उजला लोहिया की कहानी ‘क्या किया जाए’

आज पढ़िए उजला लोहिया की कहानी ‘क्या किया जाये’। उजला जी ने लिखना देर से शुरू किया लेकिन कथ्य और शिल्प पर उनकी पकड़ बहुत  मज़बूत है और कहानियाँ भी उनके पास अलग अलग तरह की हैं। जैसे यही कहानी- मॉडरेटर

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-क्या तुम मुझे सुन रहे हो?

-………

-क्या कहा! नहीं! जरा जोर से तो बोलो। वैसे तुम्हारे इंकार करने से सच बदल नहीं जाएगा।

-न बदले, मुझे क्या!

-तुम इंकार कर क्यूँ रहे हो? कुछ तो कारण होगा। बताना चाहो तो बता सकते हो।

-मैं सुन ही नहीं रहा तो बताऊंगा भी क्यूँ भला!

-ना बताओ, सुन तो लो! इस डूबती शाम में जंगली घास फूस और मिट्टी में गड़े इन पत्थरों के बीच, दूर उस बाउंड्री के परे लगे सूखी टहनियों वाले पेड़ों के सिवा कोई भी तो नहीं, जिस्से कुछ कह सकूँ। और हवा! हवा भी शायद उन टहनियों पर टंगी पड़ी है। सोचती होगी, यहाँ किसे उसकी जरूरत। सुन रहे हो न?

-नहीं।

-यूँ कहने को तो इस मिट्टी से भी कह सकती हूँ, मगर तब बात एकतरफा ही रह जाएगी। अब तुम ही हो जो मुझे सुन सकते हो। आह sss तब शायद मैं  आराम से… ।

-तुम मुझ पर अपनी इच्छा उंडेल रही हो।

-हाँ, शायद। पर कल जब यहाँ लाई गई तब तुम्हारे सिवा कोई बाहर नहीं दिखा। और मैं दावे के साथ कह सकती हूँ कि तुमने भी मुझे देखा था। कहो क्या मैं गलत कह रही हूँ!

-देखा था तो क्या! इसका मतलब ये तो नहीं कि तुम्हें सुनु भी। ये सब तो मैं पाँच साल से देख रहा हूँ। और देख भर लेने से ये कैसे सोच लिया तुमने कि मैं तुम्हारी बात सुनूंगा ही!

-यही तो…. यही तो सारी मुसीबत है। जब कहना चाहिए था तब कहा नहीं और अब कहना है तो कोई सुनने वाला नहीं। हालांकि कह देने का वक्त ग़ुजर जाने के बाद कहने का कोई मतलब भी नहीं। मगर कल….. कल सब कुछ छूटने के बाद भी जब ये बचा रह गया…..  तब लगा कि अब कह देने के सिवा कोई उपाय नहीं। तुम तो यहाँ पाँच साल से हो, तो इतना तो विश्वास के साथ कह सकती हूँ कि अब तक तो तुम जान गए होंगे कि यही एक उपाय है।

-दिखने में तो मामूली ही दिखी थी , लेकिन बातें किसी दार्शनिक सी करती हो।

-तो तुम्हारा मानना है कि दार्शनिक सी बातें करने के लिए खास दिखना जरूरी है या मामूली दिखने वाले लोग ऐसी बातें नहीं कर सकते! अच्छा तुम बाहर तो आओ।

-क्यूँ जवाब दूँ और क्यूँ बाहर आऊं! सोने दो मुझे।

-न न कोई जबरदस्ती नहीं। तुम बाहर न आना चाहो तो मत आओ। हम यूँ भी बात कर सकते हैं।  मगर देखो, सूरज अब चर्च के क्रॉस की खाली जगहों पर चार सिंदूरी बिंदियाँ लगा कर , पीछे कूद चुका है। ठीक दूसरी ओर किसी सुस्त अलसाते घडियाल सी लेटी पहाडी की ओर से आता अँधियारा मद्धम हवा को साथ लिए है। पीठ पर लदे धुएँ के गुबार से पस्त शहरी साँवली हवा। पेड़ों की नंगी टहनियों के आड़े तिरछे क्रॉस घडियाल की पीठ पर उल्टे लटके से दिखते हैं। बाई ओर वाली उस पाँच मंजिली ताश के घर सी इमारत में टिमटिमाते बल्बों के सिवा आसमान में कोई एक तारा तक नहीं। चाँद अभी निकला नहीं। किधर से निकलेगा ये तो तुम ही बता सकते हो। मेरी तो ये दूसरी ही रात है और कल पहली रात तो मैं इतनी बदहवास इतनी बेचैन थी कि बाहर निकलना तो दूर… आँख तक न खोली। यूँ तो अँधेरा मुझे कभी बुरा नहीं लगा मगर आज कुछ ज्यादा भला सा लग रहा है। कल तो ऐसा लगा था जैसे कांधो पर धरी चट्टान अचानक टूट कर बिखर गई हो …. मगर…  खाली कँधे…. उफ्फ ….। अच्छी चीजों के बारे में पता न हो तो अच्छी चीजें भी शुरू में बुरी ही लगती हैं, जैसे बुरी चीजें बुरी नहीं लगतीं, पता न होने पर! है न! वैसे तुम्हें ये सब क्यूँ बताना! तुम तो मुझसे बेहतर जानते होंगे। मैं तो बस मौसम के बारे में बता रही थी। अहा! अब तो हवा ने भी वीकएन्ड की मस्ती में अपनी गति बढ़ा दी है। घास भी देखो कैसी ओंधे मुँह सोई पड़ी जा रही है। लो, अब तो चर्च की प्रार्थना घंटियाँ भी बजने लगी हैं। इन्हें यूँ बेवजह सुनना कितना सुकून देता है न!

-क्या तुम मुझे उकसा रही हो!

-नहीं, बस बता रही हूँ। वैसे जब दो लोग आमने सामने बैठ कर बात करते हैं तो बात को बेहतर समझ सकते हैं और बात के रिक्त स्थानों को भी।

-लेकिन मैं जब कुछ कहना ही नहीं चाहता, तो भला सुनु भी क्यूँ!

