• कथा-कहानी
  • प्रवीण बंजारा की कहानी ‘पहले जैसा पीला’

    अकेलापन व्यक्ति को किस हद तक निराश कर सकता है इसका अनुमान प्रवीण बंजारा की कहानी ‘पहले जैसा पीला’ को पढ़कर लगाया जा सकता है। यह कहानी निरंतर उत्सुकता बनाये रखती है – अनुरंजनी

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    पहले जैसा पीला

    यह सुबह भी और दिनों की तरह ही आरंभ हुई थी। कुछ भी खास नहीं था इसमें। उमा रसोई में अपना काम देख रही थी। सुकुमार दफ्तर को जाने के लिए तैयार हो रहा था। कनक को उसकी स्कूल बस लेकर जा चुकी थी। विंध्या महिषी को खाना खिलाने की कोशिश कर रही थी जो कि कभी भी आसान काम नहीं होता था और आज भी नहीं था।

    सब कुछ वैसे ही हो रहा था जैसे कि रोज होता आया था। कुछ भी तो अलग नहीं था। फिर यह कैसे हो गया कि ऐसे लगा जैसे कोई विस्फोट हो गया है, जैसे परिवार के संतुलन को किसी ने बहुत बुरे तरीके से अस्त व्यस्त कर दिया है। ऐसे लगा जैसे घर की गाड़ी पटरी से उतर गई है। कोई भी तो तैयार नहीं था इसके लिए। सब कुछ वैसे ही होता रहे जिसे रोज होता आया है तभी तो घर, परिवार सब कुछ चल पाता है। ऐसा नहीं हुआ तो परिवार कैसे चलेगा, आदमी अपना काम कैसे करेगा, बच्चे बड़े कैसे हो पाएंगे, औरतें घर की व्यवस्था कायम कैसे रख पाएंगी? नहीं, नहीं ऐसे तो कदापि नहीं होना चाहिए।

    महेश्वर प्रसाद शर्मा, जिन्हें मित्र लोग ईश्वर नाम से जानते थे, आज सुबह छत पर चाय का प्याला लेकर गए थे। उनका मंतव्य चाय पीने का ही रहा होगा: प्याला भरा हुआ था और दूसरे हाथ में एक नमकीन की कटोरी थी, मीठा तो कब का बंद हो चुका था उनका, तो निश्चय ही छत पर जाने का निर्णय चाय पीने के लिए एक वाजिब स्थान तक पहुँचने के लिए ही लिया गया होगा। यह घर जिसकी छत पर वे जा रहे थे उन्होंने अपने पसीने की गाढ़ी कमाई से बनाया था। इस बात का गर्व था उन्हें, और यहां वे एक बहुत ही साधारण सा जीवन जीते थे। ऐसा करते हुए वे अपनी महत्त्वकांक्षा पूरी कर रहे थे, जो सदा से यही थी – एक साधारण जीवन जीना। हाँ यही उनकी महत्त्वाकांक्षा थी। अपनी महत्त्वाकांक्षा की विशिष्टता का आभास था उन्हें। अपने मित्रों से वे अक्सर कहते सुने जा सकते थे, ‘मैं एक साधारण व्यक्ति के जैसा एक साधारण जीवन जीना चाहता हूँ। इससे बेहतर जीवन संभव नहीं है। हर किसी के बस का नहीं है ऐसा कर पाना। अगर हिम्मत है तो कर के दिखाओ।’ उनके मित्र स्वतः ही अपनी हार स्वीकार कर लेते थे क्योंकि वे उनकी बातों का मर्म समझते थे, और अपनी सीमाएं भी। वे इस तरह की महत्त्वाकांक्षा अपने दिल में पाल ही नहीं सकते थे सो उनका अपनी हार स्वीकार लेना आसानी से समझा जा सकता था।

    उस दिन जब हर रोज की तरह ईश्वर चाय लेकर छत पर पहुंचे तो एकाएक चौंक गए। वे एक पल को रुके और सोचने लगे परंतु उन्हें यह स्मरण नहीं आया कि वह क्या बात थी जिस पर वे चौंक गए थे। वे कुछ क्षण चेष्टा करते रहे परंतु  फिर भी जब उन्हें वह बात याद नहीं आई जिस पर वे चौंके थे तो कुर्सी पर बैठ कर चाय पीने लगे। कुछ पल में वे इस बात को भूल ही गए और चाय पीते हुए सामने आसमान की ओर देखने लगे जहां कुछ चीलों ने सुबह सुबह मंडराना शुरू कर दिया था। 

    उन्होंने चाय का प्याला और नमकीन की कटोरी को खाली किया और सामने स्टूल पर रख दिया। चाय पीने से वे एक ताजगी का अनुभव कर रहे थे। उन्होंने एक टांग दूसरी पर रखी और शून्य में ताकते हुए प्रातःकाल का आनंद लेने लगे। अभी कुछ पल भी न बीते होंगे कि वे एक झटके के साथ सजग होकर सीधे बैठ गए। अब उनके दोनों पांव ज़मीन पर थे। उन्हें एक झटके में समझ आ गया कि छत पर आते ही वे क्यों चौंके थे।

    नीचे अपने कमरे में जाकर उन्होंने पत्नी को पुकारा, “उमा, जरा आना यहां।”

    उमा अपने पति की आवाज में चिंता और भय का मिश्रित स्वर पहचान कर तुरंत ही हाथ का काम छोड़ कर चली आई।

    “हाँ जी, कहिए क्या हो गया? सब ठीक तो है न?”

    “उमा आज तो कुछ अजीब ही हुआ है। ये कैसे हो गया?”

    “हुआ क्या, यह तो बताइए।”

    “उमा आज मैं ऊपर गया तो मैंने देखा कि सूरज की रोशनी पहले जैसी नहीं रही है।”

    “क्यों? पहले जैसी कैसे नहीं है? कोई ग्रहण लग रहा है क्या आज?”

    “नहीं कोई ग्रहण नहीं है। हुआ यह है कि सूरज की रोशनी पहले जैसी नहीं है। उस का रंग बदल गया है। अब वो पहले जैसा पीला नहीं है।”

    “ऐसा कैसे हो सकता है? सूरज तो सदियों से आसमान में चमकता आया है। उसकी रोशनी का रंग कभी नहीं बदलता।”

    “किंतु आज ऐसा हुआ है उमा। जो कभी नहीं हुआ था वह आज हो गया है। सूरज की रोशनी का रंग पहले जैसा पीला नहीं रहा है।”

    उमा को ईश्वर की बेचैनी देख कर कुछ घबराहट होने लगी। वह बोली, “आप चिंता मत करिए सब ठीक हो जाएगा।” उमा ने ईश्वर के माथे पर हाथ रखा, ताप तो नहीं लग रहा था। बोली, “सब ठीक है। आप थोड़ी देर आराम कर लीजिए। सब ठीक हो जाएगा। मैं किवाड़ बंद किए देती हूँ। आप आँख बंद कर लेट जाइए। मैं बच्चों से कहे देती हूँ वे आप को परेशान नहीं करेंगे। थोड़ा आराम कर फिर नहा लेना और नाश्ता कर लेना। आप चिंता मत करिए। सब ठीक है।”

    ईश्वर परेशान होकर बोले, “मैं बिलकुल ठीक हूँ। मुझे कुछ नहीं हुआ है। सूरज की रोशनी…”

    उमा ने एकदम से ईश्वर के मुँह पर हाथ रख उन्हें कुछ भी बोलने से मना कर दिया और लगभग जबरदस्ती ही पलंग पर लिटा दिया। फिर वह किवाड़ बंद कर अपना काम करने में लग गई। परंतु अब उसका चेहरा पहले की तरह शांत और निर्मल नहीं था। उसके चेहरे पर चिंता की रेखाएं खिंची थीं। पहले यह विंध्या ने देखा। बोली, “माँजी सब ठीक है न? आप परेशान क्यों हैं?”

