस डेरे पर लौटा है.
 यह डेरा बस सर्दियों से पहले का बसेरा है, बर्फ गिरने से पहले डेरा उठ जाएगा फिर क़ाफ़िला चल पड़ेगा उधर जिधर क़दम ले जाएँ. जहाँ थोड़ी-सी ज़मीन और थोडा-सा आसमान मिल जाए. अपने हिस्से में दुनिया से ज़्यादा कुछ नहीं माँगते. कम सामान और कम ख़्वाहिशों वाली यह जमात है – जम्मू क्षेत्र की ऊँची पहाड़ियों पर बसने वाले बकरवाल ट्राइब्स. गुर्जर समाज के एक बड़े और रसूखदार तबके को ‘बकरवाल’ कहा जाता है. पहाड़ों की ऊँची ऊँची चोटी पर छितराए हुए बने कच्चे मकानों में फ़िलहाल इनका डेरा है. अभी अभी तो मैदानी इलाक़ा छोड़ कर पहाड़ी घरों में डेरा डाल दिया है. कुछ महीने यानी बर्फ गिरने से पहले तक यहीं बसेरा होगा. वे सब रोज़मर्रा के कामों में जुटे हुए हैं. आने वाले दिनों के लिए कुछ चीज़ें जमा भी करनी है. सब अपने अपने काम में जुटे हैं , बुज़ुर्ग सईदा मवेशियों को चरा कर लौटी हैं, अपने हाथ पैर धो रही. शाम को रोज़ा खोलने का इंतज़ाम भी करना है. जैसे जैसे साँझ घिरती जा रही है, ढोर ढंगर लेकर लौटते हुए बकरवाल लोग अचकचाए हुए लगे कि इतनी गाड़ियाँ और इतने लोग पहाड़ की ऊँची चोटी पर क्या उन्हें देखने और मिलने आए हैं?
निलेश वाडे की पेंटिंग
दिल्ली समेत देशभर से कला शिविर में शिरकत करने वाले पंद्रह चित्रकार समूची पहाड़ी पर छितरा गए हैं. इतनी ऊँचाई पर इनके अस्थायी डेरे हैं , जिसे छोड़ कर चल देना है और फिर मौसम बदलते ही लौट आना है. खुले दरवाज़े और रोशनदान जैसी खिड़कियाँ. मिट्टी की खेतनुमा छतें हैं जिन पर अपने खाने भर के लिए सब्ज़ियाँ उगाते हैं. कला शिविर की आयोजक चित्रकार अनुराधा ऋषि बहुत उत्साहित हैं कि वे अपने उद्देश्य में सफल होंगी. जम्मू-दिल्ली निवासी अनुराधा , अपने पिता के नाम पर ट्रस्ट MSCBMCT ( मास्टर संसारचंद बरु मेमोरियल ट्रस्ट) चलाती हैं जो कला और कलाकारों के लिए बहुत काम करती है. जम्मू रीज़न के पटनी टॉप में कला शिविर का आयोजन भी उसी काम का हिस्सा है.
इस बार चित्रकार कुछ तलाश रहे हैं, रंग, रुपाकार और सभ्यता के उन सूत्रों को जो धीरे धीरे एक क़ौम की पहचान छीन लेगी. इधर कुछ घटनाएँ ऐसी घटी हैं जिसकी छाया इस क़ौम पर पड़ना स्वभाविक है. कठुआ की आसिफा का मामला अभी ताज़ा है. कुछ अपनी सुरक्षा को लेकर चिंतित हो गए हैं तो कुछ अब मुख्यधारा से जुड़ना चाहते हैं. राज्य सरकार भी चाहती है कि बकरवालों को मैदानी इलाक़े में ज़मीन देकर बसा लिया जाए. अभी तो वे विस्थापित हैं और जब पहाड़ से उतर कर मैदानों की तरफ और मैदानों से पहाड़ों की तरफ चलते हैं, रास्ते में कहीं भी डेरा डाल देते हैं. बीच बीच में विश्राम करते हुए इनकी टोली चलती है. कई बार छोटे समूह में भी होते हैं. हिमालय के असली यायावर बेहद निर्भय होते हैं.
अनुराधा की चिंता ये है कि इससे पहले कि ये समुदाय अपनी विस्थापन संस्कृति को छोड़ कर कहीं स्थायी ठिकाना बना ले और मुख्य धारा में शामिल होकर अपनी सांस्कृतिक पहचान खो बैठे, हमें उनको दस्तावेज़ों में समेट लेना चाहिए. हालाँकि उनके मुख्यधारा में शामिल होने से
से किसी को आपत्ति नहीं है. बस एक संस्कृति के विलुप्त होने की चिंता भर है जिसे चित्रों में भी समेट लेना चाहिए. इसी सोच से इस कला शिविर की रुपरेखा बनी.
