• पुस्तक अंश
  • अरविंद मोहन की पुस्तक ‘यह जो बिहार है’ का एक अंश

    बिहार को लेकर वरिष्ठ पत्रकार-लेखक अरविंद मोहन की विचारोत्तेजक किताब आई है ‘यह जो बिहार है’। आइये राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित इस किताब का एक अंश पढ़ते हैं- मॉडरेटर 

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    अपने दिल्ली के जीवन, अध्यापन, पत्रकारिता, स्टाफ-रूम और हिन्दू कालेज के हिन्दी विभाग में बिहारियों से घिरे रहने वाले युवा अध्यापक और संपादक पल्लव ने फ़ेसबुक पर अपने एक पोस्ट में बिहारियों द्वारा ‘मैं’ की जगह ‘हम’ का प्रयोग करने का मसला कुछ हल्के अंदाज में उठाया था। कुछ समय हो गया है और जब तक इस लेखक ने उस पोस्ट को फालो किया तब तक उस पर 257 लिखित कमेंट्स आ चुके थे जिनमें हिन्दी जगत के काफी सारे महत्वपूर्ण लोग भी थे। मसला बढ़िया ढंग से चल रहा था और बात कई तरह से आगे बढ़ रही थी। उनका सवाल तो एक वचन के लिए बहुवचन के प्रयोग और उससे कई बार बनने वाली हास्यास्पद स्थिति (जैसे मेरी पत्नी की जगह हमारी बीबी या बेगम) का ही था लेकिन समाज, भाषा, व्यवहार और संस्कृति की काफी बातें निकलने लगीं। एक दिन अचानक पोस्ट के गायब होने के बाद मालूल हुआ कि पल्लव इस चर्चा से बिहारियों की संभावित नाराजगी के खतरे को भाँपकर बात बढ़ाना नहीं चाहते थे और उन्होंने इसे हटा दिया। मुझे लगा एक एक अच्छे मुद्दे की भ्रूण-हत्या हो गई। वे शायद नहीं समझ पाए कि बिहार और हिन्दी परिवार को समझने की कुंजी इसमें थी।

    इस बात को आगे बढ़ाने से पहले आइए उन कुछ प्रतिक्रियाओं पर गौर कर लें। ममता कालिया जी ने लिखा, ‘अपने लिए मैं का प्रयोग अहंवादी है जबकि हम का प्रयोग विनम्रतावादी।‘ असगर वजाहत ने लिखा, ‘हम में अपनापन है। राज और समाज के भाषिक व्यवहार को इस दायरे में लाकर देखना चाहिए।‘ सदानंद शाही ने लिखा, ‘यह अहंकारशून्यता और निरभिमानता है’। अविनाश मिश्र का कहना था, ‘क्या स्थानीय बोलियां हिन्दी को भ्रष्ट करती हैं? हम उनकी शैली क्यों नहीं मान लेते? भाषायी निरंकुशता। अंग्रेजी में तो की शैलियां चलती हैं।‘ वंदना प्रसाद ने बिहार में मैं का ही मजाक उड़ाए जाने की सच्चाई बताई और पिता को तुम कहना अपनापन का प्रमाण माना। जितेंद्र बिसारिया ब्रजभाषा में ‘ते’ और ‘तुम’ को सम्मानजनक बताया। रमा शंकर सिंह ने अवधी में ‘हम खाना खाए जाइत हय’ को पर्याप्त प्रतिष्ठित भाषा व्यवहार बताया। सुमन सरकार ने हम को सामूहिकता के भाव की प्रधानता का व्यवहार बताया। अशोक मिश्र ने ‘हम को अपने और दूसरे के प्रति सम्मान की अधिकतम अभिव्यक्ति’ करार दिया।

    फिल्मकार अविनाश दास का मानना था कि व्यक्ति के पास अपने लिए एकवचन का सम्बोधन नहीं है। विपिन कुमार शर्मा ने गालिब का उदाहरण देते हुए इस प्रयोग को इस्लामी तहजीब का हिस्सा बताया। राजीव गुप्ता का मानना था कि हिन्दी पट्टी में संयुक्त परिवार सबसे मजबूत संस्था है और यह प्रयोग उसी प्रभाव से जुड़ा है। अविचल गौतम का कहना था कि हम हमारी सामासिकता का प्रतीक है। जितेंद्र बिसारिया भी मैं के प्रयोग के साथ अहं के बड़ा होने की बात करते हैं। अतुल का कहना था कि सम्मान के लिए बहुवचन का प्रयोग होता है और अगर यह क्रिया से सामंजस्य बैठा ही लेता है तब आपत्ति किस बात की है। सुबोध कुमार ने बताया कि भोजपुरी, मगही और बज्जिका में मैं होता ही नहीं। धीरेन्द्र नाथ ने लिखा कि संस्कृत के अहम् से हम बना है तो शशि शर्मा ने सवाल उठाया कि अहम्/वयम से हम कैसे बना। राहुल द्विवेदी हम को सामूहिकता से जुडा बताते हैं।

