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  • यतीश कुमार की कविताएँ

    आज यतीश कुमार की कविताएँ। वे मूलतः कवि नहीं हैं लेकिन उनकी इन संकोची कविताओं में एक काव्यात्मक बेचैनी है और कुछ अलग कहने की पूरी कोशिश, जीवन के अनुभवों का कोलाज है। आप भी पढ़िए- मॉडरेटर

    १)हम तुम

    एक स्थिति हैं
    हम तुम
    वह जो डाल पर बैठे
    तोता मैना हैं
    हम तुम हैं
    पेड़ की जो दो फ़ुंगियाँ हैं
    आपस में बिन बात बतियाती रहती हैं
    हम तुम हैं
    कुमुदिनी के फूल
    जो जोड़ो में ही खिलते हैं
    बस दो दिन के लिए
    कल ही तो खिले थे
    तुम्हारे गमले में हम
    हम हैं स्टेशन की पटरी
    जो शुरुआत में समानांतर
    आगे जब चाहे क्रॉसिंग पर
    गले मिलती रहती है
    या फिर नाव के वो दोनो चप्पू
    साथ चलने से जिसके गति रहती है
    गंतव्य पर रोज़ रख दिए जाते है
    एक साथ रात काटने के लिए
    हम तुम हैं
    पर शायाद हम तुम हैं
    घर के अक्वेरीयम में तैरती
    नीली और काली मछलियाँ
    मौन को समझ,इशारे में बात करते हैं
    या वो जो गिन्नी पिग हैं दोनो
    पिंजड़े में अपने शब्द चुगती,पचाती
    और कुछ नहीं कह पाती
    हम दोनो हैं कभी
    दो ,असंख्य
    कभी एक या सिर्फ़ शून्य

    २)सर्पिली लटें

    तुम्हारी लटें लहरा नहीं रहीं
    कम्पन अंतस का डोल रहा है
    मन के उथले क्षितिज पर
    सपनों की टुस्सियाँ फैल रही हैं
    नाख़ून कितना भी काटो
    बदस्तूर बढ़ता जा रहा है
    और त्वचा बढ़ती स्थूलता से
    ख़ुद आश्चर्यचकित है
    धमनियों में शोर का पारा
    तेजी से फैल रहा है
    और यूँ पसीने में नमक की मात्रा
    कम होती जा रही है
    सावधान
    वो नन्हा-सा सर्प तुम्हारे भीतर
    अवचेतन में जन्मेगा- पनपेगा
    और फिर दिग्भ्रांत केंचुली को पहन
    तुम्हारी लटों में बदल लहराएगा
    लपेट लो इन्हें अपने जूड़े में
    ये लपटें भावनाओं की हैं
    बढ़ते नाख़ून से खुरेचना
    उन जमी हुई खुरचन को
    कच्चे विष-दन्त ने अभी डसना सीखा नहीं
    पर सीखना तो स्वाभाविक प्रवृति है
    डंक मारना प्रकृति नहीं तुम्हारी
    पर प्रवृत्ति प्रकृति को पैरहन ओढ़ाती है
    घुंघराले बाल मेरे
    मुझे और मेरी छाया
    दोनों को भ्रमित करते हैं
    रुद्र और बुद्ध तो
    हम सब में हैं
    बस लटों को बाँधना किसे आता है …..

