• कथा-कहानी
  • यारोस्लावास मेलनिकस की कहानी ‘अंतिम दिन’

     यारोस्लावास मेलनिकस लिथुआनिया के प्रसिद्ध विज्ञान-कथाकार व अतियथार्थवादी लेखक हैं। वे यूक्रेनी मूल के हैं और इन दिनों लिथुआनिया के विलनियस शहर में रहते हैं। अब तक उन्होंने पंद्रह पुस्तकों की रचना की है, जिनमें से अनेक रचनाओं का अनुवाद अंग्रेज़ी, फ़्रेंच, जर्मन, हिंदी तथा विश्व की अन्य कई भाषाओं में हो चुका है। ‘बीबीसी बुक ऑफ द ईयर’ से सम्मानित उनकी कहानियों का संकलन अंतिम दिन, हिंदी में जिसका अनुवाद मैंने अंग्रेज़ी के माध्यम से किया और जिसका प्रकाशन साहित्य अकादेमी ने किया — विश्व साहित्य की अन्यतम उपलब्धि है। इसकी सभी कहानियाँ मानवीय जीवन की विडंबना व अस्तित्व के संकट बोध को उजागर करती हैं। अत्यंत साधारण परिस्थितियों में जीते आम लोग अचानक स्वयं को ऐसी स्थिति में पाते हैं जिससे जीवन का अर्थ और दिशा बदलने लगते हैं, बाह्य यथार्थ बेमानी हो जाता है। एक अदृश्य वास्तविकता हावी होने लगती है जो उतनी ही सच है जितना कि बाहरी जीवन जगत। यारोस्लावास मेलनिकस बहुत बारीकी से इन दो समानांतर संसारों की रचना करते हैं और बीच-बीच में ऐसे प्रश्न उपस्थित करते जाते हैं जो मानवीय अस्तित्व के स्थाई संकट को और गहरा बना देते हैं। कहानी पढ़ने के बहुत देर बाद तक उसका प्रभाव मन को घेरे रहता है। इसका श्रेय जितना कहानियों की विषय वस्तु को है उतना ही लेखकीय शिल्प को भी है। चयन की स्पर्धा में जकड़ा मनुष्य यह अनुभव करता है कि वह वास्तव में कितना लाचार है। जिस कहानी के शीर्षक ने इस पुस्तक को नाम दिया, वही कहानी “अंतिम दिन” यहाँ प्रस्तुत है, लेकिन उससे पहले यारोस्लावास मेलनिकस और उनकी कहानी कला पर कुछ बातें…

    यारोस्लावास का अधिकांश लेखन प्रतीकात्मक है। वे कहते हैं कि ‘मैं कोशिश करता हूँ कि अपने आसपास की दुनिया को एक अलग नज़रिए से पेश कर पाऊँ।’ बतौर लेखक उन्हें इस बात की बहुत चिंता है कि अंततः वास्तविकता क्या है? जो कुछ हमें अपने आसपास दिखाई देता है क्या केवल वही वास्तविक है या फिर यथार्थ की वे परतें, जो हमारे देख पाने की सामर्थ्य से कहीं गहरी हैं। वे अपनी कहानियों में कल्पना की उड़ान लेते हैं, फैंटेसी के अति कल्पनात्मक विधान जैसी और फिर किसी गहरी जमीनी हकीकत से जुड़ी सच्चाई को अनायास ही उजागर कर देते हैं। उनमें आक्रांत करने वाली वैज्ञानिकता है तो आंदोलित करने वाली दर्शनिकता भी। “अंतिम दिन” ऐसी ही एक कहानी है, जिसमें किसी डाटा के आधार पर हर एक की मृत्यु की तिथि प्रकाशित कर दी गई है। डाटा, वैज्ञानिक युग का सबसे बड़ा सत्य है। संचार क्रांति के साथ ही सामाजिक उद्घोषकों ने घोषित कर दिया था कि हम सबके जीवन पर किसी न किसी का इख्तियार होगा, कोई हर समय हमें देखता रहेगा। इस कहानी में भी बहुत सूक्ष्म ढंग से उस स्थिति का आभास होता है। तमाम जानकारियों के आधार पर मृत्यु का दिन निश्चित कर दिया गया है। शुरू-शुरू में लोगों को लगा कि शायद यह कोई मज़ाक है लेकिन बाद में उन्हें पता चला कि जो तिथि ‘किस्मतों की किताब’ में दी गई है, उसी दिन लोग मृत्यु को प्राप्त हो रहे थे। उनके जाने की तिथि सही थी, हालांकि यह कोई नहीं जानता था की मृत्यु कितने बजे और कैसे होगी — क्या कोई एक्सीडेंट या फिर हार्ट अटैक। जो भी हो एक किताब ही जीवन का सच बताने के लिए काफी थी। इस कहानी को पढ़ते हुए बार-बार महसूस होता है कि क्या यह मृत्यु के मुहाने खड़े रह कर जीवन को देखने का एक नज़रिया है या जीवन के किसी पड़ाव से मृत्यु को देखने का विकल्प…  क्या कहानी जीवन में बचे रहने के बारे में है या मिट जाने के बारे में! जब हमें मृत्यु का पता होता है तब हम जीवन को कैसे देखते हैं? कभी-कभी वह बहुत दार्शनिक भी हो सकता है; तो कभी हास्यास्पद। इस कहानी में ये सभी रूप दिखाई पड़ते हैं। यह कहानी जितनी मृत्यु के बारे में है उतनी ही मुक्ति के बारे में भी। क़िस्मतों की किताब का सच और जीवन में होने वाले चमत्कार का सच अभिभूत कर देता है। इस बीच अनेक घटनाएँ घटती हैं जो मनुष्य की मनुष्यता और क्रूरता की परख करती हैं। एक ही यथार्थ को स्त्री और पुरुष कैसे अलग-अलग ढंग से देखते हैं, उसकी पहचान बनती हैं और फिर कहानी के अंत में जो प्रत्यावर्तन होता है वह पाठक को कहानी के मूल बिंदु पर पुन: विचार करने को बाध्य करता है, सच्चाई वही है पर लेंस बदल गया- रेखा सेठी

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    अंतिम दिन

    (1)

    पहले पहल तो यह अजीब लगा। दुनिया भर से तीन लाख लोगों ने एक पागल आदमी के खिलाफ़ मुकदमा दायर किया जिसके गोदाम में एक पुस्तक के अस्सी लाख खंड भरे हुए थे। उसने अपनी सारी संपत्ति इन मोटे-मोटे खंडों को प्रकाशित करने में ख़र्च कर दी थी। यह ईश्वर का अपमान था। निश्चय ही वह कोई पागल ही था। कोई पागल ही इस ग्रह पर सबकी मृत्यु की निश्चित तिथि प्रकाशित कर सकता है। जैसे कि यह काफ़ी न हो, अपनी यह चाल चलते ही उसने तुरंत अपने बोलने की क्षमता गँवा दी। क्या सच में ही उसके बोलने की क्षमता जाती रही किसी को नहीं पता था, लेकिन जैसे ही पुलिस ने उसे गिरफ्तार किया, उसके बाद से वह एक शब्द भी नहीं बोला। वास्तव में, उनके किसी भी सवाल पर उसने कोई प्रतिक्रिया नहीं दी। और फिर, जल्दी ही एक नियमित साक्षात्कार के दौरान उसकी मृत्यु हो गई। वह अपनी कुर्सी से गिर पड़ा, जैसे कि उसे कोई तीर लगा हो। जाँचकर्ता का सहायक, जो इस घटना का साक्षी था, उसने कहा कि यह बिल्कुल उसी तरह घटा, जैसे किसी इंडियन द्वारा छोड़ा गया तीर उड़ता हुआ खिड़की से आया और अपराधी के सीने में चुभ गया। पूरी जाँच के दौरान वहाँ कोई तीर नहीं था और खिड़कियाँ न केवल कस कर बंद थीं, बल्कि लोहे के शटर से ढकी हुई थीं।