    “हाँ बेटा वैसे तो सब ठीक ही है। तेरे पिताजी की तबीयत कुछ ठीक नहीं लग रही है।”

    “क्यों क्या हुआ?”

    उमा ने बात को टालने की गरज से कहा, “कुछ अस्वस्थ महसूस कर रहे हैं। आराम करने का कह कर आई हूँ।” उमा अधिक कुछ कहना नहीं चाहती थी। जाने कैसे-कैसे डर उसके मन में घुमड़ने लगे थे। हे भगवान, सब ठीक तो चल रहा था। बैठे बिठाए ये क्या हो रहा है? माता रानी सब ठीक रखना।

    विंध्या सब देख रही थी और समझ पा रही थी। उसने देख लिया कि माँजी सारी बात बताना नहीं चाह रहीं। अधिक कुरेदना उसने ठीक नहीं समझा। “आप चिंता न करें सब ठीक हो जाएगा” , कह कर वह अपने कमरे में चली गई।

    सुकुमार अपना बैग उठा कर जाने को तैयार ही था। उसने विंध्या के माथे पर चिंता के बादल मंडराते देखे तो चौंक कर रुक गया। 

    “सब ठीक तो है न?”

    “हाँ, सब ठीक है। माँजी पिताजी की तबीयत को लेकर कुछ चिंतित लगीं।”

    “जा कर देखूँ क्या हुआ है पिताजी को?” यह कह कर बैग रख वह जाने को उद्यत हुआ। विंध्या ने उसकी बांह पकड़ ली। “नहीं, नहीं अभी पिताजी आराम कर रहे हैं। उन्हें आराम करने दीजिए। शायद इसी से वे ठीक हो जाएं। कुछ विशेष नहीं लगता। नहीं तो माँ बता ही देतीं। अभी उन्हें परेशान मत कीजिए। आप चलिए आपको देर हो रही है।”

    कुछ पल असमंजस में ठहर सुकुमार ने बैग उठा लिया और बोला, “ठीक है, मैं चलता हूँ। कुछ चिंता वाली बात हो तो मुझे बता देना।”

    सुकुमार जब घर के बाहर निकला तो उसके चेहरे पर चिंता की रेखाएं खिंची थीं। 

    आज एक हँसते खेलते परिवार का संतुलन बिगड़ गया था।

      

    कुछ देर ईश्वर लेटे रहे। वे अपने को बहुत समझाते रहे पर दिल समझने को तैयार ही नहीं था। ऐसा कैसे हो सकता है? सूरज की रोशनी में पीलापन कैसे कम हो गया? कहां चला गया वह पीलापन? पीलापन कम होने से सूरज की रोशनी में जो एक खिलापन होता था वह अब नहीं रहा था। सच तो यह था, हालांकि कहने सुनने में यह बात कुछ अजीब लग सकती है, कि सूरज की रोशनी कुछ बासी सी हो गई थी। आसमान की ओर देखने में अब वह आनंद ही नहीं रहा था। छत पर बैठ कर आसमान की ओर देखना ईश्वर के एक साधारण जीवन जीने के उपक्रम का एक अभिन्न अंग था। अब उनकी आसमान की ओर देखने की इच्छा तो बदरंग हो जाएगी। अब आसमान की ओर वे कैसे देखेंगे जब उन्हें वह दिखेगा ही नहीं जो देखने के लिए वे आसमान की ओर देखा करते थे। इसके अलावा असल मुद्दा तो यह हो गया था कि अब वे सुबह-सुबह छत पर चाय पीने जाएंगे ही क्यों? क्योंकि ऊपर जाकर जो उन्हें दिखेगा वह तो रंगहीन होगा। ऐसा रंगहीन दृश्य वे क्यों देखना चाहेंगे?

    ईश्वर से अधिक देर लेटा नहीं गया। कुछ देर बेचैनी में लेटे रहने के पश्चात्‌ वे उठ खड़े हुए और अपने नित्य के कामों में लग गए। इस दौरान इस विषय पर न तो उमा ने उनसे कोई बात की और न उन्होंने उमा से। नहा-धो कर नाश्ता किया और पार्क की ओर चले गए। 

    दो पेड़ों के नीचे चार बैंच लगा दी गई थीं जिनपर दस बारह लोग आमने-सामने बैठ कर बातचीत कर सकते थे। जब ईश्वर पहुँचे तो छः लोग आ चुके थे। बाकी लोग भी आते ही होंगे। यह दस बारह लोगों का समूह था। ये लोग दिन में दो बार पार्क में एकत्र हो जाया करता था, एक बार सुबह और एक बार शाम में। सब का आना निश्चित नहीं होता था। अपनी सुविधा और रुचि के अनुसार जो लोग भी आ सकते थे आ जाया करते थे। स्थान और समय निश्चित थे। जगह यही, सुबह ग्यारह बजे और शाम छः बजे। 

    जब वे पहुँचे तो पाँच लोग पहले से उपस्थित थे। वे गुलाटी की बगल में बैठ गए। सामने की बैंच पर बैठे बक्शी जी बोल रहे थे, “गर्ग की टीम ने पिछले तीन साल से कुछ नहीं किया है। पानी निकासी की समस्या जस की तस है, पार्क एक उजाड़ जंगल सा लगता है।”

    निवासी कल्याण संघ के चुनाव नजदीक थे। उसी को लेकर यह गहमा गहमी चल रही थी। आम तौर पर ईश्वर को इस विषय में बहुत रुचि रहती थी। परंतु आज वे आधे मन से ही ये बातें सुन रहे थे। 

    अब रामकुमार बोल रहे थे, “सुरक्षा गार्ड को देखिए, कितनी लापरवाही से काम करते हैं। दिन में भी अपने कमरे में बैठ कर सोते रहते हैं।”

    अब सक्सेना जी को भी अपनी शिकायत दर्ज करने का मौका मिल गया, “हमारे घर के बाहर गटर से बदबू आती रहती है। गर्ग से बीसियों बार कह चुका हूँ। कोई ठोस कदम उठाते ही नहीं। एक जमादार भेज देते हैं। वह ग़टर का ढक्कन खोल कर एक बार देख लेता है और कहता है सब ठीक है। अजी सब ठीक है तो बदबू कैसे आती है? हमारा बच्चों वाला घर है। कोई बीमारी फैल गई तो क्या होगा? हमारी बात गंभीरता से लेते ही नहीं हैं। हर बार टाल मटोल वाला जवाब दे देते हैं। यह भी कोई बात है भला।”

    थोड़ी ही देर में दो लोग और आ गए और आते ही वे भी इस विषय पर अपने विचार साझा करने में तल्लीन हो गए। किसी का ध्यान इस ओर नहीं गया कि ईश्वर अपने स्वभाव के विरुद्ध जन कल्याण के मुद्दों पर होने वाली चर्चा में कुछ भी हिस्सा नहीं ले रहे हैं। कुछ देर और यह वार्तालाप चलते रहने के बाद बक्शी जी का ध्यान अचानक ईश्वर की ओर गया। वे ईश्वर की ओर उन्मुख होकर बोले, “ईश्वर जी आज आप कुछ नहीं बोल रहे हैं। क्या बात है सब खैरियत तो है न?”

