आज पढ़िए कवि-लेखक अर्पण कुमार का यह लेख जो मनोहर श्याम जोशी के उपन्यास ‘कसप’ की नायिका बेबी उर्फ़ मैत्रेयी शास्त्री उर्फ़ मैत्रेयी मिश्रा को लेकर है। 30 मार्च को मनोहर श्याम जोशी की पुण्यतिथि थी। उसी अवसर पर यह लेख पढ़िए- मॉडरेटर
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बेबी उर्फ़ मैत्रेयी शास्त्री उर्फ़ मैत्रेयी मिश्र के बहाने कुछ बातें…
(‘ज़िंदगी भर सूतक मनाने के लिए पैदा नहीं’ होतीं बेबी जैसी लड़कियाँ)
अर्पण कुमार
1982 में एक उपन्यास आता है। कसप । मनोहर श्याम जोशी विरचित। देखते-देखते उसकी धूम मच जाती है। उसके ठीक पूर्व कुरु-कुरु स्वाहा… जैसा उनका असाधारण, बेहद प्रयोगशील और जटिल फ़ॉर्म वाला उपन्यास 1980 में प्रकाशित हुआ रहता है। इन दोनों उपन्यासों को एक लेखक के साथ जब हम जोड़कर रखते हैं, तब सहसा किसी शब्दशिल्पी की सत्ता पर हमें नाज़ हो उठता है। इतनी सारी पेचीदगियों को सँभालते हुए चलना सचमुच कितना मुश्किल भरा रहा होगा। जिन जगहों और कार्यों से लेखक का वास्ता रहता है, उन अनुभवों से चिर-परिचित होते हुए भी उन्हें गल्प में दर्ज़ करते जाना आसान नहीं होता। यह बात उन कृतियों पर समान रूप से (कई बार कुछ विशेष ढंग से भी) लागू है, जो हमें आसान नज़र आती हैं। हर कृति के आरंभ और पूरा होने की अपनी कथा होती है, जिसमें पाठक का कौतुक भरा प्रवेश होता है। पाठक टेक्स्ट और उसके रचयिता दोनों को पढ़ता है। लेखक कोई हो और कहीं का हो, पहले तो वह एक इंसान ही होता है। उसके साथ भी वे सभी दुनियावी व्यवहार घटित होते हैं, जिनसे वह ख़ुश तो कभी दुःखी होता है। मनोहर श्याम जोशी कसप की रचना के पीछे उस तत्काल को पकड़ने की कोशिश करते हुए इसके बारे में स्वयं बताते हैं,‘कसप मैंने घोर निराशा, गहन उदासी और मोहभंग की मनःस्थिति में लिखा।’ [1]
आगे-पीछे लिखे गए अपने इन दो उपन्यासों (कुरु-कुरु स्वाहा और कसप) के हासिल पर उपन्यासकार बताता है, ‘जिस तरह मैंने ‘कुरु-कुरु स्वाहा…’ लिखकर मनोहर श्याम जोशी से अपना हिसाब चुकता कर दिया था, वैसे ही ‘कसप’ लिखकर अपने ब्राह्मण पूर्वजों से कर दिया है।’ [2]
अपनी जड़ों और अपने पूर्ववर्तियों से उनका जुड़ाव काफ़ी गहरा है। बोलियाँ, जातियाँ, रीति-रिवाज, अंधविश्वास, आधुनिकता, उत्तर-आधुनिकता इन सब का अर्क हमें उनके लेखन में मिलता है। समाज से समायोजन के हर व्यक्ति के अपने तरीक़े होते हैं। उसके भीतर विकसित होते उसके अपने आग्रह और आशंकाएँ होती हैं। कई बार वे अंशों में लेखक के गढ़े पात्रों में दिखाई पड़ती हैं। जोशी के यहाँ जो पात्र विद्रोही हैं, वे कुछ अटपटे ढंग से पारंपरिक भी हैं। अजीबोगरीब स्थितियों का चक्रव्यूह जोशी का लेखक रचता है। उनके पात्र उसमें से निकल पाते हैं तो कई उसके भीतर उलझकर रह जाते हैं। जोशी स्वयं को पालतू बोहेमियन[3] कहते रहे हैं, जिसके अपने गहरे निहितार्थ हैं।
