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  • इतिहास, स्मृति और लेखकीय संवेदना का संतुलन: ‘इतिहास की थाली’

    हाल में ही पेंगुइन स्वदेश से प्रकाशित पुस्तक ‘इतिहास की थाली’ प्रकाशित हुई है। लेखक अनिमेष मुखर्जी की यह किताब जब से आई है लगातार चर्चा में बनी हुई है। आज इस किताब पर यह टिप्पणी लिखी है कुमारी रोहिणी ने। आप भी पढ़ सकते हैं- मॉडरेटर 

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    जब ‘इतिहास की थाली’ का कवर लॉन्च हुआ था, तब मैंने कहा था कि अनिमेष मुखर्जी एक लेससेलिब्रेटेड लेखक हैं। उनकी किताब ‘ठाकुरबाड़ी’ पढ़कर उम्मीदें तो जगी थीं, लेकिन मन के किसी कोने में यह आशंका भी थी कि कहीं यह वन टाइम फ्लूक न साबित हो। आजकल के निन्यानवे फ़ीसद लेखन के बीच यह डर अस्वाभाविक भी नहीं है। लेकिन ‘इतिहास की थाली’ ने मेरी उस शंका को पूरी तरह ग़लत साबित कर दिया।

    और एक बार फिर अपने पेसीमिस्ट एप्रोच के कारण मुझे ख़ुशी ही मिली। दरअसल, सच कहूँ तो पेसिमिस्ट होने के अपने फायदे हैं। आप ग़लत भी साबित हो जाएँ तब भी नुक़सान नहीं होता।

    ख़ैर अब किताब पर आते हैं। इतिहास की थाली नाम की इस किताब को पढ़ते हुए लगा कि ज़रूरी नहीं है इतिहास को हमेशा या तो भारी-भरकम अकादमिक भाषा में या फिर कुंजी की तरह ही लिखा जाए। इतिहास जैसे रोचक विषय को स्मृति, संस्कृति और रोज़मर्रा के जीवन के रूप में भी दर्ज किया जा सकता है, बिलकुल किसी देसी रेस्टोरेंट में मिलने वाली साउथ इंडियन या नार्थ इंडियन थाली की तरह। और यहीं यह किताब अपने शीर्षक से न्याय करती दिखाई देती है।

    इसे पढ़ते हुए एहसास होता है कि इतिहास केवल युद्धों, राजनीतिक बहसों, समझौतों और संधियों से नहीं गढ़ा जाता। वह उस दौर की रसोई में जलते चूल्हों की धीमी आँच पर भी पकता है। असली इतिहास रसोइयों, अनाज के ढेरों, मसालों और अंततः परोसे गए खाने में भी गढ़ा जा रहा होता है।

    जैसे-जैसे हम इस किताब के पन्ने पलटते हैं, यह विचार पुष्ट होता जाता है कि किसी भी सभ्यता की थाली उसके भूगोल का नक्शा भी है और उसकी स्मृतियों का दस्तावेज़ भी। खानपान केवल स्वाद नहीं, बल्कि यात्राओं, व्यापार, प्रवास और सत्ता-संबंधों की कहानी भी बयान करता है।

    इस किताब में बड़े ऐतिहासिक आख्यानों के बीच वे छोटे-छोटे प्रसंग मिलते हैं जिनकी जगह अक्सर भारी इतिहास-ग्रंथों में फुटनोट तक सीमित रह जाती है। जैसे किसी गली का कोई ख़ास व्यंजन, किसी प्रवासी समुदाय का अपने साथ लाया हुआ विशेष स्वाद, या किसी घर में पीढ़ियों से बनता आ रहा पकवान। ये सब मिलकर इतिहास का एक वैकल्पिक लेकिन जीवंत पाठ रचते हैं।

    कहीं भी ऐसा नहीं लगता कि लेखक पहले से तय निष्कर्ष लेकर बैठा है। इसके उलट, यह किताब खानपान से जुड़े उन क़िस्सों पर से भी धीरे-धीरे पर्दा हटाती है जो हमारी सामूहिक स्मृतियों में मौजूद तो हैं, पर जिनकी उपस्थिति से हम अक्सर अनजान रहते हैं। पढ़ते-पढ़ते यह विचार सिर उठाता है कि इतिहास केवल सत्ता की भाषा नहीं, बल्कि रोज़मर्रा के जीवन की भी भाषा है।

