सुंदरता का दारुण दुख: इज लव एनफ सर?

आजकल फ़िल्म देखने के इतने माध्यम हो गए हैं कि कई बार अच्छी फ़िल्मों का पता ही नहीं चलता। ‘इज लव एनफ सर’ भी एक ऐसी ही फ़िल्म है। नेटफ़्लिक्स पर मौजूद इस फ़िल्म के बारे में मुझे पता भी नहीं चला होता अगर सुदीप्ति की लिखी यह टीप नहीं पढ़ी होती। अगर सिनेमा एक कला है तो सिनेमा पर लिखना भी एक कला है, उसके आकर्षण और प्रभाव को दिखने की कला। सुदीप्ति को दोनों में महारत है। सिनेमा पर उनका लिखा पढ़ना हमेशा बहुत सुखद होता है। आप यह टिप्पणी पढ़िए-

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वीरेन  दा की काव्य पंक्ति है –

“प्रेम तुझे छोड़ेगा नहीं!

वह तुझे खुश और तबाह करेगा”

बरसों यह दिल में उसी तरह धँसी रही जैसे कि सुंदरता का दारुण दुख। ऐसी ही एक फ़िल्म है- इज़ लव एनफ सर?

आह! यह फिल्म क्या है स्क्रीन पर लिखी एक उदास कविता है। सफर की पृष्ठभूमि में चलता हुआ एक शोक गीत है। कभी-कभी हम डरते हैं शोक से और उदास करने वाली चीजों को नहीं देखना चाहते हैं, जबकि कभी-कभी पहले ही क्षण से पता होता है यह चीज हमें बहुत उदास कर देगी तब भी उसमें डूब जाते हैं।

पता होता है कि यह फिल्म/  यह कहानी / यह कविता / यह गीत सुनकर हम देर तक खारे पानी की झील में डूब जाएंगे तब भी हम उसे जरूर देखते हैं। संभवत: त्रासदी की अपनी पुकार होती है, उदासी का अपना खिंचाव, दुख का अलग ही सौंदर्य,  असंभाव्य  का दुर्निवार आकर्षण।

संभवतः यही इस फ़िल्म को देखते जाने के मूल में भी रहा। फिल्म देखे जाने के दौरान आपको लगता है कि ऐसा क्यों नहीं हो सकता और देखने के बाद आप अपनी भावुकता में सोचते हैं कि ऐसा हो तो सकता है। लेकिन, फिल्म में हुई पिता-पुत्र के बीच की एक बातचीत आपके जेहन में अटक जाती है।

पुत्र कहता है कि वह वापस न्यूयॉर्क जाना चाहता है।

पिता उससे पूछता है-‘क्या तुम अपनी नौकरानी के साथ सो रहे हो?

इसपर पुत्र कहता है, ‘नहीं! पर मैं उसके प्रेम में हूं।’

पिता जवाब देता है, ‘तब तो अच्छा है चले जाओ।’

जितना बार भी आप अपने-आप से जूझते रहें कि ऐसा क्यों नहीं हो सकता है उतनी बार यही उत्तर आता है।

अगर ऐसा हो तो तुम जितनी दूर जा सकते हो चले ही जाओ। सर कहो या फिर सर की जगह नाम ले लो इतने में क्या पहाड़ और खाई जैसी दूरी पट सकती है?

देखते हुए लगता है कि ऐसे में  अव्वल तो प्रेम होना संभव ही नहीं था। सामाजिक संरचना में जो कुछ पावर इक्वेशन के तहत देह शोषण का रूप हो सकता था उसे इतनी खूबसूरती और इतनी उदासी से प्रेम में बदल देने की कला ही तो इस फिल्म को दृश्य कविता में बदल देता है। प्रेम क्या रूप रंग, सामाजिक स्तर, आर्थिक वर्गों मात्र से तय होता है? अधिकतर पर सदा नहीं।

रत्ना अपनी बहन से कहती है न- रणबीर हो ना हो पर भला मानुष है। प्रेम नाम का दानव यह भले मानुष को ही तो परेशान करता है।

मैंने बिल्कुल ही ध्यान नहीं दिया कि इस फिल्म का निर्देशक कौन है या कि यह फिल्म बाहर की किसी वेब सीरीज से प्रभावित है या नहीं लेकिन भारतीय सामाजिक बुनावट में स्त्री-पुरुष के बीच जो सत्ता का समीकरण है; मालिक और नौकर के बीच में जो सत्ता का समीकरण है; उसमें इस बारीकी से कोमलता के भाव का तंतु बुन देना आसान नहीं था।

रत्ना एक अलग संदर्भ में कहती है कि क्या हम जैसे लोगों को सपने देखना उचित नहीं? क्या हमारे सपने पूरे नहीं हो सकते? वह इसे प्रेम के संदर्भ में नहीं कहती है। वह तो आत्मनिर्भरता के संदर्भ में कहती है। लेकिन प्रेम के संदर्भ में भी यह बात उतनी ही सच्ची है।

बॉलीवुड का हिंदी सिनेमा प्रेम के मामले में इतना परिपक्व कम ही होता है। ज्यादातर वह मूर्खतापूर्ण प्रेम कहानियां दिखाता है। उसकी अधिकांश कहानियों के मूल में प्रेम होता तो है लेकिन वह वास्तविक जीवन से कटा हुआ और  सिर्फ फिल्मी लगता है। कई बार तो वह प्रेम की जगह इवेंट, शॉपिंग और पर्यटन की तरह लगता है। उसमें इस तरह के कॉम्प्लेक्स सामाजिक संरचना में परिपक्व प्रेम को दिखा पाना क्या आसान है?