    वीणा शर्मा का कहना था कि बिहारियों के भीतर ‘मैं’ का भाव नहीं है तो यह अच्छा ही है। पंकज मित्र का मानना था कि ऐसा बौद्ध धर्म के प्रभाव से हुआ है और हम धम्म का ही बदला/बिगड़ा स्वरूप है। पतंजलि का कहना था कि चूंकि पाटलिपुत्र वाले लंबे समय तक भारत का प्रतिनिधित्व करते रहे, अत: मैं की जगह हम का प्रयोग करते थे, जो उचित ही था। राणा प्रताप का मानना था कि आज भी जब कोई समूह का प्रतिनिधित्व करते हुए बोलता है तो वह हम ही कहता है। सुभाष राय जी का कहना था कि बोलियां बहुलतावादी और समूहवादी रही हैं। ए एम खान का कहना था कि हम बोलना समग्रता-बोध से जुडा है। हेमंत द्विवेदी हम और मैं के साथ अल और तू का सवाल भी उठाते हैं। निरुपम इस बहस में शामिल लोगों से जानना चाहते हैं कि इस तरह के प्रयोग में उर्दू में क्या चलता है। विश्वनाथ मिश्र तो और ऊपर पहुंचते हैं और बताते हैं कि आप्तपुरुष बहुवचन में ही प्रयुक्त होते हैं। विकास श्रीवास्तव मैं को संस्कृत के ‘मया’ से बना बताते हैं। राजीव कुमार का कहना था कि पूरब की सभी बोलियों में हम या इसके समरूप शब्द प्रयोग होंते हैं।

    एक जानकार पाठक बताते हैं कि हम अथारिटी के भाव से जुडा है। कुरान में अल्लाह अपने लिए जमा का सीजहा (बहुवचन) प्रयोग करते हैं। सूफियों के दर्शन को इस कथन से आसानी हुई। हितेश त्यागी का कहना था कि ‘नबाब बोलता हो तो शान, टुटपुंजिया बोलता है तो मिमिक्री।‘ एक अन्य टिप्पणी थी कि इसका संबंध खुद को बादशाह समझने से है-अहंकारी है। यह भोजपुरी और बहुवचन का मामला ही नहीं है। विजय शंकर तिवारी कहते हैं कि यह अहंकार और असुरक्षा से जुडा मसला है। करीबी या बराबरी वाले से वही बिहारी मैं ही बोलता है। कवि संपादक राकेश रेणु का मानना है कि यह पूरब के समाज की विशिष्टता है, तो महेंद्र प्रजापति बिहारियों द्वारा ‘र’ को ‘ड़’ और ‘ड़’ को ‘र्’ उच्चारित करने की गलती की याद दिलाते हैं। आशीष देशपांडे इसे फोकट में शान बघारने की चीज मानते हैं तो पल्लवी प्रसाद इसे बिहारी समाज में प्रभावी सामंतवाद से जुडा मानती हैं। जीवेश प्रसाद भी इस प्रयोग को सामंती मानते हैं-तुम्हारी औकात बनाम मेरी/हमारी का दिखावा। अंजुमन आरा के लिए हम से अहंकार झलकता है जबकि दिवंगत बड़े भाई ललित सुरजन सवाल उठाते है कि इससे तो विनम्रता दिखती है किसी को अहंकार कैसे दिख रहा है।

    जब गिनती और सीमा पहले बताया दी है तो जाहिर है और काफी सारी टिप्पणियां आई होंगी लेकिन मैंने मुख्य रूप से दोहराव-तिहराव के चलते संख्या कम की है या चुनी हुई टिप्पणियां ही दी है। हो सकता है कि मेरे नोट करने में भी कुछ गलती हुई हो। पर इनमें एंटी-बिहारी जैसी कोई बात नहीं है। और हाल के वर्षों में जिस तरह स्वयं ‘बिहारी’ शब्द ही अपमान और कमजोरी का प्रतीक बन गया है तब तो बिहारियों को हल्के-फुल्के अपमान झेलने की आदत सी हों गई है। गर्व करने लायक बहुत कुछ है लेकिन वर्तमान का सच यह भी है। बांग्ला शब्दकोश में तो बिहारियों के लिए प्रचलित पद ‘सातूखोर’ का मतलब मंदबुद्धि लिखा ही गया है।