    यह किताब परंपरा-प्रथा जैसी चीजों को रोमैंटीसाइज़ नहीं करती। उल्टे यह सावधान करती हुई-सी लगती है कि जिन परंपराओं को हम बचाने में लगे रहते हैं, वे भी समय, सत्ता और स्मृति द्वारा गढ़ी गई संरचनाएँ हैं।

    हिंदी में भारतीय खानपान के इतिहास पर बहुत व्यापक लेखन नहीं हुआ है, फिर भी पुष्पेश पंत, के.टी. आचार्य और कोलीन टेलर सेन जैसे लेखकों ने महत्वपूर्ण काम किए हैं। इन लेखकों ने खानपान को व्यापार, उपनिवेशवाद और सांस्कृतिक आदान-प्रदान के संदर्भ में समझाया है। उनकी किताबें हमें बताती हैं कि क्या खाया जाता था, और कब और क्यों खाया जाता था।

    लेकिन यहाँ आकर  ‘इतिहास की थाली’ अपना रास्ता थोड़ा बदलती नज़र आती है। इसके केंद्र में उस खाने को खाने वाला आदमी, उसकी आदतें और उन आदतों का अस्तित्व जैसे विषय आ जाते हैं। इस बिंदु पर किताब बताती है कि किसी भी दौर का खानपान केवल उसकी सांस्कृतिक पहचान नहीं होती, बल्कि अस्तित्व, वर्ग-जाति, स्मृति और स्वीकार-अस्वीकार की राजनीति से भी जुड़ा होता है।

    जहाँ दूसरी किताबें भोजन को इतिहास की कोई चीज बनाकर देखती हैं, वहाँ यह किताब उसे निजी और सामाजिक अनुभव में बदल देती है। यहाँ स्वाद एक सोशल टेक्स्ट बन जाता है और थाली एक जीवित दस्तावेज़।

    एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि यह किताब नॉस्टैल्जिया में नहीं फँसती। कई बार खानपान पर लिखी किताबें अतीत को स्वर्णिम युग की तरह प्रस्तुत करती हैं। इसके विपरीत यहाँ हर थाली में अनुपस्थिति की भी उपस्थिति दर्ज होती है। कुछ चीज़ें जो कभी थीं और मिट गईं, और कुछ जो सत्ता और राजनीति के कारण जुड़ीं या गायब हुईं।

    सबसे अहम बात शायद यह है कि यह किताब इतिहास को स्थिर और अंतिम सच की तरह नहीं देखती। यहाँ “थाली” एक प्रक्रिया है। लगातार बदलती, जुड़ती, टूटती हुई। इसे पढ़कर लगता है कि इतिहास कोई दूर की, अबूझ चीज़ नहीं, बल्कि हमारे अपने घर के किचन में, रोज़मर्रा के चुनावों में, हमारे स्वाद की आदतों में मौजूद है।

    ‘इतिहास की थाली’ ज्ञान तो देती ही है, लेकिन उससे अधिक इतिहास के प्रति एक नई संवेदना और दृष्टि विकसित करती है। इस किताब को पढ़ लेने के बाद आप अपने सामने रखी थाली को पहले की तरह नहीं देख पाएँगे। ऐसा मेरा दावा है।

    यह केवल एक किताब नहीं, बल्कि एक याद दिलाने वाला दस्तावेज़ है कि इतिहास को समझने के लिए कभी-कभी लाइब्रेरी से ज़्यादा ज़रूरी है अपने किचन में झाँकना।

    और अगर यह किताब कोई संकेत देती है, तो वह यही कि अनिमेष मुखर्जी संयोग नहीं, संभावना हैं। इतिहास, स्मृति और लेखकीय संवेदना के संतुलन को साधने वाले अपने लेखकीय कौशल के कारण वे भीड़ से अलग खड़े दिखाई पड़ते हैं।

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