-अच्छा….. ऐसी बात है…. तो…. ओह्ह्ह….लगता है मैं अब कभी…। कोई बात नहीं…. तुम सो जाओ….। मुझे तो यहीं बैठे रहना होगा ….. जब तक कि …

-तुम औरतों की यही चालाकी मुझे पसंद नहीं। उम्र चाहे कितनी भी हो जाए… आवाज़ तो ऐसी दर्द भरी बना लेती हो कि बस…. इमोशनल ब्लैकमेल के सारे जन्मजात गुण लेकर पैदा होती हो। लो तब भी मैं हो ही गया। अब खुश!

-ओह शुक्रिया शुक्रिया। उस घुटन भरे छ बाइ दो के खाँचे से निकल आने के लिए। देखो! मौसम वैसा ही है न, जैसा मैंने कहा था! और हवा भी कितनी भली लग रही है! और घंटियों की आवाज़ !

-मगर तुम वैसी नहीं दिख रहीं जैसी कल आई थी।

-अच्छा! वैसे आई नहीं थी, लाई गई थी। यहाँ भला कौन अपनी मर्जी से आता है।

-समझ गया समझ गया…  कहो अब क्या कहना है। एक बात कहूँ…  होते हैं कुछ दुःखियारे जो अपनी मर्जी से आते हैं।

-क्या तुम ये कहना चाहते हो कि जो मर्जी से नहीं आते वे दुःखियारे नहीं होते!

-नहीं,  बस वे खुद को दुख से बड़ा कर लेने की कला जानते हैं।

-और जो अपनी गलती से आते हैं ?

-वो बेवकूफ होते हैं।

-……

-अब चुप क्यूँ हो!

– तब मैं बेवकूफ हूँ।

-लगती तो नहीं हो।

-अच्छा एक बात बताओ, यहाँ तुम्हारे सिवा कोई जगा हुआ क्यूँ नहीं दिखता?

-हहहह नाsssटक…. उनका नाटक बस अब भी जारी है।

-अच्छा तुम…. तुम लाए गए थे या….

-बड़ी चालाक हो ! भूल गई! कहना बताना तुम्हें है, मुझे नहीं। तुम औरतें सचमुच भुलक्कड़ होती हो या नाटक करती हो कि सामने वाला पेट का पानी तक उगल दे। मगर इधर से एक बून्द हाथ न लगेगी। बड़ी मुश्किल से बनी है जबान की चाबी। अब उसे मुट्ठी में दबाए रहता हूँ।

-ना कहो! मुझे कौनसा सुनना है! बस कहना है।

-ओह… तुम क्या वाकई नहीं जानती कि ये कहना ही सारी मुसीबतों की जड़ है!

-पता नहीं! मैं क्या कह सकती हूँ और कैसे जान सकती हूँ! मैंने तो कभी किसी से कुछ कहा ही नहीं। और तो और मैं तो उन दोनों को भी कभी सच नहीं कह पाई।…….  मगर तुम्हें ऐसा क्यूँ लगता है कि कहना मुसीबतों की जड़ है?

-सवाल बहुत करती हो तुम?

-हाँ, यही सोच रही थी कि क्या यहाँ आते ही हैड पलट कर टेल और टेल हैड हो जाता है?

-फिर सवाल?

-अब तुमसे न पूछूँ तो किससे पूछूँ! हम दो ही तो जिन्दा हैं यहाँ!

-उफ्फ… तुम सचमुच कुछ नहीं जानती। चलो खैर!कहो क्या कहना है। जरा रुको… एक मिनिट।

-कहां जा रहे हो?

-वो जो तुम्हारे दाई ओर तीसरा पत्थर है न… वहाँ हर शाम अँधेरा गहराने से पहले एक आदमी आता है और आधी पी कर छोड़ जाता है। आशिक है। देखूँ जरा… हो तो मेरा काम आसान हो जाएगा।

-कौनसा काम?

-अरे वही…. तुम्हें सुनना।

-मुझे सुनने के लिए तुम्हें दारू की जरूरत है! रहने दो मुझे सुनाना ही नहीं तुम्हें कुछ।

-नखरे तो पूरे आते हैं तुम्हें औरतों वाले। चलो…  रहने दो… मुझे कौनसा शौक है सुनने का। मैं चला सोने।

-अरे अरे रुको…. अब इसे क्या कहूँ आदमियों वाली धौंस! पियो जितनी पीनी है… मुझे क्या! मुझे तो कभी उसके पीने से ही दिक्क़त न हुई जिससे सब कहते थे होनी चाहिए थी। अच्छा सुनो, कोई गद्दा मसनद भी छोड़ गया हो तो ले आओ, तुम्हें चुभता होगा न ये छ बाई दो का पत्थर और झाड़ियां।

-ज्यादा ताने मत मारो… चला जाऊँगा फिर अंदर। थोड़े दिन रुको तुम्हें भी यही नसीब होना है। सांस लेना भी दुभर हो जाएगा।

-हाआआ… तब तक तो मैं सब कुछ कह चुकी होउंगी और आराम से…..

-लो अभी तो ये सम्भालो, बोतल के साथ एक गुलाब भी छोड़ जाता है आशिक। मेरे तो किसी काम का नहीं…. आज तुम्हारे लिए उठा लाया।

-और मैं क्या करुँगी इसका!

-स्त्री हो, लगा लो बालों में।

-जब लगाना चाहिए था, तब तो न लगाया……।

-तुमने जीवन में गणित पढ़ा ही नहीं या उसे अप्लाई नहीं किया?

-जीवन में खुद के सीखे समझे गणित को एप्लाई करने के लिए खुद के हाथ में चॉक पेन्सिल या पैन होना जरूरी होता है और एक अदद सादा कागज भी।

-उफ़ फिर शुरू हो गई तुम्हारी फ़िलोसफी! शुरू करोगी भी कहानी या मैं….

-हाँ बस वहीं तो आ रही हूँ…. अच्छा तुमने मेरी उम्र की बात की थी तो जरा बताओ मेरी उम्र!

