झूलन का त्योहार भगवान् कृष्ण और देवी राधा को समर्पित है। झूलोँ, गीतोँ और नृत्य से सजा यह भारत की सांस्कृतिक विरासत अभी भी गाँवोँ-कस्बों धूम-धाम से मनायी जाती है। डिजिटल युग मेँ सहभागी कमते जा रहे हैँ फिर भी यह अभी भी बहुतोँ के आकर्षण का केन्द्र है।
मुंगेर मेँ मनाए जा रहे झूलन उत्सव और समकालीन पेशेवर इतिहासकारोँ पर दृष्टि डालती यह कथा पाठकोँ के लिए। लिखा है युवा लेखक प्रचण्ड प्रवीर ने -मॉडरेटर
============================
पेशेवर इतिहासकार
कल की बात है। जैसे ही मैँने खाने की थाली मेज से उठाई, कन्हैय्या भैय्या का फोन आ गया। “झूलन के कार्यक्रम मेँ यदि चलना है तो पाँच मिनट मेँ घर के बाहर आ जाओ।“ मैँने झट हामी भर दी। वैसे भी रात के खाने के बाद टहलना अच्छा होता है। उम्र मेँ मुझसे पन्द्रह साल बड़े कन्हैय्या भैय्या इतिहास के अध्येता, कम इतिहासकार अधिक हैँ। उनका मानना है कि बीसवीँ सदी मेँ जो भूमिका पेशेवर बुद्धिजीवी यानी ‘पब्लिक इण्टेलेक्च्युअल’ की थी, इक्कीसवीँ सदी मेँ उसी का संवर्धन पेशेवर इतिहासकार के रूप मेँ हुआ है। मैँ उनके ज्ञान विस्तार से प्रभावित था। कुछ दिन पहले की मुलाकात मेँ उन्होँने नगर मेँ कला के गिरते स्तर पर गहरी चिन्ता व्यक्त की थी। उनके शब्द थे – ‘आज से चालीस साल पहले यहाँ अनूप जलोटा, पङ्कज उधास, ऊषा उत्थुप जैसे गायक प्रस्तुति देने आया करते थे। एक समय मेँ झूलन के पाँच दिनोँ मेँ पास की ठाकुरबाड़ी मेँ बनारस से शास्त्रीय गायक आया करते थे। किन्तु आज यदि सब नष्ट नहीँ हुआ तो अधोगति को अवश्य प्राप्त हो चुका है।‘ मैँने जिज्ञासा प्रकट की पास मेँ ठाकुरबाड़ी कहाँ है, इस पर वे बहुत क्रोधित हो गए। उसका उत्तर दिए बिना उन्होँने कहा कि झूलन आने वाला है और वे हमेँ साथ ले जाकर अपने मंतव्य और वस्तुस्थिति से हमारा प्रत्यक्ष ज्ञान कराएँगे।
हैट पहन कर मैँ जब घर के बाहर चाँदनी मेँ उनकी प्रतीक्षा कर रहा था, गली के मोड़ से वे अचानक प्रकट होते ही बोले, “ये अङ्ग्रेजोँ वाला हैट हमारे परिवेश के लिए ठीक नहीँ। यह कॉलोनियल मानसिकता का परिचायक है।“ मैँ हामी भरता उनके साथ चल पड़ा जैसे बादलोँ मेँ चाँद धीमे-धीमे चलता जा रहा था। ठण्डी बहती हवा मेँ आनन्दित हो कर कन्हैय्या भैया कहने लगे, “हनुमान मन्दिर के पास गोला मार्केट है, वहीँ श्री रामजानकी ठाकुरबाड़ी है।“ मैँने कुछ हैरानी से कहा, “अच्छा वो राम-जानकी का मन्दिर?” उन्होँने हाँ मेँ सिर हिलाते हुए कहा, “जी हाँ। वह श्री रामजानकी ठाकुरबाड़ी कहलाता है। उसका भी इतिहास है जिसका आपको कुछ अता-पता नहीँ। ये जानकारी आपको गूगल और चैटजीपीटी पर नहीँ मिलेगी। इसलिए मैँ बताता हूँ। इस गोला मार्केट का जीर्णोद्धार, बङ्गाल के नव्वाब मीरकासिम के द्वारा सन् १७६१ मेँ हुआ था। यह ठीक से नहीँ कहा जा सकता कि यह बाजार कब बना, लेकिन जीर्णोद्धार का ब्योरा मीरकासिम के खर्चे के हिसाब मेँ पटना की खुदाबख्श खाँ लाइब्रेरी मेँ रखे दीवानी कागजात मेँ स्पष्ट मिलता है।