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तरुण भटनागर के उपन्यास ‘बेदावा’ का एक अंश

तरुण भटनागर के लेखन से हम सब अच्छी तरह परिचित रहे हैं। यह उनके नए उपन्यास ‘बेदावा’ का अंश है। यह उपन्यास उनके अपने लेखन में भी एक भिन्न प्रकृति का उपन्यास है। राजकमल से प्रकाशित इस उपन्यास का आप अंश पढ़िए- मॉडरेटर

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 ख़ामोशियों की बेहयाई

तो इश्क़ की पहली आहट इस सुकून के साथ आई थी कि सुधीर देख नहीं सकता।

तब पता नहीं था कि सुकून बड़ी कुत्ती चीज़ है। मालूम न था कि किन्हीं के दरमियान सुकून का होना कब गिरफ़्त में ले-ले पता नहीं चल सकता। पता चलने में वक़्त लगता है। पर तब तक कई बार आप सुकून के सामने बेझिझक कपड़े उतार देते हैं। अपर्णा को भी तब कहाँ पता था कि सुकून के दिल में तसल्ली धड़कती है, उसकी रगों में एक किस्म की बेगुनाही दौड़ती है। उसे पता न था कि सुकून की आँखों में बेशर्मी होती है, उसके दिमाग में कोई अधूरा-सा ख़याल होता है। वे दोनों बेख़बर थे कि सुकून की जबान के नीचे लजीज़ अल्फाजों का जहर होता है, उसकी साँसों में कोई तडप होती है। पता न था, पता चलने में वक़्त था कि सकन का चेहरा देखो तो नहीं लगता कि इसकी परतों के नीचे कहीं दगाबाजी भी होगी कि वह बेवकूफ़ बनाएगा, हर लेगा, अपनी मुट्ठी में दबोच लेगा सामने वाले का दिल, कुछ बहुत हसीन लड़कियों के सपने उनकी नींद से उठकर सुकून के सपनों में आ जाते हैं और उन्हें इसका इल्म भी नहीं होता…।

अपर्णा को ‘सुकून’ था कि सुधीर देख नहीं सकता। सुधीर बेफ़िक्र था कि भला कभी कोई लड़की उसे भी चाह सकती है?

अपर्णा देखने वाले से रश्क खाती थी। घूरने वाले को देखकर झेंप जाती थी। आँखों से ख़ौफ़ का ख़याल आता-जाता रहता था। सुधीर के न देख पाने से वह ख़ुश थी। मसरूर थी।

सुधीर हर चीज़ को छूकर महसूस करता था। उसे छूने में कोई झिझक न होती थी। वह छूने को ख़्वाहिशमन्द रहता। छू लेने के लिए एक बेख़ौफ़-सी आरजू होती उसके मन में। उँगलियाँ सरकाकर महसूस करना उसकी फ़ितरत थी। दुनिया उसके छूने को गुनाह न मानती थी। वह छुए न तो क्या करे भला? वह बड़ी मोहब्बत से हर चीज़ के जिस्म पर उँगलियाँ फिराता था। वह नाबीना था, उसके लम्स को बदचलनी जानने की कोई वजह न थी।

अपर्णा औरत थी। वह घूरने और टकटकी लगाने वालों से रश्क खाती थी। पर उँगलियों से डरने की कोई वजह न हुई थी अब तक। छूने में गुनाह था। बेशक। पर जो शख्स देख न पाता हो, वह छुए न तो क्या करे। वह तो छुएगा ही। क्या किया जा सकता है भला?

…इस तरह दोनों के दरमियान तसल्ली की काहिलियत थी, फुर्सत की कमीनगी थी, रंग, मोम, आवाज़ और शमा की फिसलन भरी दगाबाज़ियाँ भी…और कोई भी बाख़बर न था, कोई इरादा, कोई वजह, कोई मालुमात न थे कि ख़बरदार हो लिया जाए…

अपर्णा के मन में कहीं कोई बेकरारी थी, कोई गहराती-सी तकलीफ़, कोई इनायत…कि सुधीर देख नहीं सकता।

सुधीर को ख़ुद के न देख पाने का ख़याल ही न था। वह इतना क़ाबिल और मशगूल था कि उसे ख़याल ही न आता कि किसी के मन में उसे लेकर कोई तकलीफ़ है, कोई रहमदिली है, कोई तड़प है…।

सुधीर थोड़ा बेताब रहता पता नहीं क्या जानने तो आती है यह लड़की?