    सो इस पक्ष पर पल्लव से शिकायत जो भी हो जितनी चीजें इस छोटी बहस में आ गई हैं उनसे बड़ी भूमिका तैयार होती है बिहार और पूरब के समाज के लिए। मैं और हम का मसला भी बताता है कि बिहारी या पूरब का समाज की तरह से विशिष्ट है और यह बात उसकी भाषा और शब्द-चयन से झलकती है। मैं से क्या झलकता है और हम से क्या यह सिर्फ आज और अभी की बात नहीं है। यह सैकड़ों साल के बर्ताव का फरक भी है जिसे हमारी बोलियों ने, बिहारी समाज से उठे जैन और बौद्ध आंदोलन ने, गोरख और मछन्दर ने, इस्लामी तहजीब-सूफियों ने और बिहारी समाज के अपने व्यवहार ने तय किया है। खड़ी बोली और बिहारी हिन्दी तथा खास तौर पर बिहार या पूरब की बोलियों से उसके रिश्ते के चलते ही पल्लव जैसे नए विद्वान इस सवाल को उठाते हैं, आज का नया व्यवहार इसे अटपटा मानता है।

    पत्रकारिता के अपने उस्तादों में एक और हिन्दी में शब्दों की व्युत्पत्ति पर काम करने वाले अरविन्द कुमार जी बार बार यह सवाल उठाते थे कि उनके अनुसार बहुत सारे प्रचालित शब्दों में ‘ए’ और ‘ऐ’ में ‘ऐ’ की मात्रा ज्यादा उपयुक्त है-रुपए से रुपयै का प्रयोग ज्यादा सही है। इसलिए उसे गलत मानना उचित नहीं है। खुद पश्चिमी उत्तर प्रदेश और कथित पैशाचिक हिन्दी वाले प्रदेश से आने के चलते उनको खड़ी बोली के बहुत सारे प्रयोगों पर आपत्ति थी और वे हिन्दी के मानकीकरण को सही मानते हुए भी इस तरह के पक्षपात को सही नहीं मानते थे। हिन्दी भाषा और बोलियों की उस तरह की विशेषज्ञता न रखने वाले फिल्मकार प्रकाश झा ने तो अपने पात्रों से बाजाप्ता बिहारी हिन्दी बोलवाना शुरू कर दिया है-हम और मैं का मामला ही नहीं ऐसी सैकड़ों चीजें हैं जिन्हें शास्त्रीय हिन्दी वाले अशुद्ध या कमजोरी मानते हैं। जब उनका समाचार चैनल चल रहा था(जो अब जी-बिहार नाम से किसी और ने ले लिया है) तो उसके समाचार वाचन में भी बिहारी हिन्दी का प्रयोग आम था। और जब फिल्म की बात हो तो सिर्फ लिखने के फरक का ही मामला नहीं रह जाता है उच्चारण, हाव-भाव और पूरा लहजा साथ चलता है। अभिनय में शब्द से ज्यादा प्रभाव इन चीजों से भी पड़ता है।

    और दुर्भाग्य से हमारे यहां शब्दों और उनकी व्युत्पत्ति तथा इससे भी बढ़ाकर समाजशास्त्रीय विवेचना होती ही कहां है। दुनिया के स्तर पर इससे ठीक उलटी स्थिति है। आज नोम चोम्स्की, फुको, देरीदा, शूमाखर और एडवर्ड सईद जैसे जितने बड़े बौद्धिक रहे हैं उनमें से अधिकांश भाषा शास्त्री हैं और शब्दों के, भाषा के गूढ और छुपे मतलब को समझते समझते ही उन्हें समकालीन समाज और राजनीति के सूत्र बेहतर समझ आते हैं। अपने यहां इस तरह की चेष्टा पिछली पीढ़ी के हजारी प्रसाद द्विवेदी जैसों में तो दिखती है लेकिन बाद में एकदम बिलायाती जमात आ गई है जो चोम्स्की और फूको-देरीदा के ‘पाठ’ का रट्टा तो लगाता है लेकिन अपनी भाषा, बोलियों और समाज के बारे में वैसा कुछ सोचने की जरूरत नहीं महसूस करता। हर उपन्यास या लेखन को उत्तर आधुनिक होने न होने का तमगा देता है लेकिन पाँच स्थानीय प्रयोगों पर ध्यान नहीं देता। उसके अपने लेखन या उच्चारण में स्थानीयता का पुट हो तब वह उसे झाड़कर एकदम सरकारी हिन्दी बोलना चाहता है, अपने प्रयोग के आगे-पीछे की बात पर गौर नहीं करता। 