इस फिल्म पर बहुत अधिक बात की जा सकती है लेकिन मैं सिर्फ दो दृश्यों की बात करूंगी जो नींद में भी मुझे हांट कर रहे थे। पहला दृश्य जब अश्विन रत्ना के लिए सिलाई मशीन मंगाता है। जितनी देर वह सिलाई मशीन के डब्बे को खोल रही होती है उतनी देर तक वह जिस लगाव, आत्मीयता और लगन से उसके चेहरे को एकटक अपलक निहार रहा होता है वह अद्भुत है। प्रेम में मुग्ध  होकर कैसे देखा जाता है इसे देखना हो तो आप उस दृश्य को देख सकते हैं। और दूसरा दृश्य जिसमें अश्विन रत्ना की बाजू पकड़ते हुए  भर्राए हुए कंठ से उसका नाम पुकारता है। पुरुष के ऐसे भर्राए कंठ का अर्थ स्त्री के लिए क्या अबूझ होता है? यहाँ बांह पकड़ने और आवाज के भर्रा जाने में ही वह बात है जिससे प्रेम की कोमलता और यह रागात्मक आवेग स्पष्ट होता है वरना वहाँ शक्तिशाली और कमजोर के बीच के समीकरण के अलावा कुछ नहीं होता। और सच पूछिए तो मैं बहुत अधिक शुक्रगुजार हूं निर्देशक और कहानीकार की कि उन्होंने इस दृश्य में एक आवेगपूर्ण चुम्बन से आगे बढ़ उस रागात्मक आवेश की कोई स्वाभाविक परिणति सेक्स दृश्य में नहीं दिखाई। नहीं तो फ़िल्म के कविता होने का तिलिस्म टूट जाता। इस दृश्य का मोह-पाश टूटता है टेलीफोन की कर्कश ध्वनि से और फिर दर्शक भी मानो चौंक उठते हैं।

‘इस शाम को भूल जाओ सर’- कहती हुई रत्ना हमें व्यवहारिक नहीं विवश लगती है। ‘क्या फीलिंग्स नहीं है तुम्हारे भीतर? क्या तुमको महसूस नहीं होता कुछ’- का उच्छवास करता अश्विन हमें प्रेम के अभागेपन से कठोर होता प्रतीत होता है और रत्ना? उसे तो जीवन के सपनों का हक़ नहीं तो प्रेम तो अलग बात है।

प्रेम मानो किसी असंभव की आकांक्षा हो जिसमें मन को निचोड़ कर भी रसहीन ही रहना है।

जाने और और कितानी बातें हैं इस खूबसूरत फ़िल्म के बारे में पर मैं कह नहीं पा सकती। दुहराव से भरे दृश्यों का सौंदर्य और साधारण की असाधारणता से गुजरना हो तो देख लीजिए नेटफ्लिक्स पर इसे।

इज़_लव_एनफ_सर? एक ऐसी फ़िल्म है जिसे मैंने फेसबुक पर कई लोगों खासकर आशुतोष जी के लिखने के बाद देखा। उन सब का शुक्रिया एक अच्छी फिल्म के प्रति जिज्ञासा बढ़ाने के लिए।सर्दियों के घने कुहासे की गंध की तरह बस गई यह फ़िल्म मेरे मानस पर

इज़ लव एनफ सर?

इस फ़िल्म को मैंने दूसरे दिन दुबारा देखा। पहले दिन देखने के साथ बनी रही कसक से पीछा छुड़ाने को। वैसे बड़े दिनों बाद ऐसा हुआ कि कोई फ़िल्म अगले ही दिन दुबारा देखी। इस दफे प्रेम से ज्यादा रत्ना के किरदार पर नज़र रही।

साहचर्य जनित प्रेम कहिए या फिर चुप्पी और परवाह से भरी देखभाल कि आश्विन के मन में राग का असंभव फूल खिल उठता है लेकिन रत्ना? क्या उसे प्रेम हुआ? ठीक उसी तरह जैसे अश्विन को हुआ?

प्रेम तो क्या उसकी कल्पना भी उसके लिए असंभव थी। क्या प्रेम का फूल सबके मन के आकाश पर असंभव आकांक्षाओं को पार कर लेने की तरह खिलता है? रत्ना जिस जगह से थी क्या उस जगह से प्रेम की आकांक्षा कर सकती थी?