-कल आई थीं तब तो पेंतालिस से ऊपर की लग रहीं थी लेकिन आज तो चालीस से कम की दिखती हो।

-एक दिन में इतना फर्क! कमाल जगह है ये तो! …  वैसे पचास पार हूँ।

-लगती नहीं हो।

-सब यही कहते थे। वैसे पचास की उम्र कोई ज़्यादा तो नहीं होती! तुम्हें क्या लगता है! तुम भी तकरीबन इसी के आस-पास लगते हो। अअअ जरा से ज्यादा….।

– कल साठ का पूरा हो जाऊँगा।

-अरे वाह, अग्रिम शुभकामनायें।

-पियोगी?

-नहीं।

-पी है कभी?

-हाँ, मगर मुझे पसंद है इसलिए नहीं।

-तब!

-जो काम हमें पसंद न हो वो हम तभी करते हैं जब वो हमारे अपनों को ख़ुशी देता है।

-ये तो एक तरह की मजबूरी हुई।

-हाँ… कह सकते हो। मगर जब तक मजबूरी महसूस न हो तब तक कैसी मजबूरी! अपनों को ख़ुश देखने में मजबूरी बिला जाती है कहीं चार हाथ नीचे।

-मालूम नहीं ये कौनसी थ्योरी है। दुनिया भर के वैज्ञानिक विचारक चाहे कितनी ही थ्योरियाँ गढ़ गए हों… चाहे पोथियाँ या वन लाइनर… तब भी वे हर इंसान का सच तो नहीं ही हो सकती। तब ऐसी थ्योरी से क्या फायदा! मुझे तो लगता है हर इंसान अपनी थ्योरी खुद गढ़ता है और अपने साथ ही ले जाता है।

-मतलब जो असल थ्योरी है वो कभी बाहर नहीं आती?

-ऐसा भी नहीं…. बस बाहर आने पर थ्योरी बदल जाती है और उसे सुनने पढ़ने वाले अपने-अपने संदर्भ के हिसाब से या…  यूँ कहें कि अपने-अपने गणित के हिसाब से उसके मायने निकाल लेते हैं। मगर अलग-अलग तरीको से हल करने पर जवाब भी बदल जाते हैं और यहीं सारी गणित या कह लो थ्योरी धाराशाई हो जाती है। ये मैंने महसूस किया है….. तुम्हारी तुम जानो।

-तो मतलब तो वही हुआ कि बाहर आने तक थ्योरी अगर बदल जाती है तो भीतर वाली तो छिपी रह गई न ! मैंने पढ़ा था कि मृत इंसान के साथ उसके भेद भी चले जाते हैं। लेकिन अब समझ आ रहा है कि एक भेद भी साथ होने तक इंसान मरता कहां है!

-इसलिए तो कहा कि हर इंसान की अपनी थ्योरी है। बस बहुत हुआ अब, तुम्हारी इन बेकार की फ़िलोसोफिकल बातों ने  बोतल का मजा भी न लेने दिया,  अब मैं चला….

-अरे अरे…. रुको…. देखो अब तो चाँद भी निकल आया… आधा ही सही और हवा की तरावट भी बढ़ती जा रही है। अच्छा … अब कोई फालतू बात नहीं… सिर्फ सीधी सादी बात। टू द पॉइंट।

-अब एक और बोतल कहां से लाऊं?

-तुम सचमुच ऊबे हुए इंसान हो या पाँच साल में इतने आलसी हो गए कि सोने के सिवा कुछ सूझता ही नहीं! क्या तुमने पाँच साल से किसी से कोई बात नहीं की !

-कोई आई नहीं न यहाँ तुम जैसी बकर-बकर करने वाली फ़िलोसफ़र ।

-मन तो कर रहा है इस गुलाब से तुम्हारा सिर फोड़ दूँ…. लेकिन….

-बोतल तो मेरे हाथ में भी है। सोच लो किसका फूटेगा किसका बचेगा। बड़ी लडाका हो… यहाँ आने से पहले भी ऐसी ही थी क्या?

-भूल गए! हैड एन्ड टेल! खैर जाने दो। सुनो… बचपन में मैं बहुत अच्छा गाती थी।

-हे भगवान अब गाना भी सुनना पड़ेगा क्या!

-अब तुम मुझे टोक रहे हो।

-अच्छा सॉरी सॉरी… बोलो….।

-किसी पुरुष से इस तरह सॉरी सुनना कितना भला सा लगता है न!

-अच्छा! मैं क्या जानूँ! मैं स्त्री थोड़ी हूँ। पर मैंने तो बहुत सी स्त्रियों को सॉरी कहा…. उन्होंने तो नहीं कहा कभी कि भला लगता है। वे तो….. खैर छोड़ो मेरी बात। तुम कहो।

– मेरी रूचि संगीत और विज्ञान में थी। दोनों अलग सी चीजें दिखती है न! मगर है नहीं। स्वरों में रमें जब हम ब्रह्माण्ड में गोते लगा रहे होते हैं तो जो परतें उघड़तीं हैं वो संगीत की है या विज्ञान की ये प्रश्न बिला जाता है कहीं चार हाथ ऊपर। मगर मेरे घर वालों को ये दोनों अलग ही दिखे हमेशा। अब उन्हें क्या दोष दूँ…. उस वक़्त तक दिखे मुझे भी नहीं थे बस महसूस हुए थे जरा जरा। और ये तो तुम जानते ही होंगे कि इस धरती पर दिखाई देना ही महत्व की बात है। और उन्हें दिखाई ये दिया कि ये दोनों ही चीजें मेरे काम की नहीं। मेरे प्रेम प्यार वाले फ़िल्मी गाने सुनने-गाने पर उन्हें वैसे भी एतराज था। उन्होंने कहा मुझे होमसाइंस इतिहास भूगोल जैसा ही कुछ पढना चाहिए। अब उनका ‘ही’ इतना मजबूत था कि वो जो मैं ‘जरा जरा’ महसूस करती थी वो पिचक गया।

-तुम हर बात को कुछ ज्यादा ही लम्बा नहीं खींचती ! इस तरह तो पूरी रात बीतने तक भी बात खत्म न होगी।

-हमें कौनसा सुबह उठ कर काम पे लगना है! सोए रहना पूरी दोपहर। अब जब पहली और आखिरी दफा कुछ बोल रही हूँ तो सुन लो तसल्ली से।

-डांट तो ऐसे रही हो जैसे मैं तुम्हारा पति हूँ!

