युवा शोधार्थी अभिषेक कुमार अम्बर जब शहरों पर लिखते हैं तो बहुत अलग तरह से लिखते हैं। पिछली बार उन्होंने रानीखेत शहर पर लिखते हुए निर्मल वर्मा की कहानी ‘परिन्दे’ में वर्णित स्थलों की खोज की थी। इस बार अल्मोड़ा पर लिखते हुए उन्होंने प्रसिद्ध लेखक मनोहर श्याम जोशी के पुश्तैनी घर की खोज की है। आइये उनके साथ अल्मोड़ा घूमते हैं- मॉडरेटर
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बेडु पाको बारा मासा
नरणा काफल पाको चैता…मेरी छैला
अल्मोडा को लल्ल बजार,
नरणा लल्ल मटा की सीढ़ी…मेरी छैला
लाल माटी की सीढ़ियों पर चढ़ते हुए यकायक ये गीत मेरी ज़बान पर आ गया और मैं इसको गुनगुनाने लगा। अल्मोड़ा, उत्तराखंड की सांस्कृतिक राजधानी के रूप में विख्यात है। अल्मोड़ा के बाज़ार भी कोई कम प्रसिद्ध नहीं हैं। पहाड़ के शिखर पे बसे तक़रीबन 200 साल पुराने बाज़ार, जो चंद राजाओं के समय बनाए गए। एक छोर से शुरू होकर शहर के दूसरे छोर तक.. लाला बाज़ार, जौहरी बाज़ार, खजांची बाजार, टम्टा बाज़ार, पलटन बाज़ार आदि फैले हुए हैं। हर बाज़ार की अपनी विशेषता है जहाँ जौहरी बाज़ार सिर्फ़ आभूषणों के लिए जाना जाता है, वहीं टम्टा बाज़ार बर्तनों के लिए। आप नंदा देवी मंदिर से छावनी की ओर चलना शुरू करें तो बारी बारी से आपको हर बाज़ार आकर्षित करेगा।
अल्मोड़ा के बाज़ारों की तंग गलियाँ और उसपर बिछी पठालें और दोनों तरफ़ लकड़ी के बने पुराने श्रृंखलाबद्ध घर, जिनकी तिबारियों पर कुशल कारीगरों की नक़्क़ाशियाँ गृह-स्वामियों के वैभव को दर्शाती हैं। उत्तराखंड में पहाड़ पर अल्मोड़ा से ज़्यादा जीवंत शहर मैंने और कोई नहीं देखा। यहाँ पर्यटकों से ज़्यादा आस-पास के गाँव-कस्बों के लोग अधिक दिखाई देते हैं। मैं पहले भी कई बार अल्मोड़ा आ चुका हूँ लेकिन जब भी इस शहर में आता हूँ तो शहर को नई उमंग से भरा पाता हूँ।
रामनगर से सुबह अल्मोड़ा के लिए निकला तो काफ़ी गर्मी थी लेकिन अल्मोड़ा पहुँचने तक मौसम पूरा तब्दील हो गया। हल्द्वानी से ब-मुश्किल बीस किलोमीटर ऊपर जाने पर ही मौसम में तब्दीलियाँ शुरू हो गईं थीं। अब हवा में ठंडक थी, जो मई की गर्मी में नवम्बर का एहसास करवा रही थी। ज्योलिकोट से भवाली पहुँचने तक आसमान में कहीं कहीं बादल भी घिर आए थे और हमेशा की तरह भवाली में जाम लगा था। सोचता हूँ पिछली सदी में भवाली, जो हिन्दी के लेखकों की पसंदीदा जगह होती थी और कुमाऊँ का एक महत्वपूर्ण केंद्र, अब किस हालत में पहुँच गया है। हर तरफ़ होटल, दुकानें, रेस्टोरेंट बन गए हैं, पहाड़ों की वो सुंदरता, वो शुद्धता कहाँ चली गई जिसके कारण यहाँ टीबी सेनेटोरियम बनाया गया था। चीड़ के पेड़ों से छनकर आती उस शुद्ध हवा का अब क्या हाल हो गया है। मैं इस बात पर विचार कर रहा था कि जाम खुल गया और हम आगे के लिए रवाना हो गए। कैंची धाम आश्रम तक पहुँचते पहुँचते बादल जल बरसाने लगे थे। घने पेड़ पौधों से घिरी घाटी बारिश होने से और ठंडी हो गई थी, आसमान, सड़क और घाटी कोहरे की चादर ओढ़े हुए थीं। बारिश की फुहारें खिड़की से होते हुए चेहरे पर गिर कर अलग संतुष्टि प्रदान कर रही थीं।
कैंची धाम पहुँचने से 2-3 किलोमीटर पहले ही दौड़ती गाड़ियाँ अब रेंगने लगीं। जबसे सोशल मीडिया ने भारत में क़दम रखा, रातों रात किसी भी स्थान के दिन फिर जाते हैं, कैंची धाम भी ऐसे ही स्थानों में से है। मुझे याद आता है कि तक़रीबन 7-8 साल पहले जब इसी रास्ते से गुज़र कर मैं चमोली जाया करता था तो यहाँ काफ़ी कम संख्या में नीम करौली बाबा के दर्शन करने लोग आते थे और यह स्थान एकदम शांत होता था। लेकिन जब से सोशल मीडिया पर यह जगह वायरल हुई है तबसे लोगों का ताँता लग गया है, सिर्फ़ दर्शन करने के लिए ही नहीं फोटो खिंचाने के लिए भी।
ख़ैर किसी तरह कैंची धाम से निकलते ही गाड़ियों ने फिर से रफ़्तार पकड़ी। अब बूंदा-बांदी कम हो गई थी लेकिन मौसम का मिज़ाज सुहाना था। मन ही मन मैं इस बात का शुक्र भी मना रहा था कि इस तरफ़ बारिश नहीं हो रही है। क्योंकि आगे क्वारब में जहाँ आजकल भूस्खलन काफ़ी हो रहा है पूरा पहाड़ ही कच्चा हो गया जिसकी वजह से थोड़ी सी बारिश में ही मलबा गिरने लगता है और नैनीताल ज़िले को अल्मोड़ा से जोड़ने वाला क्वारब पुल का रास्ता बंद हो जाता है, फिर खैरना से रानीखेत होते हुए ही अल्मोड़ा जाया जा सकता है। तीन-चार महीने पहले यह रास्ता काफ़ी दिनों तक बंद पड़ा रहा था।
हम ख़ुशनसीब थे कि क्वारब में मलबा नहीं गिर रहा था और पुल को पार करके हम अल्मोड़ा ज़िले में प्रवेश कर चुके थे। यहाँ से अल्मोड़ा के लिए लगातार ऊपर चढ़ना होता है। काफ़ी घुमावदार मोड़ आते हैं। धीरे-धीरे ऊँचाई बढ़ती जाती है और ख़ूबसूरत वादियाँ हमें चारों तरफ़ से घेर लेती हैं। पूरे रास्ते चीड़ के दरख़्त कोहरे और हल्की बौछारों के कारण ठिठुरे से खड़े हुए हैं। लोधिया में रामकृष्ण कुटीर द्वारा बनाए गए भव्य प्रवेश द्वार ने अल्मोड़ा में हमारा स्वागत किया। कुमाऊँनी शैली में बने इस प्रवेश द्वार पर घोड़े पर सवार स्वामी विवेकानंद की एक मूर्ति बनी है, और उनके दोनों तरफ़ महिलाएँ एवं पुरुष हाथ जोड़े अभिवादन कर रहे हैं।
अल्मोड़ा का स्वामी विवेकानंद से एक अलग जुड़ाव रहा है, विवेकानंद ने अल्मोड़ा की तीन बार (1890,1897,1898) यात्राएँ की हैं। कहते हैं जब पहली मर्तबा विवेकानंद अल्मोड़ा पैदल आए तो कर्बला में पहुँच कर भूख-प्यास से वह एक पत्थर पर बेहोश हो गए, तब क़ब्रिस्तान के चौकीदार ने उनकी जान बचाई। वह स्थल कर्बला में पड़ता है जो लोधिया के बाद और अल्मोड़ा शहर से एकदम पहले पड़ता है। इस स्थान पर सिर्फ़ एक क़ब्रिस्तान है और उसके नज़दीक ही कुछ एक घर, वो भी शायद क़ब्रिस्तान की देखभाल करने वाले लोगों के। सड़क की दाईं तरफ़ ही वह स्थल पड़ता है जहाँ विवेकानंद आकर रुके थे। अब उसकी चहारदीवारी करके एक विश्राम स्थल का रूप दे दिया गया है।