यथार्थजन्य परिवेश के बीच से उठाए गए चरित्र किसी गल्प में आकर अपना स्वतंत्र अस्तित्व बना लेते हैं। उन्हें रचते हुए लेखक का यथास्थितिवाद से विद्रोह और उससे असंतोष उसमें आकर पैठ जाता है। लेखक की अपनी कल्पनाशील दृष्टि उन चरित्रों को सजाती-सँवारती है। गो, कई बार लेखक को चौंकाते हुए अपने रचाव को लेकर वे पात्र उसे कुछ-कुछ निर्देशित भी करने लगते हैं। भदेसता में चमकीलापन तभी आता है। लेखक भी अपने पात्रों के साथ गलबहियाँ करता हुआ कई साहसिक और अपारंपरिक प्रयोगों के अभ्यारण्य में विचरता है। अपनी पुस्तक उपन्यास का काव्य-शास्त्र में बच्चन सिंह लिखते हैं, ‘वास्तविक जीवन में हमारा परिप्रेक्ष्य अत्यधिक बनावटी और सीमाबद्ध होता है। अपनी कायरता में हम एक घिसी-पिटी ज़िंदगी को ओढ़ लेते हैं और दूसरों को भी उसी से ढक लेना चाहते हैं। वास्तविक ज़िंदगी में हमारे लिए कोई बोर होता है और कोई घिसा-पिटा, कोई क्लाउन होता है, कोई निष्प्राण। पर उपन्यास में अपनी जटिलता के कारण वे दिलचस्प हो जाते हैं। वास्तविक जीवन की सपाटता उनमें नहीं रहती। वे बोर होकर बोरियत को तोड़ते हैं। राग दरबारी, कसप और एक पति के नोट्स में ऐसे चरित्रों की कमी नहीं है। वे अपना परिप्रेक्ष्य बनाते हैं और पाठकों के लिए ज़रूरी हो जाता है कि वे अंतर्निहित अर्थ को समझें, अँग्रेज़ी की शब्दावली में ‘विटविन दी लाइन’ पढ़ें।’
ऐसा नहीं कि हम सब अपने-अपने परिवेशों में इन जटिलताओं को नहीं समझते, इन्हें नहीं जीते, मगर उन तमाम पेच-ओ-ख़म को कई-कई और चक्कर देते हुए किसी कृति-विशेष में समाहित करना और उन्हें अंत-अंत तक ठीक-ठाक सँभाल ले जाना- सबके वश की बात नहीं। जोशी के जज़्बे को सलाम। कसप एक ऐसी कृति है जिसपर चर्चा कभी भी की जा सकती है। और हर बार कुछ नवीन कोणों के साथ। उसके पात्र कभी पुराने नहीं हो सकते। अपने रचाव में वे इतने सरल और जटिल एक साथ हैं कि उनपर मुकम्मल चर्चा किसी एक बैठक/आलेख में नहीं की जा सकती।
चरित्रों को विकसित करने, दृश्यों को रचने और घटनाओं में कई नाटकीय मोड़ देने में अभ्यस्त मनोहर श्याम जोशी यहाँ भी एक ऐसा ही जीवंत चरित्र रचते हैं। वह है बेबी। वह हमें झकझोर कर रख देती है। इस उपन्यास में कई घटनाएँ घटती हैं। कई पात्र हैं, मगर, इस आलेख में हमें विशेषकर बेबी की बात करनी है। हम पाते हैं कि उसका अंदाज़ खिलंदड़ा है, मगर उसमें इकहरापन नहीं है। वह जीवन को, उसके उतार-चढ़ाव को अपने तरीके से अपनी साँसो में भरती है। मगर, उसपर आगे और चर्चा करने से पूर्व मुए ‘मारगाँठ’ की कुछ चर्चा तो कर ली जाए, जहाँ से यह कथा आरंभ होती है और जिसपर आकर विराम भी लेती है। मारगाँठ जिसका शाब्दिक अर्थ है- दोहरी गाँठ। किसी नाड़े-फीते को बाँधते हुए हममें से कइयों से अक्सरहाँ ऐसी दोहरी गाँठ लग जाया करती है। बचपन की करतूत, शहतूत की तरह मीठी होती है। वह आगे किशोरावस्था/युवावस्था में भी जारी रहती है। कइयों के मामलों में वह वृद्धावस्था में पुनः-पुनः लौट आती है। यह मारगाँठ कथा की गाँठ भी बाँधती है। शुरुआत में नायक-नायिका को परस्पर मिलाती है और कथा-समाप्ति के वक़्त अरसे बाद मिले इन दोनों के बीच भी तो उपस्थित रहती है।