    ३)मील का पत्थर

    ——————-
    जो तुम जानते हो
    मत थोपो मुझ पर
    बाँधो मत
    धागों की उलझी लड़ियाँ
    खोजना चाहता हूँ
    ख़ुद से अनजान चीज़ों को
    अपने लिए स्रोत
    स्वयं बनना है मुझे
    ज्ञान को मुक्ति का
    आधार रहने दो
    मत दिखाओ मार्ग मुझे तुम
    नहीं रहना चाहता हूँ खड़ा
    तुम्हारे कंधो पर टिक कर
    खपरैल के खोखले बाँस की तरह
    जो अपनी उम्र से पहले सड़ जाए
    गुम हो जाना चाहता हूँ
    जड़ की आखिरी कोशिकाओं में
    शीर्ष वर्धमान सिरा का
    मूलरोम बनकर
    ढूँढना है,जानना है
    मिट्टी के गुण-अवगुण
    गासों में जिजीविषा
    पत्थर में जीवन
    पानी में अमृत
    तुम में मैं
    और मैं में हम
    मिटाना चाहता हूँ
    हम से
    अहम की सिलवटें
    बनना चाहता हूँ
    मील का पत्थर
    और खड़ा रहना चाहता हूँ
    सदियों तक
    दिशा और दूरी को समेटे हुए
    ४)मैं पूछ नहीं सका
    पूछना चाहता था
    ठीक पास बैठी महिला से
    कि उसने मास्क क्यों पहन रखा है
    क्या उसकी साँसे घुटती नहीं है
    सामने खड़े दरबान से भी पूछना था मुझे
    कि क्या तुम्हारी टांगों में दर्द नहीं होता
    कुछ पल के लिए
    बैठ क्यों नही जाते
    रीढ़ को झुकाए
    मोची से भी कहना था मुझे
    ऐंठ जाएँगी टाँगे बैठे-बैठे
    थोड़ा चहलकदमी तो कर लो
    सर्द रात में बोरे में लिपटे
    बुज़ुर्ग से पूछना था
    जिसके हाथ में
    जल कर बुझ चुकी बीड़ी है
    सीना धौंकनी-सा फड़फड़ा रहा है
    और पेट का तंदूर ठंडा पड़ गया है
    बुझायी गयी बीड़ियों से
    दीवार पर उसने
    बीते दिन लिख रखे हैं
    भाषा अव्यक्त सी है
    उसके ही पाँव से टिकी
    उस औरत से भी पूछना भूल गया मैं
    जिसकी आँखों का नूर
    कोरों पर अब भी अटका पड़ा है
    नमक बहने का उस पर असर कम क्यों है?
    वह इतनी तेजी से दौड़ा
    कि मैं पूछ ही न पाया
    उस बच्चे से
    उसके घर का पता
    मासूमियत पर जिसके
    चढ़ चुका है
    नीमक़श तेजाबियत का नशा
    जो मुझे ऑफ़िस आते-जाते
    हर बार खेलता दिख जाता है
    उन किन्नरों से भी नहीं पूछ पाया
    कि तुम्हें तीसरे लिंग का दर्जा मिलने में
    युग क्यों बीत गए ?
    कागज में दर्ज हो चुकने के बाद
    अब भी चौराहे पर
    तुम ताली क्यों बजा रहे हो ?
    उस पागल से
    उसकी हँसी का राज
    समझना था मुझे
    जो मुर्दा घरों के बाहर
    रोते-बिलखते लोगों पर हँसता है
    मैं ख़ुद से भी नहीं पूछ पाया
    कि इतना परेशां क्यूँ हूँ
    और सही समय पर
    आँखें मूँद लेने की कला
    कब सीख गए !!

    ५)यंत्रणा का अन्तरलाप

    अतृप्ति का सोता लिए
    दर-ब-दर भटकते लोग
    सुख की तलाश में
    अपने-अपने दुःख नत्थी कर चुके हैं
    खून और पसीना
    एक साथ बह रहे हैं
    हवा का रवैया इतना पुरवैया है कि
    सोखना-सुखाना तक मुश्किल…
    इन दृश्यों के बीच
    उस हर शख्स के पास एक कविता है
    जिनके हाथों में छेनी-हथौड़ा है
    वे पत्थरो पर निरंतर गढ़ रहे हैं शब्दों को…
    समय ने उनको घिस कर
    वह सिक्का बना दिया है
    जो चलन से बाहर हो चुका है
    उनका पसीना अब अलोना हो चुका है
    और महावर ज़ियादा सुर्ख़
    स्वेदार्द्र आँखों ने कोर पर
    रोक रखी है अपनी धार
    मुश्किलों को मुट्ठी में दबाए
    वह सोने की कोशिश में मुब्तिला है
    स्वप्न में भी निर्माण और ध्वंस
    लहरों की विकल्प-आवृति सा
    धार के साथ एकसार है..
    इन सबके दरमियान
    यंत्रणा का अन्तरलाप
    घरों से निकल
    एक-दूसरे के गले लग रहे हैं
    इन सबके बीच
    अपने एकांतवास से निकल
    दर्द अब एक सामूहिक वक्तव्य है.
    ६)पूर्ण विराम
    —————-
    दिखता है
    बुद्ध के घुंघराले बालों जैसा
    अंधेरे को केंद्र में दबोचे
    झाँकता है सूरज पीछे से
    चाँदना की लालिमा
    आतुर है मुस्कान लिए
    खिलखिलाने -फैल जाने को
    पहाड़ की ओट से आभा धीरे-धीरे
    फैल रही है धान के बीचरे पर
    भीतर कोलाहल है, दृश्य का
    कंचे की तरह उछलते कूदते बुलबुले
    निरंतर ध्वस्त हो रहे है
    दृश्य बोल रहा है
    परिदृश्य की खामोशी को
    चुपके से तोड़ता
    बीचरे रौंदे जा रहे है
    पानी अंदर ही अंदर धँसता जा रहा है
    कीचड़ के भीतर-बाहर
    परत दर परत
    मिट्टी सूखी-सूखी
    फिर पानी,पत्थर और शब्द
    सब ग़ायब
    बुद्ध के हर लटों में
    सैकड़ों लहरें है
    और वह बस मुस्काता है