मैंने इस स्थल पर कुछ समय रुकने का विचार बनाया। लेकिन देखता हूँ कि दरवाज़े पर ताला लगा है और चारों तरफ़ दीवारों पर कँटीले तार। मैंने सोचा कि जब यहाँ तक आया हूँ तो बिना अंदर जाए वापस जाना ठीक नहीं और दरवाज़े के पास बची थोड़ी सी जगह से ऊपर चढ़ कर अंदर कूद गया। मुझे यह समझ नहीं आता कि दरवाज़े पर ताला लगा कर क्यों रखा गया है। यहाँ ऐसा कुछ भी नहीं था जिसके चोरी या क्षतिग्रस्त होने का ख़तरा हो। छोटी सी पगडंडी से दस मीटर आगे बढ़ने पर एक विश्राम स्थल बना था। बाहर से देखने पर यह किसी मज़ार जैसा लगता है या गाँव में बस स्टॉप होते हैं कुछ वैसा। विश्राम स्थल से नीचे की तरफ़ वो क़ब्रिस्तान दिखाई दिया जिसके चौकीदार ने विवेकानंद की जान बचाई थी। कुछ देर इस स्थल पर विश्राम करके मैं अल्मोड़ा की ओर चल पड़ा।
अल्मोड़ा में मेरा क़याम छावनी परिषद में स्थित कुमाऊँ कमीश्नर सर हैनरी रैम्जे के बंगले में था, जिसको अब सर्किट हाउस के नाम से जाना जाता है। छावनी परिषद अल्मोड़ा के एकदम टॉप पर स्थित है। आजकल यहाँ राजपूत रेजिमेंट क़याम-पज़ीर है। देवदार और चीड़ के पेड़ों से घिरा यह क्षेत्र ऊपर-नीचे टेढ़ी-मेढ़ी सड़कों और उनपर घूमते लोगों से गुलज़ार रहता है। रैम्जे का यह बंगला तक़रीबन ढाई सौ पौने तीन सौ साल पुराना होगा। बंगले के अहाते में एक-दूसरे की विपरीत दिशाओं में देवदार और पीपल के विशालकाय दरख़्त हैं और सामने सूरजमुखी के फूलों से सजा बगीचा।
बाहर से पत्थर तथा अंदर से लकड़ी का बना रैम्जे का यह विशाल बंगला अपने समय का शाहकार है। कुछ एक चीज़ों को छोड़ दें तो अधिकतर चीज़ें उसी समय की हैं। यह बंगला मुझे इसलिए भी आकर्षित कर रहा था क्योंकि मनोहर श्याम जोशी के उपन्यास ‘कसप’ का नायक देवीदत्त उर्फ़ डी.डी., हॉलीवुड का बड़ा दिग्दर्शक बन कर जब अल्मोड़ा लौटा था तो इसी सर्किट हाउस में रुका था। अब आप सोच रहे होंगे कि वो तो एक उपन्यास है, और उपन्यास कौन सा सच्ची घटना पर लिखे होते हैं। आपकी बात दुरुस्त है लेकिन न जाने क्यों मैं ऐसी चीज़ों को देख-पढ़ कर रोमांचित हो जाता हूँ। और उस कल्पना को सच मान कर जीने की कोशिश करता हूँ।
लंबे सफ़र के कारण अब हमें थकान महसूस होने लगी थी तो हमने फ़ैसला किया कि कुछ समय के लिए आराम करते हैं तथा शाम होने पर शहर घूमने निकलेंगे। नींद ऐसी लगी कि जब आँखें खुली तो शाम हो चुकी थी। कमरे की खिड़की से ठंडी ठंडी हवा के झोंके अंदर आ रहे थे। जिनमें बाहर खिले सूरजमुखी के फूलों की ख़ुशबू का स्पर्श था।
अल्मोड़ा में ब्राइट एंड कॉर्नर जिसे आजकल विवेकानंद स्थल के नाम से भी जाना जाता है, से सूर्यास्त का बड़ा दिल-फ़रेब मंज़र दिखाई देता है। हम लोग झटपट तैयार हो कर सूर्यास्त देखने के लिए निकल पड़े। माल रोड से न होते हुए, हम छावनी की सड़क से ही सीधे ब्राइट एंड कॉर्नर के लिए चहल-कदमी करने लगे। दिन की हल्की बारिश ने शाम को सुहाना कर दिया था,हवा में खुनक थी, शरीर को छूती तो रोंए खड़े होते। सीधी सपाट ढलुआ सड़क पर हम तीन लोग मोहित नेगी, मोहन भाई और मैं और सड़क के दोनों तरफ़ फौजी दस्तों से खड़े देवदार के पेड़। सर्किट हाउस से कुछ दूर चलने पर मुझे एक पुराना घर दिखाई दिया जिसके बारे में मोहन भाई ने हमें बताया कि यह रवींद्र भवन है यहीं पर रवींद्रनाथ टैगोर ने ‘विश्व परिचय’ नामक प्रसिद्ध पुस्तक की रचना की थी। मैंने मोहन भाई से इस भवन को देखने की इच्छा प्रकट की। उन्होंने बताया इस भवन में आजकल सरकारी दफ़्तर चलता है । अभी तो दफ़्तर बंद हो गया होगा, हम दिन में यहाँ चलेंगे। बातों-बातों में पता ही नहीं चला और हम ब्राइट एंड कॉर्नर पहुँच गए।
इस समय काफ़ी लोगों की भीड़ एकत्रित हो गई थी। इनमें कुछ यात्री एवं कुछ स्थानीय लोग थे। युवाओं की संख्या ज़ियादा थी। कुछ लोग बेंचों पर बैठे थे तो कुछ रैलिंग से लग कर खड़े हुए बातों में मशगूल थे। और इन सब के बीच पार्क में स्वामी विवेकानंद की भव्य प्रतिमा थी, जो अपनी चिर-परिचित मुद्रा में अपनी बाँहों को मोड़े खड़े थे। ठीक उनके पीछे रामकृष्ण आश्रम था।
सूर्यास्त प्रारंभ हो गया था। सब लोग सूरज पर अलनी नज़रें गड़ाए थे। धीरे-धीरे सूरज क्षितिज की ओर बढ़ने लगा था, अब तक जो पर्वत हरियाली से भरे थे, कुछ कुछ कत्थई होने लगे। सूरज के डूबने से पूरा क्षितिज अपना रंग बदलने लगा था। हम लोगों की निगाहें सूरज पर टिकी थीं। दिन में जिस सूरज को खुली आँखों से देखना मुहाल होता है। अब वह शफ़क़ के रंग में निहारा जा सकता था। सूरज के क्षितिज छूते ही सब लोग रोमांचित हो उठे। पूरी घाटी धुँधली हो गई, धीरे धीरे कालिमा अपने पंख पसारने लगी। एकदम क्षितिज पर प्रकाश की एक लंबी रेखा खिंची और देखते ही देखते कुछ लम्हों में सूरज क्षितिज के उस पार चला गया।
पार्क को नीम-अँधियारे ने घेर लिया था, एक पल में रात पड़ गई। यह मंज़र यादगार बन गया था। पार्क और सड़कों पर बत्तियाँ जल गईं थीं। पार्क में लोगों की चहल-क़दमी धीरे धीरे कम होने लगी और हम भी पार्क के सामने बने कैफ़े में कॉफ़ी का आनंद लेने लगे।
अगले दिन परिंदों की चहचहाहट ने नयनों के पट खोले। सुब्ह के पाँच बजे होंगे। अँधियारा छँट गया था, सूर्य की आभा वादी में फैल गई थी, देवदारों के वृक्षों से अठखेलियाँ करती नवल-रश्मियाँ कमरे में प्रवेश कर रही थीं, पूरा कमरा सुर्ख़ उजाले से भर गया था। कमरे के अहाते का दरवाज़ा खोल कर मैं बंगले के बाहर बरामदे में आ गया, नंदा देवी की चोटियों को छूकर आने वाली ठंडी हवा बदन में झुरझुरी पैदा कर रही थी।
आज हमारा अल्मोड़ा में दूसरा दिन था और हमें कई जगह घूमना था। अल्मोड़ा में घूमने के लिए इतना कुछ है कि समय कम पड़ जाए, फिर भी हम यह ठान कर आए थे कि जितना हो सकेगा घूमेंगे।