-आह्हः मैं उस प्रजाति में नहीं जन्मी जिसे पति को डांटने का सौभाग्य मिलता है। क्या तुम्हारी पत्नी उसी प्रजाति की थी?

-नहीं…. नहीं थी… मतलब मेरी पत्नी ही नहीं थी।

-तुमने शादी नहीं की?

-अब पत्नी नहीं थी तो यही मतलब हुआ न!

-चलो अच्छा ही हुआ।

-अब इसमें क्या अच्छा हुआ?

-कई बार जो अच्छा होता है वो दिखता नहीं। और अभी तो मैंने कहा कि दिखाई देना ही महत्व की बात है, जो दिखाई न दे उसे ‘वहम’ की संज्ञा दी जाती है। अब हम दोनों को ही लो…. हम हैं… मगर किसी को दिखाई तो नहीं दे रहे न! और जरा महसूस हो गए तो उसे वहम ही कहा जाएगा।

-लम्बी तो करती हो… मगर बातें समझदारी की करती हो।

-थेंक्यू थेंक्यू। वो देखो तारा दिखने लगा। दादी कहती थीं किसी का शुक्रिया अदा करो तो तारा चमकने लगता है।

-बकवास…….। ऐसी बकवास बताने के लिए शुक्रिया।

-वो देखो एक और तारा।

-तुम यहाँ गिनती रहो तारे। मैं चला सोने।

-अरे रुको तो।

-तो फिर बताओ तुमने कौनसा विषय चुना?

-हथेली पर जब एक चीज़ धर दी जाए तो अंगूलियाँ सोचती हैं यही ठीक होगा। और मेरी हथेली पर तो एक के बाद एक सजी सजाई चीजें आती चली गई। एक कांधो पर चढ़ती उससे पहले दूसरी तैयार। लेकिन एक था चंदर एक थी सुधा से शुरू हुआ किताबों का इतिहास ऐसा चला कि…..

-आहहहह…. क्या याद दिला दिया..

-क्याआआ?

-इस चंदर और सुधा के चक्कर में ही तो मैंने ठाना था कि… जाने दो मेरी बात… तुम कहो।

-बात तो पूरी करो!

-नहीं, पहले तुम कहो।

-कहो कहो … जब दो कहानियाँ साथ चलती हैं तो उन्हें समझना ज्यादा आसान हो जाता है। वैसे ही जैसे एक थ्योरी के उलट दूसरी तीसरी चौथी थ्योरी पर भी गौर करते चलने से सारी थयोरियों को। फिर तुम्हें ये भी नहीं लगेगा कि तुम पर उंडेल रही हूँ अपनी इच्छा।

-हो तो चालाक, मेरे उगलवाने मे भी खुद का फायदा देख रही हो।

-हैड एन्ड टेल का खेल। कहो कहो…

-मैंने ठाना था कि मैं चंदर नहीं बनूंगा।

-ये तो अच्छा ही ठाना तुमने। फिर तुमने कह दिया अपनी सुधा से?

-……..

-क्या हुआ? चुप क्यूँ हो गए?

-तुम कहो फिर किताबों के इतिहास का सिलसिला।

-ठीक है… जैसी तुम्हारी मर्जी! फिर एक तरफ किताबों का इतिहास था और दूसरी तरफ गृहस्थी का भूगोल चालू हो गया। वो क्या शेर है कि- बसंत भी न आया था कि माली आ गया।

-बड़ा फूहड़ शेर है।

-हाँ हाँ जानती हूँ। मगर अभी यही याद आया। जानते हो, धीरे-धीरे घटती घटनाएं बिल्ली की तरह चालाक होती है, इतनी कि कब दबे पाँव बगल में बैठ, हथेली से होती कंधो पर चढ़ बैठेंगी पता भी न चलेगा। फिर कंधों को सिल बट्टे सा घिसती रहेंगी घिस्स घिस्स। मज़े की बात ये कि कंधो की छिलन महसूस होने से जरा पहले ये थोड़ा चंदन मलना भी जानती हैं। मगर नकली चंदन की तरावट कितनी देर की भला! छिलन महसूस होने लगते ही चार हाथ नीचे गड़ी मजबूरी ऊपर खिसकना शुरू कर देती है और ख़ुशी बिला जाती है चार हाथ नीचे।

-मतलब मजबूरी और ख़ुशी एक साथ नहीं रह सकती?

-उसके लिए दो हाथ बीच में रहना आना चाहिए।

-तुम्हें आया?

-जब मजबूरी और ख़ुशी की अदला बदली का खेल शुरू हुआ तब….. तब लगा सब कुछ हिल रहा है… जैसे भूकंप में धरती की परतें। मगर हम स्त्रियां भूकंपरोधी यंत्र के साथ ही पैदा होती हैं शायद। रह-रह कर झटके खाती भी थिर । मगर जब झटकों की तादाद बढ़ने लगी तो भीतर से कुछ चूना मिट्टी कंकर झरने लगे। कब तक लगाती पलस्तर!

-सीधा सीधा कहना नहीं जानती क्या?

-बताया तो… कहना ही नहीं जानती थी। ये सब तो अब जाने कहां से फूटा पड़ रहा है! असल में…  मेरा पति आदमी तो अच्छा सा ही था बस उसे एक लत थी।

 – कैसी लत?

 – उसे तारीफ सुनना बड़ा पसंद था। न न… अपने चेहरे मोहरे या कपड़ों की नहीं। अपने विचारों की। वैसे ये कोई खास खराबी भी नहीं…. तारीफ सुनना सभी को पसंद होता है मगर उसे तो खुद के विचारों की श्रेष्ठता के आगे दुनिया भर के विचार गौण नज़र आते। वो इंसान भी जो उससे भिन्न विचार रखते हों। वो उन्हें तुच्छ और बेवकूफ का तमगा लगाता और उनसे नफ़रत करने लगता।

-यानि असहमति शब्द से चिढ थी उसे।

-हाँ, यही। उसे पीने की लत भी थी। पहले वो दोस्तों के साथ पीता था लेकिन धीरे-धीरे दोस्त तुच्छ और बेवकूफ होते गए तो उसने घर में पीनी शुरू कर दी। असल में उसे पीते वक़्त बोलने की लत भी थी। और जब वो बोल रहा हो तो चूंकि वो ‘ही’ सही होता है इसलिए बाकी सबको चुप रहना चाहिए या हाँ में मुंडी हिलाते रहनी चाहिए। ऐसा करते वक़्त वो डेढ़ इंच की जगह दो इंच कभी-कभी ढाई इंच ऊपर उठ जाता। उसे लगता यही कि वो डेढ़ इंच ऊपर है। समझते हो न ‘डेढ़ इंच ऊपर’ का मतलब!