    ईश्वर जैसे अपनी तंद्रा से जगे। अपने मन में घूम रही चिंता को व्यक्त करते हुए बोले, “किसी ने आज देखा नहीं? आज सुबह मैं जब छत पर था तो मैंने देखा था। सूरज की रोशनी में पहले जैसा पीला नहीं है। उसकी रोशनी में बदलाव आ गया है। यह तो बहुत चिंता की बात है।”

    चलती हुई बहस में व्यवधान आने पर सब लोग बक्शी जी और ईश्वर की ओर प्रश्नसूचक दृष्टि से देखने लगे। उत्तेजना का जो माहौल बना हुआ था उसमें एक अनचाही ठंडक आ गई। बक्शी जी ने आँखें सिकोड़ कर सारा ध्यान ईश्वर पर केंद्रित किया। लगता था उनके मस्तिष्क को विचारों की पटरियां बदलने में कुछ परिश्रम करना पड़ रहा था। बहुत प्रयास के बाद बोले, “ऐसा क्या? यह धरती के वातावरण में जो बदलाव आ रहे हैं उनके कारण भी हो सकता है। या यह भी सम्भव है कि यह प्रदूषण के कारण हो रहा हो। हाँ यही होगा। प्रदूषण के ही कारण होगा। अब क्या करें। यह तो रोज का रोना है। सरकार इस विषय में कुछ कर ही नहीं पाती है। न जाने इस समस्या का कोई हल ही नहीं है इन लोगों के पास। भला यह भी कोई बात हुई। हर समस्या का कुछ न कुछ हल तो होता ही है। इन्हें हल ही नहीं मिलता है इसका। सब निकम्मे हो गए हैं।” बक्शी जी ने सर झटक कर कहा।

    “सही कह रहे हैं बक्शी जी। मेरा भी यही मानना है। ये लोग कुछ करना ही नहीं चाहते हैं जी। सब मिले हुए हैं”, यह सहाय जी का विचार था।

    इसके बाद बातचीत की दिशा इस ओर ही मुड़ गई। कौन किस किस से मिला हुआ है और प्रदूषण की समस्या क्यों इतनी जटिल है कि इसका निराकरण ही नहीं हो पाता है, इस विषय पर एक धुआंधार बहस होने लगी।

    ईश्वर का मन इस बहस में पड़ने का बिल्कुल भी नहीं था। वे चुपचाप उठे और चल दिए। सब जन इस चर्चा में इतने तल्लीन थे कि किसी ने उनको जाते नहीं देखा।   

    ईश्वर जब पार्क से निकले तो उनका मन खिन्न था। ये लोग इतनी गंभीर समस्या की ओर ध्यान न देकर किन तुच्छ बातों में अपना समय बरबाद कर रहे हैं। शायद ये समझ नहीं पा रहे हैं कि सूरज की रोशनी में ही बदलाव आ गया तो इसके कितने दूरगामी परिणाम हो सकते हैं।

    थोड़ी दूर चल कर सड़क के उस पार एक चाय वाले का खोखा था। वे वहां जाकर एक स्टूल पर बैठ गए। 

    “हाँ भई चंदू, सब ठीक ठाक तो है न? दुकान अच्छी चल रही है न तेरी?”

    चंदू ने ईश्वर को देख हाथ हवा में हिला कर उनका अभिवादन किया, “हाँ सरकार, आपकी कृपा से सब ठीक ही है।”

    “हम कौन होते हैं भला? ऊपर वाले की कृपा बोल। ऐसे बोल बोल कर हमें शर्मिंदा न किया कर। चल एक चाय लगा दे बिना मीठे की।”

    “जी सरकार।”

    कुछ ही देर में दुकान में काम करने वाला लड़का, जिसे सब छोटू कहते थे, उनके सामने चाय रख गया।

    जब ईश्वर खोखे पर आए थे तो एक दो ग्राहक बैठे थे। कुछ देर में वे उठ कर चले एया। चंदू अपने पास रखी एक अखबार उठा कर पढ़ने लगा। 

    “चंदू बेटा, कोई खास खबर है आज?”

    “बस सरकार, वही रोज के झमेले हैं। कुछ खास तो दिख नहीं रहा। आप तो जानते ही हैं ये सब्।”

    तभी ईश्वर को याद आया और वे बोले, “जरा देख तो सूरज के बारे में कुछ आया है क्या? आज सुबह अखबार देख नहीं पाया मैं। देख बेटा देख जरा।”

    “देख तो मैं लूँ, पर आप किस सूरज की बात कर रहे हैं? कौन है यह?”

    “अबे अपने सर के ऊपर देख्। और कौन सा सूरज, यही तो एक सूरज है। कोई ज्यादा थोड़े ही न हैं।”

    “ये वाला सूरज?” चंदू ने आसमान की ओर इशारा करते हुए कुछ विस्मित होकर कहा।

    “हाँ भई, यही तो। कोई मैं जेब में लेकर घूमता हूँ क्या उसको?”

    चंदू खीसें निपोरता हुआ बोला, “समझ गया सरकार।”

    थोड़ी देर अखबार को ध्यान से बाँचने के बाद चंदू बोला, “सरकार सूरज का कोई तो कोई जिक्र दिख नहीं रहा है। दिन का तापमान तो मोबाईल में भी आता रहता है। और कछु?”

    “बहुत हैरानी की बात है।” ईश्वर ने चिंतित होते हुए कहा।

    क्या सरकार? कोई विशेष बात हो तो बता दीजिए हमें भी। हम तो ज्यादा पढ़े लिखे न हैं। आप ही कछु प्रकाश डाल दीजिए।

    “दुनिया में इतनी बड़ी घटना घट गई और सब अनजान हैं उससे?” ईश्वर ने लगभग बुदबुदाते हुए कहा।

    हालांकि उन्होंने यह बात बहुत धीरे से कही थी पर चंदू के अभ्यस्त कानों ने उसे पकड़ लिया। सारा दिन खोखे पर बैठ कर ग्राहकों की बातें सुनना उसका शौक भी था और पेशा भी। बातें सुन कर ही अच्छे पैसे बन जाते थे उसके। चौंक कर बोला, “कैसी घटना?”

    ईश्वर ने कुछ क्रोधित होते हुए कहा, “आंखें खुली नहीं रखता है क्या अपनी? यहां सूरज का पीलापन कम होता जा रहा है और तुझे खबर ही नहीं है?”

