इस साल प्रसिद्ध लेखिका अलका सरावगी का उपन्यास आया है ‘कलकत्ता कॉस्मोपॉलिटन: दिल और दरारें’। अलका जी के उपन्यासों में कोलकाता एक अनंत कथा की तरह है जो उनके उपन्यासों में बार-बार किसी नये रूप में सामने आता है। उनके इस उपन्यास पर यह टिप्पणी लिखी है कवि-लेखक यतीश कुमार ने। राजकमल प्रकाशन से प्रकाशित इस उपन्यास पर यह टिप्पणी आप भी पढ़ सकते हैं- मॉडरेटर
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सच क्या है? कितना छिछला, कितना सख़्त, कितनी फिसलन लिए, कितने काँटे बोए हुए- नागफनी-सा सच। अलका सरावगी के इस उपन्यास में एक व्यक्तित्व के भीतर के सच की कई परतों को पढ़ते हुए आप महसूस कर सकते हैं- चाहे कुलभूषण का सच हो या किशोर बाबू का। मनःस्थिति का बारीक चित्रण हर किताब की पहचान है। एक सिग्नेचर स्टाइल या हस्ताक्षर कह सकते हैं इसे।
अलका सरावगी के उपन्यास अपनी ऐतिहासिकता, स्मृति और समाज की पेचीदगियों के लिए जाने जाते हैं। उनके प्रमुख पेचीदा किरदारों में ‘कलि-कथा वाया बाइपास’ के किशोर बाबू (जो अपनी विरासत और अपराधबोध के बीच जूझते हैं), ‘शेष कादंबरी’ की रूबी गुप्ता (जो सामाजिक रूढ़ियों और स्वयं को खोजने के द्वंद्व में फँसी है), और ‘कुलभूषण का नाम दर्ज कीजिए’ के कुलभूषण (जो अपनी पहचान स्थापित करने की जद्दोजहद करते हैं) मुख्य हैं। इसी कड़ी में जुड़ रहे हैं सुनील बोस बाबू उर्फ़ मोहम्मद दानियाल। आइडेंटिटी क्राइसिस का ट्रीटमेंट लेखक की लेखनी का मज़बूत पक्ष रहा है और इस बार और बेहतर होकर उभरा है।
प्यार करना और फिर भुगतना, अपने प्यारों की दूरी को बर्दाश्त करना—जैसे विष को थोड़ा-थोड़ा रोज़ पीना। ऐसे अनुभवों की व्याख्या से रचा यह उपन्यास अपने पहले पन्ने से ही धर्म और समाज में निहित संकीर्णता को उजागर करता प्रतीत होता है। यहाँ टुकड़ों में समस्याओं की विविधता से मिलवाता चलता है यह उपन्यास—शादीशुदा ज़िंदगी की दरिंदगी हो, विधवा के अंतर्मन का प्रलाप हो, या फिर युवा मन का असमंजस और चोटिल गुहार, सबकुछ तटस्थता से रचा गया है। एक-एक पंक्ति कसी हुई- जैसे अतिरिक्त का साँस घुट जाए। एक-एक पंक्ति का असर पुरज़ोर। अकूत अकेलेपन की अबोली टिक-टिक, समय का धप्पा—सब कुछ अपनी जगह है, न आगे, न पीछे।
एक हार्ड-कोर कम्युनिस्ट का कट्टर धर्मी में रातों-रात बदल जाना भी समाज और समय का एक चेहरा ही तो है। एक पाठक के तौर पर मन नहीं मानता, फिर भी अंततः वास्तविकता से सामना करना होता है। सुनील के पिता का यह बदलाव खटकता है, पर बतौर कहानीकार इस बात को मैं अच्छी तरह समझता हूँ कि कई बार किरदार लेखक के नियंत्रण से बाहर चला जाता है। वह अपने मन का करता है और अपनी सीमाएँ भी स्वयं निर्धारित करता है।
जीवन में कुछ सवाल सबके पास होते हैं, जो नश्तर बनकर चुभते हैं, बेचैन करते हैं, न पूछ पाने की उबकाई लिए जेहन में पैबस्त रहते हैं, पर ताउम्र पूछ नहीं पाते। ऐसा ही सवाल सुनील के पास है- अपने पिता को लेकर। लेखक उसके संशय का उद्गार रह-रहकर चित्रित करता रहता है।
उपन्यास की ऐसी कसी बुनावट इसका सबल पक्ष है। आप ऐसे सवालों से गुजरते हुए समझ पाते हैं कि नई दरारें पुरानी दरारों को और गहरी कैसे बनाती रहती हैं।
