हाल में ही रिलीज़ हुई फ़िल्म ड्रीम गर्ल की समीक्षा लिखी है निवेदिता सिंह ने-
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इस फ़िल्म को देखने से पहले जब भी किसी के मुँह से ड्रीम गर्ल के बारे में सुनती थी तो हेमा मालिनी का खूबसूरत से चेहरा खुद-ब-खुद आँखों के सामने तैर जाता था पर अब शायद ऐसा नहीं होगा क्योंकि यह ड्रीम गर्ल कुछ.. अरे नहीं.. कुछ नहीं बिल्कुल अलग है। यह असलियत में तो बॉय है पर लोगों का दिल इनकी प्यार और रुमानियत भरी बातों में इस कदर घायल हो चुका है कि यह हर उम्र के लोगों के लिए उनके सपनों की सहजादी और अंग्रेजी में बोले तो ड्रीम गर्ल बन चुकी हैं …मेरा मतलब है कि बन चुका है।
फ़िल्म का इंट्रोडक्शन तो हो चुका अब आते हैं फ़िल्म की कहानी पर। फ़िल्म की कहानी का मुख्य क़िरदार है आयुष्मान खुराना जो हर बार ख़ुद को लीक से हटकर किसी नई कहानी के लिए तैयार करते हैं और अपने आप को ही चैलेंज करते हैं। इंडस्ट्री में बहुत कम अभिनेता हैं जिनके भीतर इस तरह की फ़िल्म को करने का साहस है और आयुष्मान का नाम इनमें सबसे ऊपर आता है यह बात इन्होंने विकी डोनर, अंधाधुंध, बधाई हो फ़िल्म करके पहले ही साबित कर दिया है। ड्रीम गर्ल उसी का विस्तार है। यह कहानी है करम की जिसे महिलाओं की आवाज की मिमिक्री करने में महारथ हासिल है और यही कारण है कि बचपन से वह मुहल्ले में होने वाले रामलीला और कृष्णलीला में राम और कृष्ण बनने की बजाय सीता मैया और राधा बनता रहा है पर इस तरह छोटे मोटे नाटकों में काम करके जिंदगी का गुजारा कब तक चलता यह बात उसके पिता जगजीत सिंह (अन्नु कपूर) को लगातार परेशान कर रही थी। वह बेटे से अच्छी नौकरी करके घर की क़िस्त और लोन चुकाने की उम्मीद कर रहे थे। बेटे का गोकुल की गलियों में बेटी बनकर 100- 200 रुपये कमान उन्हें ज़रा भी रास नहीं आ रहा था पर रेगुलर नौकरी न मिलने तक यह काम उसे जारी रखना था। आख़िर आर्थिक मजबूरी और जल्दी से जल्दी रेगुलर नौकरी की तलाश करम को कॉल सेंटर तक खींच लाई जहाँ ग्राहकों से प्रेम और सेक्स भरी बातें करके उनके फ़ोन का बिल बढ़ाने के एवज़ में उसे अच्छी सैलरी ऑफर की और इस तरह अलग अलग लड़कियों की आवाज़ निकालने में माहिर एक नौजवान लड़का पूजा बन गया पर यह बात उसने न तो अपने पिता को बताई और न ही अपनी प्रेमिका (नुसरत भरुचा) को। उसका हुनर और उसकी मेहनत रंग लाई और घर की क़िस्त और लोन चुकाने के साथ ही साथ वह न सिर्फ़ पुरुषों बल्कि प्यार में धोखा खायी लड़की के दिल में भी राज करने लगा। ज़िंदगी की समस्याओं से परेशान हर इंसान उसमें अपना सच्चा साथी ढूँढने लगा। देखते ही देखते बूढ़े से लेकर आजीवन ब्रह्मचारी रहने का संकल्प लेने वाला जवान और जवानी की दहलीज़ पर कदम रखने वाला किशोर बालक सबके लिए वह ड्रीम गर्ल बन गया पर हर झूठ का कभी न कभी अंत होता ही है। दोहरी जिंदगी जीते जीते और लोगों के दिल का ड्रीम गर्ल बनते बनते उसेअपने ड्रीम गर्ल से दूूर होने की नौबत आ जाती है। कैसे वह इस मकड़जाल से खुद को छुटकारा दिलाता है और अपनी प्रेमिका को वापस पाता है यह जानने के लिए आपको फ़िल्म देखनी पड़ेगी।
राज शाण्डिल्य के निर्देशन में और एक अलग विषय पर बनी यह एक इंटरटेनिंग फ़िल्म है पर हँसाते हँसाते आखिर में यह संदेश भी देने की कोशिश करती है कि हम सब सबके साथ होते हुए भी कितने अकेले और तन्हा हैं। हमारी जिंदगी में कोई एक भी ऐसा इंसान नहीं जिससे हम अपने मन की बात कर सकें। फ़िल्म सोशल नेटवर्किंग साइट्स पर भी एक सवाल उठाती है कि आभासी दुनिया के चक्कर में वास्तविक दुनिया से कटते जा रहे हैं हम सब कहीं न कहीं। फ़िल्म के सभी पात्र ठीक अभिनय किया है पर अन्नू कपूर एक एकल पिता और अपनी भूमिका के साथ पूरा न्याय करते हैं पर फ़िल्म के असली हीरो तो आयुष्मान ही हैं। मैं इस अलग विषय पर बनी फिल्म में एक के बाद एक जोरदार कॉमेडी के पंच और हँसा हँसा कर पेट में दर्द करा देनी वाली फिल्म को 5 में से 3.5 रेटिंग दूँगी क्योंकि मेरा मानना है कि फ़िल्म का सेकंड हाफ और भी अच्छा हो सकता था।
निवेदिता सिंह