    दरअसल, पहली नज़र में यह पूरी कहानी बहुत अजीब लगती है। शायद आप इसे तब समझ सकते हैं, जब कोई अपना सब कुछ खो दे; अपना सारा पैसा जुए में हार जाए; या अपने किसी प्रिय को या फिर सड़क चलते किसी भिखारी को अपना सब कुछ दे दे। किसी भी तरह के पागलपन को समझाया जा सकता है लेकिन इस तरह की बात को आप और कैसे समझा सकते हैं। इस ग्रह पर रहने वाले सभी जीवित लोगों की सूचना इकट्ठा करना और उनकी मृत्यु की तारीख छाप देना… यह समझ पाना ज़रा मुश्किल है। यह कुछ ज़्यादा ही था और इसी से डर पैदा हुआ।

    सबसे पहले, समाचार पत्रों ने इसे किसी तरह का मज़ाक ही समझा या फिर काला जादू (हास्य), लेकिन जल्द ही सब क्रोधित हो गए और इसकी आलोचना करने लगे। अपनी मृत्यु की तारीख़ कौन जानना चाहता है? फ़ोन की घंटियाँ लगातार बजने लगीं। लाखों गृहणियाँ, अख़बारों के दफ्तरों, टीवी चैनलों तथा पुलिस के दफ्तरों में फ़ोन करने लगीं। ख़बर थी कि राष्ट्रपति की पत्नी को यह पता चला कि वह चार साल और पाँच दिन में मर जाएँगी, जबकि राष्ट्रपति लंबी आयु जिएँगे। उस पागल को उसी समय गिरफ्तार कर लिया गया।

    और भी कई विवरण सामने आ रहे थे। ऐसा लग रहा था कि क़ैदी के पास अंतरराष्ट्रीय स्तर पर तमाम डाटा की जानकारी थी। उसके लिए इस ग्रह पर रहने वाले सभी लोगों के नाम, उपनाम जान पाना काफ़ी सरल था। बाकी सब तो बस समय और तकनीक का सीधा खेल था।

    यह पूरी घटना उन सनसनीखेज़ घटनाओं में से एक हो सकती थी, जिन्हें एक महीने बाद कोई याद नहीं करता लेकिन अखबारों में थोड़े समय की चुप्पी के बाद वे फिर सुर्खियाँ बटोरने लगती हैं। हाल ही में मरने वाले लोगों के रिश्तेदारों से रिपोर्ट आ रही थी; लोग ठीक उसी दिन मर रहे थे, जैसाकि बुक ऑफ़ फेट्स या किस्मतों की किताब में बताया गया था। यह अविश्वसनीय था, लेकिन सच था। जल्द ही यह स्पष्ट हो गया कि इसके कोई अपवाद किसी की जानकारी में नहीं थे। यहाँ तक कि जिनको अपनी मृत्यु की तिथि ज्ञात थी और वे उस दिन घर से निकले ही नहीं, वे भी किसी न किसी कारण से मर जाते थे। अक्सर ऐसा होता था कि उन्हें दिल का दौरा पड़ जाता या कभी किडनी या कोई अन्य अंग फेल हो जाता। कई लोग तो नियत तिथि से बहुत पहले ही बीमार महसूस करने लगते और उनकी बीमारी निश्चित दिन पर अपने तीव्रतम उत्कर्ष पर पहुँच जाती। जो लोग जानबूझकर बुक ऑफ फेट्स में कोई रूचि नहीं दिखा रहे थे या जिनको इसके बारे में सीधे-सीधे कोई जानकारी नहीं थी (ऐसे लोग भी थे), अक्सर सड़क दुर्घटनाओं में मारे जाते या किसी मानसिक उत्पीड़न का शिकार होकर अपने बाथरूम में खुद को मार लेते। पुस्तक के अनुसार दी गई तिथि पर कुछ लोगों की हत्या भी हो जाती। हत्यारों को यह पता नहीं था कि वे सही दिन उनको मार रहे हैं।

    संक्षेप में, यह भयावह था। किसी ने उस गोदाम को आग लगा दी जहाँ उन किताबों को रखा गया था और सब कुछ जलकर राख हो गया। कुछ लोगों के लिए मानसिक तौर पर यह सब झेल पाना बहुत कठिन था। लेकिन, यह पता चला कि वहाँ दूसरे गोदाम भी थे जहाँ उन पुस्तकों की प्रतिलिपियाँ थीं और इसके अलावा यह सारी जानकारी कंप्यूटर डिस्क में भी रखी गई थी। आपको सिर्फ़ वह डिस्क अपने कंप्यूटर में डालनी थी, और अपना या अपने किसी क़रीबी का नाम टाइप करना था। बस…

    यह कैसे संभव था? जल्द ही यह स्पष्ट होने लगा कि कोई उच्च शक्ति निश्चित ही मौजूद थी। इसके बाद किसी ने उसे नकारने की कोशिश नहीं की। मतभेद मात्र इतना था कि वह ईश्वर था या किसी प्रकार की तकनीकी शक्ति। यदि वह ईश्वर था, तो उसने स्वयं को प्रकट करने के लिए बुक ऑफ फेट्स के किसी साधारण लेखक को क्यों चुना? उसने यही साधन क्यों अपनाया यह समझ के बिलकुल बाहर थाI शायद कुछ ‘एलियंस’ भाग्य पर नियंत्रण रखते हैं, या उसे प्रोग्राम करते हैं। संभव है उन्होंने सीधे-सीधे यह डाटा उस व्यक्ति को सौंप दिया जो इलेक्ट्रॉनिक सेंटर में काम करता था और उसने कंप्यूटर पर सब डाउनलोड कर लिया। लेकिन फिर वही सवाल था क्यों और किस उद्देश्य से?

    इस सबके बावजूद, जीवन चलता रहा। यह अस्वाभाविक लग सकता है, लेकिन वह रुका नहीं। एक प्रयोग के तौर पर किसी पागल ने नियत समय से पहले ही खुद को ख़त्म कर लिया। मार डालाI और फिर कई हज़ार दूसरे लोग भी हिम्मत हारने लगे। यह पता चला कि अपने समय से पहले मरना संभव था, जिसका कोई तर्क नहीं था और बहुतों को इसे समझना मुश्किल था। जो भी हो, लंबे समय तक जीवित रहना संभव नहीं था। कोई भी ऐसा करने में सक्षम नहीं था।   

    इसलिए, ज़्यादातर लोग यूँ ही अपना जीवन जीते रहे। वे और कर भी क्या सकते थे? जबकि लोगों को अपने मरने की निश्चित तिथि पता थी, लेकिन उससे उनकी मेज़ पर रोटी तो नहीं आ सकती थी। उन्हें बाहर जाना ही पड़ता था। अपने और अपने बच्चों के लिए रोटी कमाने, बच्चे इस सबसे बेखबर थे। केवल वे ही थे जो पहले की तरह अपना जीवन जिए चले जा रहे थे, केवल वही खुश थेI

     

    (2)