अपर्णा उसकी हर हरकत को गौर से देखती, पता नहीं कैसे यह हर काम कर पाता है? अपर्णा उसे कम से कम तकलीफ़ देना चाहती। जब चाय पीने की इच्छा होती वह किचन से चाय बनाकर ले आती। उसके घर में, उसके किचन में चाय बनाते उसे कुछ भी अटपटा न लगता। बस एक ही बात उसके जेहन में होती कि वह एक ऐसे शख्स की मदद कर रही है जो नाबीना है। जिसकी मदद करना हर किसी का फ़र्ज़ है। एक बार तो इस डर से कि कहीं वह बाथरूम में गिर न पड़े उसके नहाने का पानी तक बाल्टी में रख आई। उसे ज़रा भी ख़याल न आया कि इन सब बातों के कुछ और भी मतलब होते हैं। हद तो तब हो गई जब एक दिन जाने से पहले अपर्णा ने सुधीर के कपड़ों को दोहर कर रैक में रख दिया। उसके जाने के बाद सुधीर ने जब उन कपड़ों को पहना तो उसे उन कपड़ों में से अपर्णा की खुशबू आई।

अपर्णा को लगता कि वह एक बिना आँख वाले की मदद कर रही है। पर सुधीर की तो दुनिया ही ऐसी थी। बिना आँखों के भी बेहद खुशगवार। इस बात का अपर्णा को पता न चलना था।

अपर्णा खुलकर उठती-बैठती, ठट्ठा लगाकर ज़ोर-ज़ोर से हँसती, खुलकर चुप होती, बेझिझक सुधीर को घूरती, बेखौफ़ ताक-झाँक करती, बेझिझक डूबती ख़यालों में, बेपनाह सजती-सँवरती, लकदक मुस्कुराती, अपनी तरह से बैठती, ठीक अपने अन्दाज़ में चलती, बेतकल्लुफ-सी कभी कुर्सी पर कभी सुधीर के बिस्तर पर…उसे लगता उसे कोई देख नहीं रहा। पर उसकी कुछ आवाजें, ख़ुशबू, फुसफुसाहट, कोई खनक, कोई टिकटिकाहट…सुधीर तक पहुँच जाती। सुधीर को लगता अपर्णा को उसका साथ बहुत भाता है। अपर्णा की आवाज़ों से उसका मन खिल उठता। उसकी खनक, उसकी मुस्कुराहट की कोई महीन-सी आवाज़, उसकी चाल की बेपरवाही को बयाँ करती कोई सदा, कोई बेतकल्लुफी का अहसास… सुधीर के दिल में उतरता रहता।

‘कहते हैं इश्क़ अकेली ऐसी शै है, जिसके आने का ठीक-ठीक पता नहीं चलता…’ अपर्णा को अदीब के उसी नाटक की लाइनें अक्सर याद आती जो वह उसे अपनी भरी-पूरी तबीयत से सुनाया करता था।

वह नाटक की प्रैक्टिस कॉलेज के पार्क में करता था। अपर्णा अपनी सहेलियों के साथ उसके नाटक की प्रैक्टिस देखती। उनके एक नाटक में इश्क़ पर बहुत-सी बातें थीं। वे सब बातें अदीब ने रट रखी थीं। अदीब सीधा खड़ा होता जमीन की ओर सिर झुकाए और धीरे-धीरे अपना सिर ऊपर करता कहता—’कभी बेजान धरती की कोख से बीजों की सोहबत में अँखुआकर फूटता है इश्क’ स्टेज पर इस सीन में उसके ऊपर पड़ती रोशनी धीरे-धीरे बढ़ती जाती। उसका ऊपर उठता चेहरा आसमान की ओर तक उठ जाता, गर्दन की नसें खिंच जातीं और दायाँ हाथ छाती