    अपनी दीवानगी आजकल बिहारी हिन्दी के कर्म वाच्य के बेधड़क इस्तेमाल पर है। आया जाए, बैठा जाए, लिया जाए ही नहीं हर बात में घूम-फिर कर कर्तृवाच्य को बचाते हुए कर्म वाच्य पहुंचना अर्थात एक्टिव की जगह पैसिव वायस में बोलना तेजस्वी यादव और नीतीश कुमार का ही नहीं चिराग पासवान जैसे दिल्लीवासी बिहारी की आदत बन गई है। ‘कौन बनेगा करोड़पति’ में पाँच करोड़ का पुरस्कार जीतने वाले सुशील कुमार, चम्पा का पेड़ लगवाने, गौरैया का घोसला बनवाने और काम चर्चित फलों के पेड़ लगाने के चलते इस लेखक के फ़ेसबुक दोस्तों में काफी प्रिय है। एक आकर्षण उनकी भाषा का भी है-चाय का गिलास दिखाते हुए भी लिखते हैं कि अब से चाय पीने का काम इस गिलास से होगा-इस गिलास से चाय पीऊँगा, वह क्या अधिकांश शुद्ध बिहारी हिन्दी लिखने वाले नहीं लिखते। देखा-देखी हर छुटभैय्या ऐसा ही बोलता है, बल्कि ज्यादा बोलता है। भाषा के कुछ नए और अटपटे प्रयोग के साथ ऐसा आकर्षण जुड़ा होता है, तथा तब और जब ऐसा ऊपर के लोग बोलते हों। फलां काम मैंने किया या किसी दूसरे ने किया, बोलने की जगह मेरे द्वारा किया गया या उनके द्वारा किया गया बोलना ही बिहारी राजनीति या शीर्ष वाले समाज में आम है। कई बार बहुत साफ सीधे वाक्यों को भी घसीटकर पैसिव वायस में ले जाया जाता है जैसे मैट्रिक की परीक्षा में हमारे प्रश्नपत्र में आने वाले तीनों वाच्यों के परस्पर बदलाव का सवाल कुछ ज्यादा रट्टा लगा लिया गया हो।

    अधिकारी और कर्मचारी तो आदर देने या सरकारी प्रोटोकाल दिखाते हुए ऐसा ही बोलते रहे है। बल्कि वे की मायनों में इससे ज्यादा आगे बढ़ते हैं। वे कर्ता की जगह कर्म की प्रधानता वाला वाक्य तो बोलते ही हैं, कुछ ज्यादा औपचारिक भाषा बोलते हुए प्रथम पुरुष की जगह माध्यम या अन्य पुरुष अर्थात सामने वाले को आसमान पर बैठाते हैं-आया जाए, सर। बैठा जाए सर। सारा कुछ दूसरे के हवाले करने का कौशल जिसमें जिम्मेवारी भी दूसरे पर जाए और वह आदर भी महसूस करे। साहब/बाबू थोड़े ही किसी फ़ाइल पर या संख्या के हिसाब पर सही का निशान लगाता है। वह तो ‘सीन’ अर्थात ‘देखा गया’ वाला ही निशान (जो देखने में सही के निशान के उल्टा लगता है) लगाता है। तो क्या कर्तृ वाच्य की जगह कर्म वाच्य अर्थात पैसिव वायस आदर दिखाने का रस्म निभाते निभाते जबाबदेही से बचाने का रास्ता भी देता है।

    पर बाबू वर्ग तो नया है। अंगरेजी हुकूमत और अब के पचहत्तर साल वाला ही। कोई नाबाबी दौर के मुट्ठी भर बाबुओं को जोड़े तब उनका ऐसा असर पूरे समाज, भाषा और बोलियों पर हों यह समझना मानना मुश्किल है। पर बाबुओं से सिर्फ जिम्मेवारी से बचाने के लिए ऐसी भाषा नहीं अपनाई होगी और यह अपने से वरिष्ठ को आदर देने या जमादार को थानेदार कहकर काम निकलवाने जैसा मसला होगा। और इसकी प्रेरणा अपने पूर्ववर्ती जमात की जगह बिहारी समाज की बोलियों के प्रयोग से ही आया होगा क्योंकि वहां हर आदरणीय से बोलते हुए कर्तृ वाच्य की जगह कर्म वाच्य का प्रयोग ही होता है। दामाद से बात करनी हो, समधि से बात करनी हो, श्वसुर और सास को संबोधित करना हो तो कोई आओ, बैठो, बोलो नहीं करता। हिन्दी में भी आओ, बैठो, बोलो से अलग आइए, बैठिए, बोलिए का विकल्प उपलब्ध है जिसे आदर सूचक माना जाता है (बिहारी लोग आओ, बैठो और बोलो बोलने का बुरा भी मानते हैं) लेकिन बिहार की बोलियों में इसके लिए वही पैसिव वाले वाक्य या पद हैं। दामाद उम्र में छोटा हो पर पद में बड़ा गिना जाता है-सभी जगह। सो समाज के इस चलन को बाबुओं ने अपनाया हो और फिर शासकीय जमात की बोलचाल में यह आम हो गया होगा।