    जब मैं अपने दोस्त के यहाँ से अपने घर आया, मेरी पत्नी सो चुकी थी। उस समय ज़्यादा डिस्क उपलब्ध नहीं थीं। प्रत्येक डिस्क में किसी एक अक्षर से शुरू होने वाले नाम थे। जानकारी चाहने वालों के लिए भी सूचना प्राप्त करना आसान नहीं था। लेना ने मुझे पहले ही कह दिया था कि वह जानना नहीं चाहती; उसे चिंता थी कि इसके बाद वह आगे जी नहीं पाएगी। ज़्यादातर लोगों की यही प्रतिक्रिया थी। बहुत से देशों में सरकारों ने उन पुस्तकों और डिस्क को नष्ट किये जाने के आदेश जारी कर दिए थे। लेकिन यदि कोई सचमुच जानना चाहता था, तो जानकारी पाने का हमेशा कोई न कोई ज़रिया भी मौजूद था, उन देशों में भी।

    ‘कोल्या किस लिए?’ मेरी पत्नी ने पूछा, जब उसे पता चला कि मैं सच जानना चाहता हूँ। ‘कृपया, मत जाओ।’

    ‘किंतु लेना……. यही सच हैI’

    ‘हमें यह सब जानने की क्या जरूरत है, कोल्या?’ उसके गालों पर आँसू लुढ़क आए।

    ‘यह सच है कि हम सबको मरना है। उसे ऐसे ही रहने दो। हमारी सोन्या, हमारा छोटा इगोर, तुम, मैं, हम सब मरने वाले हैं। लेकिन अभी तो हम जीवित हैं। अभी हमें जीने की ज़रूरत है।’

    मैंने उसके सामने कसम खाई कि मैं नियत तिथि जानने की कोशिश नहीं करूँगा, लेकिन फिर मैं पेरित्युरिन के यहाँ गया और सब कुछ पता लगा लिया। हम उसके कंप्यूटर पर बैठे और पेरित्युरिन बोलते हुए घबरा गया।

    ‘देखो, कोल्या, तुम मई महीने की छह तारीख़ को मरोगे, और मैं उसके एक साल बाद अप्रैल की चौदह तारीख़ को।’

    उसके चेहरे से बेवकूफी भरी हँसी गायब नहीं हुई जैसे उसे कुछ समझ न आ रहा हो।

    ‘और तुम्हारी लेना…’

    ‘बकवास बंद करो, कमीने! यू बास्टर्डI’

    मैंने पेरित्युरिन को उसके चेहरे पर एक लगाई और वह रोने लगा। बाद में मुझे अहसास हुआ कि वह भी मरने वाला था और मैंने बिना किसी कारण ही उसके जबड़े पर जड़ दी थी। और मैं भी रोने लगा।

    जब मैं घर पहुँचा तो मेरा दिमाग़ पहले की अपेक्षा शांत हो चुका था और मैं साफ़ सोच पा रहा था। लेना सो रही थी, उसकी साँसें मद्धम चल रही थींI उसने हल्के नीले रंग की नाइटी पहन रखी थी। उसकी बंद पलकों में ऐसी सरसराहट थी जैसे सपने में कुछ भयानक देख लिया हो।

    लेना बारह साल में मर जाएगी और मैं सोलह में। हम अपने बचे हुए सालों में क्या करेंगे? मुश्किल से कुछ ही साल बचे हैं। लेकिन हमारे पास बेचारी क्लावा (पेरित्युरिन की पत्नी) से ज़्यादा समय है; उसके तो बस दो ही साल बाक़ी हैं। हल्की मद्धिम रौशनी में मैं अपनी पत्नी के बिस्तर के किनारे बैठा सोचने लगा। मैं अपनी ही सोच की दिशा पर हैरान थाI उसमें कुछ भयानक था। मेरी भावनाओं में भी, क्योंकि यद्यपि मैं इस बात से दुखी था कि मैं लेना के जाने के बाद चार साल और अपने आप रहूँगा, तब भी मुझे इस बात की ख़ुशी थी कि जो भी हो हम पेरित्युरिन और उसकी पत्नी से अधिक भाग्यशाली थे। उनके दोनों बच्चे कम उम्र में ही मर जाने वाले थे, जैसे कि हमारा इगोर जो चौदह साल का होने पर मर जाएगा। हमारी सोन्या अवश्य ही चौरासी साल तक जीवित रहेगी!

    मैं उठा और अपने बच्चों के बेडरूम की तरफ़ गया। सोन्या नन्हीं परी-सी सोई हुई थी, आधी उघड़ी हुई, नाक से साँस लेती हुई। वह मुश्किल से अपने बिस्तर में फिट हो पा रही थी। जल्द ही हमें उसके लिए एक बड़ा पलंग लेना होगा। मैं मुस्कुराया और सोने चला गया। मैंने इगोर की तरफ़ नहीं देखा…

    (3)

    मुझे नहीं पता क्यों, लेकिन उस दिन से, बल्कि ठीक-ठीक कहूँ तो उस शाम से ही मैं इगोर की अपेक्षा सोन्या से ज़्यादा प्यार करने लगा। जबकि होना इसके उलट चाहिए था। सोन्या को लंबा जीवन मिला था; शायद यह उसके भाग्य में लिखा था कि वह माँ बनेगी और वंश को आगे बढ़ाएगी, और मुझे अत्यंत आवश्यक लगा कि अपना सबकुछ उसमें उड़ेल दूँ। दूसरी ओर, इगोर चौदह साल की उम्र में मर जाने वाला था। इतनी कम उम्र में। यह सच जानते हुए भी, उसके जीवन में निवेश न करना क्रूरता होगी। लेकिन क्यों? इसका मेरे पास कोई उत्तर नहीं था।

    ‘पापा, जब मैं बड़ा हो जाऊँगा, मैं पायलट बनूँगा?’

    ‘हाँ, इगोर, बिल्कुल।’

    वह अपने जीवन में क्या ही हासिल कर पाएगा?

    क्या उसे प्यार का अनुभव होगा? वह क्या सीख पाएगा?

    हमारे पास पैसे खत्म हो गए थे, तो मैं कुछ काम की तलाश में जॉब सेंटर गया। उन्होंने मुझे एक कंपनी में नौकरी की पेशकश की, लेकिन उसके बदले में पैसा बहुत ही कम था। जब तुम कहीं काम शुरू करते हो, कोई भी अच्छा पैसा नहीं देता। यदि तुम मेहनत करो तो कुछ समय बाद सामान्य वेतन मिलने की संभावना रहती है। यही स्थिति की विडंबना थी! यह जानते हुए भी कि मैं अगले पंद्रह साल में मरने वाला था, मुझे कौड़ियों के दाम पर काम करना पड़ेगा; रोटी के एक टुकड़े के लिए कड़ी मेहनत करनी होगी। बस यही आपकी क़िस्मत है।

    और इस तरह मैं अपनी ‘रोटी कमाने’ के लिए काम पर गया। जो लोग कंपनी के शीर्ष पर थे वे असली मुनाफ़ा कमा रहे थे, जबकि उनके लिए वह पैसे मैं बना रहा थाI यह काफ़ी दर्दनाक था। वे मालिक थे और मैं एक अदना-सा क्लर्क, और वे नहीं बल्कि मैं था जो इस पद के लिए नौकरी की भीख माँग रहा था।

    लेना इतनी थक जाती थी कि जब वह काम से घर आती वह बिस्तर पर पड़ जाती और आधे घंटे तक वहीं पड़ी रहती। जिन्हें पैसा कम मिलता है, उन्हें उतना ही अधिक पसीना बहाना पड़ता है। अपना जीवन यों बरबाद करने की क्या आवश्यकता है? लेकिन और तुम कर भी क्या सकते हो? थोड़ा-सा पैसा भी बहुत प्रयास और मेहनत माँगता है, और बहुत अधिक पैसा… उसे भी बहुत प्रयास करना होता है, लेकिन वह अलग तरह का होता है। लेकिन क्या तुम बॉस लोगों से अपनी तुलना कर सकते हो?