“ मैँने उत्सुकता से पूछा, “तब आपको ऊर्दू-फारसी आती होगी?” उन्होँने झिड़क कर कहा, “यही है अज्ञानता। उस समय नगर का हिसाब कैथी लिपि मेँ लिखा जाता था। मुझे कैथी लिपि नहीँ आती, पर मैँने इसका लिप्यान्तरण और अनुवाद कर के अपने शोध मेँ यह डाला है।“ मैँ चुपचाप उनको सुनता रहा। कन्हैय्या भैय्या कहने लगे, ”रामजानकी ठाकुरबाड़ी को कैसे पहचानोगे? वहाँ के विशाल चबूतरे पर आज छह-आठ अनाज की दुकानेँ चलती हैँ। मैँ इसका भी इतिहास बताता हूँ। जब चालीसा का भयङ्कर अकाल पड़ा था, तब जो भगवान की कृपा से बच गए थे, उन्होँने ही यह मन्दिर बनाया था। जमीन के मालिक के वंशज आज भी इस जगह पर ठाकुरबाड़ी और अचल सम्पत्ति के मालिक हैँ। खानदानी आलसी लोग हैँ, जो काम-धाम नहीँ करना चाहते हैँ। आजादी के बाद कई दिनोँ तक इन्होँने अपनी जमीनेँ बेच कर घी पिया और घर को स्वर्ग बनाया। बीच मेँ चुनाव भी लड़े और हार गए। अबकी पीढ़ी होशियार हो गई या कहेँ मजबूरी है कि वे जमीन नहीँ बेचते बल्कि किराए के पैसे से अपना खाना-खर्चा चलाते हैँ। झूलन पर जो कार्यक्रम हो रहा है, यह अस्सीवाँ वार्षिकोत्सव है। पहले बनारस के गायक यहाँ आया करते थे। अब अच्छे गायक आने के पैसे भी माँगते हैँ और देने वाले सेठ पैसा देना नहीँ चाहते। इसलिए शहर मेँ ना सुरीला गाने वाले बचे हैँ और न सुनने-समझने वाले। इतिहासकार केवल तथ्य की जानकारी नहीँ रखता बल्कि उसपर अपनी दृष्टि रखता है। इसलिए इतिहासकार ही सही मायने मेँ ज्ञानी होता है और बाकी सभी उसके सामने कमतर हैँ।“
हमलोग श्रीरामजानकी ठाकुरबाड़ी पहुँच गए। मैँने ठाकुरबाड़ी के सामने इतने बड़े हॉलनुमा जगह पर कभी गौर नहीँ किया था। दुकानोँ के हट जाने के बाद अच्छी जगह बन गयी थी। चार चौकियाँ लगा कर अच्छा मञ्च बन गया था। एक तिलकधारी दुबले-पतले वृद्ध किन्तु रङ्गे काले केश वाले सज्जन कुर्ता-जैकेट-धोती पहने तबले पर बैठे थे। हरे रङ्ग का सलवार सूट पहने एक युवती माइक पर गाने को बैठी थी, साथ ही मेँ हारमोनियम छेड़ रही थी। मञ्च के ठीक सामने ठाकुरबाड़ी के मालिक राय साहब, एक और युवती और कुछ सज्जन बैठे थे। श्रोता के नाम पर पाँच-दस वृद्ध और तीन-चार बाजार मेँ काम करने वाले बाल मजदूर बैठे थे। गायिका गा रही थी – “कङ्करी मोहे मारी, गगरिया फोड़ डाली… गगरिया फोड़ डाली, मोरी सारी अनारी भिगोये गयो रे.. मोहे पनघट पे..।” १
कन्हैय्या भैय्या और हम मञ्च के सामने बिछी दरी पर पालथी मार कर बैठ गए। कन्हैय्या भैय्या कहने लगे, “इन गायकोँ का भी इतिहास है। ये जो वृद्ध रामनरेश शास्त्री जी बैठे हैँ, वे अच्छे जानकार हैँ। इनको मैँ चालीस साल से देख रहा हूँ। शाम होते ही शराब के नशे मेँ हमेशा धुत्त हो जाते हैँ। दरअसल ये कलाहन्ता हैँ।