पिछले कुछ वर्षों में नेहरु को खूब याद किया जा रहा है. बीच में तो उनको लोग भूलने से लगे थे. हाँ, यह बात अलग है कि पहले उनको सीने पर लगे गुलाब के गुलाब के लिए याद किया जाता था. आज देश की एक बड़ी आबादी को उस गुलाब के कांटे चुभने लगे हैं. लेकिन यह तो है ही कि उनको पहले से अधिक याद किया जाने लगा है. नेहरु की व्याप्ति का इससे बड़ा प्रमाण क्या हो सकता है? आजकल युवा लेखिका अणुशक्ति सिंह नेहरु का होना, न होना श्रृंखला लिख रही हैं. उसी का एक हिस्सा नेहरु की 53 वीं पुण्यतिथि के बीत जाने के अगले दिन, जो संयोग से इतवार भी है- मॉडरेटर
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नेहरू का होना, नेहरू का न होना
जिस वक़्त आप नेहरू की विफलताओं की बात कर रहे हैं, आपका ध्यान मैं द्वितीय विश्वयुद्ध के बाद वाले वैश्विक राजनैतिक परिदृश्य की ओर खींचना चाहूंगी. समूची दुनिया दो धड़ों में बंटी थी. अमेरिका और रूस दोनों अपने अपने प्यादे मुल्क तैयार करने में जुटे थे, उसी वक़्त भारत के तात्कालिक प्रधानमंत्री ने एक अभूतपूर्व फैसले की ओर कदम बढ़ाया था. अपने दो मित्र देश यूगोस्लाविया और मिस्र के साथ मिलकर किसी भी धड़े की ओर न जाने का मन बनाया था. एक आंदोलन की शुरुआत की थी – गुटनिरपेक्ष आंदोलन. एक ऐसी तीसरी दुनिया का विकास जिसका किसी भी तरह के विभाजन से कोई लेना देना नहीं था. जो शीत युद्ध में किसी खेमे का हिस्सा नहीं था. इस तीसरी दुनिया का एक मात्र मकसद अपनी संप्रभुता और स्वायत्ता को बरक़रार रखते हुए वैश्विक विकास की ओर अग्रसर होना था. इस दुनिया के बारे में आधुनिक युग के सबसे सशक्त नेताओं में से एक फिदेल कास्त्रो ने कभी कहा था, “गुटनिरपेक्ष आंदोलन का उद्देश्य गुट-निर्पेक्ष देशों की स्वाधीनता, संप्रभुता, क्षेत्रिय-अखंडता और सुरक्षा सुनिश्चित करना है.” कभी लगभग सिर्फ़ तीन देशों से शुरू हुई इस संस्था जे अंदर दुनिया की 55 प्रतिशत से ज़्यादा आबादी आती है. करीब दो तिहाई संयुक्त राष्ट्र सदस्य देश गुट-निर्पेक्ष आंदोलन के सदस्य हैं. यह लगभग सभी विकासशील देश की मातृ संस्था है. विशेष यह है कि थर्ड वर्ल्ड के अनुपम महिमामंडन की कल्पना भी यहीं से शुरू हुई थी.
इस सब का दारोमदार भारत के उसी प्रथम प्रधानमंत्री को जाता है जिन्हें आप तमाम तरह के विभूषणों से नवाज़ते हैं.