    ७)इतना ही सीखता हूँ

    इतना ही सीखता हूँ गणित
    कि दो और दो को बस
    चार ही गिन सकूँ
    इतनी ही सीखता हूँ भौतिकी
    कि रोटी की ज़रूरत के साथ
    हृदय की प्रेम तरंगे
    और कम्पन भी माप सकूँ
    इतना ही सीखता हूँ भूगोल
    कि ज़िंदगी की
    इस भूल भूलैया में
    शाम ढलने तक
    घर की दिशा याद रख सकूँ
    इतनी ही सीखता हूँ अंग्रेज़ी
    कि देशी अंग्रेज़ों के बीच
    अपने स्वाभिमान के साथ
    अपनी हिंदी भी बचा सकूँ
    इतना ही पढ़ता हूँ ज़िंदगी को
    कि दीवार पर उभरी
    चूल्हे की कालिख में
    परतों की उम्र भी पढ़ सकूँ
    उकेरता हूँ लेखनी को उतना ही
    जितना सच
    बचा है
    मेरे अंतस में
    ८)भूख -रोटियों की गंध
    अंतहीन गंध के चक्कर में
    घूमती रहती है धरती
    या इसी चक्र में घूमते हैं
    इस पर रहने वाले लोग
    मृग तृष्णा है ये गंध
    या इंसानों में भी है कोई कस्तूरी
    विचित्र अग्नि है
    रूह झुलसती नहीं
    बस सुलगती रहती है
    भूख करवट यूँ बदलती है
    मानो जलती लकड़ी
    आँच ठीक करने के लिए
    सरकाई जा रही हो
    उसी आँच पर रोटी पकेगी
    सोच कर नींद नहीं आती
    आँच आती है, बढ़ती है
    बस कमबख़्त रोटी नहीं आती
    आँखें बुझ जाती है
    नींद डबडबाती है
    देह सो जाती है
    पर भूख अपलक जागती है
    हाँ,कभी-कभी ढिबरी में
    ज़्यादा तेल फैल जाने जैसा
    फकफ़काती भी है
    एक लम्बी रुदाली है
    जिसकी सिसकियाँ नहीं थमती
    एकसुरा ताल है जिस पर
    ताउम्र नाचता है जीवन
    एक ठूँठ पेड़ है
    जिसकी पत्तियाँ नहीं होती
    तने का बस हरापन ज़िंदा है
    और वो जो लहू हरे में बह रहा है
    वो अजर-अमर भूख है
    भूख को अमरत्व प्रदान है
    पर सपनों को नहीं
    देह से बाहर
    देश की भूख अलग होती है
    और देश के अंदर
    राज्यों की अलग भूख
    अनंत सीमाओं की भूख लिए
    दूर अंतरिक्ष से दिखते हैं देश
    ऊन के उलझे धागों जैसे
    कोई एक भी सीधी रेखा नहीं दिखती
    बीते दिनों देश की भूख
    रोटी से ज़्यादा पानी की हो गयी है
    पूरी नदी चाहिए इनको
    पर इन दिनों प्यास
    और विकराल हो चला है
    इसे अब नदी से संतुष्टि नहीं
    पूरा समंदर चाहिए
    भूख की स्थूलता
    अब इस पर निर्भर है
    कि ये किसकी भूख है
    भारत की,पाकिस्तान की
    चाइना की या अमेरिका की
    पर भूटान की भूख
    थोड़ी मीठी सी है
    भूख की ज़िद इनदिनों
    आक्टोपसी हो गयी है
    इसलिए कहता हूँ यतीश
    रोटी से ऊपर के सारे भूख
    दरिंदे होते है
    नुक़सान होना तय है
    बोसों की भूख को
    रोटी से नीचे की भूख मानता हूँ मैं
    कई घर जिनमें रोटी नहीं है
    वो बोसों के आलिंगन पर ही तो टिके हैं
    और ज़्यादातर देश ??
    ज़्यादातर देश टिके हैं
    आलिंगन की सांत्वना पर
    रोटी की गंध अपनी नाभि की कस्तूरी में लेकर ।