इस उपन्यास का एक कहानीनुमा अंश पहले पढ़ा था और फिर जब लेखिका से बात हुई तो पता चला कि इस कहानी का विस्तार एक नए उपन्यास के रूप में होने वाला है। उस समय, सच कहूँ तो, मेरे गले यह बात नहीं उतरी थी कि इसे उपन्यास की शक्ल कैसे दी जाएगी, पर आज जिस किताब से गुजर रहा हूँ, वह लेखनी का जादू है। एक लेखक की शानदार काबिलियत भी—कि इतना विशाल उपन्यास-रूपी बटवृक्ष उस नन्हे पौधे से उगाना सचमुच जादू ही है। देखते-देखते लेखक प्रकृति-सा बन जाता है—हर बार नए सृजन के साथ।
किसी का मरना किसी से मिलने का सबब हो सकता है। चूजों का जाना और दीबा का आना—शायद ऐसी ही घटना है, जहाँ से इस उपन्यास की नई दिशा तय होती है।
“माँ धरती की तरह धीरज रखती”—कितनी सघन, सार्थक पंक्ति है। तो क्या धीरज का रोग इतने चरम पर पहुँच गया कि मृत्यु की लपट में भी धीरज ने उन्हें टस से मस नहीं होने दिया? हाय रे धीरज! सुनील बोस की माँ की मृत्यु के समय हवा में जलने की बास का असर आपके साथ भी बहुत देर तक बना रहता है। दिल के किसी कोने के चटक जाने की आवाज़ देर तक सुनाई देती रहती है।
अलका सरावगी अपनी हर किताब में कोलकाता के पुराने रूप को नई दृष्टि से दिखाती हैं। इस किताब में कोलकाता का मिनी लखनऊ—‘मटियाबुर्ज’—का इतिहास दर्ज है और नवाब वाजिद अली शाह का उस जगह से क्या जुड़ाव रहा है, वह भी। उपन्यास के नेपथ्य में दबे पाँव इतिहास दस्तक देता रहता है—मयूरभंज की बात हो या मटियाबुर्ज की, सबकी अपनी कहानी है। गार्डन रीच रोड और कोलकाता की कई सड़कों के नाम बदलने का ज़िक्र, ब्रिटिश पापा टी स्टॉल—सब कुछ इसमें दर्ज है।
जैसे कुलभूषण के पास हर ग़म को भुलाने का बटन था, यहाँ सुनील के पास गाने हैं—हर गंभीर पल को धुएँ में बदल देने वाले गाने। यहाँ तक कि माँ की मृत्यु की हृदय-विदारक खबर का असर कम करने के लिए भी फ़िल्मी गाना उसकी मदद करता है।
रचनाकार की असली शक्ति उसकी दृष्टा बने रहने में है। यहाँ लेखक का ऑब्ज़र्वेशन एक अलग ही स्तर का दिखाई देता है। मसलन, एक जगह लिखा है कि मालिश करने वाला उसके लिए अदृश्य-सा प्रतीत होता है। ऐसी बारीक बातें एक सजग दृष्टा ही पकड़ सकता है। एक जगह लिखा है कि मालिश या फिजियो करते समय वह खुद दीबा हो जाता है—उसके हाथ दीबा के हो जाते हैं। ऐसा सोचना कितना रूमानी प्रतीत होता है। अलका सरावगी का भाषायी जादू रोज़मर्रा की उन चीज़ों को महसूस करा देता है, जिन्हें हम करते तो हैं, पर महसूस नहीं करते।
अंतरधार्मिक प्रेम और विवाह जैसे जटिल विषय को बहुत सावधानी और संवेदनशीलता के साथ रचा गया है। दीबा और सुनील के रिश्तों की बारीकियाँ, द्वंद्व और संशय—सभी को संतुलित तवज्जो दी गई है। धोखे का साया दीबा की माँ के मन-मस्तिष्क पर छाया रहता है। धर्म की अभेद्य दीवार की क्रूर सच्चाई को यहाँ टंकित किया गया है।
“आजकल जब भी ज़ोमैटो-स्विगी से खाना मंगवाते हैं, डिलीवरी बॉय नब्बे प्रतिशत मुस्लिम लड़के होते हैं।”
ऑब्ज़र्वेशन यूँ दर्ज हैं इस किताब में। इसी के साथ धर्म के असली माने और उसके बिगाड़—दोनों को दर्शाया गया है। शबे-बारात में पटाखे बजाने की प्रचलित नासमझी को भी अंकित किया गया है। मुस्लिम धर्म में त्योहारों के माने और उन्हें निभाने के तरीकों को भी बहुत संवेदनशीलता से कहानी में पिरोया गया है। ‘रहम’ रखना, रात को गुलगुले बनाना और फिर सबमें बाँटना—जैसी बातें उस धर्म के मानवीय पक्ष का दर्शन कराती हैं।