-हाँ हाँ जारी रखो। वो बोतल आधी से भी कम थी। और निर्मल वर्मा मेरे पसंदीदा रहे हैं।

-तब ठीक है, उसके आधे या एक इंच ज्यादा को मैं देख पाती थी मगर कह नहीं। उस वक़्त वो इतना खुश होता था कि उसकी थ्योरियों से इत्तफाक न रखते हुए भी मैं हामी भरती हुई उसे सुनती रहती। जैसे वो सरकार और मैं उसकी हाँ में हाँ मिलाती प्रजा। जैसे वो जमींदार मैं कर्जदार। कभी-कभी उसकी ख़ुशी की खातिर मुझे दो बून्द को झूठमूठ का बड़ा सा घूंट बनाने का नाटक भी करना पड़ता। मगर धीरे-धीरे मैं उकताने लगी और बस यहीं से चार हाथ नीचे गड़ी मजबूरी ऊपर खिसकने लगी। इतनी इतनी ऊपर कि…. कि… दिखाई ही नहीं सुनाई भी देने लगी।

-ये तुम अपनी कहानी सुना रही हो या इस देश की जनता की!

-मैं क्या देश की जनता नहीं!

-बातें तो खूब गोल-गोल घुमाना आता है तुम्हें!

-पहले आ जाता तब तो किसी काम आता! अब क्या! उस वक़्त जब मजबूरी और ख़ुशी की अदला-बदली हो रही थी, सब कुछ जानते हुए भी मैं सिर्फ देख रही थी। दूसरे के साथ घटित का दृष्टा बने रहना इतना मुश्किल नहीं जितना खुद के साथ घटित का।

– मुझे ये शब्द ‘दृष्टा’ बकवास लगता है…. बेजान इन पत्थरों सा बेप्रतिक्रिया पड़े रहना।

-ना, पत्थर जैसे नहीं… उस चाँद जैसे। प्रभावित न होकर लगातार प्रभावित करना, चाहे धीरे-धीरे ही सही। देखो उस चाँद की तरफ, कैसा तरल हुआ जाता है न मन! तारे भी कितने सारे दिखने लगे हैं।

-सही कह रही हो। मैंने यहाँ आने से पहले चाँद तारों को कभी इस तरह नहीं देखा था। यहाँ आने के बाद काफ़ी अरसा चुपचाप इन्हें देखा करता। फिर मुझे मौन में आनंद आने लगा।

-यानि तुम इनसे प्रभावित होने लगे थे।

-हाँ, वैसे भी यहाँ आने के बाद सिवा दृष्टा बने रहने के और किया भी क्या जा सकता है। जिंदगियां बीत जाती हैं इन चाँद तारों के धीमे प्रभावों का असर आते-आते, कि तभी फिर कोई ग्रहण लग जाता है।

-हाँ, और जिन पर ग्रहण का अँधेरा उतरता है उन पर ये चाँद तारे फिर कोई प्रभाव नहीं छोड़ पाते। सिवा इसके कि उन्हें भी, दृष्टा बना यहाँ तक ले आते हैं। हहह… उदासीन दृष्टा।

-कुछ हुआ था क्या? … अचानक ये उदासी …

-…….. अब कैसी उदासी। तुम कहो, ऐसा क्या बोल-बोल कर थक गए थे …. कहीं तुम भी मेरे पति की तरह….।

-नहीं… असल में मुझे हर बात में असहमति दर्शाने की बीमारी थी।

-मगर ये तो कोई बीमारी नहीं, वरन जबान की ताकत है। मेरे पास भी होती तो शायद मैं यहाँ न होती।

-मेरी जबान पर बैठी इस ताकत पर, फन उठाए खडे सांप की लपलपाती जीभ ने आक्रोश का जहर छोड़ दिया था। जहर का असर ऐसा हुआ कि मुझे हर बात बस कह देनी होती थी। मैं जल्दबाजी में रहता था। वमन कर देने की।

-कोई नेता वेता तो नहीं थे!

-नहीं… था तो नहीं… मगर लक्षण पूरे थे। मुझे चुप रहना पसंद नहीं था। किसी भी मामले में। लड़कियों के मामले में भी मैंने चंदर न बनना ठान रखा था। मेरे जीवन में एक के बाद एक कई लड़कियाँ आईं। कोई जरा सी भाई नहीं कि मैं कुछ भी सोचे-समझे बगैर उससे कह देता कि उसे प्यार करता हूँ। असल में मेरे भीतर विचार करने तलक कुछ टिकता ही नहीं था। सच झूठ, आड़ा बांका, अच्छा बुरा, सही गलत कुछ भी। धीरता से मेरा परिचय नहीं था। मैं प्रतिक्रिया की जल्दी में रहा हरदम। मगर जैसा मैंने पहले कहा था बाहर आने पर थ्योरी बदल जाती है…  तो हर बार वही हुआ। गणित धाराशाई और नतीजे उलट। दुनिया में हर किसी के सुनने के फार्मूले भी तो अलग होते हैं। अब तुम्हें ही लो, तुम जैसा फार्मूला कितनों के पास होगा जरा! और वो भी कब तक टिकेगा कोई गारंटी नहीं। मेरा कोई भी प्यार कुछ महीनों से ज्यादा मेरे पास नहीं टिका। मैंने रोकना चाहा… सॉरी भी कहा…. मगर…..

-कितनी अजीब बात है न, मेरा बेप्रतिक्रिया दृष्टा बने रहना भी गलत सिद्ध हुआ और तुम्हारा प्रतिक्रिया देना भी। क्या वाकई तुम उन सबसे प्यार….

-पता नहीं… लेकिन मेरी जबान पर टिके आक्रोश के जहर ने मुझे कहीं का नहीं छोड़ा। बस अकेला छोड़ दिया।

-ये तुम अपनी बात कह रहे हो या…..