    अचानक ही मेरे माता-पिता आन पहुँचे। मेरी माँ एक साल में मरने वाली थीं, और पिता के पास तीन साल का समय था। हम सब्ज़ियों के बारे में बात कर रहे थे, जब मेरे पिता एकदम खड़े हो गए और कहने लगे, ‘मैंने तुम्हें पहले ही कहा था कि तुम्हारा पेशा किसी काम का नहीं है, लेकिन तुमने मेरी सुनी ही नहीं।’ वह इतने परेशान क्यों हैं? उनके पास सिर्फ़ तीन ही साल बचे थे। मेरी माँ अपनी दिल की बीमारी के बारे में बात करने लगीं।

    सोन्या, जो चौरासी साल तक जीवित रहने वाली थी और शताब्दी का अंत होते हुए भी देखने वाली थी, वह अभी अपनी दादी की उँगली पकड़कर चलना सीख रही थी।

    बृहस्पतिवार को पेरित्युरिन ने मुझे फ़ोन करके मछली पकड़ने जाने के लिए आमंत्रित किया। इससे मुझे थोड़ी ख़ुशी मिली और मैंने तय किया कि उस दिन छुट्टी ले लेता हूँ। मुझे पता था कि वे लोग (मालिक लोग) नाराज़ होंगे, लेकिन ऐसा हो नहीं सकता था कि मैं न जाऊँ ।

    मछली पकड़ना मज़ेदार था। पेरित्युरिन ने आठ छोटी मछलियाँ, क्रूसियन कार्प पकड़ीं, और मैंने तीन टेंच और चार क्रूसियन कार्प।

    ‘यही जीवन है, कोल्या!’ पेरित्युरिन ने कहा।

    ‘और ऐसा लग रहा है जैसे बुक ऑफ फेट्स का कोई अस्तित्व ही न हो!’

    ‘हाँ।’

    झाड़ियों में पक्षी चहचहा रहे थे और हवा के झोंकों से बहते हुए पानी की छोटी-छोटी लहरें हमारी ओर सरक रही थीं।

    ‘सुंदर’, पेरित्युरिन ने कहा।

    ‘हाँ।’

    ‘हो सकता है यह सब बकवास हो।’

    ‘खैर, यह किताब। मुझे लगता है कि यह बकवास है।’

    ‘तुम बेकार बात कर रहे हो।’ मैंने अपना सर उठाया और उसकी ओर देखा। ‘अभी तक एक भी अपवाद नहीं है।’

    ‘अब तक न।’ पेरित्युरिन ने अपनी मछली पकड़ने की डोरी पर चारा बदला। ‘शुक्रवार तक हो सकता है ऐसा ही चले और फिर शनिवार को रूक जाए।’

    ‘कैसे?’

    ‘तुम क्या सोचते हो ऐसा नहीं हो सकता? तुम्हें कैसे पता?’

    उसने अपनी बाँह घुमाई और डोरी को जितना दूर तक फ़ेंक सकता था, फेंका। उस दिन से मैं भी चीज़ों को थोड़ा अलग नज़रिए से देखने लगा। सच ही है, ऐसा क्यों नहीं हो सकता? पहले पहल किसने सोचा था कि कोई अपनी नियत तिथि से पहले भी मर सकता है, लेकिन फिर वह संभव हुआ। और फिर अभी तक कोई निश्चित डाटा उपलब्ध नहीं था। जितने भी लोगों की मृत्यु ज्ञात थी वह उस तारीख़ से मेल खाती थी, जिसकी भविष्यवाणी की गई थीI उन सबकी जाँच कर पाना कहाँ संभव था, जिनकी मृत्यु की घोषणा हुई थी? यह बहुत कठिन हो सकता था। तो फिर, सबने कैसे मान लिया, हर कोई इतना आश्वस्त कैसे था कि कोई अपवाद नहीं है? संभवतः कहीं अफ्रीका के जंगलों में कोई ऐसा हो जिसे पहले से नियत दिन पर मर जाना था, लेकिन वह अब भी जी रहा है और कल भी जीवित रहेगा। और यदि एक अपवाद हो सकता है, तब कोई दूसरा-तीसरा भी हो सकता है।

    *     *     *

     बाद में, बहुत से लोग इस तरह के भ्रम और गड़बड़ी पर खुश हो गए। जिन लोगों के नाम, उपनाम और माता-पिता के नाम समान थे, वे अपनी मृत्यु की तारीख़ नहीं समझ पा रहे थे। यदि यह बुक ऑफ फेट्स ईश्वर प्रदत्त है, तो वह इस तरह की ग़लतफ़हमी कैसे पैदा होने दे सकता था? उसने उन लोगों के बारे में क्यों नहीं सोचा जिनके नाम एक जैसे थे? और यदि यह उस पागल करोड़पति का काम था जिसने इस भ्रम को फैलने दिया था तो ईश्वर ने उसे ठीक क्यों नहीं किया?

    और भी कई ग़लतफ़हमियाँ थीं। यह निश्चित तिथियाँ किस टाईम ज़ोन पर आधारित थीं? आपको यह सब खुद समझना थाI जिस टाईम ज़ोन में वह करोड़पति रहता था उसके समय के अनुसार जोड़-घटाकर अपनी मृत्यु की तिथि देखनी थी। पूरी किताब में इस विषय पर एक शब्द भी नहीं था।

    और अततः, उन लोगों का क्या जो अब पैदा हो रहे थे? उन्हें पुस्तकों में शामिल नहीं किया गया था। यदि कोई नया मसीहा नहीं आ जाता तो अगली पीढ़ी सामान्य जीवन जी पाएगी, जैसा कि हमने जिया जब तक कि यह पुस्तक सामने नहीं आई थी। क्या यह किसी तरह का प्रयोग था? लेकिन क्यों?

    (4)

    देश और दुनिया के सामने एक बहुत ही अजीब स्थिति आ गई थी। हर कोई यह मानता था कि कोई दिव्य शक्ति है। लेकिन वह कहाँ है? सूर्य हमेशा की तरह चमक रहा था, आकाश वैसा ही था जैसाकि बादल, पेड़ और जानवर। संसार अब भी बदला नहीं था; सब कुछ उसी तरह जीवंत और चमकीला था लेकिन वह छिपी हुई दिव्यता कहीं दिखाई नहीं देती थी। केवल वही किताब थी, जो अचानक पता नहीं कहाँ से सामने आ गई। उसने सबका दिमाग़ खराब कर दिया था। हे ईश्वर, यदि आप जताना चाहते हो और वह भी इतने मौलिक ढंग से, तो स्वयं को प्रकट करो! किस रूप में? वह आप ही बेहतर जानते हैं। हम चौक पर आपका इंतज़ार करेंगे, वहाँ दिख जानाI कम से कम पाँच मंज़िला इमारत के बराबर ऊँचाई हो ताकि देखते ही पता चल जाए कि आप ईश्वर हो। या फिर आसमान में दिख जाना बादलों के बीच। और तब हम बात कर सकते हैं कि आप कौन हो, हम कौन, मृत्यु क्या और यह सब किसलिए? हम सच में जानना चाहते हैं; यह अजीब-सा भय किसे चाहिए? अगर हमें कुछ पता नहीं होगा तो हम खरगोशों की तरह काँपते रहेंगे। हमसे वह क्यों छिपाते हैं, जो आप जानते हैं? बस कहो, ‘यह ये है या वे’, आप बनाये ही इसलिए गए हैं और आप इसीलिए जीते हैं, आप ये हैं या वे।’ बताइए, ‘मृत्यु से मत डरिए क्योंकि वह मृत्यु है ही नहीं। बस मैं हूँ यहाँ और आप भी हैं। और आप बस मेरे हैं, पूर्णतः।’