कसप उपन्यास, अपने लेखक की उपस्थिति से कुछ विशेष प्रभावी हो उठता है। बीच-बीच में उसके कमेंट्स पाठकों को पूरी पृष्ठभूमि से अवगत कराते और गुदगुदाते चलते हैं। लोकेल और टाइम दोनों से। ह्यूमर से भरे लेखक के नोट्स पाठकों को हल्का करते चलते हैं, वहीं नीम-दर्शन सी उसकी बातों से उन्हें दिमाग़ी ख़ुराक भी मिलती है। बीच-बीच में अँगोछे से अपनी तो कभी अपने पात्रों की देह-मन को जैसे पोंछता हुआ-सा अगर वह उपस्थित न होता तो शायद यह कृति उस तरह से अपनी जगह नहीं बना पाती, जैसी आज इसकी है। प्रेम को लेकर जो व्याख्याएँ यहाँ जिस चुटीली भाषा में और जिज्ञासा भरे मन से हुई हैं, उसमें चुहल-गांभीर्य के अनुपात कुछ ऐसे हैं कि इतने वर्षों बाद भी इस कृति के भीतर जैसे कोई सदाबहार ताज़गी बनी हुई है, जो ऋतुओं से अप्रभावित है। वैसे ही जैसे राँदे वू –संकेत-स्थल[4] (नैनीताल के उस बँगले का नाम, जहाँ एक शादी-समारोह में आए हुए नायक-नायिका की एक-दूसरे से पहली भेंट होती है) पर दिखी बेबी के सौंदर्य में डी.डी. (देवीदत्त तिवारी) को एक विशेष लावण्य दिखता है और वह उसे जीन-सिम्मंस लगती है।
बेबी जैसे करिश्माई क़िरदार पर कुछ लिखते हुए जाने कितने कोण सामने आने लगते हैं! पाँच भाइयों के बीच पली-बढ़ी इकलौती बहन बेबी के भीतर की जमी जड़ें भी तो कोई कम गहरी नहीं! वह एक बहुस्तरीय चरित्र है। अपने जिस परिवार-परिवेश के बीच सुरक्षित और लगभग भारमुक्त रहती हुई वह अपने अल्हड़-खिलंदड़ेपन को सींचती रही है, उनके स्नेह-पुंज से ऊर्जा लेती रही है, ज़रूरत पड़ने पर उन सभी से वह लोहा लेने को भी तत्पर हो जाती है। डी.डी. के साथ घटित हुआ उसका प्रेम-संबंध, इस कथा के रचाव का सबब तो बनता है, मगर जिस भावुकता और दृढ़ता के साथ बेबी अपने प्रेम के प्रति आग्रहशील और आस्थावान रहती है, उसके स्वभाव के वे सभी फब-ढब उन्हीं पारंपरिक स्रोतों से आए हुए हैं, जहाँ एक लड़की, परिवार ही नहीं, पूरे कुनबे की इज़्ज़त होती है और जहाँ चौकसी भरी कई-कई दृष्टियाँ एक साथ उसपर तैनात होती हैं। जहाँ पूरा शहर पूरे शहर को देखता है, जहाँ निजता कभी कोई मुद्दा ही नहीं ठहरी। उस पारंपरिक समाज में भी प्रेम होते रहे हैं। सफल-असफल दोनों। प्रेम को लेकर हिंसा और हत्याएँ होती रही हैं। कसप की बात करें तो बेबी का भाई, उसके प्रेमी डी.डी. को बुरी तरह पिटता है, मगर कभी प्रेम में स्वयं असफल रहे बेबी के पिता, उसके प्रेम को लेकर कमोबेश आर्द्रता का भाव भी रखते हैं। जिस काल (सन् 1954) में यह कथा आरंभ होती है (जब देश में प्रथम पंचवर्षीय योजना चल रही थी), काल-सापेक्ष बात करें तो बेबी ऐसी कोई अल्पवयस्का नहीं मानी जाएगी। वह सत्रहवें और इंटर के प्रथम वर्ष में है। मगर, बिना दाँतों की बछड़ी की तरह वह कुछ ऐसी मनमौजी है, जो खेल-खेल में अपना दिल