बंगले से जब हम तैयार होकर निकले सुबह के आठ बज चुके थे। धूप पूरी तरह खिल चुकी थी। हम कैंटोनमेंट से पैदल माल रोड पर उतर रहे थे। सामने नंदा देवी पर्वत की चोटियाँ धूप के कारण सुनहरी हो गई थीं। कहीं-कहीं उनके ऊपर बादल मंडरा रहे थे। आज हमने सबसे पहले कसार देवी जाने का निश्चय किया।
कसार, अल्मोड़ा की सबसे ऊँची चोटी पर स्थित है। यह स्थान एक से अधिक कारणों से प्रसिद्ध है। पहला, कसार देवी मंदिर के लिए, जो द्वितीय शताब्दी ईसवी का बताया जाता है। यह मंदिर दुर्गा के छठवें अवतार माँ कात्यायनी को समर्पित है, किंवदंती है कि कात्यायनी सर्वप्रथम इसी स्थान पर अवतरित हुई थीं। दूसरा, 1890 में इस स्थान की यात्रा स्वामी विवेकानंद ने की थी, उन्होंने मंदिर के प्रांगण में स्थित गुफा में तपस्या की तथा यहाँ हुए अपने अनुभवों को डायरी में दर्ज किया था। तबसे यह स्थान सम्पूर्ण विश्व में प्रसिद्ध हो गया। तीसरा, कसार देवी मंदिर के सामने क्रैंक रिज उर्फ़ हिप्पी हिल, जो 1960-70 के दशक में हिप्पी आंदोलन का प्रमुख स्थल रहा। इतना ही नहीं वाल्टर इवांस वैंटज, सुनीता बाबा ( अल्फ़्रेड सोनसन),तिब्बती बौद्ध लामा अनागारिक गोविंदा और ली गौतमी जैसे व्यक्तित्व इस क्षेत्र का भ्रमण तथा यहाँ आध्यात्मिक शांति का अनुभव कर चुके थे। गौरतलब है कि कसार देवी का क्षेत्र वैन एलेन बैल्ट के अंतर्गत आता है। सम्पूर्ण विश्व में ऐसे तीन क्षेत्र नासा द्वारा चिन्हित किये गए हैं जिनमें कसार देवी के अलावा बाक़ी दो दक्षिण अमेरिका के पेरु में स्थित माचू-पिच्चू व इंग्लैंड के ‘स्टोन हेंग’ में हैं।
कसार मुश्किल से अल्मोड़ा शहर से 7-8 किलोमीटर दूर था हम तक़रीबन 20 मिनट में माल रोड होते हुए फिर नंदा देवी से माल रोड को छोड़ बागेश्वर रोड से होते हुए कसार देवी पहुँच गए। मंदिर पहाड़ की चोटी पर स्थित है आस-पास जंगल के अलावा कुछ नहीं है, मंदिर से थोड़ा दूर ज़रूर कुछ हॉटेल्स और रिसॉर्ट्स वगैरह बने हैं।
मैं पहली बार कसार देवी आया था तो मुझे लगा था कि मुख्य सड़क से नीचे (खाई) की ओर मंदिर होगा, अक्सर कसार देवी मंदिर की तस्वीरों में मैंने देखा है कि मंदिर नीचे है और ऊपर से काफ़ी सीढ़ियाँ उतर कर वहाँ पहुँचा जाता है लेकिन जब मुख्य सड़क से ऊपर (पहाड़) की ओर सीढ़ियाँ दिखीं तो एक बार को मैंने सोचा हम ग़लत जगह तो नहीं पहुँच गए हैं। जब कुछ पर्यटकों को उन्हीं सीढ़ियों से आते और जाते हुए देखा तो विश्वास हो गया हम सही जगह उतरे हैं। मंदिर की चढ़ाई ज़्यादा मुश्किल नहीं है। बड़ी संख्या में पर्यटक यहाँ आते हैं तो एक मेला सा लगा हुआ था आस-पास खाने पीने की कुछ पोर्टेबल दुकानें थीं, जो शायद शाम होते ही यहाँ से रवाना हो जाती होंगी।
सीढ़ियों चढ़ते हुए मैंने महसूस किया कि मंदिर बहुत ही शांत जगह पर अवस्थित है, आस-पास चीड़ का घना जंगल है। और दूर तक फैली वादियों में, सामने ऊँट सरीखे पहाड़ की पीठ पर लदा अल्मोड़ा शहर नज़र आता है। मंदिर गोलाकार है और आकार में छोटा है इसके गर्भ-गृह में एक गुफा स्थित है जहाँ देवी विराजमान हैं। मंदिर के आगे बढ़ा सा प्रांगण है जिसमें एक पेड़ लगा है, पेड़ का नाम याद नहीं आ रहा लेकिन इतना याद है कि श्रद्धालुओं ने पेड़ पर चुनरियाँ बाँध-बाँध कर उसे पूरा लाल कर दिया था, शायद पेड़ भी अपना असली रूप भूल गया हो। मंदिर के बराबर में ही एक गुफा है जहाँ विवेकानंद ने ध्यान किया था।
हमने मंदिर में दर्शन किए और दर्शन करने के बाद दूसरी तरफ़ के दरवाज़े से जब बाहर निकले तो उधर भी मंदिर से ऊपर चढ़ने के लिए पहाड़ी से होती हुई टेढ़ी-मेढ़ी सीढ़ियाँ जाती हैं यानी ऊपर भी कोई मंदिर था। हमने देखा अधिकतर लोग मंदिर में दर्शन करने के पश्चात उन्हीं सीढ़ियों से ऊपर चढ़ रहे थे, हमने भी सीढ़ियों का रास्ता पकड़ लिया। सीढ़ियों पर कुछ ऊपर चढ़ने के पश्चात जब मैंने पीछे मुड़ के देखा तब यह राज़ खुला कि कसार देवी के जो फोटो इंटरनेट पर दिखाई देते हैं वो इन्हीं सीढ़ियों से लिये गए हैं, जो मंदिर के सड़क से नीचे होने का भरम पैदा करते हैं। मैंने भी कुछ तस्वीरें लीं और ऊपर चढ़ने लगा। ऊपर भगवान शिव को समर्पित एक मंदिर था, शिव मंदिर के बराबर में ही भैरव का एक छोटा सा मंदिर भी बनाया गया है। यह जगह भी बहुत शांत थी, इस मंदिर के प्रांगण में कई घने छायादार पेड़ लगे थे और यहाँ गुनगुनी धूप में स्कूली बच्चों को पिकनिक पर लाया गया था। बच्चे पंक्तिबद्ध नीचे फ़र्श पर बैठे थे और सामने मंदिर की चहारदीवारी की मुँडेर पर बैठी उनकी अध्यापिकाएँ गीत गुनगुना रही थीं, जिसे उनके पीछे पीछे सभी बच्चे दोहरा रहे थे।
हमने मंदिर में दर्शन किए, मंदिर की प्रतिमाएँ प्राचीन हैं किंतु ऐसा प्रतीत हो रहा था कि मंदिर का हाल ही मैं पुनर्निर्माण हुआ है मंदिर नागर शैली में बना था और पत्थरों का प्रयोग करके जैसे मंदिर हिमालय में बनाये जाते हैं ठीक वैसा ही था। दर्शन के पश्चात हम लोग उन बच्चों से थोड़ा अलग एक वृक्ष की घनी छाँव में कुछ देर के लिए बैठ गए। मंदिर में असीम शांति थी। अब यह शांति शह्र से दूर होने के कारण थी या भू-चुम्बकीय क्षेत्र होने के कारण प्रतीत हो रही थी, मुझे नहीं पता।
मैंने नीचे देखा वहाँ एक तरफ़ बढ़ा सा मैदान था, जहाँ खुले में एक शिवलिंग स्थापित किया हुआ था। कुछ लोग वहाँ बैठे ध्यान कर रहे थे और कुछ लोग फोटो खींच रहे थे। मैदान के बाद नीचे तक सिर्फ़ ढलुआ-उबड़-खाबड़ खाई थी जिसमें यूँ तो तरह-तरह के पेड़ दिखाई दे रहे थे किंतु बहुतायत चीड़ ही की थी। कहते हैं चीड़ एक बार जिस जगह उग जाता है फिर वहाँ कोई भी वनस्पति नहीं होने देता, अगर आप कभी चीड़ का जंगल देखेंगे तो उसमें सिर्फ़ चीड़ ही चीड़ होगा। चीड़ के पत्ते जिन्हें ‘पिरुल’ कहा जाता है वो पेड़ों के नीचे घास पर एकत्रित हो जाते हैं और धरती को ऐसे ढक देते हैं कि उसपर फिर कुछ भी होना ना-मुमकिन होता है। इस मामले में चीज़ भी इंसान की ही तरह है। इंसान भी जहान एक बार क़दम रख दे उस ज़मीन पर जंगल नहीं होता। मैंने कभी शेर भी कहा था –