    न, यह सब बकवास है। कोई ज़रूरत नहीं। यदि ऐसी कोई बात होती तो हम उसके बाद कैसे जी पाएँगे? कैसे हम कील ठोकेंगे? कैसे चंद सिक्कों के लिए फैक्ट्रियों में हाड़-तोड़ मेहनत करेंगे? ईश्वर को देखकर, उनसे सीधे बात करने के बाद भी बचे रहना असंभव है। हम डर के मारे जमे रह जाएँगे और फिर पहले की तरह जी पाएँगे। लेकिन तुम्हें जीना पड़ता है जब तक कि चीज़ों के सही मायने नहीं जान पाते, और फिर ज़िंदगी चलती रहती है। जीवन का अर्थ, मायनों को न समझ पाना ही है। यदि तुम्हें मतलब पता चल गया, तो ज़िंदगी का कोई मतलब नहीं रह जाएगा।

    स्थिति चाहे जो भी हो, जीवन चलता रहा। समाचार-पत्र, टेलीविज़न और रेडियो सबने अपने को इस नए विषय में झोंक दिया; हम सबको इन हालातों को समझने के लिए दिमाग़ लगाना था। बुक ऑफ फेट्स के बाद, दुनिया वैसी नहीं हो सकती थी जैसी पहले थी: यह वह दुनिया थी जहाँ लगभग सबको पता था या जान सकते थे कि उनकी मृत्यु कब होने वाली है! जल्द ही, यह देखकर मुझे आश्चर्य हुआ कि इस नए विषय पर ज़ोरदार बहसें होने लगीं, कहीं टॉक शो और कॉमेडी शो भी हो रहे थे। और तो और, इस नए विषय पर आराम से चर्चा होती थीI लोग वाइन पीते हुए या जीवन के छोटे-मोटे मज़े के बीच इसकी चर्चा करते। एक लड़की जिसकी मृत्यु बुक ऑफ फेट्स के अनुसार अगले ही दिन होने वाली थी, उसका सीधा प्रसारण दर्शकों के लिए टेलीविज़न पर किया गयाI उसने ‘अच्छाई’, ‘शांति’ और ‘सार्वभौमिक प्रेम’ के बारे में कुछ फुसफुसाया जो आपको पागल कर देने के लिए काफ़ी था। दो विख्यात हास्य कलाकार आपस में और (पूरे देश से) इस विषय पर मज़ाक करते रहेI

    ‘कल, क्या आप खाली हैं?’

    ‘कल? हम्म… कल….. मुझे मरना है।’ (स्क्रीन के बाहर हँसी का शोर)

    एक सुबह मैंने लेना को उसकी मृत्यु के बारे में बता दिया; मैं इसे ज़्यादा नहीं छिपा पाया।

    ‘मैं जानता हूँ कि मैं तुम्हें कब खो दूँगा, दाढ़ी बनाते हुए मैंने कहा।

    ‘तो, तुमने पता लगा ही लिया?’ उसने थोड़ा गुस्से से पूछा। ‘तो, फिर कब?’

    ‘बारह साल में।’

    ‘इतनी जल्दी?’ लेना ने कहा। वह रसोई में एक बर्तन रगड़ रही थी। ‘मुझे लगा कि मेरे पास शायद इससे ज़्यादा समय होगा।’

    ‘और मैं सोलह साल में मर जाऊँगा!’ मैंने चिल्लाकर कहा ताकि वह रसोई से मेरी आवाज़ सुन सके।

    पहले उसने कहा था कि अपनी मृत्यु की तिथि जानकर वह जीवित नहीं रह पाएगी। तो अब क्या होगा?

    मैंने दाढ़ी बनाना खत्म किया और निकलने ही वाला था कि लेना अभी भी उसी बर्तन को माँज रही थी।

    ‘जब तुम बाहर जाओगे, ला सको तो थोड़ी ब्रेड लेते आना,’ उसने उस बर्तन से नज़र हटाए बिना कहा। ‘घर में एक टुकड़ा भी नहीं है।’

    मैं हैरान होकर उसकी ओर देखने लगा।

    ‘और मारिया फेदरोवना को सोन्या के लिए बुला लेना ।’

    हमारी बेटी गणित का होमवर्क नहीं कर पा रही थी।

    मैं दरवाज़े पर खड़ा इंतज़ार कर रहा था कि वह और क्या कहेगी। लेकिन वह तेज़ गति से अपना काम करती हुए, उस बर्तन में उबलते पानी में कुछ डाल रही थी।

    ‘तुम अभी भी यहाँ हो?’ उसने पूछा, जब देखा कि मैं अभी भी झिझकता हुआ दरवाज़े पर खड़ा हूँI

    ‘लेना,’ मैंने कहा। ‘मैंने अभी तुम्हें इतनी महत्त्वपूर्ण खबर सुनाई और तुम…’

    ‘क्या?’ वह बर्तन से दूर हुई, और अचानक हाथ में एक प्याज़ लिए और आँखें मुझ पर टिकाए बोली।

    ‘तो क्या? इससे क्या बदलने वाला है?’

    ‘क्या से तुम्हारा क्या मतलब है’?’

    ‘तो और क्या? फिर खाने की कोई ज़रूरत नहीं है? शायद, तुम दोपहर के भोजन के समय खाना खाना चाहोगे?’

    ‘लेकिन…’ मुझे समझ नहीं आया कि क्या कहूँ।

    ‘या शायद सोन्या के लिए गणित में फेल हो जाना ठीक है?’

    ‘लेकिन हम…’

    ‘क्या फर्क पड़ता है? अभी हमें वह सब सोचने की क्या ज़रूरत है? इससे क्या होगा?’

    मुझे अपने कानों पर यक़ीन नहीं हो रहा था। मैं ख़ामोशी से पलटा और निकल गया।

    मुझे लगा कि मैं अपनी पत्नी के बारे में कितना कम जानता हूँ।

    (5)

    सबसे दिलचस्प बात यह थी कि हमने फिर कभी इस विषय पर बात नहीं की; और कुछ भी नहीं बदला, कुछ भी नहीं; हम छोटी बातों पर पहले की तरह ही झगड़ते रहे। केवल, कभी-कभी मुझे याद आता कि यदि हमें उस फ़ालतू-सी बुक ऑफ फेट्स पर विश्वास था तो समय बीत रहा थाI यह एक दुःस्वप्न ही था कि आपको अपनी मृत्यु का सही समय ठीक पता था और आप उस बारे में कुछ कर नहीं सकते थे।

    और फिर, एक के बाद एक कई किताबें आने लगीं: द विज़डम ऑफ़ फाइनल नोइंग, द मीनिंग ऑफ़ साइन फ्रॉम अबव, द थ्योरी एँड प्रैक्टिस ऑफ लीविंगI हमारे दार्शनिक और मनोवैज्ञानिक जल्दी-जल्दी इस विषय पर कुछ लिखकर प्रकाशित कर देना चाहते थे, जब तक कि यह विषय चर्चा में था; अपनी मृत्यु की घड़ी जानते हुए भी पैसे के लिए इन पुस्तकों को बाज़ार में बढ़ावा दे रहे थे। और लोग भी इन किताबें को खरीदने के लिए भागे जा रहे थे। वे इस विषय पर सब पढ़ लेना चाहते थेI दस लाख प्रतियाँ! और मैं भी, उन्हें खरीदने से खुद को रोक नहीं सका। उनकी राय में जीवन अब पहले से कहीं बेहतर था। ‘मृत्यु अब बुरा-सा आश्चर्य नहीं था’; ‘व्यक्ति अब सीधे मौत की आँखों में देखकर अपनी ताकत का अंदाज़ा लगा सकता था। ऐसी कंपनियाँ सामने आने लगीं जो ‘विदाई समारोह’ का आयोजन करती थीं। चूँकि कोई भी अपनी मृत्यु की तारीख जान सकता था, बहुत से लोग उसे शादी या नामकरण की तरह एक आयोजन में बदलने लगे।

