वक्त लिखता रहा चेहरे पर हर पल का हिसाब

लेखिका अनु सिंह चौधरी की की दूसरी किताब ‘मम्मा की डायरी’ हिंदी में अपने ढंग की पहली किताब है. रिश्तों को, जीवन को, समकालीन जद्दोजहद को समझने  के लिहाज से एक मुकम्मल किताब. हिन्दयुग्म प्रकाशन से शीघ्र प्रकाश्य इस किताब की प्रीबुकिंग चालू है. फिलहाल इसका एक छोटा सा अंश, जो पिता-पुत्री के रिश्तों को लेकर है- मॉडरेटर.
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फ़िल्म डैडीमैंने रिलीज़ होने के बहुत साल बाद देखी। शायद 1999 में।

मैं कॉलेज की छुट्टियों से घर लौटी थी। ये अद्भुत संयोग ही था कि कभी न खाली रहने वाले उस विशालकाय घर में उस दिन कोई नहीं था। कम से कम नीचे वाली मंज़िल पर तो कोई नहीं। इसलिए पुराना पड़ता टीवी और बेकार होता वीसीआर, दोनों मेरे कब्ज़े में आ गए थे। डीवीडी तक गए नहीं थे अभी, और फ़िल्में अभी भी वीएचएस पर आती थीं। नवकेतन में हमारी मेंबरशिप थी, इसलिए दस रुपए में किराए पर फ़िल्में मिल जाया करती थीं। नवकेतन वालों को भी मालूम था कि महेश भट्ट की तरह वीएचएस भी एंटीक पीस में तब्दील होने वाला है। इसलिए डैडीजैसी फ़िल्म ले आओ तो कई-कई दिन तक तगादा नहीं होता था। एक थके-हारे टूटे हुए शराबी पिता की कहानी में किसी को क्या मिल जाता कि कोई डैडीजैसी फ़िल्म देखने की ख़्वाहिश भी रखता? वो भी तब, जब सिमरन के पापा में अपने पापा का अक्स दिखाई देने की ज़्यादा गुंजाईश थी!

फ़िल्म मैंने अकेली देखी थी, और मुझे आज तक नहीं मालूम कि पापा ने वो फ़िल्म देखी या नहीं। लेकिन पापा देखते वो फ़िल्म तो इस बात पर सहमत होते कि डैडीहमारा आईना थी, हमारे रिश्तों का आईना थी।

जब मैं पापा से दूर-दूर होती गई तो पापा के पापा यानी अपने बाबा से करीब होती गई। बाबा के साथ रिश्ता सहज था। बाबा को मैंने ख़ुश करने की कोशिश कभी नहीं की। लेकिन ज़िन्दगी भर मैं पापा का समर्थन हासिल करने की, उनकी स्वीकृति पाने की, उनका दिल जीतने की अजीब सी कोशिश में लगी रही पापा और मेरे बीच के लंबे ख़ामोश रिश्ते के बावजूद। मेरे और पापा के बीच बाप और बेटी का रिश्ता तभी मुकम्मल हो पाया जब मैं बहुत बड़ी हो गई और जब पापा भी बहुत बड़े हो गए। इस बीच पापा ने डैडीकी तरह दो बार मुझे बहुत बुरी तरह टूटने और बर्बाद होने से बचाया। मैं आज तक इस उम्मीद में हूँ कि मैंने भी डैडीकी पूजा की तरह अपने पापा को जीने की कोई वजह दी ही होगी।

बहरहाल, इस फ़िल्म का संदर्भ इसलिए नहीं आया क्योंकि फ़िल्म की कहानी अच्छी है, या इस फ़िल्म में अभिनय के लिए अनुपम खेर को नेशनल अवॉर्ड से नवाज़ा गया था। या इसलिए क्योंकि ये फ़िल्म एक ऐसे ऐल्कोहॉलिक की कहानी है जिसे किस्मत ने कहीं का नहीं छोड़ा। या सिर्फ़ इसलिए क्योंकि ये फ़िल्म बाप-बेटी के रिश्ते की कहानी है।

इस फ़िल्म को मैं उस मिसाल के तौर पर पेश करना चाहती हूँ जिसमें पिता बन जाने के बाद एक पुरुष की ज़िन्दगी में आए बदलावों की कई परतें नज़र आती हैं। एक पिता से समाज और ख़ुद परिवार किस तरह की अपेक्षाएँ रखता है, और उन अपेक्षाओं पर खरे न उतरने पर एक पिता को किस तरह नाकामयाब करार दिया जाता है, ‘डैडीउसकी कहानी है।

पापा कौन होता है बच्चे के लिए? हीरो। सबसे शक्तिशाली। सबसे सही। पापा के वश में सब होता है। पापा घर चलाते हैं, घर में सुख-सुविधाएँ जुटाते हैं। दुनिया चाहे जो भी समझे, पापा आदर्श हैं। शान हैं अपने बच्चों के लिए।