स्त्री किरदारों के मन, मस्तिष्क और सोच की बारीक पड़ताल दर्ज है किताब में। कहीं-कहीं बहुत साहस के साथ लिखी पंक्तियाँ हैं। मन का विद्रोह देह के विद्रोह तक जाता दिखता है। प्रेम समय के साथ खट्टा होता है या मीठा—यह प्रश्न अब भी अनसुलझा है, जिसे सुलझाने की कोशिश इस उपन्यास में की गई है। व्यक्तित्व का यूँ उलट जाना और दरारों का उभरना खटकता है, पर कारण समझने के लिए पाठक को पन्ने पलटते रहना पड़ता है।
कपड़ों, दाढ़ी और मूँछों का असर व्यक्ति पर क्या पड़ता है—इसकी भी पड़ताल मिलती है। बोस जब इंदौर में होता है, तो उसके ख़यालात खुले होते हैं। वह नमाज़ नहीं पढ़ता, पर जैसे ही कोलकाता आता है, पाँचों जुमे की नमाज़ पढ़ने लगता है। हाल और हुलिया दोनों बदल जाते हैं।
शंका और ख़याल के बीच डोलती इस कॉस्मोपॉलिटन सोसाइटी की कहानी हर अध्याय के बाद नया मोड़ लेती है। जीवन अपनी जटिलताओं में उलझे धागों-सा प्रतीत होता है। उपन्यास आगे बढ़ते हुए किरदारों के प्रति अपनी प्राथमिकता बदलता रहता है। सुनील बोस और दीबा की कहानी में कभी नीलोफर, कभी रेहान, तो कभी अब्बा का रूहानी मिजाज उभरता है। पर अंततः उपन्यास का केंद्र सुनील और दीबा ही रहते हैं।
कटाक्ष का स्वर मद्धम है, पर चोट करता है। मसलन, रेहान का यह कथन—
“सरकार बेरोज़गार लड़कों के लिए भी कोई योजना क्यों नहीं चलाती?”
इसमें युवा वर्ग के एक खास तबके का दर्द छिपा है।
पढ़ते-पढ़ते कुछ पंक्तियों पर नज़र ठहर जाती है—
“कभी रो पड़ना ज़रूरी होता है। पता चलता है कि हम पत्थर के बुत नहीं बन गए।”
उपन्यास में महिलाओं और लड़कियों के लिए चलाई गई सरकारी योजनाओं का उल्लेख भी आता है।
पढ़ते हुए कई प्रश्न भी मन में उठते रहते हैं।
वापस आकर केयरटेकर की नौकरी में फिर से बोस बाबू बनना और घर में दानियाल बने रहना कितना कठिन रहा होगा।
मन एक जगह खटका भी—कि साला और सालियाँ सुनील भाई क्यों कहेंगे, दानियाल भाई क्यों नहीं?
अगर उसके हाथ में फिजियो का हुनर है, तो कोलकाता में वही काम क्यों नहीं कर पाया? इस बिंदु पर थोड़े और विस्तार की आवश्यकता महसूस होती है। जब थाने वाला इतने प्यार से समझा रहा था, तब भी उसने क्यों इनकार किया? उसे पुलिस वाले से डर क्यों लग रहा था? फिर लगा भीतर का भारी संशय, सुविधा की प्राथमिकता और भीतर का चोर मन—जैसे कई कारण हो सकते हैं इसके पीछे। अच्छे उपन्यास की यह भी विशेषता है कि वह आपको सोचने पर मजबूर करे और प्रश्नों के बुलबुले फूटते रहें पढ़ते हुए। यह उपन्यास आपको अजय मल्लिक जैसे किरदार से रूबरू कराता है, जो आपको सब कुछ नए सिरे से सोचने पर विवश कर देता है।
अंत में, अगर यह सोचूँ कि इस उपन्यास को पढ़ने से हमें क्या मिला, तो लगता है—
कोलकाता को बेहतर समझने का अवसर, मुस्लिम समाज के अंतर्विरोधों को जानने का अवसर, एक कालखंड को फिर से जीने का अवसर, स्त्री मन, स्त्री पीड़ा और संघर्ष की अनेक झलकियाँ; कॉस्मोपॉलिटन समाज का बदलता स्वरूप; नौकरी और अवसरों की विविधता; सरकारी योजनाओं की जानकारी; पुरुष मन का भटकाव और बदलती प्राथमिकताएँ; कम्युनिस्ट और कट्टरपंथी—दोनों के गुण-दोष;
और इसके साथ व्यक्तित्व में आते बदलाव की झलक।
ढेर सारी ऐसी बातें इस उपन्यास में निहित हैं, जहाँ भाषा की कसावट लेखन की परिपक्वता को दर्शाती है। पहले डेढ़ सौ पन्नों तक एक-एक पंक्ति बिना किसी अतिरिक्तता के मिलती है। कहीं कोई विषयांतर नहीं—केंद्रीय थीम को पकड़कर पूरी किताब लिखी गई है।
अंत में, एक पठनीय उपन्यास लिखने के लिए अलका सरावगी को ढेर सारी बधाइयाँ।