तो हारती ही है, अपने प्रेम-पत्रों को अपने पिता से पढ़वाती भी है। भला ऐसी कितनी लड़कियाँ होंगी जो अपने लिए आए प्रेम-पत्रों का वाचन अपने पिता से कराती हों! और शास्त्री जी, अपने प्रेम में कभी विफल रहे शास्त्री जी उस युवक को अपनी पुत्री के लिए यथोचित वर न मानते हुए भी उसकी भाषा से प्रभावित होते हैं। उसमें जहाँ-तहाँ कुछ सुधार करने के गुरु-दायित्व की इच्छा भी पाल लेते हैं। अपने चार पुत्रों में से किसी की भी भाषा और साहित्य के प्रति रुचि न होने का अफ़सोस संस्कृत के प्रोफ़ेसर का दिल कभी-कभी दरका देता है। ऐसे मौक़ों पर ख़ासकर। अस्तु, अपनी पुत्री की अभिलाषा से अधिक महत्त्व वे उसकी आर्थिक सुरक्षा को देते हैं। पिता की पुत्री पर लौटते हैं, जो फ़िलवक़्त हमारा अभीष्ट है। बेबी, हाँ, बेबी ही तो। बेबी, जो कुछ भी कर सकती है। वह अपनी शादी के लिए प्रस्तावित वरों का मज़ाक उड़ा सकती है। किसी खाँचाबद्धता को अस्वीकारते हुए हर तरह का खेल खेलती है। शारीरिक और मानसिक दोनों। क्रिकेट खेलते हुए कभी अपने बाएँ हाथ की छोटी अँगुली तुड़वा ली थी तो प्रेम करते हुए वह शरीर के बाएँ हिस्से में धडकता-तड़पता अपना नन्हा दिल भी अंततः तुड़वा लेती है। हर तरह के निषेध और निर्देश को उसकी अल्हड़ता उपहास में तब्दील कर दिया करती थी। मगर, यह भी सच है कि प्रेमरत बेबी, अपनी अल्पज्ञता को लेकर कोई कुंठा नहीं पालती थी, मगर वह जैसे ही उस प्रेम से बाहर आती है, और वह भी बुरी तरह टूटकर, तो जो पहला काम करती है, अपनी सहज-व्यावहारिक मेधा से ,वह यह कि अपने आपको शैक्षणिक स्तर पर मज़बूत करती चली जाती है। वह अपने पिता शास्त्री जी को अपना गुरु बनाती है। और डी.डी. से यूँ अलग होकर वह नए कलेवर के साथ हमारे सामने आती है। विजयमोहन सिंह लिखते हैं, ‘ ‘सफलता’ अगर डी.डी. के लिए ‘रिव्हेंज’ है तो ‘शिक्षा’ बेबी के लिए।’[5]
बेबी के भीतर आते गए बदलावों का वर्णन उपन्यासकार इन शब्दों में करता है, ‘…वह जो एक अल्हड़-सी, अनपढ़-सी, ठेठ अल्मोड़िया-सी बेबी थी, बहुत तेज़ी से तेजी से एक परिष्कृत युवती मैत्रेयी में बदल गई, जिसके रहन-सहन में, बोलने-चालने में, पहनने-ओढ़ने और सजने- सँवरने में आभिजात्य के दर्शन हुए। यह नहीं कि वह कुछ अलग-ऊँची-सी, रूखी-सी बन गई। नितांत सरस बनी रही वह, हँसी-मज़ाक में सबसे आगे। इतना ही कि उस हास-परिहास में भी अब एक प्रकार की प्रौढ़ता आ गई। हर मंच पर उसका अनौपचारिक आभिजात्य, उसका वाग्वैदग्ध्य और जीन सिम्मंस-रूप एक दुनिर्वार आकर्षण पैदा करने लगा उसके प्रति।’ [6]