    ईश्वर उठ कर चल दिए। चंदू चकित सा उन्हें देखता रहा। उनकी चाय हिसाब की कापी में नोट करना भी याद नहीं रहा उसको। “पीलापन? कम हो रहा है?” कहते हुए उसने चिंतित होकर सूरज की ओर ताका परंतु चौंध से उसकी आंखें बंद हो गईं।

    ईश्वर धीमे धीमे टहलते हुए वापस घर आ गए। रास्ते में वे अपनी रिटायरमेंट पार्टी को याद कर रहे थे। उनके दफ्तर के साथियों ने बहुत धूम धाम से इस पार्टी का आयोजन किया था। उनकी तारीफ में ऐसे कसीदे पढ़े गए कि बैठे बैठे ही ईश्वर को यह आभास होने लगा था कि वे सतह से छः इंच ऊपर उड़ रहे हैं। खुशी से उनका हृदय बल्लियों उछल रहा था। यद्यपि उन्हें मालूम था कि यह तो जगत की रीत है कि जाते हुए इंसान की बहुत बड़ाई की जाती है। यही सब करते आए हैं, उन्होंने स्वयं भी यही किया था अपने अन्य साथियों की बिदाई के समय। परंतु अब जब उनकी बिदाई के समय यह सब हो रहा था तो वे गद्‌गद्‌ हुए जा  रहे थे। सच तो यह है कि उन्हें अपने भीतर से मालूम था कि जो शब्द बोले जा रहे थे वे वास्तविकता में उनपर लागू होते थे। जो कहा जा रहा थ वह सच ही था। और आज तो उनका हक है अपनी तारीफ सुनने का। वे क्यों इस आनंद से अपने को वंचित रहने दें। सो वे खूब रस ले ले कर सब सुनते रहे और मुस्कराते रहे। कहीं कहीं तो उनकी आंखों में आंसू भी आ गए थे। रुमाल से पोंछ दिया था उन्हें। इन कसीदों की बरसात में एक दो बार उन्होंने गर्व से उमा की तरफ भी देखा जो उनकी बगल में बैठी थी। उनके देखने का तात्पर्य यह था कि सुन लो जो मैं अपने विषय में जो बताया कहा करता था वह सोलह आने सच था। गप्प नहीं मार रहा था मैं। साथ ही सुकुमार, विंध्या, कनक और महिषी भी थे। 

    वापसी में उनके कुछ साथी घर तक उन्हें छोड़ने आए थे। उनका स्नेह पाकर ईश्वर स्वयं को धन्य मान रहे थे। अब एक महीना हो गया होगा इसको। उस दिन को याद कर ईश्वर मन ही मन मुस्करा दिए। कितना खुश थे ईश्वर इस ‘मुक्ति’ से। जीवन के लगभग चालीस बरस भाग दौड़ में ही निकल गए थे। एक समय तक तो उन्हें यह भाग दौड़ बहुत सुहाती थी। अपितु कहना चाहिए कि उन्हें जीवित रखती थी। परंतु पिछले कुछ समय से उन्हें इस भाग दौड़ में आनंद नहीं आता था। ऐसा आभास होता था कि वे खड़े खड़े एक ही स्थान पर दौड़ रहे हैं। श्रम तो बहुत होता था परंतु पहुँचना कहीं नहीं होता था। वह आदमी जो एक समय एक पल भी खाली बैठना पसंद नहीं करता था अब उस दिन का इंतजार करने लगा था जब वह खाली बैठ सकेगा। कितना आनंद आएगा उस दिन जब यह बिना कारण की भाग दौड़ समाप्त होगी। कुछ समय तो बैठ कर आँखें बंद कर वे केवल अपनी उखड़ी हुई साँसों को बराबर करेंगे। जब आँखें खोल कर वे अपने चारों ओर देखेंगे तो एक नई ही दुनिया दिखाई देगी। उन्हें पूर्ण विश्वास था कि वह दुनिया एकदम अलग होगी। उस दुनिया का रूप रंग चाल ढाल सब अलग होगा। तब वे जीवन को सिर्फ और सिर्फ जिएँगे। जीवन को अनुभव करेंगे। वे हर एक चीज को बहुत गौर से देखेंगे, सुनेंगे और महसूस करेंगे, और वास्तव में जीवन को जीना प्रारम्भ करेंगे, एक एक पल को बीतते हुए देखेंगे और उसे सप्रेम विदा करेंगे। फिर, वे अगले पल का स्वागत करेंगे। 

    ईश्वर जब घर पहुँचे तो खाने का समय हो गया था। उमा और विंध्या रसोई में थीं। महिषी अपने कमरे में खिलौनों से खेल रही थी। ईश्वर इस बात से प्रसन्न थे कि विंध्या अपने बच्चों को टीवी अधिक नहीं देखने देती थी। दोनों बच्चों की टीवी देखने की समय सीमा निर्धारित थी।

    उमा ने उन्हें कहा कि वे हाथ धो लें तो वह उनके लिए खाना भेज देती है। वे हाथ धोने चल दिए। इस समय का उनका खाना बाहर बरामदे में लगाया जाता था। यह उनके द्वारा दिए हुए निर्देश के अनुसार ही होता था। बरामदे में बैठकर वे स्वयं को प्रकृति के नजदीक अनुभव कर पाते थे। हवा के एक एक झोंके को महसूस करते थे, पौधों को हवा में झूमते हुए देख कर आनंदित होते थे। चिड़ियाँ तो अब रही नहीं थीं, सो उड़ते हुए कीट पतंगों से ही दिल बहला लेते थे। यह उनका शौक था। इसमें उन्हें रस आता था। कीट, पतंगे और पक्षी कैसे अपना जीवन जीते हैं, कहां रहते हैं, क्या खाते हैं, अपना भोजन कैसे जुटाते हैं, अपने अपने बालकों को कैसे पालते हैं, कैसे अपना घर बनाते हैं, इत्यादि, इत्यादि। इन सब तथ्यों के विषय में जानकारी एकत्र करना उन्हें बहुत भाता था। इस विषय में उनकी जानकारी कुछ कम नहीं थी, बहुत विस्तृत थी। परंतु अब तक की अपने जीवन शैली के कारण वे इन प्राणियों को करीब से नहीं निरख पाते थे। बहुत कोफ्त होती थे उन्हें बंद कमरों से, चार दीवारी से। उन्हें पसंद थे पशु, पक्षी, कीट पतंगे और पौधे भी। इन सब में वे जीवन देखते थे, उछलता, कूदता, छलांगें मारता और उड़ता और बढ़ता हुआ जीवन। इनमें वे स्वयं को सजीव पाते थे। बहुत प्रसन्न थे वे उन चार दीवारों से निकल कर।  

    हाथ धोने को जाते जाते उन्हें वह याद आ गया जो आज सुबह हुआ था। वे रुके और लौट कर उमा को बोले, “आज खाना अपने कमरे में ही लगा देना।” वे बाहर बैठ कर अपने मन की शांति को नष्ट नहीं करना चाहते थे। 

    उमा बात समझ गई परंतु उसने कुछ कहना उचित नहीं समझा। 

    ईश्वर ने अपने कमरे में खाना खाया। कुछ देर अखबार पढ़ी। फिर अपने बिस्तर पर सुस्ताने के लिए लेट गए।