-तुम तुम्हारी कह रही हो, मैं मेरी। लेकिन हम दोनों से ही तो देश है। छोड़ो… तुम कहो अपनी।

-हाँ.. तो जब मैं दृष्टा बनने की प्रेक्टिस कर रही थी तब कई बार अवसाद की खाई मेरे बस चार कदम आगे नज़र आती। मैं चट्टान सी लुढ़कती ढहने को होती और पीछे से तेज गति लुढ़कती आती दूसरी चट्टान को थामने के चक्कर में खुद भी थमी रहती।

-यानि दूसरों के अवसाद ने तुम्हें अवसाद में जाने से बचाए रखा!

-हाँ यही। उनके आंसुओं को हथेली में भरने के चक्कर में मेरे आँसू सूखे के सूखे रहे। वो कभी किसी को नहीं दिखे। सुनने की आदत तो थी ही मुझे, तो बस मैं उनका दुख सुनती… आंसू पोछती, कंधा बनती और खाई में जाते रास्ते की बाढ़ बन जाती। मैं इस काम में माहिर हो गई थी।

-आंसू छिपाने या आँसू पोंछने के?

-दोनों में। मैं एक बेहद सकारात्मक इंसान , परिवार और पति से प्रेम करने वाली अच्छी पत्नी, अच्छी मां और एक अच्छे मौन नागरिक के ओहदे पर थी। जानते हो… इन ओहदों पर बने रहना वजनी चट्टान को दोनों कंधो के बीच बेलेंस करना है।

-हाँ, समझ रहा हूँ।

-इस बीच मेरी दृष्टा बने रहने की प्रेक्टिस जारी रही। मगर इस शब्द की एक खराब बात ये है कि ये दिखाई दे रही चीजों से इतर भी बहुत कुछ दिखाने लगता है। न न… सिर्फ दूसरों का ही नहीं… खुद का भी। वही जिसे हम शुरु में वहम समझते हैं। और फिर एक रोज़ मुझे बहुत सी चीजों के बीच ये भी दिखाई दिया कि मैं… मैं तो प्रेम करती ही नहीं अपने पति से। बल्कि कभी किया ही नहीं। या यूँ भी कह सकते कि कभी जाना ही नहीं। मतलब ये कि मैं बगैर प्रेम को जाने समझे पति के साथ खुश पच्चीस बरस गुजार चुकी थी। उन दिनों मैं सदमे की सी हालत में रहती थी। उन ओहदों पर रहते हुए मैं भीतर से उन सब से च्युत हो चुकी थी। समझ रहे हो न!

-हाँ, रुको मत कहती जाओ।

-फिर मैंने एक चालाकी की। अपनी एक डमी उन ओहदों वाले सिंघासन पर बिठा दी और खुद मुक्त हो गई। अब जो करना है करती रहे डमी। चाहे मुंडी हिलाए या हाँ में हाँ मिलाए या फिर मुँह में घूंट गोल गोल घुमा कर कुल्ला करती हुई भी, मजबूरी और ख़ुशी का मेलमिलाप करती रहे।

-तुम तो कमाल निकली! फिर डमी ने चार लोगों वाला परिवार संभाला या…..।

-तुम्हें जो समझना है समझो। लेकिन ठीक उन्हीं दिनों अचानक मुझे गाने की इच्छा होने लगी। ये इच्छाएँ भी न जाने कैसी तासीर लेकर पैदा होतीं हैं, बरसों बाद भी फूट पड़ती हैं।

-जैसे रेतीले धोरों के नीचे दबी सूखी जिन्दा नदी।

-तो तुम्हें कविता कहना भी आता है!

-यहाँ आने के बाद, यूँ ही बेवजह कभी-कभी।

-ओह्ह हैड एन्ड टेल। वैसे… ऐसी बेवजह चीजें जब किसी उलझन से गुजरती हैं तो उसके सुलझने की वजह बन जाती हैं।

-शायद। फिर तुमने क्या किया?

-मैंने जंगल का रुख किया।

-जंगल! मिला तुम्हें ?

-जब इच्छा जोर की हो तो सारी कायनात….

-हाँ हाँ समझ गया… रस्सी को इलेस्टिक मत बनाओ, आगे कहो।

-बड़े बुरे श्रोता हो तुम! जरा सी बात लम्बी क्या हुई कि ऊबने लगते हो। मेरे पति से पाला पड़ जाता तो जाने क्या होता तुम्हारा!

-अब पति की भड़ास मुझ पर मत निकालो। वैसे भी रात आधी से ज़्यादा बीत चुकी है और मेरी कमर भी अकड़ गई है। चाँद चर्च के क्रॉस तक पहुँचे उससे पहले हमें अपनी बात खत्म कर लेनी चाहिए।

-इसकी कोई खास वजह?

-नहीं, यूँ ही बेवजह। आगे कहो।

-हम्म्म….. अब मैं जब मन करता जंगल की ओर निकल जाती और गाने की कोशिश करती। हअअअ… मगर इतने बरसों से रूँधा गला जो बोलना भी भूल चुका हो वो क्या गाता भला। मगर  इस चाँद ने, मिट्टी ने, पेड़ों ने, हवा ने, चीं चां पिहू ट्यु टर्र सबने मुझमें उम्मीद जगाई और प्रेम भी।

-फिर?

-फिर क्या! मैं पड़ गई प्रेम में। आह्ह कायनात के प्रेम में। कायनात के प्रेम में होना समझते हो न!

-अ… ह हाँ, समझ रहा हूँ।

-धीरे-धीरे मैं सुरीली होने लगी। वैसे सुरीला विशेषण मन के लिए ज्यादा उपयुक्त है न गले की बनिस्पत! तुम्हें क्या लगता है?

-मैं क्या जानू! मैंने कौनसा कभी गाना गाया है!

-क्यूँ कहा तो है न जिंदगी भर! और कहने को अगर सुर में कहा जाए तो वो गीत सा मधुर लगता है।

-मगर मेरी जबान पर तो जहर गिरा हुआ था, भूल गईं। मैं कैसे सुर में कह सकता था!