निश्चय ही, कसप की कभी भुलाई न जा सकनेवाली किरदार है बेबी। सोचता हूँ, यह जो बेबी है, भला किस मिट्टी की बनी हुई है! कहाँ से लाती है इतना प्रेम, साहस और दुःसाहस! धर्य और सहनशीलता भी। साहित्यिक और मूडी क़िस्म के इंसान डी.डी. से उसे प्यार हो जाता है। मुंबई जाने के कुछ समय बाद ही से डी.डी. ‘यौवन भार मंथरा’[7] गुलनार के संपर्क में है मगर क्या वह बेबी को भूल पाता है! लेखक, बेबी के बरअक्स गुलनार को खड़ा तो नहीं करता! जो भी हो, जब बेबी अपने पर आती है तो क्या गुलनार और क्या अमेरिका – सबको धो डालती है। भाँति-भाँति के चरित्रों से यह उपन्यास भरा पड़ा है मगर इन सब पर बेबी ही तो भारी ठहरी! अगर कसप की कहानी को उदासी और मिठास के घोल से बनी बताई जाती है, तो इसमें उस प्रेम-कहानी की संवाहिका बेबी ही तो रही, बल! उसके सुख-दुख़ दोनों से मचलती-मितलाती।
बेबी, डी.डी. से बिना शर्त प्यार करती है। बराबरी के स्तर पर। वह उसके पढ़े-लिखे होने का सम्मान करती है और उसकी विचित्र-विचित्र आदतों पर जी भर हँसती है। ऐसे कई सचित्र दृश्यों से यह कथा हरी-भरी है। वह उसके साथ दोस्ती और छेड़छाड़ के तमाम रंगों से स्वयं सराबोर होती है और उसे भी करती है। वह उसकी होशियारी और मूर्खता दोनों से प्यार करती है। वह उसके साथ अभेद हो उठती है। मन-ही-मन उसपर अपना सर्वस्व लुटा देती है। उसकी नज़र में उसका प्रेमी सामान्य बल्कि कुछ ‘असामान्य क़िस्म का मूर्ख’[8] है। बेबी को अपनी यह धारणा तब और पुष्ट होती दिखती है जब डी.डी. दया से विवाह नहीं करने का निर्णय लेता है। उसे तब क्या मालूम था कि स्वयं उसके प्रेम को भी विवाह तक पहुँचाने के अवसर पर डी.डी. कुछ और मोहलत माँग लेगा! और उस मोहलत के चक्कर में बेबी का सारा उत्साह पानी-पानी हो जाएगा और राग-अनुरागों से गुनगुनाते उसके मन को एक तीव्र झटका लगेगा! मगर क्या कीजै कि उस बाले के जीवन में यह सब होना था। हुआ। शायर सलीम कौसर ऐसे ही मौक़ों के लिए लिख गए हैं शायद …
मोहलत न मिली ख़्वाब की ताबीर उठाते
हम मारे गए टूटे हुए तीर उठाते
इसका संकेत तो पूर्व में कथाकार ने भी तो दिया ही था। उपन्यास के आरंभ का वह अंश देखें, ‘नायक-नायिका में से कोई भी किसी पिछले प्रेम से आहत नहीं है। लेकिन आहत होंगे अब, ऐसी आशा की जा सकती है, क्योंकि एक उम्र होती है आहत होने की और वे उस उम्र में पहुँच चुके हैं। उस उम्र के बाद और उस चोट के बावजूद तमाम और ज़िंदगी होती है, इसलिए लेखक होते हैं, कहानियाँ होती हैं।’ [9]
नायिका के लिए प्रेम के मायने क्या हैं, इसे जानने-समझने के लिए उपन्यास के इस अंश को पढ़ते हैं, ’बेबी के लिए प्रेम दो अकेलेपनों के एक-दूसरे को सहेजने, सहलाने और असीसने का पीड़ास्पद और पीड़ाजनित क्रम नहीं है। प्रेम उसके लिए दो जनों की स्वास्थ्यप्रद क्रीड़ा है।’[10]
मगर वह जिस लाटे (डी.डी.) से प्रेम करती है, जिसके साथ घटती उल-जलूल बातों पर गुड़िया और अन्य के साथ मन भर मनों हँसी हँसती है, वह जानती है कि उसका वह लाटा उससे भिन्न राय रखता है। वह प्रेम को इस दृष्टि से नहीं देखता। मगर, वह हार नहीं मानती। निराश नहीं होती। वह तो उसके स्वभाव में ही नहीं ठहरा, बल। इसका काट वह कैसे निकालती है, इसे देखें, ‘…अगर डी.डी. आया तो वह कभी गर्वीली अलभ्य सम्राज्ञी बनकर उसी के बनाए सिंहासान पर विराजमान रहेगी और हथेली पर उसका विह्वल ‘जिलेंबू’ ग्रहण करेगी और कभी उसे धकियाकर और उसके बनाए सिंहासन को लतियाकर दौड़ भागेगी कि मैं कोई देवी, कोई सम्राज्ञी नहीं, कौतुक-कन्या हूँ मात्र, और जो तेरे भेजे में अक्ल और टाँगों में ताक़त हो तो दौड़कर मुझे पकड़ ले और दे गिरा घास पर। हाँफता हुआ झुक, मुझ हाँफती हुई पर।’[11]