    एक रविवार को, पेरित्युरिन ने मुझे अपने एक जानकार की ‘विदा पार्टी’ (जैसा उन आयोजनों को कहा जा रहा था) पर आमंत्रित किया। अधिक सटीक रूप में कहें तो वह पेरित्युरिन की पत्नी की दोस्त का पति था। वह किसी बड़ी कंपनी का वाइस प्रेसिडेंट था, अमीर आदमी, तो अपने ‘विदा दिवस’ को मनाने के लिए (जैसाकि निमंत्रण पर लिखा था) उसने करीब पाँच सौ लोगों के लिए एक बड़ी दावत का इंतज़ाम किया था। पेरित्युरिन की पत्नी ने, ज़ाहिर है, जाने से मना कर दिया था, इसलिए उसने वह निमंत्रण मुझे दे दिया। मैं चला गया क्योंकि मैंने ऐसे आयोजनों के बारे में केवल पढ़ा था, जो शहर के अंदर और बाहर बहुत लोकप्रिय हो रहे थे।

    गर्मियों के दिन थे, बाहर तारों के नीचे सजाई गई टेबलें थीं, जो खाने से लदी थीं। ऑर्केस्ट्रा बज रहा था, लोग नाच रहे थे। बीच-बीच में, यहाँ-वहाँ आतिशबाज़ियाँ भी छूट रही थीं।

    ‘वे लोग तो मज़े कर रहे हैं, नहीं?’ मैंने पेरित्युरिन से कहा, जब वेटर हमें एक मेज़ पर ले गया।

    ‘नहीं, वे रो रहे हैं।’

    ‘नहीं, मैं गम्भीर होकर कह रहा हूँ।’

    ‘अच्छा, तुम्हें क्या लगता है कि वे बेवकूफ़ हैं या क्या? वे अपने जीवन के अंतिम दिन का शोक क्यों मनाना चाहेंगे?’

    ‘और वह ख़ुद कहाँ हैं?’

    ‘रुको, वह जल्द आता होगा।’

    जैसे-जैसे सुबह होने लगी, कंपनी (यदि आप दो सौ लोगों को कंपनी कह सकते हैं तो) के लोग तनावमुक्त होने लगे और बातचीत खुलकर होने लगी; लोगों के मन में जो भी आया वे बोल रहे थे वह सब समझदारी भरा लग रहा था। गुरु-गंभीर। अचानक घंटाघर की घड़ी ने चार बजाना शुरू कर दिया। महल की सीढ़ियाँ जगमगा उठीं और धूमधाम की आवाज़ों के साथ अंतिम घंटी बज उठी। सब जड़वत खड़े हो गए। दरवाज़ा खुला और हमारा मेज़बान लाल जैकेट और टाई पहने, मुस्कुराते हुआ दिखाई दिया। वह सीढ़ियों से नीचे उतरा, उसकी चाल में अभी भी जवानी की गति थी, उसके रिश्तेदारों ने नीचे आते ही उसे घेर लिया। फिर, जब वह मेज़ पर सबसे प्रमुख स्थान पर बैठ गया, तो पार्टी पुनः शुरू हुई।

    सुबह जब चार बजे तो उस जगह आधी रात थी जहाँ पुस्तक का प्रकाशक रहता था। मालिक की मृत्यु का दिन आन पहुँचा था, और वह कोई जोखिम नहीं लेना चाहता था। वह ठीक समय पर प्रकट हुआ, एक सेकंड की देर किये बगैर, ताकि वह सबकी उपस्थिति में मर सके। तब ही मुझे समझ में आया कि ‘सबकी उपस्थिति में मृत्यु’ का क्या अर्थ है, जिसकी उन दिनों काफ़ी प्रशंसा हो रही थी। यह सच था कि इसमें कुछ बात तो थी।

    उजाला हो गया था, लेकिन मालिक अभी भी ज़िंदा था — जीवित, खाता-पीता, हँसता हुआ और यहाँ तक कि युवा लड़कियों के साथ नाचता हुआ।

    ‘पादरी कहाँ है?’ मैंने पेरित्युरिन से पूछा, जो आधा नींद में था और आधा नशे में।

    उसने सिर उठाकर मेरी ओर ऐसे देखा जैसे मुझे पहली बार देख रहा हो।

    ‘इस तरह के आयोजनों में पादरी को नहीं बुलाया जाता। यहाँ उसके लिए करने को क्या है?’

    और उसका सिर फिर से नीचे लुढ़क गया।

    हर कोई उस समापन का इंतज़ार कर रहा था, यानी वाइस प्रेसिडेंट की मृत्यु, यही वो कारण था जिसके लिए हम सब वहाँ इकठ्ठा हुए थे। इससे पहले ऐसा अनुभव संभवतः मध्यकाल में ही हुआ होगा, जब लोगों की भीड़ सार्वजनिक तौर पर दिए जाने वाले मृत्युदंड को देखने के लिए इकठ्ठा होती थी।

    ‘आई वांट टू रेज़ ए टोस्ट’, अचानक मेरे सिर के ऊपर लगे लाउडस्पीकर से आवाज़ आई। ‘आप सब अभी कुछ समय और रहने वाले हैं, जबकि मैं जा रहा हूँ। कल तक मैं जान जाऊँगा कि आप सबके पास क्या नहीं है। तो, मेरी कंपनी के नाम ‘लोटोस इंटरनेशनल के लम्बे जीवन और खुशहाली के लिए, जिसके लिए अभी किसी ने समाप्ति की अंतिम तिथि निश्चित नहीं की है।’

    ‘हिप हिप, हुर्रे!’

    मैं देख नहीं पाया कि कौन इतनी ज़ोर से चिल्लाया था। और तब कॉर्क के खुलने की आवाज़ आई और शैंपेन बहने लगी।

    दोपहर के समय, धूप में, सभी लोग थकने लगे। बिजनेस मैन भी जम्हाई ले रहा था, वह मुश्किल से अपने पैरों पर खड़ा हो पा रहा था। उसकी पत्नी, जो एक भारी महिला थी, जिसके कपड़ों से उसकी उघड़ी छातियाँ और नंगी पीठ दिख रही थीं। वह भी नशे में थी, और पैर फैलाकर, हिचकियाँ लेती हुई बेवजह हँस रही थी।

    कुछ मेहमान अपनी घड़ियाँ देखने लगे और चुपके से मेज़ से खिसक गए। अन्य लोग बैठे रहे, उन्हें लगा कि वाइस प्रेसिडेंट की मृत्यु से पहले चले जाना शिष्टाचार के विरुद्ध होगा, क्योंकि उन्हें इसीलिए आमंत्रित किया गया था। दुनिया निश्चित रूप से उलट गई थी। मैं भी जाने ही वाला था (खुदा जाने लेना मेरे बारे में क्या सोच रही होगी), तभी अचानक लाउडस्पीकर पर एक गंभीर आवाज़ ने घोषणा की—

    ‘सज्जनो! वह जा रहे हैं, सज्जनो! हमारे मेज़बान जा रहे हैं!’