    लेकिन बाबुओं वाला मसला थोड़ा और अलग है। इसमें कर्त्ता और कर्म का स्थान बदलने के साथ प्रथम पुरुष और मध्यम या अन्य पुरुष का मामला भी है जिससे सिर्फ आदर या आदर का दिखावा नहीं होता, यह अहम की विदाई भी करता है। मैं और हम के प्रयोग का आधार भी बनाता है। इसे एक हद तक पुरानी अंगरेजी के आदर दिखाने वाले प्रयोग ‘दाऊ आर्ट’ से कुछ हद तक समझा जा सकता है। हिन्दी में भी आप और तुम का फरक आदरणीय और सामान्य जन का अंतर बताता है। लेकिन आया जाए, खाया जाए से जिस आदर या सामने वाले को श्रेष्ठता का भाव दिया जाता है उसकी तुलना इससे नहीं हो सकती। वह आपको सामान्य से उठाकर महामानव, अर्द्धदेव, महापुरुष, महाराज, महात्मा, देवता की श्रेणी में ला देता है। हजूर, महामहिम, हीज हाइनेस या महाराजाधिराज के साथ दरबारीपना और घटियापन का भाव आता है। इसलिए साधु जैसों को महाराज, महात्मा और देवता बोलना आम है और यह भोजपुरी ही नहीं हिन्दी की सभी बोलियों में है। यह दारोगा को एसपी या लेक्चरर को प्रोफेसर बोलना भी नहीं है।

    और साफ लगता है कि इस परिघटना को अकेले वाच्य वाले खड़ी बोली के वैयाकर्णिक सूत्र(फार्मूले) से नहीं समझा जा सकता। ‘देखा जाए’, ‘बैठा जाए’, ‘आया जाए’, ‘लिया जाए’ में सारा कुछ सामने वाले के हवाले ही है, बोलने वाला न तो अपनी भूमिका देखता है न कोई निर्देश या आदेश देता है। वह धीरे-धीरे खुद को नेपथ्य में जाने देता है। पर यह प्रभुपद की धूलि की आस में खुद को न्यौछावर करने का दास भाव नहीं है। इसे समझने के लिए कोई नया पैरामीटर ही ढूँढना होगा जिसके लिए हल्के ढंग से कई लोगों ने प्रयास किए हैं। पर उनके प्रयास में कमी है और उनको सभी तरफ से मान्यता भी नहीं मिली है। इसकी चर्चा आगे होगी।

    बिहार की तीन प्रमुख(भोजपुरी, मगही और मैथिली) और सभी पांचों (पूर्वोक्त तीन के साथ अंगिका और वज्जिका) बोलियों में भाषा का ऐसा प्रयोग, एक्टिव और पैसिव वायस वाला प्रयोग एक जैसा ही है। पूरब के मुसलमान सुरजापुरी जैसी थोड़ी भिन्न बोली बोलते हैं लेकिन उसमें भी ऐसे प्रयोग हैं। और यह एक बड़ी चीज की तरफ इशारा करती है- बिहारी समाज की मौलिक एकता की। भाषा के ऐसे प्रयोग और उसका हजारों साल बाद तक प्रभावी रहना बताता है कि बिहारी समाज एक सा बोलता, समझता, व्यवहार करता है। बिहारी संस्कार खास है और उसे बनाने में इस खास भाषा की भूमिका है-सभी समाजों को बनाने में उनकी भाषा सहायक होती है।

    और जो लोग ग्रियरसन जैसे विद्वानों के भाषा संबंधी विभाजन को स्वीकारते हुए उसे एक-दो कदम आगे बढ़ाते हैं और बिहारी समाज के बंटे होने की बात करते हैं वे गलत है। कोई मिथिला को वेदान्त ज्ञान का केंद्र मानते हुए पूरे के पूरे मगध अर्थात कीकट प्रदेश को मक्खालि गोसाल, पूरण कस्सप, पकुठा कच्चायन जैसे आजीवक/श्रमणों को समांतर खड़ा करने या वेद-वेदान्त से भी ऊपर बताने का प्रयास करता है तो किसी विद्वान को बिहार के पचास प्रमुख लोगों में उत्तर बिहार का सिर्फ एक पहलवान ही शामिल करने लायक दिखाई पड़ता है। भारतीय दर्शन की एक कम चर्चित परंपरा के देवी प्रसाद चटोपाध्याय के विलक्षण अध्ययन का यह दुरुपयोग ही है। कोई उत्तर वालों को स्त्रैण मान्यता है तो कोई दक्षिण वालों को दानवों से संबंधित बताता है। बोलियों और व्यवहार में हल्का अंतर जरूर है लेकिन इसका रिश्ता जलवायु, पैदावार तथा खानपान से ज्यादा है। गंगा बिहार को बांटती नहीं एक करती है।