इक बार आदमी के जहाँ भी क़दम पड़े
दोबारा उस ज़मीन पे जंगल नहीं हुआ
कसार देवी मंदिर की बाईं तरफ़, खाई की ओर एक बहुत विशाल शिला दिखाई देती है। जिस पर अक्सर लोग फोटो खिंचाते हैं। यह पत्थर पहाड़ से आगे खाई में निकला हुआ है और इतना बड़ा है कि 7-8 लोग आराम से इसपर एक साथ बैठ सकते हैं। कसार देवी मंदिर के ठीक बाहर से अगर आप इस शिला को देखें तो यह इंसान के चेहरे की तरह दिखाई देती है। माथा, आँख, नाक, मुँह सब स्पष्ट दिखते हैं। हम भी इस शिला पर पहुँचे। शिला एकदम सपाट है और खाई के मुँह में लटकी है। इस पर बैठ कर एक पल को दिल ज़ोर से धड़कता है लेकिन यहाँ से बहुत सुंदर नज़ारे दिखाई देते हैं अल्मोड़ा शहर भी ख़ूबसूरत दिखाई देता है।
मंदिर की सीढ़ियाँ जहाँ से शुरू होती हैं ठीक उसके उलट एक पगडंडी जंगल की तरफ़ जाती है। इसी पगडंडी पर कभी हिप्पी आंदोलनकारी आगे क्रैंक रिज की तरफ़ बढ़ते दिखाई देते होंगे, आज भी यहाँ काफ़ी संख्या में विदेशी पर्यटक घूमते दिखाई देते हैं। समय कम होने और धूप अधिक बढ़ जाने के कारण हो यहाँ नहीं गए।
सूरज हमारे सर के ऊपर खड़ा था, दोपहर हो चुकी थी। कसार देवी से हम वापस अल्मोड़ा के लिए रवाना हो चुके थे। अल्मोड़ा के मुख्य बाज़ार से कुछ पहले मल्ला कसून में एक प्राचीन चर्च पड़ता है। अल्मोड़ा का बडेन मेमोरियल मेथोडिस्ट चर्च। चर्च मुख्य सड़क से ही अपनी ओर आकर्षित करता है। सड़क से ऊपर की तरफ़ एक भव्य चर्च, जिस पर एक बड़ा सा घन्टा लगा है। चर्च का निर्माण 1897 में जॉन हैनरी बडेन की याद में करवाया गया था, वह एक मिशनरी थे जिन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन चर्च को समर्पित कर दिया था और अपने अंतिम दिनों में अल्मोड़ा आकर बस गए थे, 1890 में उनकी मृत्यु के पश्चात लंदन ईसाई मिशनरी ने उनकी स्मृति में इस चर्च का निर्माण करवाया। चर्च का सौंदर्य दृष्टव्य था, बड़े-बड़े पत्थरों से बनी दीवारें, अंदर से लकड़ी की साज-सज्जा। चर्च का प्रेयर हाल बड़ा और सुंदर था, जिसमें सैकड़ों लोग एक साथ बैठ कर प्रार्थना कर सकते थे।
आज जब मैं इस चर्च में आया तो चर्च में सिर्फ़ दो लोग ही थे। एक तो चर्च के फादर एवं चर्च के कार्यों में सहायता करती एक युवती। बिना भीड़ के चर्च एकदम शांत था ऊँचाई पर होने के कारण चर्च के चारों तरफ़ से दूर-दूर तक की पहाड़ियाँ दिखाई देती हैं, बड़े नयनाभिराम दृश्य थे।
युवती फूलों से चर्च को सजा रही थी, शायद आज चर्च में कोई विशेष कार्यक्रम है जिसकी तैयारी में फादर और युवती दोनों मशगूल हैं। उनको परेशान न करके मैं स्वयं ही चर्च में प्रवेश कर एक एक वस्तु को निहारने लगा, दीवारों पर ईसा मसीह की तस्वीरों के अलावा छोटी-छोटी प्लेटें लगी थीं, जिनपर कुछ लोगों का ज़िक्र था, शायद इन लोगों ने चर्च की बहुत ख़िदमत की होगी, तो श्रद्धांजलि स्वरूप चर्च में उनके नाम की यह प्लेटें लगी थीं, ऐसा मुझे इसलिए लगा क्योंकि उनमें एक नाम जॉन हैनरी बुडेन और सर हैनरी रैम्जे का भी था।
मैं चर्च में तीसरी-चौथी पंक्ति की एक बैंच पर बैठ गया। चर्च की मोटी-मोटी दीवारों से बाहर का शोर अंदर प्रवेश नहीं कर पा रहा था, मैं चर्च की शांति को महसूस करने लगा। ऐसा नहीं था मैं इस चर्च में पहली बार आ रहा हूँ, तक़रीबन दो साल पहले सर्दियों के दिनों में पहली बार मैं यहाँ आया था।
मुझे याद है वो क्रिसमस का दिन था। शाम हो रही थी और ढलते सूरज के साथ चर्च में कृत्रिम रोशनी का शहर आबाद था। चर्च का घंटा रात के अंधेरे में भी साफ़ दिख रहा था। लोगों का तांता लगा था, मानो पूरा शहर ही धीरे धीरे चर्च में उमड़ रहा हो। इस भीड़ में नौजवानों की संख्या ज़्यादा थी, सब नए-नए कपड़े पहन कर आये थे। कुछ लोग चर्च की सीढ़ियों पर फोटो खींचा रहे थे तो कुछ चर्च के प्रांगण में। कुछ लोग सीढ़ियों पर बैठे आपस में हँसी-मज़ाक़ भी कर रहे थे। चर्च के अंदर भी काफ़ी संख्या में लोग मौजूद थे। दीवारें, फूलों और लड़ियों से सुसज्जित थीं, सामने मद्धम लय में संगीत बज रहा था। फादर एक लंबा चोगा पहन कर बैठे थे, वह सांता कलॉस तो नहीं बने थे किंतु अपने हाथों में उन्होंने एक झोला ले रक्खा था। छोटे-छोटे बच्चों को अपने पास बुला कर उस झोले से टॉफ़ियाँ दे रहे थे, हमें उम्मीद थी शायद टॉफ़ियाँ हमें भी मिले, पर हम यह भूल चुके थे कि अब हम बच्चे नहीं रहे, हमें कोई टॉफ़ी नहीं मिली।
चर्च में आगे की बेंच पर बैठा बैठा मैं यह सब देख रहा था, लोग आ रहे थे कुछ देर बैठ रहे थे और क्रिसमस ट्री के साथ फोटो ले कर चले जा रहे थे। हम भी कुछ समय बैठे और फिर क्रिसमस ट्री के साथ रस्म अदा कर बाहर आ गए।
लेकिन आज चर्च में कोई नहीं था एकदम शांत था चर्च किन्तु चर्च की शांति में एक ख़ालीपन नहीं बल्कि सुकून था। मैं कुछ समय बाद चर्च से बाहर आ गया और चर्च के चारों तरफ़ टहलने लगा। बरामदे में कहीं-कहीं देवदार के बड़े-बड़े पेड़ खड़े थे और क्यारियों में लिली के फूल खिले थे। ऊँचाई पर होने के कारण हवा के झोंके बहुत तेज़ी से आ रहे थे। कुछ देर वहीं टहलने के बाद मैं चर्च से मुख्य सड़क पर उतर आया और पैदल ही नंदा देवी मंदिर की तरफ़ बढ़ने लगा।
अल्मोड़ा आए हो और नंदा देवी मंदिर न जाओ ऐसा हो ही नहीं सकता। गिनती की चीज़ें ही तो हैं जो अल्मोड़ा की विश्वप्रसिद्ध हैं। एक बाल मिठाई तो दूसरी नंदा देवी। चर्च से लगातार नीचे उतरते हुए अब मैं नंदा देवी मंदिर की गली में था। भाँति-भाँति की चीज़ों की सजी दुकानें। दिन में ही जगमग करता बाज़ार। मंदिर अल्मोड़ा शहर के बिल्कुल बीचों-बीच स्थित है।
