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  • आकृति विज्ञा ‘अर्पण’ की पाँच कविताएँ

    वनस्पतिशास्त्र में शोध कर रही आकृति विज्ञा ‘अर्पण’ की इन कविताओं में प्रकृति है, खेत-खलिहान हैं, ऋतु परिवर्तन है। बहुत स्वाभाविक कविताएँ हैं। आप भी पढ़ सकते हैं- मॉडरेटर 

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    1.आयतन

     

    खेतिहर के बच्चे को सिखाया गया
    आ से आम
    उसने पाया आ से आत्महत्या

    फौजी की बेटी जिसे पढ़ाया गया
    य से यज्ञ
    उसके हिस्से आया
    य से युद्ध

    बुनकर के बच्चे जिन्हें पता था त से तकली
    जीना पड़ा त से तकलीफ़

    पनिहारन की पतोहू जिसे बताया गया
    न से नल
    लेकिन झेलती रही न से नकारा जाना

    हिन्दी वर्णमाला के ये मात्र ये चार अक्षर
    आ य त न
    जो बस एक बार में बता रहे हैं
    घट रहा है मानवता का आयतन

    अभी तो बाक़ी हैं पूरे चौआइलस अक्षर
    जिसमें शामिल है चौआइल लाख‌ से अधिक पक्ष

    कभी फुर्सत मिले तो दिल खोलकर टटोलना
    हरिजन, बाभन, मियां, हिंदू,फौजी, मर्द, मेहरारू सबका करेजा

    बस वादा करना कि म से मैला न से नहीं हो तुम्हारा अपना मन

     

    2.चैत का गीत

     

    कट गये पेड़ मधुबन के
    कहाँ ढूंढूँ छइयाँ
    पूछें सब कोयल मोरे मन के
    जाऊँ किस ठइयाँ

    अशोक के पेड़ कटे
    फूल नहीं आयेंगे
    मोजर आम के अब
    चैती न सुनायेंगे

    महुये के कोच चुपाये
    कहाँ पात सहजन के

    कहाँ ढूंढूँ छइयाँ बताओ
    कटे पेड़ मधुबन के

    खेत बिके सब
    पटी है पोखरिया
    घर के मरम को
    मारे बजरिया

    पेट पर लात जमी है
    खेतिहर जन के

    कहाँ ढूंढूँ छइयाँ बताओ
    कटे पेड़ मधुबन के

    भाव पर भाव बढ़े
    बढ़े न कमाई
    अन्न ना पेट में
    तिउहार हरजाई

    लूट लिये एक विपदा ने
    रोयें बदन के

    कहाँ ढूंढूँ छइयाँ बताओ
    कटे पेड़ मधुबन के

     

    3.मैं सेमर का फूल बनूंगी

     

    मैं सेमर का फूल बनूंगी
    किसी देवता के दर पर
    नहीं चढ़ाई जाऊंगी…

    ना दुल्हन के जूड़े में,
    न दूल्हें के सेहरे में
    न नवयुगलों की बनूं निशानी
    न गीतों में गायी जाऊंगी…

    मैं अनभिज्ञा जग की नज़रों से
    नाप सकूं रफ्तार सड़क की
    बूढ़े श्रमिकों के एंड़ी की
    फटहन मैं सहलाऊंगी
    इससे अच्छा क्या होगा?…

    ना समय किसी का मेरे हिस्से
    ना चाहेगा कोई गंध मेरी
    जग से हारी एक वियोगिन
    देख मुझे मुसकायेगी
    इससे अच्छा क्या होगा…

    इक बच्चा अनजाना
    गंध रीति का भान न हो
    न चिंता होगी मर्यादा की
    पद जैसा अभिमान न हो
    खेलेगा वो मेरे संग
    इससे अच्छा क्या होगा…

    फागुन के आने से पहले
    पथ दमक रहें हो लाली से
    लज्जा से उपर उठना है
    कहें स्वयंभू काली से
    बन निष्काम सुंदरी झर जाऊं
    इससे अच्छा क्या होगा…

    मैं सेमर का फूल बनूंगी…
    किसी देवता के दर पर
    नहीं चढ़ाई जाऊंगी…

     

    4.इसलिये मैं गा रही हूँ

     

    पुरखिनों से लोक पाया
    गीत रचती जा रही हूँ
    इसलिये मैं गा रही हूँ।

    श्लोक झरते नीम से
    देवता पीपर बसे
    आते हैं पुरखे हमारे
    हर बरस बरगद तले

    खेत आजा ने खरीदे
    अन्न अब तक खा रही हूँ
    इसलिये मैं गा रही हूँ।

    एक कहँरवा ज्यों उठा कि
    राग धोबी झूमता
    बज नगाड़ा रोपनी का
    धान सूरज चूमता

    इक अषाढ़ी चंद्रमा से
    माँग कजरी ला रही हूँ
    इसलिये मैं गा रही हूँ।

    चैत से फागुन तलक हैं
    धुन ये बारहमासिये
    दिल का है ये ही ठिकाना
    जानते हैं डाकिये

    पत्र गंगा के सहारे
    राप्ती भिजवा रही हूँ
    इसलिये मैं गा रही हूँ।

     

    5.टींस
    ………..

    पेड़ जिसके परान में
    बसती है कजरी
    आँखों से झाँकता है उलारा
    पेड़ों से पानी पाता बारहमासा
    इन्ही के कंधे चढ़कर आता पुरूआ

    तुम कहते हो
    कटा है पेड़
    मैं कहती हूँ
    मर गया एक पुरखा

    नदी जिससे उपजी सभ्यताएँ
    धरती को देती है धारिता
    ललमुनिया को पिलाती है पानी

    तुम कहते हो
    पाटी गयी नदी
    मैं कहती हूँ
    अफना रही है मेरी दादी

    खेत जो उगलते हैं सोना
    जिनके मेड़ों पर उगे चानी
    जहाँ दर्ज है
    मेरी दादी की कहानी
    दादा की जवानी

    तुम कहते हो
    बिक रहा है खेत
    मैं कहती हूँ
    छिटक रहा है
    मेरे दादा का परान

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