-ओह हाँ,। तुमने सॉरी भी सुर में नहीं कहा होगा।

-तुम कहो, तुम सुर में कह रही हो। सच कहूँ तो अब मुझे सुनना अच्छा लग रहा है।

-शुक्रिया शुक्रिया।

-देखो! दो और तारे!

-जानते हो, ये तारे हमें हाथ पकड़ कर खींच लेना जानते हैं अवसाद और सदमे की खाइयों से। फूल बन कर खिल जाते हैं। झरने बन बहने लगते हैं। फिर मैं तो सिर्फ बॉर्डर पर थी। अब मेरे सब ओर गीत होते कलकल-कलकल गुनगुन-गुनगुन। वो… वो सुना है न तुमने… काँटों से खींच के ये आँचल 🎵🎵तोड़ के बंधन बाँधी पायल🎵🎵कोई न रोको दिल की उड़ान को🎵🎵दिल वो चला आहा हा हा हा आज फिर जीने की तमन्ना है। लेकिन आज तो सचमुच मरने का इरादा है।

-गाती तो अच्छा हो।

-है न! मैंने भी हमेशा खुद से यही कहा। हाँ तो अब मैं एक साथ दो जगह होने में माहिर होती जा रही थी। असल में मैं दो हाथ बीच में रहना सीख गई थी। समझ रहे हो न… दो हाथ बीच।

-हाँ, तुम तो वाकई समझदार निकली!

-ख़ुशी और समझदारी अच्छी दोस्त हैं।

-बेवजह की थ्योरियाँ मत गढ़ो। आगे कहो।

-सब समझ चुके थे कि मैने बीच में रहना साध लिया है। अब मैं उतनी ही सुनती जितनी दो हाथ बीच रहने के लिए जरूरी होता। मेरा पति अब भी ढ़ाई इंच ऊपर को उठा रहता। हालांकि मानता वो यही कि डेढ़ इंच ऊपर ही है। एक ओर तो डमी मुंडी हिलाती रहती, दूसरी ओर मैं समझभरी ख़ुशी में कायनात के प्रेम में डूबती उतरती रहती।

-फिर

-फिर… फिर वो मेरी जिंदगी में आया। जैसे कोई तूफान मेरी देह और मन के बँधे तटों को भेदता पार हुआ हो। जैसे…  जैसे ये हवा… हवा छू रही है हमें अभी …. बगैर देह के भी… रुह के आर पार। वो चाँद… उसकी किरणे महसूस कर रहे हो न तुम! जैसे… बगैर कंठ के भी मेरी आवाज़ सुन रहे हो ! आहहहह… नईनकोर जन्मी रुह की जिव्हा पर अनार के फूल से शहद टपका हो जैसे। बाssवरी रुह। उसका बावरापन बरसों से साधक रही सांसों से संभाले न सम्भलता। ओह… मैंने तो कायनात से प्रेम किया था लेकिन क्या प्रेम का एक रूप ऐसा भी होता है? तुम… तुम बताओ… तुमने तो कई बार प्रेम किया है न! अरे, क्या हुआ, गर्दन इतनी क्यूँ झुका ली। देखो इधर।

-मैंने बस समझा ही था कि किया है। लेकिन मेरी असहमति की लत और आक्रोश के बढ़ते जहर ने मुझे बदबूदार कर दिया था। प्रेम जरा पास आता और मैं उसमें खामियाँ निकालने लगता। उसके चाल-चलन, रहन-सहन, खाने-पीने तक में। यहाँ तक कि उसकी जन्मजात चीजों तक में। सोचता मैं यही था कि उसे सुधार दूंगा लेकिन जहर…. उसका क्या करता। सो चीजें सुधरने की बजाय ज्यादा बिगड जातीं। असल में अच्छी चीजें भी लत में बदलते ही बुरी होने की शुरुआत कर देतीं हैं। फिर अच्छी चीजों को डिफाइन करना भी तो आसान नहीं।

-ओह्ह… तब तो तुम प्रेम से अनजान ही रहे। प्रेम हवा में झूमती इस घास सा बना देता है। वो आस पास होता तो मैं ऐसे ही झूमती रहती, मगर जब वो न होता तब उसकी याद मुझे डेढ़ इंच ऊपर उठाए रखती। उफ्फ…. दो हाथ बीच में रहते हुए डेढ़ इंच ऊपर उठ जाना क्या होता है कोई पूछे मुझसे। ये ऐसा था जैसे किसी अखंड जोत को संभाले पानी में लगातार तैरते रहना। कभी-कभी लहरों का ऐसा रेला आता कि मैं डगमगाने लगती और कभी लौ की लपट ऐसी ऊँची उठती कि साँसे साथ छोड़ने को होती। मैं जंगल में होती और एक जंगल मेरे भीतर होता। कंठ गीत गाता तो आवाज़ बाहर वाले नहीं वरन भीतर के जंगल में गूंजती। मैं कई-कई देर बारिश में भीगती। मैं कई-कई देर शून्य में टंगी रहती। मुस्कुराती आँसू बहाती रहती। तुम नहीं जानते कि प्रेम में होना कितनी खतरनाक चीज़ है। ये एक शब्द सारे शब्दों को मिटा देता है। सारी सहमतियों, असहमतियों को भी। सारे डंकों और जहर को भी। लेकिन इन सबके बीच भी सिंघासन पर विराजी या कहूँ बंधी डमी मौन साधे अपने फर्ज निभाती रही। मजबूरी से बड़ी कोई और चीज़ नहीं शायद।

-किसकी मजबूरी? डमी की या….।

-दोनों में अंतर है क्या?

-हम्म… था कौन वो?

-फौजी था। मेरी दोस्त का भाई। कश्मीर में पोस्टेड।

-शादीशुदा?

-नहीं, नहीं की थी।

-क्यूँ?

-कहता था, बस यूँ ही।

-तुमने बताया उसे कभी कि तुम उसे…..

-काश! बता पाती।

-जरूर डर रहा होगा। अपना परिवार छिन जाने का। अपनी पहचान मिट जाने का।

-किस परिवार की बात कर रहे हो?

-तुम्हीं ने तो कहा दोनों में कोई अंतर नहीं! खैर छोड़ो। तुम ये बताओ कि क्या वो भी तुम्हें….

-स्त्रियों की सिक्स्थ सेंस के बारे में सुना है न तुमने! पता चल जाता है।

-उसने कुछ कहा कभी?