    चाचा ग्रियरसन ने बिहार और यहां की बोलियों/भाषाओं की बहुत सेवा की है, बहुत श्रम के साथ अपना सर्वेक्षण किया था। साल के आठ महीने अस्थायी छावनियों में रहकर जगह जगह का पानी पीते और मच्छर कटवाते हुए सर्वेक्षण करना और चार महीने बैठकर उस सर्वेक्षण के नतीजों को कलमबंद करना आसान काम नहीं था-बौद्धिक श्रम के साथ शारीरिक कष्ट भी काफी हुआ होगा। उन पर षडयंत्रकारी होने का आरोप लगाना पाप होगा। लेकिन जिस तरह उन्होंने बिहार का भाषायी मानचित्र खींचा (और यह काफी हद तक प्रामाणिक भी है) यह विभाजन वाली सारी चर्चा उसी से निकलती है। संभव है यह नक्शा बनाते हुए उनके भी दिमाग के किसी कोने में यह साम्राज्यवादी सोच काम कर रही होगी कि भारत तो भाषा, धर्म, जाति और संस्कृतियों में बंटा था, एकता तो हम अंगरेजों ने बनाई है। पर इस नक्शे का बिहार के कथित चिंतक आगे ऐसा दुरुपयोग करेंगे इसकी कल्पना भी उन्होंने नहीं की होगी। बौद्धिक और चिंतक ही क्यों आम लोग भी हर मामले में गंगा इस पार या उस पार की बात ध्यान में रखते हैं। लाशों तक के अंतिम संस्कार में नदी के उत्तर होने का खयाल रखा जाता है लेकिन इसमें ऐसा विभाजन कारण नहीं है-भले की लोग विभाजन गिनाते गिनाते इसे भी जोड़ लेते हैं।

    गंगा जीवनदायिनी है, विभाजनकारी नहीं। उसको जलवायु से तो मतलब है बोलियों और जातियों से नहीं। मगही और मैथिली या एक हद तक अंगिका और वज्जिका तो गंगा के प्रवाह के अलग अलग इलाके में बोली जाती है लेकिन सबसे बड़ी भोजपुरी का उसके दोनों तरफ बोला जाना इसका सबसे बड़ा प्रमाण है। मैथिली का शास्त्र है, व्याकरण है क्योंकि वहां शास्त्र की परंपरा ज्यादा बड़ी और मजबूत रही है। भोजपुरी और मगही लोक की प्रधानता वाली बोलियां हैं-इनमें मैथिली से कम अनुशासन है, अनुशासन की मांग भी कम है (यूरोप की भाषाओं में फ्रेंच में यह प्रवृत्ति है)। अनुशासन का अपना महत्व है स्वच्छंदता का अपना। इस विषय को हम आगे कभी ज्यादा विस्तार से उठाएंगे।

    पर बोलियों के चरित्र में ही बुनियादी एकता नहीं है। जातियों के बीच कुल और गोत्र का बंटवारा होते हुए भी बुनियादी एकता होना इसका सबसे बड़ा प्रमाण है। अभी हाल तक हर जाति में ऐसा विभाजन बेटी-रोटी के संबंध में बाधक दिखता था। पचास साल के चुनावी अनुभव ने किस तरह जातियों के छोटे विभाजन मिटा दिए हैं, हम सबने देखा है। अवधिया-घमैला, कृष्णौट-मझौत, मैथिल सरयुपारी, जेठरिया-जुतौझिया ही नहीं नायक और खलनायक के मामले में एकदम उल्टा नजरिया रखने वाले पासवान, भुईया और कई बिरादरियों में आज जैसी एकता पहले नहीं थी। जातिगत ऊंच नीच है लेकिन भेदभाव और मान-अपमान में जमीन आसमान का अंतर आ गया है।