“ मैँने पूछा, “आप ऐसा क्योँ कहते हेँ?” कन्हैय्या भैय्या कहने लगे, “कलाहन्ता न कहूँ तो क्या कहूँ। इतिहासकार को कला की समझ भी रखनी होती है, वरना इतिहासकार काहे का! पैँतालीस साल पुरानी बात बता रहा हूँ। एक गायक था – मनोज परवाना। बहुत जबरदस्त गाता था। वह बम्बई भी गया था। उसे मौका नहीँ मिला। वह भी नशे मेँ धुत्त रहता और आस-पास के लोग को दुत्काराता। कला के उत्कर्ष के लिए कभी नहीँ सोचता। मगर उसका भी कारण था। हर चीज का कारण ढूँढना ही इतिहासकारोँ का काम होता है। उस खूबसूरत कारण का नाम था – रेणुका दीवानी। परवाना साहब और दीवानी जी की जुगलबन्दी बहुत मशहूर थी। लेकिन मायानगरी मेँ मिली नाकामयाबी मनोज परवाना को खा गयी। हुआ ये कि रेणुका दीवानी ने किसी और से शादी कर ली। परवाना की मौत रेणुका दीवानी के विवाह से पहले हुई या बाद मेँ, इस विषय मेँ नगर के इतिहासकार एकमत नहीँ है। यह अधिक शोध का विषय है, जिस पर मेरी व्यक्तिगत रुचि नहीँ है। इस तथ्य के पता चलते ही यह स्थापित हो जाएगा कि किसने, किसके साथ बेवफाई की। खैर, रेणुका दीवानी जी शादी के बाद छपरा बस गयीँ थी, अब वे इस संसार मेँ नहीँ है। उनकी दो लड़कियाँ हुईँ – रीमा रानी और रुबी रानी। भाग्य का खेल की वे दोनोँ ननिहाल वापस आकर, इसी नगर मेँ रहने लगी हैँ। सुना जाता है कि इन दोनोँ के मामा निस्सन्तान हैँ और मामी अब दुनिया मेँ नहीँ रही। मैँ यह क्योँ बता रहा हूँ? जो मञ्च पर बैठी है, वही है रीमा रानी! इन्होँने इण्डियन आइडल मेँ गाने की खूब कोशिश की, पर सफलता… नहीँ मिली! उसकी छोटी बहन रुबी रानी मञ्च के ठीक सामने नीचे बैठी हैँ। ये लोग कहाँ ठीक से गा रहे हैँ? ध्यान से देखिए तबले की सङ्गत के साथ मोबाइल मेँ जैक लगाया हुआ है, करोके बज रहा है साथ-साथ।“
बगल मेँ आकर बैठे राय साहब के लड़के नीरज ने हमलोग से पूछा, “ठीक चल रहा है?” कन्हैय्या भैय्या ने हँस कर आश्वस्त किया, “एकदम फर्स्ट क्लास!“ नीरज ने हताशा से कहा, “अब लोग कहाँ सुनने आते हैँ! हमारे दादा जी का शुरू किया हुआ कार्यक्रम है। देखिए ८० साल हो गए। भैय्या आप जो शोध कर रहे हैँ, नगर के इतिहास मेँ इसको अवश्य दर्ज कीजिएगा।“
कन्हैय्या भैय्या मुझसे फुसफुसा कर कहने लगे, “रीमा रानी क्या ही गाएगी! बेचारी शिव चर्चा मेँ गीत गाती रहती है ताकि चन्दे का पैसा पॉकेटखर्च जैसा मिल जाए। बेचारी की गलती नहीँ है। शिव चर्चा वाली पगलाई औरतेँ उससे अपने लिखे गीत गाने को कहती है। परसोँ रीमा लाउडस्पीकर पर गा रही थी – ‘अपने तो जैसे तैसे, थोड़ी ऐसे या वैसे कट जाएगी, आपका क्या होगा ओ मातारानी। आपका क्या होगा?’ मातारानी की इतनी फिक्र करने वाली, चन्दा देने वाली स्वयं गीत भी लिखा करती हैँ। ऐसी मौलिक गीतोँ को गाने वाले क्या ये लोग कलाहन्ता नहीँ हैँ? आप ध्यान दीजिए, करोके के साथ तबले का तालमेल नहीँ है। सुर ठीक नहीँ है।“