नंदा देवी मंदिर के पीछे भी एक रोचक कहानी छिपी है। पहले इस मंदिर को उद्योतचंदेश्वर मंदिर के नाम से जाना जाता था। चंद वंश के राजा उद्योत चंद ने इसका निर्माण करवाया था इस मंदिर के पास ही राजा दीपचंद ने मंडप का निर्माण करवाया जिसको दीपचंदेश्वर मंदिर के नाम से जाना जाता है। नंदा देवी कुमाऊँ के चंद शासकों की कुलदेवी मानी जाती हैं। चंद राजा बाज बहादुर चंद ने गढ़वाल के बावन गढ़ों में से एक बधाणगढ़ (वर्तमान ग्वालदम में) के शासक को युद्ध में पराजित कर बधाणगढ़ी मंदिर से नंदा देवी की मूर्ति को जीत स्वरूप लाकर अल्मोड़ा के मल्ला महल में स्थापित किया तथा कुलदेवी के रूप में उन्हें पूजने लगा।
जब कुमाऊँ पर अंग्रेज़ों का राज हुआ तो ट्रैल कमीश्नर बनकर अल्मोड़ा आया और मल्ला महल से उसने नंदा देवी की मूर्ति को विस्थापित कर दिया। किंवदंती है कि ऐसा करने पर धीरे धीरे ट्रैल की आँखों की रोशनी जाती रही और वह अँधा हो गया। पश्चाताप स्वरूप ट्रैल ने माँ नंदा की प्रतिमा दीपचंदेश्वर मंदिर में प्रतिस्थापित करवाई और उसकी आँखों की रोशनी वापस आ गई। तब ही से इस मंदिर को लोग उद्योतचंदेश्वर / दीपचंदेश्वर के स्थान पर नंदा देवी के नाम से जानने लगे। वैसे भी नंदा देवी भी हैं तो पार्वती ही। नंदा देवी, गढ़वाल तथा कुमाऊँ दोनों क्षेत्रों की आराध्य देवी हैं, पूरे उत्तराखंड में नंदा देवी के सैंकड़ों मंदिर हैं। प्रत्येक बारह वर्षों में होने वाली नंदा देवी राजजात में गढ़वाल एवं कुमाऊँ समेत पूरे विश्व से लोग शामिल होने आते हैं।
अल्मोड़ा का नंदा देवी मंदिर कुमाऊँनी स्थापत्य का अनूठा नमूना है, गर्भगृह नागर शैली का बना है और उसके आगे ढलुआ पहाड़ी छत से बना मंडपम, इस मंदिर को स्थापत्य की दृष्टि से भी बाक़ी मंदिरों से जुदा करता है। मंदिर के आगे फैला आँगन, जहाँ प्रतिवर्ष नंदा देवी मेले के आयोजन पर सांस्कृतिक कार्यक्रमों की झड़ी लगी होती है। मंदिर के गर्भगृह में तीन मूर्तियाँ विराजमान हैं जिनमें नंदा-सुनंदा तथा तीसरी मूर्ति स्थानीय देवी की है।
पिछली बार जब हम अल्मोड़ा आए थे तो खीम सिंह मोहन सिंह की दुकान की बाल मिठाई खिला कर सुन्दर बिष्ट ने हमारा स्वागत किया था, उन दिनों नंदा देवी मंदिर में मेला लगा था। हम लाल माटी की सीढ़ियों से चढ़ते हुए सबसे पहले नंदा देवी के मंदिर में ही आए थे। मंदिर रोशनी के लड़ियों से रोशन था, बड़ी संख्या में श्रद्धालु मंदिर के प्रांगण में थे। मंदिर की दाईं तरफ़ स्टेज पर सांस्कृतिक कार्यक्रम हो रहे थे। नंदा देवी के भजनों पर छोटी-छोटी लड़कियाँ लहंगा-पिछौड़ा पहने थिरक रही थीं। मेले में आस-पास के गाँवों से भी काफ़ी संख्या में लोग आए थे जो मंदिर के नज़दीक सजी-धजी दुकानों से ख़रीदारी में व्यस्त थे।
लेकिन आज मंदिर में गिनती के लोग मौजूद थे, शाम धीरे धीरे अपने पँख पसारने लगी थी। कुछ बच्चे कुछ नौजवान अपने घरों से निकल कर मंदिर की ओर आ रहे थे और बाहर से ही दर्शन करके जा रहे थे। कुछ ने वहीं मंदिर के बाहर बनी सीढ़ियों पर अपना डेरा जमा लिया था। हम भी उन्हीं सीढ़ियों पर बैठ थे। दिन में मंदिर एकदम सूना हो जाता है शाम होते होते फिर से चहल-पहल होने लगती है। मंदिर के प्रांगण में बैठे मैं, मोहित नेगी, सुंदर बिष्ट बात कर रहे थे कि अल्मोड़ा नंदा देवी की वजह से ही जाना जाता है, तो मोहित नेगी बोले ‘किन्तु साहित्य के क्षेत्र में अल्मोड़ा सुमित्रानंदन पंत, शेखर जोशी, शैलेश मटियानी के नाम से जाना जाता है।
मुझे भी याद आया कि पहली बार अल्मोड़ा से मेरा परिचय अपने स्कूल की हिन्दी पाठ्यपुस्तक में सुमित्रानंदन पंत के जीवन परिचय को पढ़कर ही हुआ था और हाल में मैंने जो ‘कसप’ उपन्यास पढ़ा है उसके लेखक मनोहर श्याम जोशी भी अल्मोड़ा के ही थे, ये बात अलग है कि उनका जन्म अजमेर में हुआ किन्तु फिर भी जीवन भर उनका अल्मोड़ा से जुड़ाव रहा।
अपनी पिछली दिल्ली यात्रा में, मेरा प्रभात रंजन जी से मिलना हुआ। बातों बातों में मनोहर श्याम जोशी का ज़िक्र छिड़ा तो उन्होंने मुझे बताया कि जोशी जी का पुश्तैनी घर अल्मोड़ा में ही स्थित है। आज मैं अल्मोड़ा में ही था तो मैंने प्रभात रंजन जी से पता किया ताकि मैं मनोहर श्याम जोशी के घर को देख सकूँ। जोशी जी को इस जहान-ए-फ़ानी से गए बीस बरस होने वाले हैं। लेकिन अपने पुरखे लेखकों को याद करना उनके घर के दर्शन करना भी लिखना सीखने वालों के लिए किसी तीर्थ से कम नहीं।
प्रभात जी ने बताया कि गल्ली अल्मोड़ा में जोशी जी का घर पड़ता है। उन्होंने मुझे अल्मोड़ा की लेखिका दीपा गुप्ता जी से बात करने की सलाह दी, दीपा जी से पता चला कि जाखन देवी मंदिर के पास ही जोशी जी का पुश्तैनी घर है। जाखन देवी मंदिर माल रोड पर पड़ता है। मैं नंदा देवी मंदिर से जाखन देवी की तरफ़ पैदल ही चलने लगा। माल रोड से कोसी की ओर, नंदा देवी मंदिर से तकरीबन एक किलोमीटर चलने पर ही जाखन देवी मंदिर पड़ता है। मैं शहर में अनजान था और नहीं जानता था कि गल्ली अल्मोड़ा में कहाँ पड़ता है। रास्ते में चलते चलते मैंने सोचा कि दुकानदारों से पूछ लेना सही रहेगा। मंदिर से थोड़ा पहले एक सब्ज़ी की दुकान पड़ी।
मैंने दुकानदार से पूछा – क्या आप जानते हैं मनोहर श्याम जोशी का घर कौन सा है?
दुकानदार : मनोहर श्याम जोशी! इस नाम का तो कोई यहाँ नहीं रहता।
मैं – मुरली मनोहर जोशी को तो आप जानते होंगे, उनका घर कौनसा है? (प्रभात जी ने मुझे बताया था कि मनोहर श्याम जोशी, बीजेपी नेता मुरली मनोहर जोशी के चचेरे भाई थे)
दुकानदार: हाँ! बहुत अच्छे से जानता हूँ, कॉलेज के समय मैं उनके घर में किराए पर रहता था। आप जो सामने बड़ा सा घर देख रहे हैं, वही उनका घर है। लेकिन अब वहाँ कोई नहीं रहता, उन्होंने यह घर बेच दिया था आजकल वहाँ एक एनजीओ कार्यरत है। वैसे आप कहाँ से आए हैं?