बेबी की अँजुली ने बहुतेरे अनुभव बटोरे, मगर उसका बेशक़ीमती अनुभव हाथ आकर भी उसके जीवन का स्थायी हिस्सा नहीं बना। इस नकार से वह ऐसी टूटी कि वह काफ़ी हद तक बदल गई। डी.डी., बेबी के जीवन में प्रेम की बोहनी है, वहीं बेबी से मिलने से पूर्व डी.डी. प्रेम के तीन छोटे-छोटे प्रसंगों से गुज़र चुका है। ‘हलफ़िया बयान’ देते हुए उन तीन प्रसंगों की चर्चा हुई है, मगर, उन्हें ‘प्रेम ठहराने की ज़िद’[12] न करने की अपील भी की गई है। जीवन को, प्रेम को बेबी सहज भाव से लेती है। वह दिल से ज़्यादा और दिमाग़ से कम सोचती है। वह खिलंदड़ है, मगर, खिलंदड़े ढंग से कही उसकी बातों में कोई इकहरापन नहीं है। उपन्यास की शुरुआत में उसका चरित्र भीगे चने के अँकुराने जैसा है। स्निग्ध और भावपूर्ण। शिद्दत से किए गए उस प्रेम में असफल होने पर वही चरित्र चने के उस दाने सदृश दिखता है, जो पानी में रखे जाने के बावजूद अंकुरित होने से इंकार कर देता है। वह इतना कमज़ोर नहीं होती कि कोई उसे मसल दे। वह स्वयं को नए सिरे से तैयार करती है। डी.डी. उससे सगाई कर लेने और दो-तीन वर्षों में अमेरिका से आकर शादी कर लेने का प्रस्ताव देता है, मगर वह जैसे इस संकल्पना को ही पूरी तरह त्रुटिपूर्ण मानती है। उस अवसर पर हुए डी.डी. से हुए संवाद बेबी के बेहद तर्कशील और मज़बूत रूप से हमारा परिचय कराते हैं। वहाँ डी.डी. किसी उद्धव सरीखा बेबस दिखता है तो बेबी में स्वाभिमानी गोपियों का स्वर आ पैठता है।
पूरी कथा से दो-चार होइए। हमें बेबी के कई-कई रूप दिखाई पड़ते हैं। हर रूप उतना ही ख़ास और तेजोमय। चंद्रमा के अलग-अलग आकारों के साथ जैसे प्रतिस्पर्धा करता हुआ, जैसे कोई समायोजन बिठाता हुआ। उपन्यास की शुरुआत में जो बेबी है, उसकी अठखेलियाँ हैं, उपन्यास के उत्तरार्ध में वह मैत्रेयी मिश्र है। एक गृहस्थिन की भरी-पूरी संपदा, गरिमा और ठसक के साथ। उम्र अपना काम करती है। वरीयताएँ बदलती हैं। चिड़िया की बोली किसी और आँगन में गुँजायमान होती है। उसकी चहचहाहट में गांभीर्य आता है, यद्यपि उसके कंठ से मिठास कभी नहीं जाती। जिस बेबी को कुछ भी लिखने में बहुत आलस आता है[13], वही बेबी बाद में पढ़-लिखकर अपने कच्चेपन को आभिजात्यता में बदल लेती है। हिंदी या कहें भारतीय साहित्य के प्रसिद्ध प्रेम-उपन्यासों में अपनी विशेष जगह रखनेवाले उपन्यास कसप की बेबी के चरित्र में उतरोत्तर विकास और स्थैर्य दिखाई देता है। भावनात्मक और शैक्षणिक स्तर पर। उसके प्रेमी डी.डी. में भी विकास है, मगर, वहाँ भावों का उछाह और निश्छलता कम और महत्त्वाकांक्षाओं की फ़ुर्ती और व्यावहारिकता अधिक है।