    सभी ने अपनी गर्दनें ऊपर उठाईं, या अपनी सीट से खड़े हो गए, तो मैं ठीक से ज़्यादा कुछ नहीं देख पाया; केवल एक झलक दिखी जिसमें अपने मेज़बान के शरीर को ऐंठते हुए देखा, उसका शरीर अपनी कुर्सी में पत्ते की तरह काँप रहा थाI सब देख सकें इसलिए उसे कुछ ऊपर उठा दिया गया। पाँच मिनट बीत गए।

    ‘सज्जनो, वे नहीं रहे! आइए उनके लिए एक जाम उठाएँ!’     

    सब खड़े हो गए और चुपचाप शराब पीने लगे।

    ‘और अब, कुछ मीठा हो जाएI’

    जब मैं देहात में खरगोशों का गला काटता था, तो उनके शरीर में ऐसी ही ऐंठन होती थी। मैंने पेरित्युरिन का हाथ पकड़ा और उसे घसीटता हुआ बाहर सड़क पर ले आया, जहाँ हमारी गाड़ी खड़ी थी।

    ‘यह क्या मूर्खता है!’

    ‘तो क्या हुआ?’ पेरित्युरिन ने कहा। ‘और जल्दी भी क्या है? अभी हमने मीठा तो खाया ही नहीं।’

    ‘क्या किसी को इस तरह मरना चाहिए?’

    ‘क्या अंतर है? लोग उसी तरह मर रहे हैं। जैसे वे चाहते हैंI जैसा चाहो करो, मैं मिठाई खाने जा रहा हूँ।’

    ‘तो फिर जाओ!’

    मैं गाड़ी के पास बैठकर इंतज़ार करने लगा।

    (6)

    लेना बदल रही थी। जैसे-जैसे इगोर की मौत करीब आ रही थी (और अधिक छिपा न पाने के कारण मैंने ही उसे इस बारे में बताया था), वह और भी उदास हो गई। वह पहले ऐसी नहीं थी, लेकिन अब मैं देखता वह आधा छीला हुआ आलू लेकर रसोई में बैठी होती, जैसे कहीं दूर देख रही हो। हमारी खिड़कियाँ शहर के पार्क की तरफ़ खुलती थीं। मुझे पता नहीं क्यों पर उसकी उदासी से खुशी हो रही थी; उसकी उदासीनता से उदासी मेरे दिल के ज़्यादा करीब थी।

    इगोर भी जानता था। बच्चे उस ओर ही आकर्षित होते हैं जो निषिद्ध हो; स्कूल में हर कोई एक-दूसरे के बारे में जानता था – किसके पास जीने का कितना समय बचा हैI कोई बुक ऑफ़ फेट्स का कोई अंश ले आता; आप सूचनाओं को पहुँचने से रोक नहीं सकते। एक बार, मैं खेल के स्टेडियम के पास रुका। दो लड़के एक-दूसरे को मार रहे थे।

    ‘तुम डरपोक हो! माँ का छोटा-सा बच्चा!’ उनमें से एक मुट्ठियाँ भींचते हुए चिल्लाया।

    ‘और तुम नौवीं कक्षा में ही निकल जाओगे। हा!’

    ‘मैं अठहत्तर साल की उम्र तक जीऊँगा और तुम मर जाओगे!’

    ‘साले।’ पहले ने बोलने वाले को पकड़ा और ज़मीन पर पटक दिया।

    मैं चिल्लाया, ‘तुम दोनों यहाँ क्या कर रहे हो?’ ‘रुको अभी!’

    वे डर कर अलग-अलग दिशाओं में भाग गए।

    हाँ, दुनिया बदल गई थी लेकिन अच्छे के लिए नहीं।

    जब इगोर तेरह साल का हुआ, उसे जन्मदिन की बधाई देते हुए हमने अपनी नज़रें झुका लीं। हम क्या कह सकते थे? यह कोई बीमारी भी नहीं थी; तब हम उससे लड़ तो सकते थे। कम से कम कुछ उम्मीद तो जगा सकते थे।

    ‘इगोर,’ मैंने मुश्किल से निगलते हुए कहा। मैं अपने बेटे को क्या शुभकामना देता जिसने अपने जीवन के अंतिम वर्ष में प्रवेश कर लिया होI

    ‘पापा, इसकी कोई ज़रूरत नहीं है’ इगोर ने कहा। ‘वैसे भी मैं सब समझता हूँ।’

    वह मुझसे ज़्यादा बहादुर था, और इस बात के लिए मैं उसका सम्मान करता था। मैं देख पा रहा था कि वह खुश हैI मेरी आँखों में अपने लिए सम्मान देखना उसके लिए बहुमूल्य था जबकि इस हालत में खुश होने की बात कौन कर सकता है?

    सोन्या को अपने से चिपकाए लेना रो रही थी। सोन्या, चौरासी साल तक जीवित रहने वाली थी।

    मुझे पता नहीं क्यों, लेकिन मैं किसी चमत्कार की उम्मीद कर रहा था। ‘केवल कोई चमत्कार ही हमें बचा सकता है’ – इससे पहले इस वाक्यांश का मेरे लिए कोई अर्थ नहीं था। पेरित्युरिन की पत्नी कब की गुज़र चुकी थी, और उनकी एक बेटी भी (दूसरी के पास पाँच साल बचे थे), लेकिन मैं फिर भी उम्मीद कर रहा था। दुनिया पागल हुई जा रही थी। अमीर लोगों ने अपने ‘विदा दिवस’ के प्रसारण के लिए टीवी चैनलों को बेशुमार पैसा दिया था, जबकि लोग (अपनी टी.वी. स्क्रीन पर) किसी विख्यात बैंकर या फ़िल्मी अभिनेता को संसार से जाते देख सुन्न रह जाते थे। सारे टैब्लॉयड और कुछ गंभीर समाचार-पत्र भी अगले दिन के मौसम के हाल के साथ-साथ अगले दिन मरने वाले प्रतिष्ठित लोगों की सूची प्रकाशित कर रहे थे। नव वर्ष की पूर्व संध्या पर, अगले वर्ष इस संसार से उठ जाने वाले विश्व के कुलीन लोगों के विषय में भी उन्होंने लेख लिखे। विशेष संस्थानों ने यह डाटा तैयार किया कि किन लोगों के मरने से कितनी नई नौकरियाँ खाली होंगी (डॉक्टर, प्रोफ़ेसर, वकील) और उन नौकरियों के लिए लड़ाई तब ही शुरू हो जाएगी, जब तक कि जाने वाले लोग अभी जीवित होंगे।

    लेना और मैंने खुद को मनोवैज्ञानिक और भौतिक रूप से इगोर दिवस के लिए, जैसा हम उसे कह रहे थे, तैयार किया। हमने तय किया कि इगोर की विदाई एक छोटा-सा पारिवारिक आयोजन होगा; लेना, सोन्या, इगोर और मैं। वे सभी लोग ऐसा ही करते थे, जो इस फैशन के चक्कर में नहीं पड़े जिसमें ‘विदा दिवस’ सबको आमंत्रित कर मनाया जाता था, या और भी बहुत कुछI

    एक शाम पहले, हमने नहाया, साफ कपड़े पहने, मेज़ के चारों ओर बैठे और चुपचाप खाना खाया। हमने तय किया कि उस रात सोयेंगे नहीं; हम इगोर के साथ होना चाहते थे। इगोर इस तरह व्यवहार कर रहा था जैसा पहले कभी नहीं किया; ऐसा लग रहा था कि जैसे वह नहीं बल्कि हम विदा हो रहे हैं। उसने मज़ाक करने की भी कोशिश की।