‘मैं दिल्ली से आया हूँ, सोचा जब यहाँ आया हूँ तो जोशी जी का घर भी देख आऊँ।’
दुकानदार- जब आप इतनी दूर से आए हैं तो ज़रूर हो आइए!
दुकानदार ने सड़क के मोड़ पर स्थित, जिस घर की तरफ़ इशारा किया था मैं वहाँ पहुँचा। घर सड़क से नीचे की तरफ़ बना था और बहुत ही बड़ा था। मुख्य द्वार पर एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति अपनी बाइक चमका रहा था। मैं उनसे मुख़ातिब हुआ तो पता चला यही घर मुरली मनोहर जोशी का पुश्तैनी घर था। लेकिन उन्होंने 90 के दशक में इसको बेच दिया था और आजकल यहाँ उत्तराखंड सेवा निधि नामक एनजीओ कार्यरत है।
घर देखने की मेरी ख़्वाहिश को जानकर उन्होंने मुझसे कहा, आप घर देख सकते हैं लेकिन आज इतवार होने की वजह से दफ़्तर बन्द है। आप चाहें तो बाहर से घर को देख सकते हैं। अँधा क्या माँगे दो आँखें, चलो अंदर से न सही बाहर से घर देखने का मौक़ा तो मुझे मिल ही रहा था। सड़क से सटी सीढ़ियों से होते हुए मैं एक सुंदर से बगीचे में नीचे उतरा, बगीचा आकर में भले छोटा था लेकिन था बेहद ख़ूबसूरत। सामने दीवार पर दरवाज़े-नुमा मेहराब से घर के आँगन में पहुँचा। कुमाऊँनी शैली का दो मंज़िला बना घर, तल पर दोनों तरफ़ बरामदे और उसके बाद कमरे बने थे। आँगन से पहली और दूसरी मंजिल पर कुमाऊँनी स्टाइल की सीढ़ियाँ, जिसका दरवाज़ा पारंपरिक कुमाऊँनी शैली का था। काठ के दरवाज़े पर नक़्क़ाशी की हुई थी और सीढ़ियों पर ऐंपण बनाया हुआ था।
ऐंपण जिसका अर्थ लीपना होता है, कुमाऊँ की पारंपरिक लोक कला है। इसको आप कुछ-कुछ रंगोली की तरह समझिए। वैसे यह देश के अन्य स्थलों पर भी प्रचलित है और अन्य नामों से जाना जाता है जैसे उत्तर प्रदेश में पूरना, गुजरात में अल्पना आदि, किन्तु कुमाऊँ का ऐंपण अपने रंग संयोजन के कारण विशेष है। गेरुई पृष्ठभूमि पर चावल को पीस कर बनाए गए लेप से ऐपण बनाया जाता है। इसको शुभ अवसरों यथा तीज-त्यौहारों आदि पर घर के प्रवेश द्वार तथा पूजा आदि के स्थान पर बनाया जाता है।
जोशी जी के घर की सीढ़ियों पर भी ऐंपण बना हुआ था। घर पुराना था और अपने साथ लंबा इतिहास समेटे था। मैंने बाहर से ही घर के कुछ फोटो खींचे। घर के आँगन के बाद कुछ सीढ़ियाँ नीचे उतरने पर एक छोटे से खेत का टुकड़ा था जो शायद इस घर का ही हिस्सा था। घर के बरामदे से ही खेत के प्रवेश द्वार पर उगे बड़े से आड़ू के पेड़ पर लदे आडुओं ने अनायास ही मेरा ध्यान खींचा। आड़ू पके हुए थे और घर के दफ़्तर में बदल जाने की सज़ा भुगत रहे थे। घर में बच्चे होते तो इन आडुओं के पकने का इंतज़ार ही न करते, कच्चे आडुओं को भी सफ़ा-चट कर जाते। आड़ू पेड़ से टूट टूट कर नीचे ज़मीन पर गिर रहे थे। ऐसे में मैंने आड़ू तोड़ कर कुछ अपनी ज़ेबों में भरे और कुछ वहीं खाए। बहुत मीठे आड़ू थे आज भी उसका स्वाद जीभ पर बरक़रार है।
जोशी जी के पुश्तैनी घर को देखने और उनके बग़ीचे के आड़ू खाने के बाद मैं फिर घर के चौकीदार के पास पहुँचा, वो अभी भी अपनी बाइक चमका रहे थे। मैंने उनसे जोशी जी के बारे में जानना चाहा तो उन्होंने अपनी असमर्थता प्रकट की कि वह पिछले 2-3 साल से यहाँ कार्यरत हैं और जोशी जी इस घर को बहुत पहले ही बेच चुके हैं। फिर उन्होंने बताया कि आगे ग्रीनफील्ड स्कूल के पास गिरीश चंद्र पांडे रहते हैं, जीआईसी के रिटायर्ड प्रिंसिपल हैं तथा अल्मोड़ा के पुराने आदमी भी, वो ज़रूर आपको उनके बारे में बता पाएँगे।
गिरीश चंद्र पांडेय जी के घर का रास्ता जानने के बाद मैं पूछता-पूछता उनके घर पहुँचा। लेकिन गिरीश जी घर पर नहीं थे, उनकी धर्मपत्नी से मेरी मुलाक़ात हुई। उन्होंने मुझे बताया कि ‘पहले वह मनोहर श्याम जोशी के घर में किराए पर रहते थे। जोशी जी का मकान जाखन देवी मंदिर के एकदम बराबर में है।’
मैंने उनसे पूछा – क्या मुरली मनोहर जोशी और मनोहर श्याम जोशी का घर अलग-अलग है? मैं तो जिस घर को देख कर आ रहा हूँ उसे ही मनोहर श्याम जोशी का पुश्तैनी घर समझ रहा था।
वो बोलीं – जिस घर की आप बात कर रहे हैं वो तो मुरली मनोहर जोशी जी का ही पुश्तैनी घर है, दोनों में रिश्ता ज़रूर था लेकिन घर दोनों के अलग ही थे। मैं आपको एक व्यक्ति का पता देती हूँ वो ज़रूर आपको मनोहर श्याम जोशी के बारे में बहुत सी बातें बता सकेंगे। फिर वो मुझे अपने घर से नीचे की तरफ़ दूर चमकते एक घर को दिखाने लगीं। आप वह जो घर देख रहे हैं जो पुराने घर के बराबर में है, नया नया बना दिख रहा है, वही रामचंद्र जोशी जी का घर है। रामचंद्र जी वकील और अल्मोड़ा के बड़े प्रतिष्ठित व्यक्ति थे। उनकी मनोहर श्याम जोशी जी से काफ़ी नज़दीकी थी। अब तो उनकी मृत्यु हो गई किन्तु उनके बेटे आपको घर मिल जाएँगे, आप एक बार उनसे मिल लीजिए।
मैं उनको धन्यवाद कहकर, बताए गए घर तक पहुँचने के लिए नीचे उतरने लगा। जाखन देवी के बराबर से एक पगडंडी जा रही थी, उस पर आती मुझे एक लड़की दिखाई दी, मुझे लगा इससे घर का पता कंफर्म कर लेना चाहिए। मेरे पूछने पर कि क्या आप रामचंद्र जोशी जी का घर बता सकती है?