कायदे से देखिए तो अपनी आर्थिक आज़ादी के लिए वह जिस पर निर्भर थी उसकी देखभाल पूरी ईमानदारी से कर रही थी। वह अपना काम कर रही थी और करते हुए उसे सुरक्षा महसूस होती थी। सर छत और चारदीवारी से अधिक उस व्यक्ति से कुछ पाने की आशा ही मूर्खतापूर्ण थी। सच मानिए तो आश्विन के व्यवहार में आए हर परिवर्तन से वह आने वाले झंझावत के लिए कांप रही है।

याद कीजिए जब वह आश्विन के कमरे से एक नई मैडम को सुबह-सुबह जाते देखती है। क्या वह भीतर के प्रेम के कारण झुंझलाई और मुरझाई है? पहली बार जब आश्विन जब उसे उसकी बहन की शादी में फोन करता है। फोन पाकर उत्कंठा से भरती तो है पर अपने को याद किए जाने का औचित्य नहीं समझ या नासमझ बन पूछती है कोई काम था सर? बात करते हुए अनायास उसका हाथ पल्लू को ठीक करने लगता है। हैंगर उठा कर टाँगते अश्विन की भंगिमा हमें उसके मन का हाल बता देती है पर यह रत्ना को तो नहीं पता।

आश्विन जब उसके लिए सिलाई मशीन मंगाता है तब भी वह काँपते हाथों से बस इसी डर को संभालती है कि इसका क्या अर्थ है। उसके थैंक यू कहने में आभार से ज्यादा आशंका है।

उसे सच में प्यार नहीं होता। वह मान के चलती है प्यार संभव ही नहीं। वह इसी आशंका से डरती है कि यह सब उसके साथ ‘सोने के लिए’ किया जा रहा है। जिस समीकरण को वह जी रही है उसमें प्यार क्या होता है? अहसास क्या होते हैं? होते भी हों तो उनको महसूस करने की छूट कौन देता है? झुंझलाया अश्विन जब कहता है क्या यह सब मैं तुम्हारे साथ सोने के लिए कर रहा हूँ? उसका साधारण उत्तर होता है तो और किसलिए? और किसलिए कर सकता है या उसके लिए कल्पनातीत है।

जब दोस्त विकी घर आकर कहता है कि रत्ना हम आपकी वजह से घर आ गए तब उस समय की रत्ना की भंगिमा देखिए। डरी सहमी, सकुचाई। आपने बता तो नहीं दिया? आप अगर मालिक हैं, आपने खुद सेक्सुअल फेवर लेने जैसी हरकत की और अगले दिन आप किसी दोस्त को लेकर आ गए तो बिल्कुल ही कमज़ोर स्थिति में खड़ी स्त्री और क्या सोचेगी? डर और आशंका में वह सिकुड़ कर खड़ी है। अश्विन जिस मानसिक बुनावट का है उसमें वह सोच या समझ भी नहीं सकता है उसका डर। हल्के से हाथ छूकर आश्वासन जब देता है तब भी वह सहमी ही रहती है।

आश्विन जब उसके अपने अहसास जानना चाहता है तो वह यही कह पाती है, सब बिगड़ गया। सब बिगड़ गया माने जीवन के कठोर रेतीली यथार्थ भूमि में जिसे कुछ क्षणों का यह शीतल ठौर मिला वह अब सब छोड़ना पड़ेगा। प्रेम संभव ही नहीं उसके अपने मन में भी। क्या हो सकता है उसे अपने मालिक से प्रेम जिसके लिए रहेगी तो वह सर्वेंट ही?

पर प्रेम क्या संभव असंभव भर देखता है? अपना सामान पैक करती फूट फूट कर रोती रत्ना में क्या बस आसरे के छिन जाने का गम पिघल रहा है? हमें पता चलता है कि वह उसके भीतर पसर चुका है। लेकिन उसे अभी नहीं पता। जाने के उस एक क्षण में जब वह आगे बढ़कर भी गले नहीं मिलती; जब वह खोले हुए दरवाजे को बंद करने के लिए हाथ बढ़ाती है पर नज़रें रोक लेती है उस एक क्षण में पता होता है कि प्रेम की कसमसाहट ही उसे आश्विन को देखने नहीं देती। फिर क्या जाना संभव होता?

शायद बंद ताले को न पाती तो उस दिन भी अपने सर को शुक्रिया कह लौट जाती रत्ना जिस क्षण उसने उसे आश्विन पुकारा उस क्षण उसे पता था कि  उसे नहीं पाकर उसे जो महसूस हुआ उसे ही प्रेम कहते हैं।

प्रेम की असंभव कल्पना से परे उस प्रेम को अपने हृदय में महसूस कर सकने की यात्रा भी है सर। शुक्रिया तिलोत्तमा शोम इस चरित्र को जीने के लिए।

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