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  • लोकतंत्र को आदिवासियों से सीखने की ज़रूरत है- प्रो. गोमती बोदरा हेम्ब्रोम

    दिल्ली विश्वविद्यालय के उत्तरी परिसर स्थित बौद्ध अध्ययन विभाग में बुधवार, 07 जनवरी 2026 को ‘राष्ट्र निर्माण में जयपाल सिंह मुंडा का योगदान’ विषय पर एक अकादमिक संगोष्ठी का आयोजन किया गया। अपराह्न 2 बजे से सेमिनार हॉल–305 में संपन्न यह कार्यक्रम हिमालयन ट्राइबल लिटरेरी सोसाइटी एवं बौद्ध अध्ययन विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय के संयुक्त तत्वावधान में आयोजित हुआ। कार्यक्रम की संयोजक प्रो. स्नेहलता नेगी रहीं।
    संगोष्ठी में मुख्य अतिथि के रूप में प्रो. आई. एन. सिंह उपस्थित रहे, जबकि अध्यक्षता प्रो. गोमती बोदरा हेम्ब्रोम ने की। डॉ. राजीव रंजन गिरि एवं डॉ. आयशा गौतम ने बतौर वक्ता अपने विचार प्रस्तुत किए।
    कार्यक्रम का शुभारंभ स्वागत वक्तव्य से हुआ, जिसमें प्रो. स्नेहलता नेगी ने जयपाल सिंह मुंडा के राष्ट्र निर्माण में बहुआयामी योगदान पर प्रकाश डाला। उन्होंने संविधान सभा में उनकी ऐतिहासिक भूमिका को रेखांकित करते हुए 11 दिसंबर 1946 के उस भाषण का उल्लेख किया, जिसमें जयपाल सिंह मुंडा ने आदिवासी प्रतिनिधित्व की सीमाओं, लोकतंत्र की वास्तविक भावना और आदिवासी समाज को ‘जंगली’ कहे जाने की मानसिकता का सशक्त प्रतिरोध किया था।
    प्रो. नेगी ने उनके जीवन-संघर्षों का उल्लेख करते हुए बताया कि रांची से ऑक्सफोर्ड तक की उनकी शैक्षणिक यात्रा प्रेरणास्पद रही। वे ‘ऑक्सफोर्ड ब्लू’ का सम्मान पाने वाले प्रथम एशियाई बने। आई.सी.एस. परीक्षा उत्तीर्ण करने के बावजूद उन्होंने प्रशासनिक सेवा के स्थान पर खेल और समाज को प्राथमिकता दी। उनकी कप्तानी में भारत ने हॉकी में पहला ओलंपिक स्वर्ण पदक प्राप्त किया। उन्होंने यह प्रश्न भी उठाया कि इतने व्यापक योगदान के बावजूद जयपाल सिंह मुंडा को इतिहास और मुख्यधारा के विमर्श में अपेक्षित स्थान क्यों नहीं मिला।
    प्रथम वक्ता डॉ. राजीव रंजन गिरि ने जयपाल सिंह मुंडा की सामाजिक, पारिवारिक और वैचारिक पृष्ठभूमि पर विस्तार से चर्चा की। उन्होंने बताया कि उनके पिता समुदाय के पाहन (पुरोहित) थे तथा प्रारंभ में उनका नाम प्रमोद पाहन था। डॉ. गिरि ने कहा कि औपनिवेशिक काल में उच्च पदों पर रहते हुए भी जयपाल सिंह मुंडा ने आदिवासी समाज के अधिकारों, स्वायत्तता और आत्मसम्मान के प्रश्न को राष्ट्रीय मंच पर निर्भीकता से उठाया। उन्होंने आदिवासी स्वशासन की मांग को अलगाववाद नहीं, बल्कि ऐतिहासिक अधिकारों और लोकतांत्रिक चेतना की अभिव्यक्ति बताया।
    द्वितीय वक्ता डॉ. आयशा गौतम ने जयपाल सिंह मुंडा को केवल एक ऐतिहासिक व्यक्तित्व नहीं, बल्कि एक जीवंत विचारधारा के रूप में प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि खेल, शिक्षा, बौद्धिक विमर्श और संस्कृति—सभी क्षेत्रों में उनका योगदान उनके नेतृत्व और संगठन क्षमता का प्रमाण है। आदिवासी नृत्य, संगीत और उत्सवों को वे पिछड़ेपन का नहीं, बल्कि आत्मसम्मान और सामाजिक एकता का स्रोत मानते थे।
    मुख्य अतिथि प्रो. आई. एन. सिंह ने अपने वक्तव्य में आदिवासी संघर्ष और राष्ट्र निर्माण के संबंधों पर विचार रखते हुए बिरसा मुंडा, जयपाल सिंह मुंडा और शिबू सोरेन के आंदोलनों को ऐतिहासिक निरंतरता में देखने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने कहा कि सभ्यता का विकास तभी सार्थक है, जब वह आदिवासी समाज के ज्ञान, संस्कृति और जीवन-दर्शन को समान सम्मान दे।
    अध्यक्षीय संबोधन में प्रो. गोमती बोदरा हेम्ब्रोम ने मुंडारी लोकगीत से अपने वक्तव्य की शुरुआत की और जल, जंगल, जमीन तथा स्वशासन के प्रश्नों को आज के पर्यावरणीय और सामाजिक संकटों से जोड़ा। उन्होंने कहा कि “आदिवासियों को लोकतंत्र सिखाने की नहीं, बल्कि लोकतंत्र को आदिवासियों से सीखने की आवश्यकता है।”
    कार्यक्रम के अंत में डॉ. मिथिलेश ने धन्यवाद ज्ञापन प्रस्तुत करते हुए जयपाल सिंह मुंडा को समर्पित कविता का पाठ किया। मंच संचालन अर्चना त्रिपाठी ने किया, जिन्होंने समकालीन आदिवासी कवयित्रियों की रचनाओं के उद्धरणों के माध्यम से संगोष्ठी को वैचारिक और सांस्कृतिक गहराई प्रदान की।
    संगोष्ठी के माध्यम से यह स्पष्ट रूप से उभरकर सामने आया कि जयपाल सिंह मुंडा केवल इतिहास की एक विभूति नहीं, बल्कि संविधान, लोकतंत्र, आदिवासी अधिकार और सांस्कृतिक अस्मिता से जुड़ी एक सशक्त विचारधारा हैं। वक्ताओं ने इस बात पर बल दिया कि आदिवासी नेतृत्व और दर्शन को केंद्र में रखे बिना राष्ट्र की समावेशी परिकल्पना अधूरी है।

    कार्यक्रम में प्रो.मंजू कांबले, डॉ. सत्य प्रकाश सिंह, डॉ.विपुल कुमार राय, डॉ. सतेन्द्र सिंह, डॉ. कामाख्या नारायण तिवारी, डॉ. गगनदीप नेगी, प्रो. रजनी दीसोदिया, डॉ.सुनील वर्मा, डॉ. धर्मेंद्र सिंह, डॉ. गोपेश्वर पांडे, डॉ.प्रदीप सिंह, डॉ. अजीत कुमार,डॉ.टीकम मीणा और हिंदी विभाग और बौद्ध अध्ययन विभाग के प्राध्यापक और शोधार्थी मौजूद रहे।

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