उस लड़की ने कहा – मैं नहीं जानती, हम लोग कुछ दिन पहले ही यहाँ शिफ़्ट हुए हैं, आप किसी ओर से पूछ लीजिए।
मैंने सोचा यह लड़की इतना न बोलकर अगर ‘कसप’ कह देती उससे भी काम चल सकता था। मैंने कहीं पढा था कि एक मर्तबा मनोहर श्याम जोशी अल्मोड़ा में किसी युवती से कोई पता पूछ रहे थे, जिसके जवाब में वह बार बार ‘कसप’ ‘कसप’ कर रही थी, उन्हें बाद में पता चला कि वह लड़की कुमाऊँनी में ‘मुझे नहीं पता / मैं नहीं जानती’ कह रही है। आगे चलकर जोशी जी ने ‘कसप’ नाम से उपन्यास भी लिखा और हो सकता है कसप की ‘बेबी’ उसी लड़की से प्रभावित रही हो।
ख़ैर, मैं उसी पगडंडी पर आगे बढ़ने लगा। बताए गए घर पर पहुँच कर मैंने घर की बैल बजाई तो अंदर से साठ बरस के आस-पास की उम्र के एक सज्जन बाहर आए। उन्होंने मुझसे आने का कारण पूछा। मेरे कारण बताने पर उन्होंने मुझे बैठाया और स्वयं अंदर कमरे में चले गए। कमरे में वह अपने बड़े भाई को बुलाने के लिए गए थे। उनके बड़े भाई इतिहास के प्रोफ़ेसर थे। मैंने उन्हें अपने आने का कारण बताया कि मैं दिल्ली से आया हूँ और मनोहर श्याम जोशी के घर को देखना चाहता था। ऊपर जीआईसी के प्रिंसिपल पांडेय जी के घर से पता चला कि आपने परिवार की उनसे काफ़ी नज़दीकी थी।
वह कहने लगे – मनोहर श्याम जोशी और हम एक ही परिवार के थे। वह मेरे पिताजी के बहुत अच्छे मित्र थे और रिश्ते में उनके चाचा लगते थे। हम सब गल्ली के जोशी हैं। यह पूरा क्षेत्र जो आप देख रहे हैं यहाँ गल्ली के जोशी ही निवास करते हैं।
मैंने पूछा – क्या इसी क्षेत्र को गल्ली कहते हैं यही जोशी जी का पुश्तैनी गाँव है?
उन्होंने बताया – यह हमारा पुश्तैनी गाँव नहीं है, असली गल्ली गाँव तो अल्मोड़ा से 30-32 किलोमीटर दूर है, यहाँ से आप कोसी जाएँ तो कोसी के पुल से एक रास्ता कटता है वह गल्ली को ही जाता है।
मैंने पूछा – फिर इस क्षेत्र का नाम गल्ली कैसे पड़ा?
वह – जब कुमाऊँ के चंद शासकों ने अल्मोड़ा शहर बसाया तब आस-पास के गाँवों से काफ़ी संख्या में उन्होंने लोगों को यहाँ बसाया, जिस गाँव से आकर लोग यहाँ बसे उस मोहल्ले का नाम उसी गाँव पर पड़ गया। जैसे हम गल्ली से आए तो इस मोहल्ले का नाम गल्ली अल्मोड़ा पड़ गया।
मैंने पूछा – फिर तो मनोहर श्याम जोशी जी का पुश्तैनी घर भी गल्ली गाँव में होगा?
वह – हाँ, गाँव में भी उनका पुश्तैनी घर है, लेकिन अब तो शायद वह टूट भी चुका हैं। जाखन देवी मंदिर के पास उनका जो घर है बस यही बचा है।
‘क्या जोशी जी अल्मोड़ा आया करते थे, आपने उन्हें देखा है?’
‘जोशी जी का जन्म भले अजमेर में हुआ हो, लेकिन वह साल में एक बार अल्मोड़ा ज़रूर आते थे। जाखन देवी मंदिर में पूजा भी किया करते थे। जिन दिनों वे यहाँ रहते थे तो अक्सर हमारे घर आया करते। मेरे पिताजी की बहुत बड़ी लाइब्रेरी थी, अक्सर वह उस लाइब्रेरी से पढ़ने के लिए किताबें भी ले जाते थे।’
‘मेरे पूछने पर कि क्या आपको ऐसी किसी रचना के बारे में पता है जो उन्होंने अल्मोड़ा में लिखी हो?’
‘मनोहर श्याम जोशी ज़िन्दगी भर लिखते रहे, लेखक से पहले वह पत्रकार के रूप में प्रतिष्ठित थे, गौरतलब है कि उन्होंने भारत का पहला सोप ओपेरा ‘हम लोग’ भी लिखा। किन्तु जितना मुझे याद आता है उन्होंने हमारे घर में रहकर तो कुछ नहीं लिखा, यहाँ वह किताबें ज़रूर पढ़ने आते थे। हो सकता है अपने घर में लिखा भी हो! वैसे मुझे लिखने से याद आया कि सुमित्रानंदन पंत का घर भी यहीं पास में माल रोड के ऊपर स्थित है जब आप इतनी दूर से आये हैं तो उसे भी देख आइएगा।
मैंने उनसे कहा – क्या आप मुझे मनोहर श्याम जोशी और सुमित्रानंदन पंत का घर दिखा सकते हैं?’
‘ज़रूर! मैं आपको एकदम सही पता बताता हूँ। जिस पगडंडी से आप आए हैं उसी पर वापस जाने पर मुख्य सड़क पर न जाकर जाखन देवी मंदिर का जो रास्ता है उससे जाइये, मंदिर में प्रवेश न करें वही रास्ता नीचे मनोहर श्याम जोशी के घर में जाता है। तथा माल रोड में मुरली मनोहर जोशी के घर से थोड़ा सा पहले सीढ़ियों ऊपर को जाती हैं कुछ सीढ़ियाँ चढ़ने पर ही बाईं तरफ़ आपको एक बहुत पुराना और विशाल घर देखने को मिलेगा, वही सुमित्रानंदन पंत का घर है।
उनका शुक्रिया अदा करके, मैं उनके बताए रास्ते से जाखन देवी के बराबर से गुज़रकर एक घर में पहुँचा। वहाँ एक ही आँगन में कई घर बने थे। अब मुझे यह समझ नहीं आ रहा था कि इनमें से जोशी जी का घर कौनसा होगा? इस दुविधा से निकलने के लिए मैंने पहले ही घर की कुंडी खटखटाई, उसमें से पचास बरस के आस-पास के मद्धम कद काठी के गोल-मटोल व्यक्ति बाहर निकले। मैंने उन्हें अपना परिचय दिया, तो उन्होंने बताया कि वह जोशी जी के ख़ानदानी पंडित हैं। जोशी जी के घर के बारे में पूछने पर उन्होंने अपने बाएँ हाथ की तरफ़ इशारा करके कहा कि यह तो घर आप देख रहे हैं जोशी जी का ही है।
मकान एक मंज़िला ही था और सड़क से बिल्कुल सटा हुआ था। वह मुझे मकान दिखाने लगे। हम मकान के पीछे की तरफ़ बने मुख्य द्वार पर गए जहाँ अब झाड़ियाँ उग आई थीं और कुमाऊँनी शैली के बने काठ का नक़्क़ाशीदार दरवाज़ा गल रहा था। मकान खंडर में तब्दील हो रहा था। खिड़कियों के शीशे भी टूटे थे।
पंडित जी ने बताया – हम कुछ बरस पहले तक इसी मकान में रहते थे किंतु मकान ख़स्ता हाल होने और पिछले साल घर की आधी छत गिर जाने के कारण अब बराबर के मकान में रहने लगे हैं।
‘मैंने उनसे घर को अंदर से दिखाने के लिए कहा।’
‘घर तो आपको मैं अंदर से दिखा दूँ, लेकिन ख़स्ताहाल होने तथा छत टूटने के कारण अंदर बहुत सीलन आ गई है। कुछ दिन पहले ही मकान के अंदर दो साँप भी दिखाई दिए थे। इसलिए हम में से भी कोई अब इसके अंदर नहीं जाता। मैं आपको आगे से पूरा घर दिखा देता हूँ।’
हम दोनों अब बरामदे से होते हुए घर के आगे आ गए यानी माल रोड की तरफ़। मकान के बाहर बनी सीढ़ियाँ चढ़कर हम दोनों माल रोड के बिल्कुल बराबर खड़े जोशी जी के घर को निहार रहे थे। इस तरफ़ भी काफ़ी झाड़ियाँ उगी थीं और पठाल से बनी छत आधी ढह चुकी थी। पंडित जी का कहना था अगर मरम्मत न कि गई तो बरसात मुश्किल ही पकड़ेगी। पूछने पर उन्होंने बताया कि इस घर में मनोहर श्याम जोशी के अलावा उनके परिवार के बाक़ी भाइयों का भी हिस्सा है। सभी लोग एकमत नहीं हो पाते जिसकी वजह से यह घर खंडर में तब्दील हो चुका है। पंडित जी ने बड़ी उम्मीद के साथ मुझसे कहा कि अगर आप दिल्ली में मनोहर श्याम जोशी जी के बेटों से मिलते हैं तो उनसे कहिएगा कि इसको ठीक करा दें। अब मैं उनसे क्या कहता कि मैं उनका एक प्रशंसक हूँ। मैं जोशी जी के परिवार को व्यक्तिगत रूप से नहीं जानता। मैं उनका दिल नहीं तोड़ना चाहता था इसलिए कुछ न कहा। और मैंने उनसे विदा ले ली।
वैसे आपको मैं जाखन देवी मंदिर के बारे में बताना तो भूल ही गया, जाखन देवी मंदिर अल्मोड़ा के सबसे प्राचीन मंदिरों में से है। जाखन देवी, यक्षों की देवी थीं, और यक्षिणी देवी के नाम से जानी जाती थीं जो बाद में नाम के अपभ्रंशीकरण के कारण ‘जाखन’ हो गया। जाखन देवी मंदिर प्राचीन काल में अल्मोड़ा में यक्षों की उपस्थिति का जीता-जागता प्रमाण है। मंदिर में देवी की कोई मूर्ति स्थापित नहीं है बल्कि देवी एक शिलाखंड के रूप में यहाँ विराजमान हैं। मंदिर के प्रांगण में एक विशाल पेड़ भी खड़ा है।
मैं मनोहर श्याम जोशी का घर देख चुका था। मन में ख़ुशी भी थी और घर के खंडर में तब्दील होता देख दुख भी। मैंने सोचा सुमित्रानंदन पंत के घर भी हो ही आता हूँ क्या पता उसको देख कर थोड़ा दुख कम हो। मैं माल रोड पर जाखन देवी से मुरली मनोहर जोशी के घर की तरफ़ बढ़ रहा था। थोड़ा पहले एक मिठाई की दुकान आई, मैंने उस पर मिठाई बनाते अंकल से पंत के घर का पता पूछना चाहा। तो उन्होंने मुझे दुकान में बैठे एक वृद्ध से मुख़ातिब होने को कहा। वह वृद्ध मुझसे पूछने लगे- बताइए आपको कहाँ जाना है?