    कुछ देर बाद महिषी उनकी बगल में आकर लेट गई। “दादा, कहानी।”

    जब से ईश्वर सेवा निवृत्त हुए थे महिषी रोज इस समय अपने दादा के पास आ जाया करती थी। दादा से एक कहानी सुनती थी और सुन कर अपनी माँ के पास सोने चली जाती थी। ईश्वर कुछ समय आराम करते थे। उसके बाद वह कुछ पढ़ते थे। यह भी उनका एक पुराना व्यसन था जो वे अपने नौकरी के दिनों में नहीं कर पाते थे।

    आज भी ईश्वर ने महिषी को देखा और मुस्करा कर बोले, “लो सुनो। आज तुम्हें एक बिल्ली और तितली की कहानी सुनाता हूँ।”

    उन्होंने मन से ही गढ़ कर एक कहानी सुनाना शुरू किया। इस कहानी में बिल्ली और तितली की अनायास ही मित्रता हो जाती है। दोनों जंगल जंगल घूमते हैं। एक दिन बिल्ली तितली से कहती है कि वह भी उड़ने का अनुभव लेना चाहती है। तितली बिल्ली को उड़ना सिखाती है और पेड़ों जितनी ऊंचाई तक ले जाकर जंगल का एक नया ही अनुभव लेने में उसकी सहायता करती है।

    कहानी सुनने के बाद महिषी खुश होकर अपनी माँ के पास चली जाती है।

    जब ईश्वर कहानी सुना रहे थे उमा भी आकर बगल में लेट चुकी थी।  

    “अब कैसा लग रहा है?”

    ईश्वर ने कुछ क्षण उमा को झुंझलाहट भरी नजरों से देखा, “कैसा लगना चाहिए मुझे?”

    उमा ने आँखें बंद कर लीं और सोने का उपक्रम करने लगी।

    ईश्वर की बेचैनी उन्हें आराम नहीं लेने दे रही थी। नींद आना तो दूर, वे शांति से बिस्तर पर लेट भी नहीं पा रहे थे। कुछ देर तक वे करवटें बदलते रहे। जब बेचैनी नहीं थमी तो उठ कर बगल में रखी कुर्सी पर बैठ गए। आजकल वे एक किताब पढ़ रहे थे। वह उठाई और पढ़ने का प्रयास किया। जब उसमें भी मन नहीं लगा तो उसे उठा कर बगल में रख दिया। बहुत समय तक वे बैठे शून्य को ताकते रहे।

    ईश्वर की दुविधा कम होने के  बजाय बढ़ती ही गई। अगले दिन उन्होंने देखा कि हर पीली वस्तु पहले से कम पीली हो गई है। हल्की पीली वस्तुएं तो सफेद ही हो चुकी थीं। चटख सफेद नहीं, मुरझाया धूसर सफेद। पीला रंग मद्धम पड़ जाने से सब कुछ बुझा बुझा सा लगता था। मकानों की दीवारें, फूल, बच्चों के खिलौने, आग की लपट, सुबह और शाम, स्त्री पुरुषों के पहने हुए कपड़े, सब कुछ तो। यहाँ तक कि महिषी की बाल कथाओं वाली किताब जो रंग बिरंगे चित्रों से परिपूर्ण थी, वह भी फीकी पड़ गई थी। ईश्वर के अंतस्‌ को एक उदासी घेर रही थी और वे कुछ कर नहीं पा रहे थे।

    अपने आसपास देख कर उनको ऐसा नहीं लगता था कि ऐसा कुछ अनुभव औरों को भी हो रहा होगा। सब काम काज पहले की तरह चल रहे थे। लोग अपने जीवन में वैसे ही व्यस्त थे। जो दुखी थे वे दुखी थे, जो प्रसन्न थे वे प्रसन्न थे। बच्चे भी हँसते खेलते दिखाई पड़ रहे थे। किसी को देख कर ऐसा तो नहीं लगता था कि उन्हें दुनिया में कुछ मूलभूत बदलाव आया दिख रहा था। 

    पीला रंग ईश्वर के लिए खुशी का रंग था। पीला रंग उत्सव था, जीवन था, उमंग था। वे पीला रंग पहनते तो नहीं थे परंतु पीला रंग अपने आसपास देखना पसंद करते थे। जब पीला रंग ही पीला नहीं रहा तो जीवन कुछ कम जीवंत हो गया था।

    आज उस दिन को बीते लगभग एक माह हो गया होगा जिस दिन शर्मा परिवार का संतुलन डगमगा गया था। उस दिन से आज तक ईश्वर के व्यक्तित्व और व्यवहार में उनके परिवार ने कई बदलाव देखे। उन्होंने सुबह की चाय पीने के लिए छत पर जाना छोड़ दिया था, दोपहर के खाने के लिए बरामदे में बैठना छोड़ दिया था, अपने मित्रों से मिलने बहुत ही कम जाते थे, जाते थे तो जल्द ही वापस आ जाते थे। बच्चों के साथ हँसना खेलना कम कर दिया था। अधिकतर अपने कमरे में उदास और गम्भीर मुद्रा में बैठे रहते थे।

    परिवार के सदस्य कुछ समय तो इस विषय में आपस में बात करने में भी कतराते रहे जैसे बात छेड़ने पर जाने और क्या क्या गंभीर मुद्दे खुल कर सामने आ जाएंगे जिनका समाधान न जाने उनके पास होगा कि नहीं। सब ऐसे ही बरताव करते रहे जैसे कि जीवन पूर्ववत्‌ चल रहा है और कहीं कोई समस्या नहीं है। परंतु जब ईश्वर का व्यवहार परिवार के माहौल को बहुत ही बोझिल करने लगा और सब का मनोबल प्रभावित होने लगा, क्योंकि ऐसा होता ही है कि परिवार में सब के तार सब से जुड़े होते हैं, तो इस विषय को और नहीं टाला जा सकता था। इस विषय पर बातचीत करना अनिवार्य हो गया था। 

    ईश्वर अपने कमरे में कुर्सी पर बैठे किताब पढ़ रहे थे। यह कहना अधिक उचित होगा कि किताब पढ़ने का प्रयास कर रहे थे क्योंकि आजकल पढ़ने में उनका मन कतई नहीं लगता था। उमा अपने बेटे के साथ आई। ये दोनों पलंग पर बैठ गए। पहले तो ईश्वर ने ध्यान नहीं दिया कि वे उन्हीं से बात करने के लिए आए हैं। परंतु उनकी निगाहों को अपने ऊपर अनुभव किया तो देखा वे दोनों उन्हीं की ओर देख रहे थे। कुछ देर वे उनके कुछ कहने की प्रतीक्षा करते रहे। उनके कुछ न बोलने पर बोले, “यों मेरी ओर क्या देख रहे हो? कोई बात है क्या?”

    सुकुमार- “पिताजी, यदि आप व्यस्त हैं तो हम फिर कभी बात कर लेंगे।”

    ईश्वर – “ये मजाक करने का कोई नया तरीका है क्या? हम सेवा निवृत्त लोगों को कैसी व्यस्तता?”