-प्रेम या तो माथे पर कफ़न बाँध सारे बंधन तोड़ देता है या फिर मौन के मनके जपता सिसकता रहता है। मैं तो थी ही माहिर मौन के मनके जपने में और उसने एक कफ़न पहले ही सिर पर बाँध रखा था।

-यानि भीतर का गणित भीतर ही रहा!….. वैसे अच्छा ही हुआ।

-मतलब?

-मतलब ये कि….. कह देने से नतीजे टेढ़े-मेढ़े या उलटे हो सकते थे। और तब… सारी थ्योरियों के ढेर संग तुम भी चारों खाने चित्त धाराशाई।

-न कहने पर भी तो यही हुआ!

-कम ज़ कम प्रेम तो बचा रहा।

-जब प्रेमी ही न बचेंगे तो प्रेम कैसे जिन्दा रहेगा?

-मतलब?

-उसे तीन गोलियाँ लगी थीं। आतंकी हमले में।

-ओह्ह… आइ एम सॉरी।

-माथे पर, सीने में, पेट में। तिरंगे के तीनो रंग लाल हो गए थे। ज़ब आखिरी बार उसे देख रही थी तो मेरा रोआं रोआं चीख पड़ना चाहता था। उसे बताना चाहता था कि प्यार करती हूँ उससे… बहुत बहुत प्यार….। मैं चीख पड़ना चाहती थी उन तीन ही नहीं अनगिनत गोलियों की आवाज़ से भी तेज….। मैं चीख पड़ना चाहती थी तिरंगे के लाल धब्बों से उठते रुदन से भी तेज। लेकिन आवाज़ दग़ा दे गई। जिंदगी भर मौन को तवज्जो देते रहने का बदला लिया उसने। और मैं अपने अनकहे प्रेम को लिए अकेली भटकती रही। वो… वो देखो… सलेटी उजाले में घडियाल सी पसरी पहाड़ी दिखने लगी है, उस पर जो सूखी टहनियों के उल्टे क्रॉस लटके हैं, ठीक वैसे ही मैं भी लटकी रही और मेरे आँसू घडियाल की आँखों से बहते रहे। उन आंसुओं को देखती तो अटकी हुई चीख निकल पड़ने को होती। मगर वहाँ पहले से ही इतनी तरह-तरह की थयोरियों वाली, एक दूसरे पर गिरती पड़ती, दबा देने की कोशिशे करती, बदबूदार चीखें भरी हुई थीं कि मेरी चीख, न किसी को सुनाई देती, न समझ आती। सो मैं चुपचाप चीखती रही। बदबू दम घोंटती तो वमन कंठ तक आ जाता। जानते हो, ओंधे लटके होने पर वमन को कंठ से वापस लौटा ले जाना कितना मुश्किल होता है! मगर मैं भी कम माहिर थोड़े ही थी! दिन महीने साल गुजरते चले गए, जाने कितने। मगर बेआवाज चीखों का बोझ बहुत भारी होता है। कंधो पर पड़ी उस चट्टान से भी भारी जिसे मैंने डमी के कांधो पर डाल दिया था। इस बोझ तले दबी, मैं बस लटकी रही औंधी। आजीवन मौन रहने का दुर्दान्त दुराचार किया मैंने। कल जब अचानक लटकी साँसे छूट कर टूट गईं तो सब कुछ बिखर गया और मुझे आठ हाथ नीचे ला कर पटक दिया गया। लेकिन इस अनकहे ने मुझे मरने ही नहीं दिया।

-……………..

-……………..

-हहहहह…… तुम्हारी हर बात से सहमत हूँ , सारी बात समझ भी रहा हूँ। लेकिन तब भी मुझे लगता है कि जहरीली चीखों का बोझ, अनकहे से कहीं ज़्यादा भारी होता है। पाँच साल से उसे ही तो ढो रहा हूँ।

-ओह्ह्ह! तब क्या जबान की ताकत को भूल जाना होगा!

-नहीं।

-फिर! क्या किया जाए? कहा जाए या न कहा जाए?

-प्रेम या जहर?

-क्या ये दोनों बचे हैं अलग-अलग! और बचे भी हैं तो कह देने भर से क्या पहचान लिए जाएँगे?

-पता नहीं!

-देखो चाँद चर्च के पीछे की ओर झुक गया है और पहाड़ी की ओर से सिंदूर उड़ा चला आ रहा है।बातूनी हवा सारे कहे-अनकहे को समेट कर चली जाने वाली है। इधर देखो दल के दल कतारों में चली जा रहीं इन मौन चीटियों को। ये दोनों धरती की जड़ों से लेकर सिरों तक पहुँच ही जाएँगी एक दिन।  क्यूँ न हवा और चींटी की पीठ पर प्रेम रख दें! और आज तो तुम्हारा जन्मदिन भी है तो सेलिब्रेशन तो बनता है न! आओ तुम्हारे जन्मदिन की ख़ुशी में इस मिट्टी में सारे जहर को लेकर दफन हो जाएँ। क्या पता जबान अपनी असल ताकत फिर से पा जाए! चलो अब हम मर जाएँ।

-रुको!

-ये कौन बोला?

-मैं…इधर…तुम्हारी दाई ओर पाँचवे पत्थर से। मुझे कुछ कहना है।

-ठहरो, मत सुनना इसकी। बेसुरा है ये।

-पर मुझे भी हक है मरने का।

-मुझे भी सुनो… इधर… मैं तो थक चुका हूँ चुप रहते रहते… तुम्हें मेरी बात भी सुननी होगी। इस मिट्टी की शपथ खा कर कहता हूँ, जो कहूंगा सुर में कहूंगा। आखिर मैं भी तो मरना चाहता हूँ।

-मुझे भी मरना है।

-मुझे भी।

-मुझे भी।

-ओह्ह्ह….  अब! अब क्या करें!

-कुछ नहीं…. हम कुछ कर भी नहीं सकते मरने के सिवा।

-और ये प्रश्न?

-रहेगा जिन्दा, अलग-अलग थ्योरियों से हल होते रहने के बावजूद। उसी घड़ियाली पहाड़ी पर, उल्टे क्रॉस की तरह लटका हुआ।

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