कोई बहेलिया जाल फैलाता है, एक गंधर्व गाता है

आज सुबह ‘जनसत्ता’ में प्रियदर्शन की कविताएं पढ़ी. कुछ कविताएं ऐसी होती हैं जिनको पढने सुनने का अनुभव अनिर्वचनीय होता है. उनके बारे में कुछ भी अतिरिक्त कहने का मन नहीं करता. आप भी पढ़िए- मॉडरेटर.
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एक बार कुमार गंधर्व को सुनते हुए

एक

आंख कुछ छलछलाती है
होंठ कुछ बुदबुदाते हैं
गले में कुछ अटकता है,
कुछ है जो आत्मा के पार जाता है
एक गंधर्व गाता है।

दो

आसमान कुछ और उठ जाता है
धरती के बंधन खुल जाते हैं
हवाओं की सांस थमने लगती है
एक हंस धीरे से उड़ जाता है
एक गंधर्व गाता है।

तीन

एक आलाप में सिमट आते हैं सारे दिगंत
इस आवाज़ का न आदि है न अंत
समय जैसे ठहर जाता है
सदियों का सन्नाटा तोड़ता हुआ
कोई कबीर आता है
एक गंधर्व गाता है।

चाऱ

रागदीप्त रोम-रोम
प्रतिध्वनित व्योम-व्योम
अंबर दीये की तरह थरथराते शब्दों को
धरती की थाल में सजाता है
और फिर उन्हें सागर में सिरा आता है
एक गंधर्व गाता है।

 

पांच

यह कौन है
जिसका गायन एक महामौन है?
झीनी-झीनी बुनी जाती है स्वरों की चादर
साथ में जिसके
एक उदात्त समंदर लहराता है
एक गंधर्व गाता है।

छह

बहुत भीतर पैठा हुआ अंधेरा
बहुत भीतर उतरा हुआ उजाला
सब जैसे सुरों की एक विराट लहर में बहने लगते हैं
तृष्णाएं आंख मूंद लेती हैं
राग-विराग का एक दरिया किसी अनहद पर नजर आता है
एक गंधर्व गाता है।

सात

हिरना
समझ-बूझ कर चरना
पत्ती-पत्ती घास-घास
धरती-धरती अकास-अकास
कोई बहेलिया जाल फैलाता है
एक गंधर्व गाता है।

 

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