    उमा– “पिछले कुछ दिनों से हम देख रहे हैं कि आप कुछ परेशान रहते हैं। आपने इस विषय में कुछ बात भी नहीं की, अस्वस्थ हैं या कुछ और कारण है। यही जानने मैं और सुक्कू आपके पास आए थे।”

    ईश्वर कुछ सोच में पड़ गए। वे सोचने लगे कि इन्हें क्या बताएं और कितना बताएं। एकदम से नकारने का भी कोई लाभ नहीं है क्योंकि  यह तो स्पष्ट है कि वे दुखी हैं। परंतु जिस कारण से दुखी हैं उसका बखान करना उन्हें कठिनाई में डाल सकता है। जब से उन्हें अनुभव हुआ था कि उन्हें एक ऐसी समस्या है जो केवल उन्हीं को है, किसी और को नहीं है, और सच तो यह है कि औरों को उनकी समस्या समझने में भी कठिनाई हो रही है, तब से वे एक कुंठा में पड़ गए थे। 

    चुप रहना ठीक न समझते हुए वे बोले, “स्वास्थ्य को लेकर तो नहीं परंतु एक समस्या तो है।”

    सुकुमार- “हमें भी बताइए पिताजी। संभव है कि हम आपकी समस्या के निदान के लिए कुछ कर पाएं। न भी कर पाएं तो बात करने से आपका मन हल्का होगा।”

    ईश्वर ने एक गहरी निश्वास छोड़ते हुए कहा, “पीला रंग अब पहले जैसा पीला नहीं रहा है। पीले रंग को कुछ हो गया है।”

    उमा – “ऐसा तो हमें कुछ दिखाई नहीं देता। न जाने आप को ऐसा क्यों लग रहा है? मैंने सुक्कू से भी बात की है। उसे भी ऐसा नहीं लगता।”

    सुकुमार – “पिताजी, हमें तो पीला रंग वैसा ही दिख रहा है जैसा वह सदा से दिखता आया है।”

    ईश्वर ने दोनों की ओर बारी बारी से देखा। फिर वे चुप होकर बैठ गए।

    उमा – “आप किसी आँखों के डॉक्टर को दिखा लीजिए।”

    ईश्वर  – “मेरी आँखें बिल्कुल ठीक देख पा रही हैं। प्रकृति का यह बदलाव शायद तुम लोग देखना नहीं चाहते। एकदम सामने दिख रहा है। यह किसी आने वाले बड़े बदलाव की ओर इशारा कर रहा है। एक दिन देखोगे तुम लोग्।”

    उमा ने हिचकते हुए बोला, “मैं तो कहती हूँ किसी दिल के डॉक्टर को दिखा लीजिए।”

    ईश्वर ने रोष भरी आँखों से उमा को देखते हुए कहा, “तुम्हारा मतलब है दिमाग के डॉक्टर को?”

    उमा ने अपनी बात की सफाई देते हुए कहा, “आप इतने परेशान जो रहते हैं। वह कुछ हल आपको बता देगा।”

    ईश्वर परिहास भाव से बोले, “ईश्वर की समस्याएं कोई और नहीं ईश्वर ही सुलझा पाता है।”, फिर गंभीर होकर, “मैं इस समस्या का निदान जल्द ही ढूँढ लूंगा। आप लोगों को अधिक परेशान होने की आवश्यकता नहीं है।”, यह कहकर वह उठ गए।

    उन्हें उठता देख उमा और सुकुमार भी बिस्तर से उतर कर खड़े हो गए। सुकुमार ने कहा, “पिताजी मैं आपसे केवल एक विनती करता हूँ कि आप कमरे में अकेले मत बैठे रहा करें। बच्चों से खेलें। वे आपसे रोजाना बातचीत करने के और खेलने के इतने आदी हैं कि आपका इस तरह गुमसुम रहना उनके लिए बहुत भारी पड़ रहा है। बस इतना ही कहना चाहता था मैं। माँ, आप हम सब के लिए चाय बनाओ, सब एकसाथ बैठ कर चाय पीते हैं। आप भी आ जाइएगा पिताजी।”

    उनके जाने के बाद ईश्वर कुछ देर खड़े रहे। उन्हें यह अच्छा नहीं लगा कि उनके कारण बच्चों का मन उदास हो रहा है। ऐसा कदापि नहीं होना चाहिए था। बच्चों के लिए तो वे कुछ भी कर सकते थे। उन्होंने निर्णय लिया कि वे दोबारा से बच्चों के साथ खेलना प्रारंभ करेंगे। पीला रंग पीला रहे न रहे बच्चों का दिल कभी नहीं दुखना चाहिए।

    और उस दिन के बाद से ईश्वर ने बच्चों के साथ जो दूरी बन गई थी उसे दूर करने का प्रयास प्रारंभ किया। महिषी कहानी सुनने फिर से आने लगी। इस अंतराल के बाद पहली बार जब वह आई तो अपने साथ एक किताब ले आई जिसमें रंग बिरंगे चित्रों के साथ कहानियां भी दी गई थीं। चित्रों में जहां जहां पीला रंग होना चाहिए था वहां सफेद चकत्ते देख कर उनका हृदय खिन्न हो गया। एक बारगी तो ईश्वर जी का मन हुआ कि उसे वापस जाने को कह दें। परंतु जब बच्ची का मुख देखा तो उस पर इतनी उत्सुकता और प्रसन्नता का भाव देखा कि उनका मन पिघल गया। वह पुस्तक लेकर कहानी सुनाने लगे। हमेशा की तरह कहानी वे अपने मन से गढ़ कर सुना रहे थे। बस इस बात का खयाल रख लेते थे कि सुनाई जा रही कहानी किताब में दर्शाए चित्रों से मेल खाती हो।

    कहानी सुनते हुए महिषी विस्मित होती रही और किलकारियां मारती रही। उसकी यह खुशी देख ईश्वर जी ने उत्साहित हो उसे दो तीन कहानियां और सुना डालीं। आखिरी कहानी सुनते सुनते महिषी उनकी गोद में ही सो गई। पर वे जानते थे कि बच्ची अपने अवचेतन मन से कहानी सुन ही रही होगी। सो उन्होंने कहानी अंत तक सुनाई। फिर उमा को इशारे से बुलाकर कहा कि बच्ची को उसकी माँ के पास छोड़ दे।

    बच्ची की खुशी देख कर आज ईश्वर का मन भी बहुत प्रसन्न था। बहुत दिनों के बाद आज वे जीवन में रस अनुभव कर रहे थे। उन्हें याद आया कि पार्क के अपने साथियों से मिले भी कुछ दिन बीत गए थे। कल सुबह वे उनसे अवश्य मिलेंगे।

    अगले दिन जब वे पार्क में पहुंचे तो बक्शी, ओमप्रकाश, सक्सेना और भसीन आ चुके थे। ईश्वर ने सब को राम राम की और एक बैंच पर बैठ गए। उनके आने से सब में एक प्रसन्नता की लहर दौड़ गई।

    बक्शी जी उन्हें देख प्रसन्नता से बोले, “भाई साहब, अच्छा किया आज आप आ गए। न आते तो आज हम आपके द्वार आने ही वाले थे। अपने दोस्त जनों की खोज खबर हम सदैव रखते हैं।”

    सक्सेना ने उनकी ओर गौर से देखते हुए कहा, “सब खैरियत तो है न? घर परिवार में सब कुशल मंगल है?”