पर रखा होता, वह थोड़ी ऊँची-सी आवाज़ में कहता—’इश्क्क जो कभी यकायक किसी अकस्मात् टूटते तारे की तरह से गुजरता जाता है अपनी रोशनी के गुबार के साथ आकाश के बियाबान से।’ थियेटर में उसकी एक सहेली उससे फुसफुसाकर पूछती—इस बात का क्या मतलब हुआ? वह उसे चुपचाप सुनने को कहती। एक दूसरा लड़का जिसका नाम गणपति था, दर्शकों से मुखातिब होकर ज़ोर-ज़ोर से कह रहा होता—’इश्क़ जो जहर होकर आता है उतरने छूट दर घूट, कभी पलता रहता है क़ब्र में कंकाल होती किसी लाश के साथ-साथ…।’ मंच पर डायलॉग के साथ-साथ बढ़ती आवाजें धीरे-धीरे मद्धिम पड़ती जाती हैं और मुट्ठियाँ भींच थोड़ा सिर झुका तपते चेहरे और काँपते होंठों से धीमे से लगातार बढ़ती आवाज़ में अदीब कहता जाता—’कहाँ पता चलता है कि जो झुल गया फाँसी पर वह मिट्टी की मोहब्बत में था, कितनी मुश्किल से दीखती है उस इश्क की लकीर जिसके जुनून में कोई तोड़ता है अपना दम जेल की सलाखों के पीछे’-तीन ऐक्टर पीछे चले जाते और एक लड़की जिसका नाम लावण्या था, धीरे-धीरे सामने आती, गहरी साँस भरकर कहती ‘…कि जंगलों में अपने डंक में जहर लिये बिच्छू की तरह रेंगता है इश्क्क…’ फिर बाईं ओर मुड़कर दूसरी ओर चेहरा कर कहती जाती—’इश्क, इश्क…हवा में तैरती वह भाप है जो अगर सुबह होती तो किसी पत्ते पर ओस का मोती होता’-अपर्णा की सहेली जुहेरा को यह डायलॉग बड़ा अच्छा लगता इश्क़…हवा में तैरती वह भाप है जो अगर सुबह होती तो किसी पत्ते पर ओस का मोती होता।

अदीब फिर अपने संवाद कहता। सबसे पीछे, उलटा खड़ा, पीछे लटकते काले कपड़े की ओर मुख़ातिब होकर और कोरस की तरह कुछ और ऐक्टर उसके कहे डायलॉग को दोहराते—’मुफ़लिस मुल्कों की कब्रों पर दूर के अनाम लोगों के आँसुओं की तरह फूटता रहा जो इश्क्क…भीतर पल रहे गुस्से और ज़िद के रंगों के मिलने से बना जो इश्क…इश्क्क पसीना, इश्क खून, इश्क जिस्म पर घावों की कोई मनचाही इबारत…’ स्टेज पर अँधेरा छा जाता और फिर कुछ मशालें दिखाई देतीं—’कैलेंडर की तारीखों पर लाल गोलों-सा इश्क़, इश्क…इश्क मौत का मज़ा…’-अदीब चीख़ता-सा कहता, मानो कोई नज़्म पढ़ रहा हो—’इश्क, इश्क्क मौत का मज़ा, दीवारों पर नारों-सा गुदा, हाथ की भिंचती मुट्ठी-सा कितना मदमस्त यह इश्क, इश्क…।’