    भाषा और बोली समेत अस्थायी बँटवारों की बात ज्यादा आगे न बढ़ाना ही ठीक है। पर यह बताना जरूरी है कि भाषागत एकता और समाज की बुनियादी एकता के जो सूत्र बिहारी समाज में सबसे प्रबल हैं उनमें ज्ञान और कर्म का आदर और सबसे ऊपर होना प्रमुख है। भोग, शारीरिक सुख या फिर भक्ति को बिहारी समाज उतना महत्व नहीं देता जितना ज्ञान और कर्म को देता है। बौद्धिक तर्क और शारीरिक श्रम जीवन के आधार रहे हैं। और जिस कर्म वाच्य की प्रधानता या अभी तक प्रभावी होने की चर्चा पहले की गई है वह महत्वपूर्ण पहचान है। हिन्दी साहित्य के शुरुआती आंदोलन में ब्रजभाषा और बाद में खड़ी बोली की प्रधानता तथा खड़ी बोली हिन्दी को राजभाषा बनाए जाने के बावजूद अगर बिहारी समाज में इसका इतना प्रचलन है कि बाहर वाला भी इसे नोटिस करता है तो इसे कमी या कमजोर नहीं मानना चाहिए।

    और वाच्य है क्या चीज? यह असल में क्रिया का रूपांतरण है जिसके द्वारा कर्त्ता, कर्म या भाव की प्रधानता तय की जाती है या अपनी पसंद दिखाई जाती है। मजदूरों ने पुल बनाया की जगह मजदूरों के द्वारा पुल बनाया गया जैसा बदला वाक्य बुनियादी सूचना तो एक ही देता है लेकिन मजदूरों की जगह पुल बनाने की प्रधानता स्थापित करता है। मेरे द्वारा किताब पढ़ी गई, में किताब पढ़ने को प्रमुखता है। व्यक्ति को प्रधान पद से विस्थापित करके कर्म को प्रधान बनाना कर्म वाच्य का काम है। प्रथम पुरुष की जगह मध्यम और अन्य पुरुष को महत्व देना सोने में सुहागा वाला मामला है। यह भाषा के साथ पूरे समाज के व्यवहार और सोच की एक झलक देता है, उस पर पड़े प्रभावों की झलक देता है, समाज द्वारा काफी घिसाई-पिटाई के बाद उसे अपनाने का सच बताता है।

    भाषा का यह प्रयोग व्यवहार के अलग क्रम से आया है। बिहारी समाज एक तरफ तो ज्ञान को सर्वाधिक मान देता है तो दूसरी ओर कर्म को (भक्ति को सबसे काम)। इसके फलितार्थ आज क्या हैं यह बिहार की खस्ताहाल अर्थव्यवस्था से नहीं समझा जा सकता। इतिहास के सबसे लंबे दौर तक शीर्ष पर रहा पाटलिपुत्र और बिहार अंगरेजी राज में जितना शोषित हुआ और लूटा गया था, यह उसका परिणाम है। भाषा और समाज का मान उससे अप्रभावित रहा हो यह भी नहीं है लेकिन पहले का गौरव, व्यवहार, सोच और संस्कार की झलक आज तक प्रयुक्त भाषा दे रही है। आज भी पंजाब या दिल्ली से लौटा प्रवासी मजदूर जब ज्यादा ‘मैं मैं’ का प्रयोग करता है तो उसे कोई भी डांट देता है। यह इस बात का भी संकेत करती है कि ज्ञान और श्रम का आदर, उपजाऊ जमीन तथा भरपूर पानी उसके लिए फिर से उभरने की सारी संभावनाएं रखे हुए हैं।

    अपने जिस वरिष्ठ ने बिहारी हिन्दी के कर्म वाच्य प्रधानता की बात को उसकी विशिष्टता के तौर पर बताया था उन्होंने ही कहा कि इसका रिश्ता बिहार के बौद्ध प्रभाव से है। निश्चित रूप से बिहार अपने नाम के साथ ही काफी चीजों से इस प्रभाव को व्यक्त करता है। लेकिन इस लेखक ने पाली प्रकृत जानने वालों या बौद्ध मत के जिन जानकार लोगों से बात की उन्होंने इस किस्म का रिश्ता बताने या उसके प्रमाण देने में असमर्थता जताई। भोजपुरी व्याकरण समेत की भाषायी विषयों पर एकदम मौलिक और दिल जीतने वाला तर्क देने वाले राजेंद्र प्र सिंह (हालांकि उनके तर्कों और कथनों को अभी सर्वमान्यता नहीं मिली है या वे हिन्दी के बौद्धिक विमर्श का हिस्सा नहीं बने हैं) आजकल बौद्ध पुरातात्विक चीजों के अध्ययन पर जोर दे रहे हैं। जब हमने भोजपुरी या बिहारी हिन्दी के इस कर्म वाच्य प्रधानता को लेकर कुछ जानना चाहा तो उन्होंने भी असमर्थता जताई। पर यह सब निराशा की बात नहीं है। बिहारी लड़के-लड़कियों में अभी काफी ऐसे हैं जो इसे स्थापित करेंगे या इस तर्क के आधार न होने की पुष्टि करेंगे। अभी तक तो इस दिशा में कोई काम ही नहीं हुआ है। 