असल ज़िन्दगी में एक हारे हुए, नाकामयाब, ज़िन्दगी से हताश पापा के होने से अच्छा है पापा के न होने के झूठ का होना। इसलिए कांताप्रसाद अपनी लाडली नातिन को कह देते हैं कि उसके पापा हैं ही नहीं। अपनी बेटी की तलाश में थका-हारा ज़िन्दगी से बेज़ार बाप किसी तरह अपनी बेटी का पता खोज लेता है, और उसे फ़ोन पर कहता रहता है, आई लव यू। ख़ुदा ख़ैर करे, लेकिन ऐसे सनकी, पागल पिता से दूर रहना ही अच्छा’, बेटी की कंडिशनिंग ये कहती है। लेकिन उसका दिल है कि उस आवाज़ को पहचानने की, उसे अपनी पहचान वापस दिलाने की कोशिश में जुट जाता है। बेटी पापा का रिडेम्पशन चाहती है, उनके सारे दाग़ों के उनकी मुक्ति चाहती है। बेटी पापा के लिए थोड़ी-सी इज्ज़त, थोड़ी-सी शोहरत चाहती है। लेकिन पापा के लिए बेटी का प्यार हासिल तो सब हासिल। संतान की माफ़ी ख़ुदा की माफ़ी से बढ़कर है।

ऐसे एक डैडी को हम सब जानते हैं। ऐसी एक संतान हम सबमें है। डैडीफ़िल्म ने मेरे भीतर की संतान को बदल दिया था। अचानक उसे समझदार बना दिया था। पापा को लेकर मेरी तंगदिली दिखाई दी थी पहली बार। पापा से न बोलने का, या बहुत कम कम बोलने का रिश्ता इसलिए था क्योंकि मेरे दिमाग़ में बैठ गई पापा की परफेक्ट छवि से मेरे पापा का चेहरा मिलता ही नहीं था। ज़िन्दगी के असली आईने में जो तस्वीर दिखती थी पापा की, वो मुकम्मल नहीं थी।

इसलिए पापा की कमज़ोरियाँ स्वीकार नहीं थीं। पापा की ग़लतियाँ स्वीकार नहीं थीं। पापा का इंसान होना स्वीकार नहीं था क्योंकि पापा तो हमें सुपरह्यूमैन चाहिए होते हैं। डैडीकी पूजा ने पहली बार मुझे पापा से एक नया रिश्ता बनाना सिखाया था। डैडीने मुझमें दुनिया के तमाम पापाओं, तमाम पुरुषों के कंधे पर मौजूद अदृश्य सलीब को देखने की समझ पैदा की थी।

पुरुष पर घर चलाने का भार होता है। ज़िन्दगी में हासिल उसकी सफलताओं और असफलताओं का असर पूरा परिवार जीता है, कई-कई तरह से। कई-कई सालों तक। अपने पिता के साथ किसी बेटे का रिश्ता ये तय करता है कि आगे चलकर वो किस तरह का पिता बनेगा। बेटी जो पापा के साथ जीती है, जो उनमें देखती है, उसी के दम पर बाद में अपने पति के साथ भरोसे का, या तकलीफ़ों का, रिश्ता जोड़ती है। जो पिता जी नहीं पाता, उसका बोझ अपने बच्चों पर डाल देता है। मशहूर मनोविश्लेषक सी. जी. जंग ने यूँ ही नहीं कहा कि पारिवारिक माहौल, और ख़ासकर बच्चों पर, किसी और चीज़ का उतना गहरा मनोवैज्ञानिक असर नहीं होता जितना माता-पिता में से किसी एक के अधूरे ख़्वाब का होता है। हम जाने-अनजाने वो बना दिए जाते हैं, जो हमारे पिता नहीं हो सके। ठीक वैसे ही, जैसे हम अपने बच्चों से उस ज़िन्दगी के जीने की उम्मीद रखते हैं जो चाहते हुए भी हमारे हाथ न आ सकी।

चूँकि एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी तक जाने वाली ये कड़ी इतनी ही बारीकी से एक-दूसरे से गूँथी होती है, इसलिए हर बच्चे को, बल्कि वयस्क हो जाने के बावजूद हर शख़्स को, एक फ़ादर फ़िगर चाहिए होता है जो उसका आदर्श हो। उसकी शान हो, उसका गुमान हो। पिता में वो भरोसा नहीं मिलता तो कहीं और जाकर उस भरोसे की तलाश होती है नाना या दादा में, चाचा में, बड़े भाई में, शिक्षक में, किसी दोस्त के पिता में, बॉस में, मेन्टर में… और अगर वो भरोसा कहीं नहीं मिलता, तो फिर किसी पर भी भरोसा करना मुश्किल हो जाता है। किसी की ज़िन्दगी में पिता या पिता रूपी किसी शख्सियत का न होना उसकी शख़्सियत में सबसे बड़े अधूरेपन के रूप में बचा रह जाता है।
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