मैँने नीरज को इशारे से बुलाया और धीमे से कहा, “सुनो, मुझे गाने का एक मौका दो। देखो यहाँ पक्के से भीड़ इकट्ठी हो जाएगी।“ नीरज ने सशंकित होकर कहा, “भाई, आप फिल्मी गाने तो नहीँ गाएँगे? यहाँ शास्त्रीय सङ्गीत चल रहा है।“ कन्हैय्या भैय्या ने फौरन प्रतिवाद किया, “मोहे पनघट पे – ये गाना मुगल+ए+आज़म’ फिल्म का है। आप क्या बात कर रहे हैँ? पहले इनकी बात सुन लीजिए।“ मैँने कहा, “मैँ सन् १९४७ का एक फिल्मी गाना गाऊँगा। अब गाने के ७८ साल हो गए। इस लिहाज से वह भी क्लासिकल गीत हो गया कि नहीँ?” कन्हैय्या भैय्या ने हाँ मेँ हाँ मिलायी, “एकदम सही बात। वैसे नीरज, तुम्हारी जानकारी के लिए बता दूँ कि सन् १९४६ मेँ जब यह झूलन का कार्यक्रम ठाकुरबाड़ी मेँ पहली बात हुआ था तब कुन्दन लाल सहगल का ‘झुलना झुलाओ आवो री..’ गीत गाया गया था। यह गीत सन् १९३२ मेँ आयी फिल्म ‘मोहब्बत के आँसू’ मेँ था। कुछ लोग का मानना है कि यह गीत निजी था, पर यह सरासर गलत है। कुछ लोग का कहना कि यह गीत सन् १९३२ मेँ आयी सहगल की दूसरी फिल्म ‘जिन्दा लाश’ से है। यह भी तथ्य नहीँ है। गूगल से इसकी सही पुष्टि नहीँ हो सकती क्योँकि दोनोँ फिल्मोँ की रील खो गयी है। प्रसिद्ध अभिनेता पेदी जयराज ने अपनी आत्मकथा के पैँतीसवेँ पृष्ठ पर इस तथ्य को रखा था। आप कहिए क्या आप पी. जयराज की बात को झुठला देँगे?”
नीरज पर कन्हैय्या भैय्या की जोश भरी बातोँ ने जादू-सा असर किया। होना क्या था, उनलोग के विनम्र आग्रह को मैँ ठुकरा न सका और रामनरेश शास्त्री ने मञ्च से हटकर मुझे जगह दी। रीमा रानी वहीँ माइक पर बैठी, उसे उठने से मना करते हुए मैँने कहा कि आपकी आवश्यकता पड़ेगी। हैट सँभालते हुए मैँने गाना शुरू किया, “आना मेरी जान, मेरी जान, सण्डे के सण्डे, आना मेरी जान मेरी जान सण्डे के सण्डे, मेरी जान मेरी जान सण्डे के सण्डे..।“ ३ मेरे आवाज़ से आती-जाती भीड़ जुटने लगी। यह देख कर रीमा रानी की बाँछे खिल गयी। मैँने फिर से गाने लगा, “आना मेरी जान, मेरी जान, सण्डे के सण्डे, मेरी जान मेरी जान सण्डे के सण्डे..आइ लव यू।“ रीमा रानी ने माइक सँभाला, “भाग यहाँ से तू।“ मैँने गाता रहा, “तुझे पैरिस दिखाऊँ, तुझे लन्दन घुमाऊँ, तुझे ब्रैण्डी पिलाऊँ, ह्विस्की पिलाऊँ और खिलाऊँ, खिलाऊँ मुर्गी के, मुर्गी के अण्डे, अण्डे, आना मेरी जान मेरी जान सण्डे के सण्डे।“
भीड़ जुटने जाने के बाद मञ्च के सामने बैठे वृद्ध राय साहब ने सख्ती से मुझे नीचे आने का इशारा किया। तत्पश्चात पण्डित रामनरेश शास्त्री वापस अपनी विजयी मुस्कान के साथ वापस मञ्च पर रीमा रानी के साथ सङ्गत करने बैठ गए। कन्हैय्या भैय्या नीरज से बात करने मेँ लगे थे और रुबी रानी उठ कर मेरे पास कोने मेँ आयी। उसने मुझसे कहा, “आप तो बहुत अच्छा गाते हैँ। मैँने जो आपके बारे मेँ सुना है वह सब सच निकला।“ मैँने उत्सुकता से पूछा, “क्या सुन लिया आपने?” रुबी रानी ने कहा, “यही कि आप मुम्बई मेँ रहने वाले बड़े गायक हैँ। हरिहरन के साथ आप सुबह की चाय पीते हैँ। सोनू निगम आपके पड़ोस मेँ रहता है। सन् २०२१ मेँ सांगली जिले मेँ आपने श्रेया घोषाल और सुनिधि चौहान के साथ एक कार्यक्रम मेँ युगल गीत गाया था।