    काफी पहले जब हिन्दी भाषा परिवार का दायरा और उसमें आने वाली बोलियों की चर्चा हो रही थी तब विलक्षण वैयाकरण पंडित किशोरी दास वाजपेयी जी ने सूत्र दिया था कि छठे कारक के रूप में जिन जिन बोलियों में कवर्ग वाले पद हैं वे हिन्दी परिवार का हिस्सा है। इस एक सूत्र ने सारे झमेले मिटाए और काफी सारी उलझाने सदा के लिए दूर कर दीं। पंजाबी, मराठी, बांग्ला और गुजराती जैसी भाषाएं हमसे थोड़ा दूर हैं यह तय हो गया। ओडिया और दक्षिण की भाषाएं तो अलग हैं ही। ताम्रपत्र और भुजपत्र के लेखन ने भी भेद बनाया है, लिपियों का चरित्र तय किया है। पंडित हजारी प्रसाद जी के साहित्य को बारीकी से पढ़ने से की सूत्र निकाल सकते हैं क्योंकि इस विषय पर उन्होंने ही कुछ ध्यान दिया भी था। राजेन्द्र सिंह भी भोजपुरी व्याकरण के कुछ ऐसे सूत्र देते हैं जो हिन्दी में लिंग निर्धारण से लेकर कई और परेशानियों का समाधान बन सकते हैं। उम्मीद करनी चाहिए कि इस विशेष बिहारी प्रयोग के कारण और आधार को समझने समझाने का काम भी होगा।

    पर इतनी अटकल हम भी लगा सकते हैं कि अगर वैदिक या वेदान्त वाली परंपरा ज्ञान की श्रेष्ठता स्थापित करती है और पाली-प्रकृत का चरित्र इस कर्म वाच्य को समर्थन नहीं देता तो बिहार की अन्य बौद्धिक तथा सांस्कृतिक परंपराओं की तरफ भी ध्यान देना चाहिए। वैसे तंत्र की, समातन धर्म की और बौद्ध तथा जैन धर्म की भी कई सारी परम्पराएं रही हैं-कई कई सौ वर्ष तक समाज पर भारी असर रखने वाली। और इसमें सबसे प्रबल प्रभाव नाथ पंथियों का रहा है-गोरख और मछेन्दर वाली, सूफियों वाली। और जिस व्रात्य परंपरा की बात पहले की गई है संभव है उससे इसका रिश्ता हो। मैं एक अध्ययन के सिलसिले में जब चंपारण के एक गाँव मछरगांवा को ढूंढ रहा था तो पता लगा कि सिर्फ वहीं चार या पाँच मछरगांवा हैं। मैं इसे मच्छर की अधिकता से जोड़ रहा था पर तब काफी शर्मिंदा हुआ जब पता चला कि यह नाम मछन्दरनाथ अर्थात गोरखनाथ के गुरु मत्स्येन्द्र नाथ के नाम से जुडा है। जमाने तक भरथरी की गाथा सुनाने वाले जोगियों से लोग बच्चों को बचाते थे कि वे इस कथा के प्रभाव में आकार बैरागी न बन जाएं।       

    बिहार की जमीन के पग पग पर जनक, सीता, याज्ञवल्क, बाल्मीकि, गौतम, गार्गी, मैत्रेयी, 24 तीर्थंकर, बुद्ध, शंकराचार्य, मंडन मिश्र, अश्वघोष, सहरपा, नैयायिकों-वैशेषिक-मीमांसकों, चन्द्रगुप्त, अशोक, चाणक्य, आर्यभट्ट, पाणिनी, हर्ष, वाण, ध्रुवस्वामिनी, चन्द्रगुप्त द्वितीय, शेरशाह, कबीर, गोरख, मत्सेंद्रनाथ, तांत्रिकों, अनेक बड़े सूफी संतों की पूरी पलटन, विक्रमशिला-नालंदा के भौतिक अवशेष बिखरे पड़े हों उसके संस्कार, स्वभाव और व्यवहार पर उनका असर न हो यह कैसे संभव है। उत्तर हो या दक्षिण बिहार जहां खुदाई हो, जिस पुराने तालाब की उढ़ाई हो कुछ न कुछ ऐतिहासिक चीज निकल ही आती है। उनकी भाषा इन सबसे कैसे अप्रभावित रहेगी। उनकी निशानियां हर जगह हैं तो भाषा पर क्यों नहीं हो सकतीं।            

    अनुज पल्लव को अभी यह जानना है।

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