    सुबह होने लगी, इगोर अब भी जीवित था; यहाँ तक कि उसकी कमज़ोर किडनियाँ भी उसे तकलीफ नहीं दे रही थीं (वह इस बीमारी के साथ ही पैदा हुआ था, यह उसे लेना से विरासत में मिली थी)। मैं और लेना केवल एक ही चीज़ चाहते थे कि उसकी विदाई शांतिपूर्ण हो, बिना किसी तकलीफ के। बस इतना ही कि उसे घुटन न हो या फिर मुँह से ‘खून’ न निकले। हे भगवान! हम कैसे किसी के हाथ में माँस के लोथड़े के समान ही थे; हमारे साथ तुम जो करना चाहो सो करो।

    दोपहर के भोजन के समय लेना अचानक बाथरूम में जाकर प्रार्थना करने लगी, जो उसने पहले कभी नहीं की। मेरी हिम्मत भी डगमगा गई। शायद यह सच था कि ऐसे समय में शराब पीना बेहतर था, जैसा कि सुझाया जाता था; लेकिन जो भी हो मैं ऐसे समय पर नशे में नहीं होना चाहता था।

    ‘हम कैटरीना फॉर्म मेक्सिको क्यों न देखें?’

    हम सब आश्चर्य से इगोर की ओर देखने लगे; वह उस धारावाहिक की बात कर रहा था जो हम पिछले छह महीनों से देख रहे थे।

    वह सही था, ऐसा करना ही सबसे समझदारी भरा था। हालांकि शायद यह थोड़ा धर्म के विरुद्ध था।

    हम बैठ गए, टेलीविज़न चलाया (अँधेरा होने लगा था) और अचानक एक शांति और खुशी का अनुभव हुआ (हाँ! हाँ!), जैसे कि कुछ हो ही नहीं रहा हो। बुक ऑफ फेट्स हो ही न। ऐसा लग रहा था जैसे हम चारों वैसे ही बैठे हैं, जैसे हमेशा बैठते हैं, एक-दूसरे को अपने होने से, अपनी देह और मुस्कान से गर्माहट देते हुए। सच ही हम हँस रहे थे। ऐसा लग रहा था कि कुछ नहीं हो सकता; कोई तूफ़ान हमारी सुरक्षित दुनिया में घुसकर उसे उड़ा नहीं ले जा सकता।

    जब कार्यक्रम समाप्त हुआ, तो चिंता तुरंत लौट आई, साथ ही यह भावना भी कि हम अपरिहार्य को रोक नहीं सकते। हालांकि हम इस पर विश्वास नहीं करना चाहते थे। यह एक दुःस्वप्न था।

    रात हो गई। सोन्या सोफ़े पर सो गई, जबकि हम सब बैठे रहे, हमारी आँखें टीवी स्क्रीन पर चिपकी हुई थीं, समझ नहीं पा रहे थे कि क्या हो रहा है (लेना और मैं, वैसे भी – मैं उसे महसूस कर सकता था)। यह कब होगा? कब?

    इगोर का आखिरी दिन ख़त्म होने वाला था।

    (7)

    इगोर अभी भी मरा नहीं था। चार बजने में अभी कुछ मिनट बचे थे (बुक ऑफ़ फ़ेट्स के प्रकाशक के समयानुसार रात बारह बजे), लेना और मैं, भयग्रस्त होते हुए भी किसी चमत्कार को अनुभव कर पा रहे थेI हमारी आँखें दीवार पर टँगी घड़ी की सुइयों पर जमी थीं। आखिरी मिनट शुरू हुआ…

    ‘इगोर…’ लेना ने कहा। ‘मेरा बेटा…’

    वह उसकी ओर ऐसे बढ़ी मानो उसे उसके भाग्य से बचाना चाहती हो। मैंने अपना होंठ काट लिया। अच्छा… अच्छा… तो फिर…

    जब चार बजे तो हम तीनों उछल पड़े। कुछ हुआ।

    ‘इगोर, तुम ज़िंदा हो?’ मैं अपनी नज़रों पर यकीन नहीं कर पा रहा था।

    हम अपनी खुशी को दबाए रहे, जैसे बोतल में बंद कर रहे हों, जैसे किसी पुष्टि की प्रतीक्षा हो, हमारे दिमाग घूम रहे थे; हो सकता है घड़ी तेज़ चल रही हो (जबकि पिछली रात इसीलिए हमने घड़ी मिलाई थी)। हो सकता है कुछ गलती हुई हो… आधा घंटा बीत गया। एक घंटा। घड़ी ने पाँच बजाए। इगोर (जीवित और हँसता हुआ) हमारे सामने बैठा था। हमें समझ नहीं आया।

    (8)

    बुक ऑफ फेट्स जिस तरह आई थी, उसी तरह गायब हो गई। यह बताया गया कि तीन दिन पहले उसकी भविष्यवाणियाँ पूरी होनी बंद हो गई थीं (जबकि दुनिया को इसका पता नहीं चला था, क्योंकि सभी को इसकी जानकारी नहीं थी)। अगले दो महीनों में, हर कोई शांत होने लगा था, क्योंकि लोग इस बात से आश्वस्त हो रहे थे कि जिनको उस समय तक मर जाना था, वे अभी भी जीवित हैं।

    लेना और मुझे लगा कि जैसे हमारा नया जन्म हुआ हो; जैसेकि हमें दूसरा मौका मिला हो।

    ‘चलो कल समुद्र पर चलते हैं! भाड़ में जाए सब कुछ!’ हम पहले कभी अचानक छुट्टी पर नहीं गए थे। हे भगवान, हम कितनी शिद्दत से जीना चाहते थे!

    वैसे, अगर आप इस बारे में सोचें — तो क्या बदल गया? क्या हम अमर हो गए? अब मुझे इस पर भी यकीन नहीं था कि जो तारीख़ मुझे दी गई थी मैं तब तक भी जीवित रह पाऊँगा। सोन्या के लिए तो यह और भी सच था क्योंकि उसे चौरासी साल की उम्र दी गई थी। तो फिर हमें अचानक से अपने ठीक होने का यह अहसास क्यों हो रहा है? क्यों?

         

                                                    लिथुआनियाई कहानी-संग्रह : अंतिम दिन से साभार

    साहित्य अकादेमी द्वारा प्रकाशित  

    प्रथम संस्करण 2025

    2 thoughts on “यारोस्लावास मेलनिकस की कहानी ‘अंतिम दिन’

    1. अद्भुत कहानी। हम सब भावी के प्रति अपने भय और आशंकाओं से इतने त्रस्त रहते हैं कि मरण से पूर्व ही मर जाते हैं। जीवन के हर पल को पूरी तरह जीना ही भूल जाते हैं। ये कहानी नए विज्ञान और सूचना प्रणाली से जनित डेटा , नई गणना , नई तकनीक की ओर बढ़ते हमारे रुझान और निर्भरता पर भी सवाल खड़े करती है। कहानी का अंत एक सकारात्मक भाव की ओर ले जाता है कि मृत्यु से जीतने की नहीं बल्कि मृत्यु के भय से मुक्त हो कर जीवन के प्रत्येक क्षण को भरपूर जीने में ही जीवन की सार्थकता है। अनुवादक रेखा सेठी को इस महत्वपूर्ण कहानी के सुंदर अनुवाद के लिए धन्यवाद।

    2. ये कहानी सच में ही बहुत खूब हैं. जब मैं इसे पढ़ रही थी तो पूरी तरह उसी में खो गई थी सब जेसे आखों के सामने चल रहा हो.

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