    ईश्वर ने हाथ जोड़ कर कहा, “ऊपर वाले की कृपा से सब राजी खुशी है। आप सब लोग कैसे हैं?”

    ओमप्रकाश ने सब की ओर इंगित करते हुए कहा, “आप देख ही रहे हैं। हम लोग यहां हाजिर हैं। बाकी आते ही होंगे। बैठे हुए गर्ग के कर्मों का राग गा रहे थे। आइए आप भी शामिल हो जाइए।”

    सब लोग हँस पड़े।

    भसीन, जो अब तक चुप बैठे सब सुन रहे थे, बोले, “ईश्वर जी, जब आ ही गए हैं तो आप भी अपना मूल्यवान योगदान दीजिए। जितने दिमाग लगेंगे उतना ही मीठा फल निकलेगा।”

    ईश्वर ने सहमति में सर हिला दिया और उत्सुकता से उनका वार्तालाप सुनने लगे।

    धीरे धीरे और लोग भी आ गए। कुछ ही देर में सारे बैंच भर चुके थे। ईश्वर बहुत ध्यान से उनकी वार्तालाप सुनते रहे। कहीं कहीं वे अपना मत भी देते रहे।

    पार्क से वापस आते हुए वे चंदू के चाय के खोखे पर बैठ गए। चंदू ने स्वयं ही एक चाय लाकर रख दी। ‘नो शूगर’, चाय रखते हुए वह बोला।

    “बहुत अंग्रेजी सीख गया है रे।”

    “आप जैसे साहब लोग आते रहते हैं।”

    चाय की चुस्कियां लेते हुए ईश्वर का ध्यान बार बार उन समस्याओं की ओर जा रहा था जिनको लेकर इस कॉलोनी के निवासी दुखी थे।

    उन्हें यह अहसास भी बहुत तीव्रता से हो रहा था कि दुनिया तो अपनी गति से चल रही है। हम रहें न रहें उससे कोई अंतर नहीं पड़ता है। पुराने लोग चले जाएंगे, नए आ जाएंगे। यही क्रम सदा चलता रहा है, चलता रहेगा। वे स्वयं भी इस विशाल संसृति में एक कण मात्र हैं। उनके उदास होने से न ही संसार की और न ही पृथ्वी की गति धीमी होने वाली है। ईश्वर ने एक ठंडी सांस ली और गिलास उठा चाय पीने लगे।

    जब वे खोखे से उठकर चले तो उनके मन का भारीपन कुछ कम हो गया था।

    घर वापस जाते हुए उन्हें अपने नौकरी वाले दिन याद आने लगे। उनके वरिष्ठ अधिकारी उनके जिस गुण को सर्वाधिक सराहते थे वह था उनकी कार्य निष्ठा। ईश्वर जी ने जब भी कोई कार्य अपने हाथ में लिया था वे उसे परिणति तक ले जाने के लिए उसमें अपनी संपूर्ण ऊर्जा झोंक देते थे। यही कारण था कि बरसों से अधूरे पड़े हुए कई काम भी उनके हाथों में आने से सफलता पूर्वक संपन्न हो जाते थे। उनके इस गुण को जब पहचाना गया तो उन्हें महकमे के शीर्ष अधिकारियों द्वारा भी सराहना मिली। उन्हें कई ऐसे अहम‌ प्रोजेक्ट भी सौंपे गए जिन्हें असंभव समझ कर छोड़ दिया गया था। और ईश्वर जी ने अपनी लगन, मेहनत और दूर दृष्टि से उन्हें सराहनीय ढंग से पूरा किया। जिससे उनके अधिकारी गणों और पूरे महकमे को भूरी भूरी प्रशंसा बटोरने को मिली। एक समय पर सुस्त और नाकारा समझे जाने वाले महकमे की चहुँ ओर ख्याति प्रसारित हो गई। जो भी ईश्वर से मिलता बहुत ही सम्मान से मिलता, क्योंकि यह सबको ज्ञात था कि सारी सफलता के पीछे उनका ही हाथ था। ईश्वर जी को अपना जीवन सार्थक लगने लगा। अपने पद और पैसों से कहीं बढ़ कर उन्हें यह पहचान और मान्यता लगती थी जो विशुद्ध उनकी मेहनत से उपजी थी।   

    ईश्वर जी ने एक एक कर बहुत से प्रोजेक्ट याद किए जो उनके हाथों में पड़ते ही चमक उठे थे। उन्हें वह रोमांच और ऊर्जा अनुभव होने लगी जो उन्हें करते हुए वे अनुभव करते थे। जितना कठिन प्रोजेक्ट, उतना अधिक रोमांच्। ऐसा था ईश्वर जी का व्यक्तित्व।

    घर पहुँचने तक ईश्वर जी का मन अत्यधिक प्रसन्नता का अनुभव कर रहा था। उन्होंने उमा से कहा, ‘आज खाना बरामदे में ही लगा देना। वहीं खाएंगे आज।‘

    खाना खाते हुए ईश्वर को सोच कर अचरज हो रहा था कि आखिर गर्ग ठीक से काम क्यों नहीं कर पाता है। कहीं तो कुछ है जो काम को होने से रोकता है। काम को सही सिरे से पकड़ा जाए तो काम स्वयमेव ही पूरा होता चला जाता है।  

    वे यह मुद्दा कल ही पार्क वाली मंडली में उठायेंगे।

    कल तक का समय ईश्वर जी ने बहुत व्यग्रता से काटा। नाश्ता करके उन्होंने कपड़े बदले और पार्क की ओर निकल गए।

    वहाँ पहुँच कर वे कुछ देर सब लोगों का वार्तालाप सुनते रहे। फिर उनसे और अधिक रुका नहीं गया। लंबी निष्कर्ष हीन मंत्रणाओं से ईश्वर को सदा से परहेज था। बोले, “आप सब लोगों से एक विनती है। जो सब रुके और अधूरे कामों के विषय में हम लोग चिंतित हैं उनमें से एक काम आप सब की सहमति से मैं अपने हाथ में लेना चाहूंगा। वह है पार्क के जीर्णोद्धार का काम। टीम कोई भी रहे, आज गर्ग साहब हैं कल संभवतः कोई नई टीम आ जाए, यह काम मैं अपनी जिम्मेदारी से करता करूंगा। यदि आप लोग उचित समझें तो मुझे गर्ग जी से मिलवा सकते हैं।”

    समूह में एक उत्साह की लहर दौड़ गई। और सर्वसम्मति से यह निर्णय लिया गया कि ईश्वर को गर्ग की टीम से मिलवा दिया जाए। उसी समय भसीन को ईश्वर जी के साथ गर्ग की टीम से मिलवाने निवासी कल्याण संघ कार्यालय की ओर भेजा दिया गया। 

    कुछ देर बाद जब वे दोनों गर्ग जी की टीम से बातचीत कर कार्यालय से निकले तो यह प्रोजेक्ट ईश्वर जी को सौंपा जा चुका था। ईश्वर जी की आंखों में एक चमक देखी जा सकती थी।