मैंने उनको बताया – मुझे सुमित्रानंदन पंत के घर जाना है।
‘आपको क्या काम है? आप कहाँ से आए हैं?’
‘मुझे कुछ काम नहीं है मैं दिल्ली से आया था, अभी मनोहर श्याम जोशी के घर से आ रहा हूँ। वहाँ पता चला पंत का घर भी नज़दीक है तो सोचा देखता चलूँ।’
‘सही किया आपने, चलिए मैं आपको ले चलता हूँ, मैं उसी घर में रहता हूँ।’
हम दोनों अब पंत के घर की तरफ़ चलने लगे। वह कोई 75 वर्ष के वृद्ध व्यक्ति थे। छड़ी पकड़ कर चलते थे। बोलते बहुत जल्दी-जल्दी थे और ऊपर से उनकी आवाज़ लड़खड़ाती थी। जिससे उनकी आधी बातें ही मेरी समझ में आ रही थीं।
‘उन्होंने अपना नाम अरुण जोशी बताया और यह भी कि वह सुमित्रानंदन पंत की भतीजी के देवर हैं। उनकी नब्बे वर्षीय भाभी गाँव में रहती हैं और अब उनकी याददाश्त कमज़ोर होने लगी है वह उनको भी पहचान नहीं पातीं।
बातों बातों में हम सुमित्रानंदन पंत के घर पहुँच चुके थे। घर बहुत आलीशान था। बिल्कुल वैसा ही था जैसे घर कुमाऊँ में पहले समय में बनाए जाते थे। इस विशाल घर में दर्जनों कमरे थे। बाहर काफ़ी बड़ा आँगन था जो कपड़ों से लदी तारों से पूरा भरा था। अरुण जोशी जी ने अपने कमरे का ताला खोला और हम दोनों अंदर बैठ कर बातें करने लगे। पुराने पहाड़ी घरों की दीवारें काफ़ी मोटी-मोटी बनाई जाती हैं जिसकी वजह से वह सर्दियों में गर्म तथा गर्मियों में ठंडे रहते हैं। गर्मियों के महीना चल रहा था लेकिन जोशी जी का कमरा बिना पंखे के भी एकदम ठंडा था।
जोशी जी से मैंने पूछा – क्या आप सुमित्रानंदन पंत से मिले हैं कभी?
‘हाँ, उनसे मेरी एक बार मुलाक़ात हुई है। हमारे यहाँ एक शादी में सुमित्रानंदन पंत आये थे। कोट पैंट पहने लंबे-घुँघराले से बाल। उस समय हम छोटे थे उनकी प्रसिद्धि को नहीं जानते थे तो हम लोगों ने उन पर अधिक ध्यान नहीं दिया। उस समय कैमरे भी इतने प्रचलन में नहीं थे तो हम उनके साथ तस्वीर भी नहीं ले पाए।
‘कौसानी में स्थित पंत जी के निवास को तो सब जानते हैं वहाँ उन्होंने अपना बचपन गुज़ारा,क्या पंत इस घर में कभी रहे थे?’
‘मैं आपको बता दूँ कौसानी में सुमित्रानंदन पंत का पुश्तैनी घर नहीं है। उनके पिताजी कौसानी में नौकरी करते थे तो वहीं उन्होंने अपना घर भी बना लिया किन्तु उनका पुश्तैनी घर ठीक अल्मोड़ा के सामने जो आप वो पहाड़ देख रहे हैं, उस तरफ़ है स्यूनराकोट। उनका जन्म भी स्यूनराकोट में ही हुआ था जन्म के तुरंत बाद माता का निधन हो जाने के कारण कौसानी में उनको नानी के पास भेज दिया गया था। अल्मोड़ा का यह घर भी सुमित्रानंदन के पिताजी श्री गंगादत्त पंत ने ही बनवाया था। मेरा जन्म इसी मकान की पहली मंज़िल पर हुआ था। बचपन यहीं बीता है मेरा। पंत यहाँ मेरे जन्म से पहले हो सकता है रहे हों, मैंने अपने सामने उनको यहाँ कभी नहीं देखा।’
‘अन्य कमरों में जो लोग हैं क्या वह सुमित्रानंदन पंत के परिवार के लोग ही हैं?’
‘अब परिवार के लोग कहाँ? पंत ने तो शादी ही नहीं की थी। इस मकान में बहुत से हिस्सेदार थे लेकिन अब सभी लोग बाहर ही रहते हैं, सबने अपने हिस्से के कमरे किराए पर चढ़ा दिए हैं, ये सब लोग किरायेदार हैं।’
‘आप अकेले यहाँ रहते हैं या आपका परिवार भी साथ रहता है?’
‘मैं अकेला ही यहाँ रहता हूँ, दो बेटे थे दोनों किसी काम के नहीं निकले। बीवी अब है नहीं। मैं अकेला ही रहता हूँ, अकेला ही बनाता हूँ अकेला ही खाता हूँ।’
‘मैं अब चलता हूँ, मैंने आपका काफ़ी समय ले लिया। क्या मैं इस घर की तस्वीरें ले सकता हूँ?’
‘अरे समय कटता ही कहाँ है, आज आप आ गए तो कुछ समय आपके साथ बातों में कट गया, आप घर के साथ मेरी भी तस्वीर ले लीजिए। और मुझे याद करते रहिएगा।’
‘मुझे आपसे मिलकर बहुत अच्छा लगा, दोबारा अल्मोड़ा आऊँगा तो आपसे ज़रूर मिलूँगा।’
हम दोनों कमरे के बाहर आ गए वह बाहर बनी सीढ़ियों पर अपनी छड़ी थामे बैठ गए मैंने उनकी और घर की कुछ तस्वीरें लीं। ईश्वर जाने अब मेरा इनसे दोबारा मिलना होगा भी या नहीं किन्तु आज का दिन मेरे लिए यादगार दिन बन गया था। दिन भर घूमने के बाद मनोहर श्याम जोशी और सुमित्रानंदन पंत का घर न सिर्फ़ देखने को मिला बल्कि बहुत सी बातें भी उनके बारे में पता चलीं। मैं उनको वहीं बैठा छोड़ रास्ते की सीढ़ियाँ उतरने लगा था। शाम अपनी आख़िरी साँसें गिन रही थी। आसमान पर फैली लालिमा धीरे धीरे अँधियारे के गर्भ में समा रही थी और मैं माल रोड पर अल्मोड़ा की यादें संजोए पैदल चले जाए रहा था।
– अभिषेक कुमार अम्बर