अपर्णा और उसकी सहेलियाँ अदीब की रिहर्सल देखकर खुश हो जाती, खड़ी होकर ताली बजाती। अपर्णा उससे बाद में कह देती कि यह इश्क की बात उसे समझ न आई। भला यह कैसा इश्क़? वह मुस्कुराता, फिर एकदम चुप हो जाता। अपर्णा की आँखों को पल भर को देखता। फिर कहता कि वह समझाएगा उसे कि इसका क्या मतलब है। आखिर वे जवान हैं, पढ़ाकू हैं उनसे बेहतर इश्क को कौन समझ पाएगा? पर जैसे इतने के बावजूद भी उसे समझा पाना कठिन हो। उसके नाटक में बहुत कम लोग आते थे। उनका एक ग्रुप था। एक नाटक मंडली जो इस तरह के नाटक करती रहती। कॉलेज में बहुत से लोग अदीब को लेकर कुछ अजीब सी बातें बताते, कहते कि वह कोई ठीक लड़का नहीं है। पर वह उससे प्यार करती थी, उसे दूसरों की बातें ग़लत लगती… । इश्क हो तो माशूक के खिलाफ़ बातें ग़लत ही होती हैं एक बार किसी ने उससे कहा था इश्क में माशूक के ख़िलाफ़ किसी बात की कोई कैफियत नहीं होती। कोई ऐसी जगह नहीं होती जहाँ उसके ख़िलाफ़ कहे लफ़्ज रुक सकें।

अपर्णा और सुधीर देर तक साथ-साथ बैठे रहते। बातें करते। मोम पिघलाते, साँचे गढ़ते, डिजाइन की तरतीब पर बात करते, कास्ट तैयार करते, एक-दूसरे की उँगलियों पर अपनी उँगलियाँ रखे कास्ट की गीली मिट्टी को सही तरह से जमाते, मोम की धुआँ छोड़ती पतली धार को कास्ट में डालते, बूंद-बूंद टपकाते, पिघलते मोम में रंग घोलते, रोशनी और अँधेरों की दुनिया के बीच रंगों पर बात करते, किसी जम चुकी मोम का कास्ट तोड़ते, किसी मोमबत्ती के जिस्म पर अपनी उँगलियाँ फिराते…।

सुधीर अपर्णा को शान्त होकर सुनने को कुछ कहता। अपर्णा को कुछ भी सुनाई न देता। अपर्णा रोशनी के लिए खिडकी के पल्ले खोल देती। सुधीर हँस पड़ता।

गीली मिट्टी में लिथडी उन दोनों की उँगलियाँ कास्ट की सतह पर एक-दूसरे के ऊपर बेतरतीबी से फिसलतीं। कास्ट की गीली मदहोश मिट्टी में सनी उनकी उँगलियाँ इस तरह फिसलती मानो एक-दूसरे में समा जाएँगी। उँगलियों की गर्मी से कास्ट की लिपटती-फिसलती मिट्टी गुनगुनी-सी तप्त हो जाती।

अपर्णा सुधीर को गौर से देखती, बड़ी फुर्सत और तबीयत से। सुधीर को पता न चलता था कि वह देख रही है। अपर्णा जानती थी कि वह देख नहीं सकता। नाबीना है। सुधीर को पता न था कि चाहने वाला जब गौर से देखता है तब क्या होता है।

दोनों की बेपरवाहियों के अपने-अपने किस्से थे। दोनों की दुनिया के दरवाजे एक के बाद एक खुल रहे थे। कोई तनहाई बेईमान हो रही थी। ख़ामोशियों की बेहयाई खुलकर सामने आ रही थी। देखने और देख न सकने के बीच एक रास्ता था दोनों तरफ़ न मालूम कितनी दूरियों तक पसरा हुआ। वे तैर आए थे और पता नहीं था कि यह सबसे बड़ा दरिया है, बहरे-आज़म है। बहरे-आज़म को कोई पार नहीं कर पाया, जो मुकदर है वह थककर उसमें डूबना ही है।

‘तुमने मोमबत्तियाँ बनाना कैसे शुरू किया?’ ‘बहुत लम्बा किस्सा है।’ ‘बताओ…।’ ‘आज तक किसी को नहीं बताया।’ ‘क्यों?’ “उसमें कुछ ऐसा है कि बताया नहीं जा सकता।’ ‘अगर मैं वादा करूँ कि किसी को न कहँगी तो।’ ‘तब भी नहीं।’ ‘अगर मैं वादा करूँ कि न कहूँगी एकदम न कहँगी, क्या तब भी नहीं?’