    ९)ओसारा

    घर का ओसारा
    पहले सड़क के चौराहे तक
    टहल आता था
    पूरे मोहल्ले की ठिठोली
    उसकी जमा पूँजी थी
    ओसारे से गर कोई आवाज़ आती
    तो चार कंधे हर वक़्त तैयार मिलते
    शाम हो या कि रात
    वहाँ पूरा मेला समा जाता था
    हर उम्र का पड़ाव था वह
    कंचे की चहचहाहट
    चिड़िया उड़ और ज़ीरो काटा में
    चहचहाती किलकारियाँ
    पोशंपा के गीत
    या ज़मीन पर अंकित
    स्तूप का गणित
    पिट्ठु फोड़ हो
    या विष-अमृत की होड़
    या फिर ताश और शतरंज में लगाए कहकहे
    सब के सब वहाँ अचिंतन विश्राम करते
    पर आज वहाँ
    हर वक्त दोपहर का साया है
    वो चौराहे तक पसरा हुआ ओसारा
    चढ़ते सूरज में सिमट आया है
    ढलती शाम की पेशानी
    वहाँ अब टहल नहीं पाती
    और न ही उगते सूरज की ताबानी के लिए
    कोई जगह शेष है
    ओसारा अब अपना पैर सिकोड़े
    सर पर चढ़े सूरज को ताक रहा है
    और वो ख़ुद में समा गए
    अपने ही साये से बेइंतहा परेशान है

    १०)चौराहों का शतरंज

    पगडंडी से निकला ही था वह
    कि दोराहे से उसकी मुलाक़ात हो गयी।
    बातों ही बातों में दोराहे ने
    उसे चौराहे तक छोड़ दिया
    चौराहा उसे दोराहे से ज़्यादा दिलचस्प लगा
    उसकी बातों में चार कंधों सा अहसास था
    उस अहसास ने बड़ी आसानी से
    चौराहों के झुंड से उसे मिलवाया
    अब वो चौराहों के मेले में है
    उसकी आँखे ऊपर उठती है
    उसे मेले का प्रतिबिम्ब
    हवा में दिखाई देता है
    हवा में मादक नज़रों से निहारती
    दसमुखी सर्पीली राहें हैं
    बहुत जल्दी में है वह
    और उस पर राहों का नशा सवार है
    नशे की मादकता इतनी कि
    उसने सर्पीली दसमुखी को चुम लिया
    गगनचुंबी चुम्बन का विषाक्त
    अब शरीर से भारी है
    भार लिए आसानी से गिरता है वह
    अब चौराहों पर बिछी बिसात का
    वह ऐसा प्यादा है
    जिससे राजा को मात देने की कला
    छीन ली गयी है…..