कला शिविर का विषय ही है – वैनिशिंग अार्ट एंड कल्चर ऑफ़ जे. एंड के.( बक्करवाल ट्राइब्स) !
छह दिनों के कला शिविर में चित्रकार इसी थीम पर काम कर रहे हैं. अपेक्षाकृत शांत पटनी टॉप क्षेत्र चहल पहल से भर गया है.
मैदानों से पहाड़ों की तरफ आने का सिलसिला शुरु हो गया है. कुछ तो कठुआ कांड के बाद भी मैदानों से पहाड़ों की तरफ पलायन बढा. बताते हैं कि मैदानी इलाक़ों में ये लोग स्थायी रुप से बसना चाहते थे ताकि अपने बच्चों को पढा लिखा सके, लेकिन आठ साल की बच्ची आसिफा के साथ हुई बर्बरता ने इस समुदाय को हिला कर रख दिया है. स्वभाव से शांतिप्रिय, घुमंतू प्रवृति के बकरवालों को 1991 में लम्बे संघर्ष के बाद आदिवासी का दर्ज़ा मिला.
2011 की जनगणना के मुताबिक, जम्मू कश्मीर में गुर्जर बकरवालों की कुल आबादी लगभग 12 लाख के करीब है यानी कुल जनसंख्या का 11 प्रतिशत.
हालाँकि यह आँकड़े अनुमानित होंगे. ख़ानाबदोशों की सही गणना मुश्किल होती है.
इन्हीं ख़ानाबदोशों को कैनवस पर देखना अलग क़िस्म का अनुभव है.
शिविर में शामिल चितेरी रेणुका सोढी गुलाटी बकरवाल महिला को दर्ज कर रही हैं जो अपने दरवाज़े पर बैठ कर पर्यटकों को आते जाते देख रही है. मुंबई से आए युवा चित्रकार नीलेश वड़े के कैनवस पर कच्चे घर के भीतर से झांकती भैंस दिखाई देती है.
नीलेश बकरवालों के मवेशी प्रेम से बहुत प्रभावित हैं. वह कहते हैं – “जिस तरह से अपने मवेशियों को वे प्रोटेक्ट करते हैं, वो हमें बताते हैं कि हम जानवरों को नहीं पाल रहे, वो हमें पाल रहे हैं.”
 दिल्ली के वरिष्ठ चित्रकार राजेश शर्मा पहाड़ों की बनावट को पकड़ रहे हैं, जहाँ एक संस्कृति यायावर है. पहाड़ भी कैसे रंग और टेक्सचर बदलते हैं.
चित्रकार की आँख रचनाकार की आँख की तरह होती है . वह दृश्य को अदृश्य में और अदृश्य को दृश्य में बदल देती है.
बकरवाल अब कैनवस पर बसेंगे कुछ दिन तक. उन्हें कहाँ मालूम.
चाय की छोटी-सी दूकान खोले जावेद पर्यटकों के आने से चहक उठा है. उसकी बिक्री जो होगी. उसे मालूम कहाँ कि वह महज़ केस स्टडी है. उसकी एक एक हरकत नोट की जा रही है. उसे कहाँ पता कि वह कैनवस पर दर्ज होने वाला है. वह खुश होकर चाय बनाने लगता है और चित्रकार उसकी पूरी खोली खंगाल डालते हैं.
खुले में पत्थरों का बड़ा-सा चूल्हा है जिस पर सामूहिक भोज के लिए कड़ाह चढ़ते हैं. दूर दूर तक नज़र दौड़ाएँ, बकरियाँ, भेड़े और भैंसे चरती नज़र आती हैं. उन्हें हाँकते हुए  छोटे बच्चे और बच्चियाँ.
जावेद कहते हैं- ये हमारा इलाक़ा, हमें यहाँ कोई खौफ नहीं.
हिंदी बहुत अच्छी बोलते हैं. मैदानी इलाक़ों का प्रभाव साफ बोलचाल में दिखाई देता है. चित्रकारों की आँखें कुछ अलग तलाश रही हैं. रंगों को, रुपाकारो को, समय और सरोकारों को भी पकड़ने की कोशिश में हैं. उनकी जिंदगी लाइव देखना चाहते हैं इसलिए बकरवालों के पास सब जमा हैं. उनसे बातों का सिलसिला जारी है. उनके लोगो और घरों की तस्वीरें उतारी जा रही हैं.
अनुराधा उत्साह में भर कर बताती हैं – “शिविर में जो काम होगा, वो इतिहास में झाँकने के लिए एक झरोखा होगा. समय की रफ़्तार हमसे हमारी सांस्कृतिक पहचान छीन रही है और इनकी बातें सिर्फ किताबों में बच जाएगी. हमें अपनी पहचान नहीं भूलनी चाहिए. आने वाली पीढ़ियाँ अपने सांस्कृतिक इतिहास में झाँकना चाहें तो हमारा काम देख सकती हैं. इसमें हम समय को भी दर्ज कर रहे हैं.”

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