“ मैँने हैरानी से कहा, “यह सब किसने कह दिया आपसे?” रुबी रानी कुछ रूठते हुए बोली, “आप कितने विनम्र हैँ! अपनी उपलब्धियाँ छुपाना चाहते हैँ! पर अब वह सम्भव नहीँ है क्योँकि जमाना बदल गया है। हर कुछ इतिहास मेँ दर्ज है।“ मैँने डपट कर पूछा, “एक मिनट! आपने क्या मेरी कोई फोटो सोशल मीडिया पर देखी है जिसमेँ मैँ सोनू निगम या सुनिधि चौहान के साथ गा रहा हूँ?” रुबी रानी ने मुझे डाँटते हुए कहा, “हर कोई फोटो देख कर ही मानेगा क्या? इतिहासकार जो कहते हैँ वह हमेँ मानना चाहिए। हम कन्हैय्या जी की बातोँ को मानते हैँ।“
मैँने हार मानते हुए कहा, “चलिए। आप मुझसे क्या चाहती हैँ?” रुबी रानी ने दुपट्टा अपनी उँगलियोँ मेँ लपेट कर इठलाते हुए कहा, “एक मौका। मेरे साथ ठुमके लगाने वाली लड़की रील बना के बम्बई मेँ मॉडल बन गयी। आप कहीँ सिफारिश कर देँ तो बात बन जाए।“
मैँने कहा, “ठीक है। आप दोनोँ बहनोँ की? उनका तो गाना सुना, पर आप कुछ गाकर सुनाइए।“ तब रुबी रानी मञ्च पर बैठी अपनी बहन पर विजयी निगाह डालते हुए मेरे सामने गुनगुनाने लगी:
ओ माय साब, कम कम कम
तुम रोमी और जुलियट हम
ओ डियर, कम हियर, डॉण्ट फियर!
ये गाँव की नेटिव लड़की है, ये दिल की बीटिंग क्या जाने
ये चेजिंग हंटिग क्या जाने, ये लव की मीटिंग क्या जाने
“राइट! राइट! राइट! ऑल राइट!”
आओ डियर, हम चले देयर
“ह्वेयर?”
देयर, गड़े मोहब्बत के, मोहब्बत के झण्डे, झण्डे
आना मेरी जान मेरी जान सण्डे के सण्डे…
ये थी कल की बात!
दिनाङ्क: ०७/०८/२०२५
सन्दर्भ: १. गीतकार – शकील बदायूँनी, चित्रपट – मुगल+ए+आज़म (१९६०)
२. गीतकार – प्यारेलाल संतोषी, चित्रपट – शहनाई (१९४७)


बदलते समय का यह एक शानदार आकलन है। गहरा व्यंग्य। प्रचंड प्रवीर ने बहुत सारी चीजों की याद दिला दी। हमारे गांव में भी झूलन उत्सव होता था हमारी पीढ़ी के तमाम बच्चे इसमें कई दिनों तक संलग्न रहते थे। मैं जिस गांव (अब कस्बा) में रहता था। नोनीहाट के तीन मंदिरों में यह झुलनोत्सव होता था। पूरे गांव के और दूसरे इलाके के लोग नोनीहाट आते थे और मंदिरों में यह उत्सव और साज सज्जा देखने के लिए रात के 10 – 11 बजे तक घूमते रहते थे। देसी घी से बने हलवा प्रसाद के रूप में वितरित होता था। पूरे माहौल में हलवे की खुशबू फैली होती थी। अब वह सारी चीज समाप्त हो गयी हैं। नए लड़के अब फिल्मी गाने बजाते हैं डीजे पर और यह उत्सव जैसे अब एक रस्म अदायगी है।
यह लेख बहुत अच्छा है। समय, इस तरह के आयोजन और संगीत के लिए लोगों को रूचियाँ कैसे बदल गयी हैं, प्रवीर जी ने अपनी इस बतकही में इनका ठीक ठीक जायजा लिया है।
एक दिन मैंने अपने घर के बगल वाले मंदिर में हो रही शिव चर्चा में यह गीत सुना :
मेरी चढ़ती जवानी तरसे
शंकर कुछ तो तू बोल
वादा न तोड़ …..