    ११)कार से झाँकती ज़िंदगी

    उफ़क पर सूरज डूब रहा है
    कार बेतहाशा दौड़ रही है
    अस्त होने की गति को
    अपनी गति से मिलाना है
    खामख्याली का सुरुर है
    शहर में शाम ढल रही है
    शोर का सैलाब
    घुसपैठ की हद तक
    ज़िद में है.
    कार के शीशे नहीं चढ़ाता मैं
    बल्कि अपने और उफनते सैलाब के बीच
    पर्दा गिराता हूँ
    अंधेरी सड़क पर दौड़ती कार से
    ऐसे ताकता हूँ
    जैसे सर्च लाइट की रोशनी में
    ज़िंदगी राह ढूँढ रही हो
    रीयर व्यू मिरर में झाँकता हूँ
    समय अपने आकार से बड़ा
    और ख़्वाब
    सुबह दिखे सपने से ज़्यादा
    नज़दीक दिखते हैं
    वाइपर चलाने की
    पुरज़ोर कोशिश करता हूँ
    कि भविष्य और स्पष्ट देख सकूँ
    यूँ भी होता है अक्सर
    कि नीले-पीले सारे ख़याल
    ड्राइविंग सीट पर बैठते ही
    कंधे पर फुदक कर बैठ जाते हैं
    उन फुदकती चिड़ियों को
    जब भी पकड़ना चाहता हूँ
    ज़िंदगी की इस गाड़ी को
    ब्रेक लगाना पड़ता है
    १२)देह के मोती
    कभी कभी कुछ पल 
    ऐसे होते है
    जिनमें पलकें खोलना
    समंदर बहाने जैसा होता है
    उन पलों में आप और लम्हे
    एक साथ सैकड़ों नदियों में
    हज़ारों डुबकियाँ लगा रहे होते हैं
    कभी लम्हा सतह से उपर
    और कभी आप ………
    लम्हों और आपके बीच की
    लुक्का -छुप्पी , डुबकियाँ
    सब रूमानी- सब रुहानि
    फिर आप जैसे समंदर पी रहे हो
    और नदियाँ सिमट रहीं हों
    असीमित फैलाव समेटने के लिए
    फिर एक लम्हे में छुपे हुए सारे समंदर
    और उनमें छुपी सैकड़ों नदियाँ
    छोड़ देते है बहने
    लम्हे बिलकुल आज़ाद है अब
    छोड़ देना आज़ाद कर देना
    सुकून की हदों के पार
    ला खड़ा करता है आपको
    आप जैसे खला तक फैल कर
    फिर ज़र्रे में सिमट रहे हो
    बिखरते हर लम्हे ऐसे लगते है
    जैसे आप के अस्तित्व के असंख्य कण
    आपसे निकल कर
    अंतरिक्ष के हर नक्षत्र को टटोलते फिर रहे हैं
    पूरे ब्रह्मांड में आपका फैलाव
    हावी हो रहा हो
    जैसे हर लम्हा आपसे छूटकर
    जाता हो ईश्वर को छूने
    देवत्व का टुकड़ों में हो रहा हो
    स्वाभाविक वापसी
    जगमगाते लम्हे, टिमटिमाते लम्हे
    अंतरिक्ष में असंख्य सितारे
    और उस पल उगते हैं
    देह पर असंख्य नमकीन मोती
    ब्रह्मांड भी कभी धरती पर
    समाता हो एक शरीर के बहाने
    हर ज़र्रा,हर लम्हा,शरीर का हर मोती
    कायनात को रचने की क्षमता रखता है
    और तब उस प्रेम भरे पल में
    रीता लम्हा भी सृष्टि रचने की क्षमता रखता है।

    १३)चीख़ती रूहें

    बस
    शहर की सबसे डरावनी चीज़ है
    जिसके आगे
    किसी का कोई बस नहीं
    शेर के पंजों-सी झपट है उसमें
    चींटियों की कतार-सी चल पाए
    वो हुनर नही
    चीते-सी रफ्तार है
    पर कतार से बाहर
    मदमस्त पागल हाथी सी
    डग भरने लगती है
    अल्हड़ यौवन-सी मदमस्त
    उसे होश कहाँ रहता है
    पूरे शहर को नापती
    बस दौड़ती फिरती रहती हैं
    हर चौराहे पर
    एक चीख़ शिनाख्त हैं इसके नाम
    सड़क पर बिछी कोलतार पर
    खरोंची और खींची हुई है सुर्ख़ लकीरें
    चीख़ टायर से निकली या हलक से
    क्या फ़र्क़ पड़ता है !
    निशान लाश के हैं या टायर के
    क्या फ़र्क़ पड़ता है
    भागते-दौड़ते लोगों में
    सोचने का वक़्त किसके पास है
    और मैं सोचता हूँ सोचने के लिए
    वक़्त ठहर क्यूँ नहीं जाता
    लोग अकेले निकलते है घरों से
    फिर भीड़ में गुम हो जाते है
    पर चीख़ अकेले निकलती है
    और अकेली रह जाती है
    इंतज़ार में हूँ
    एक दिन भीड़ के चीख़ने का
    क्योंकि जब भीड़ चीख़ती है
    तो अनहद-नाद में बदल जाती है
    पता नहीं है कि ये रोज़ का सफ़र
    मौत है या मंज़िल
    मैं तो बस
    लड़खड़ाते उतरते फिसलते
    और फिर दौड़ते
    मौत देखता हूँ बार-बार