    शायद पीला रंग भी लौट आए। कुछ भी संभव है।

    गर्ग जी से कार्यालय में बातचीत के दौरान उन्होंने यह भी बताया कि वे किन किन समस्याओं का सामना कर रहे हैं। ईश्वर उन समस्याओं के विषय में सोचते रहे। अपनी सीमित जानकारी के साथ जो भी समाधान उन्हें समझ आया उन्होंने एक डायरी में लिख लिया। इस काम के लिए उन्होंने एक नई डायरी लगा ली थी। उसके बाहर उन्होंने लिखा ‘पार्क जीर्णोद्धार प्रोजेक्ट’। जो भी विचार इस विषय में उनको समय समय पर आते रहे उन्हें वे क्रमवार डायरी में नोट करते रहे। उन्हें अपने अंदर एक विशेष ऊर्जा का संचार होता अनुभव हुआ। उन्हें महसूस हुआ कि इस कार्य को वे अपने साधारण जीवन जीने के अभियान का ही एक हिस्सा बना सकते हैं। सौंदर्य बोध और रोमांच का मिला जुला संगम इस कार्य को और रोचक बना देगा।

    उन्होंने घड़ी देखी, उसमें साढ़े बारह बज रहे थे। वे उठे और कनक को लेने चल दिए। कल यह निश्चित हुआ था कि आज कनक के आने के बाद दादा और पोता पहले खाना खाएंगे और उसके बाद बरामदे में बेडमिंटन खेला जाएगा। कनक की शिकायत थी कि उसके कई दोस्त इस खेल में उसे बहुत सहजता से हरा देते हैं। उसने सुन रखा था कि दादा अपनी जवानी में बेड्मिंटन के बहुत अच्छे खिलाड़ी रहे थे। उसने अपनी यह समस्या जब दादा जी को बताई तो उन्होंने कहा कि वह कुछ समय रोज उनके साथ लगाए तो वे उसे कुछ पैंतरे सिखाएंगे जिससे वह अपने साथियों को बराबर की टक्कर दे पाएगा। महिषी को एक खिड़की में बिठा कर रेफरी का काम लिया जाएगा जिसके लिए वह अतीव उत्साह से राजी हो गई थी।

    ईश्वर पैदल चलते हुए अपनी कॉलोनी के गेट तक गए और कनक की स्कूल बस की प्रतीक्षा करने लगे। कुछ ही देर में बस आ गई और कनक बस से उतरा। उसके साथ कॉलोनी के और भी कई बच्चे उतर रहे थे। उसने जैसे ही दादा जी को देखा तो दौड़ कर उनके पास आ गया।

    “दादा जी!”, उसने उत्तेजित स्वर में कहा।

    “कनक बेटा!”

    “आज याद है न आपने मुझे बेडमिंटन का चैंपियन बनने की ट्रेनिंग देनी है?”

    “और किस वास्ते मैं तुम्हारा इतना इंतजार कर रहा था यहां खड़ा होकर।”

    उनकी बात सुन कनक खुशी से हंस पड़ा। ईश्वर को भी हंसी आ गई।

    वे दोनों ग़ेट से अंदर जाते हुए अपने घर की ओर चल दिए। अभी दो ही कदम चले होंगे कि ईश्वर एक दम ठिठक कर रुक गए। उनके साथ ही कनक भी रुक गया और ईश्वर का चेहरा देखने लगा। ईश्वर ने सकुचाते हुए पीछे मुड़ कर बस की ओर देखा तो उन्हें अपनी आंखों पर विश्वास नहीं आया। बस का पीला रंग वे स्पष्ट देख पा रहे थे। परंतु उन्होंने स्वयं को अधिक प्रसन्न होने से रोक लिया। ‘ऐसा कैसे हो गया?’, वे सोच रहे थे। उन्होंने अपने आसपास देखा तो पीले रंग की झलक कई जगह दिखी, यद्यपि अभी भी कई जगह भद्दा धूसर सफेद दिख रहा था। उन्होंने इस विषय में अधिक सोचना उचित नहीं समझा और कनक को लेकर घर आ गए जहां महिषी बहुत व्यग्रता से उनके आने की प्रतीक्षा कर रही थी। आज तो उसे रेफरी बनना था न!

    उन्होंने देर तक कनक के साथ बेड्मिंटन खेला। खेल खेल में उसे कई पैतरे सिखाए। अंत तक आते आते कनक का आत्मविश्वास कई गुना बढ़ चुका था। इस खेल में जो व्यक्ति सबसे अधिक शोर मचा रहा था वह था मैच का रेफरी। उसकी हँसी और किलकारियां रुक ही नहीं रही थीं। लगभग आधे घंटे के खेल के बाद रेफरी को रोकना असंभव हो गया। महिषी ने जाकर कनक का रैकेट छीन लिया और कहने लगी, “अब दादा के साथ मैं खेलूंगी!”

    सब खिलाड़ियों को इस चंचल रेफरी की बात माननी पड़ी।

    अगले दिन जब ईश्वर की नींद खुली तो उनका मन प्रसन्न था। परंतु एक दबा दबा सा डर भी उसमें व्याप्त था।

    नित्य क्रियाओं से निवृत्त होकर जब वे आए तो उमा से कहकर चाय बनवाई। जब तक चाय बन रही थी वे अंदर अपने कमरे में ही टहलते रहे। जब उमा चाय ले आई तो वे चाय और नमकीन की कटोरी लेकर छत की ओर जाने वाली सीढ़ियों पर चढ़ने लगे। वे एक एक कदम फूंक फूंक कर रख रहे थे। अंत में वे ऊपर आ ही पहुँचे। वे कुर्सी पर बैठ गए और चाय और नमकीन सामने रखे स्टूल पर रख दिया।

    बहुत सहमते हुए उन्होंने सर उठाकर क्षितिज की ओर देखा।

    और देखते रह गए।

    सामने चमकता हुआ पीला रंग सुदूर पूर्व को रोशन किए हुए था। और वह बिल्कुल पहले जैसा पीला था।

    वे उम्मीद लेकर छत पर आए थे परंतु डर रहे थे कि कहीं निराशा हाथ न लगे।

    अच्छा हुआ जो वे छत पर आकर प्रत्यक्ष देख पाए।

    प्रकृति में पीला रंग वापस आ चुका था।

    आज ईश्वर बहुत प्रसन्न थे।

    आज से वे फिर अपना विलक्षण साधारण जीवन जी पाएंगे।

    आज फिर शर्मा परिवार का संतुलन वापस लौट आया था।

    परिचय- 

    दिल्ली विश्वविद्यालय से भौतिकी में स्नातकोत्तर। सेवा निवृत्त बैंक अधिकारी।

    एक कहानी संग्रह ‘मोरपंख’ 2025 में प्रकाशित। कहानियां और कविताएं ‘जानकीपुल’, ‘पाखी’, ‘प्रश्नचिह्न’, ‘पुरवाई’ और ‘अमर उजाला’ में प्रकाशित।

    सम्पर्क – एच-0012, विंडसर कोर्ट, सेक्टर 78, नोएडा, उत्तर प्रदेश 201305

    मो – 9717879719

    मेल – praveen.banjara@zohomail.in

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