‘मुझे पता है, तुम वादाखिलाफ़ी न करोगी।’

 ‘पर फिर भी नहीं।’

‘हाँ।’

‘ऐसा क्या है?’ ‘ऐसा ही है।’ ‘ऐसा कुछ नहीं होता। वादा पक्का हो तो फिर बता ही देना चाहिए।’

‘ये तो ज़िद है। न बताने की जिद।’

अपर्णा का इस तरह से कुरेदना सुधीर को अच्छा लगा। कुरेदने पर उसे ख़याल आया कि कुरेदने से घाव की पपड़ी उतरती है, पर कुरेदने से शीशा भी तो साफ़ होता है। यह ठीक है कि कुरेदकर अंगारों में दफ़न राख को उधेड़ा जा सकता है, पर कुरेदकर ही तो नाखून साफ़ किए जाते हैं नेलपॉलिश के नये रंगों के लिए…कुरेदना उकसाता है, कुरेदना कह देने का जज़्बा देता है…ऐसा उसे लगा।

‘बचपन में मेरी माँ कहती थी कि मैं अलहदा हूँ। इस दुनिया में मेरे होने के खास मतलब हैं।’

‘वो सच कहती थीं। ‘लोग सूरदास को अन्धा नहीं मान पाते, जानती हो क्यों?’ ‘नहीं पता।’

“वे शक करते हैं कि अगर वे अन्धे थे तो अपनी कविताओं में इतने जीवंत अक्स कैसे खींच पाए? कैसे लिख पाए वह सब जिसे पढ़कर लगता है कि बिना देखे नहीं लिखा जा सकता था।’

‘हाँ, ये बात तो है। मैंने सूरदास को पढ़ा है पर कभी इस तरह नहीं सोचा।’ ‘लोग अन्धों को अन्धा नहीं मान पाते हैं।’ “ऐसा तुम्हें लगता है।’

‘यक़ीनन। इसीलिए तो सूरदास की बात कही। लोग कहाँ मान पाते हैं कि वे नाबीना थे। बचपन से नाबीना। तुम फिर से पढ़ के देखो। यह लगेगा कि अगर नाबीना थे तो ऐसा कैसे लिख पाए, मानो सब कुछ देख रहे हों।’

‘बात तो सही है। ‘माँ एक बात और कहती थी। एक अजीब सी बात।’ ‘क्या?’

“वह कहती कि जिन्होंने भी दुनिया को चौंकाया वे वे लोग थे जो देख नहीं पाए, या तो पूरी तरह से नहीं देख पाए, यानी नाबीना थे या उस तरह से नहीं देख पाए जिस तरह से देखा जाता है, यानी उनका देखना ठीक-ठीक वैसा न था जिस तरह आँखों वाले देखते हैं।’

‘यह एक मुख़्तलिफ़-सी बात है।’

‘मुझे इस बात का मतलब बहुत दिनों बाद समझ आया। जब मैं बड़ा हुआ तब। पर तब माँ को गुजरे अरसा बीत चुका था। माँ अगर जिन्दा होती तो मैं माँ को बताता कि मुझे उसकी बात का मतलब समझ आ गया।’

बाहर बारिश शुरू हो गई थी। अपर्णा ने अधगीले कास्ट पर एक सूखा कपड़ा डाल दिया था। हवा में उतरती नमी थी, जिस्म में रमती एक फुरफुराती-सी ठंडक। मिट्टी की गन्ध को जज्ब किए पानी की एक अलहदा-सी खुशबू तैर रही थी।

चींटियों की एक लाइन बाथरूम की देहरी के किनारे-किनारे मुँह में अंडे दबाए सरक रही थी, ख़ुद में डूबी हुई, मगन, बेचैन और हड़बड़ाती-सी।

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