    १४)आलय का आला

    (यादों के झरोखे)
    आलय के आले से उड़
    स्मृतियों का उद्भ्रांत पाखी
    अक्सर मेरे कंधे पर बैठ जाता है
    कंधा कई बार झटकता हूँ
    पर पदचिह्नों की सुगबुगाहट
    कंधे से चिपकी रह जाती है
    शाम अंधेरे में धीरे से आती है
    अंधेरे का धीरे धीरे रेंगते आना
    बड़ा अच्छा लगता है मुझे
    सुबह का सपना
    अक्सर भूल जाता हूँ
    दोपहर का सपना
    हमेशा याद रहता है
    अपने बुखार का पारा
    माँ के चेहरे में देखता था कभी
    नज़र की तपिश
    माँ के चेहरे का पीछा करती थी
    नज़र की ऊष्मा में
    चेहरे का उतार चढ़ाव समतल
    और झुर्रियों के बल
    स्वतः ढीले पड़ जाते थे
    फिर मुझे लगता
    माँ ठंडी साँसे ले रही है
    पर उस समय भी माँ ऊनींदी में
    मेरे घुंघराले बालों में उंगली टहलाती थी
    आज भी वो उद्भ्रांत पाखी
    मेरे बालों को छू
    छू मंतर हो जाता है
    सोचता हूँ
    माँ ने सब कुछ तो समझाया था
    ज़िंदगी कैसे जीनी है
    कैसे चढ़नी है
    सबसे कठिन समय की
    सबसे कठिन चढ़ाई
    और कैसे उतरनी भी है
    अखरोटों को बटोरते
    गिलहरी की तरह
    ख़ुद की चढ़ी ऊँचाइयों को
    सहेजते सुरक्षित
    रेंगती चींटियों की एकता
    और जूट पटसन के धागों में
    बंधी कसाई हुई एकता
    कुत्तों और घोड़ों की वफ़ादारी
    उस पर इंसानी ऐयारी
    क्या कुछ तो सिखाया था माँ ने
    शतरंज की बिसात में
    हमेशा हाथी नहीं
    ऊँट भी बनना है
    अंतिम निर्देश था
    सिपाही की तरह
    राजा को मात देना
    मेरे भीतर गहरी सी साँस
    उखड़ आयी ये सोचकर कि
    बीते दिनों को
    वापस बुलाने का तरीक़ा ,माँ
    तुमने कभी नहीं बतलाया

    १५)आज

    वक़्त ने अपनी शक्ल छुपा दी
    और घड़ी ने अपने हाथ
    बर्फ़ पिघलने और
    नदी जमने लगी है
    पगडंडियाँ हो रही हैं विलुप्त
    और रास्ते लगें हैं फैलने
    केंचुओं ने छोड़ दिया है
    मिट्टी का साथ
    और मिट्टी ने किसानों का
    बारिश ने ही
    चुरा लिया है
    मिट्टी से सोंधापन
    गुलाब के काँटे
    अब चुभते नहीं
    आघात करते हैं
    कमल अब सूरज को देख नहीं खिलता
    छुइमुई ने भी शर्माना छोड़ दिया है
    और दीमक
    दीमक अब लोहे को भी चाट जाता है
    नेवला बिल में घुस गया है
    साँप बिल में अब नहीं रहता
    शहर में घुस आया है
    सियार अब आसमान ताके
    आवाज़ नहीं लगाता
    मुँह झुकाए रिरियाता है।
     
    और इंसान ???
    इंसान ने इन सबकी शक्ल चुरा ली है

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