बेबी के लिखे पत्रों में ऐसी कई बातें आती हैं, जिनमें बेबी का मिज़ाज खुलकर सामने आता है। अलग-अलग अवसरों पर डी.डी. को लिखे उसके पत्रों के कुछ वाक्यों के बीच बेबी की वाक्पटुता और चरित्रगत स्थिरता को समझा जा सकता है। उन ख़तों का मज़मून, उसके व्यक्तित्व को स्थापित करने में सहायक है। अपने एक पत्र में बेबी क्या ख़ूब लिखती है, ‘ज़िंदगी भर सूतक मनाने के लिए पैदा नहीं हो रही यह बेबी।‘ [14]
सचमुच बेबी जैसी लड़कियाँ शोक मनाने के लिए इस धरती पर नहीं आतीं। वे इस धरती की खट्टी-मीठी गंधों को अपने नथुनों में भरपूर भरती हैं और उन गंधों को लिए एक दिन मर जाती हैं। इनका मरना किसी को पसंद नहीं आता, मगर यह दुनिया तो आने-जाने की कोई स्थली ही ठहरी। बेबी और डी.डी. की प्रेम कहानी विवाह में परिणत नहीं होती, यह सच है। वे एक-दूजे से विलग हुए, सच है। इस फ़ानी दुनिया से भी वे एक दिन विलग होंगे, सच है। मगर, फ़िलहाल उपन्यास के कथानक में लौटते हैं, जहाँ वे अपना-अपना जीवन जी रहे हैं। बेबी विवाहित है और आई.ए.एस. श्यामसुंदर मिश्र की पत्नी है। उसका लाटा अब ‘कभी किसी और समय का लाटा’ बन चुका है। मगर जब लाटा है तो वैसी हरक़तो से वह बाज भला क्योंकर आए! वह मैत्रेयी की बेटी को अपनी और बेबी की प्रेम-कथा बतला देता है। वह इतना तो कर ही सकता है, ख़ासकर मनोहर कथाकार की कथा-दुनिया में आकर। और बेबी को भी भला इन बातों से कब कोई फ़र्क़ पड़ा। वह स्वयं एक विदुषी के रूप में अपनी जगह बना चुकी है। और हाँ, बावजूद इसके, मैत्रेयी को वह कभी भी घुड़क सकती है! वह बेबी जो है, चिर-खिलंदड़ी। मैत्रेयी मिश्रा उसका तन है जिसकी आत्मा में बेबी बसती है। ठीक वैसे ही जैसे पहले वह शरीर मैत्रेयी शास्त्री का था, जिसमें वह निवास करती थी। शास्त्री जी की मलेच्छ शिष्या द्वारा मैत्रेयी का बेबी रखा गया गया यह नाम, मैत्रेयी के बड़े भाई को भी तो ख़ूब पसंद आया था। बेबी के लिए मैत्रेयी एक अन्नमयकोश है। मैत्रेयी नाम के इन दो भिन्न चोलों में रहता हुआ बेबी का मन अपनी राह चलता है। पाठक उस राह पर चलते हुए उसे कभी इस ओर से तो कभी ओर से निहारते हैं। कनखियों से देखते और मुस्कुराते हैं। बेबी के चरित्र के भीतर उपन्यासकार जिस तरह से उतर पाया है, वह कमाल का उसका कौशल ठहरा। पाठक रह-रह कर उस मसिजीवी को भी तो याद करते हैं।
डी.डी. प्रतिभावान, विकासशील और मेहनती है मगर वह कोई मज़बूत और स्थिरचेता व्यक्तित्व नहीं है। उसमें तमाम कुंठाएँ और कमियाँ हैं, मगर उसे अकुंठ भाव से चाहती रही है बेबी। पूरे परिवार के साथ लड़-झगड़कर वह डी.डी. को स्वीकारती है और अंततः अपने परिजनों को मनाने में कामयाब होती है। वह अपने बचपने को बचपना नहीं समझती, उसे पूरे आत्मविश्वास से आगे बढ़ाती है। यह उस खिलंदड़ी के भीतर अपनी स्वाभाविकता को बख़ूबी समझने की एक बड़ी नेमत है। सबके बीच बेबी डी.डी. को अपना पति मानती है। मगर हाय री डी.डी. की उलझन, वह उस बाले की निश्छ्ल भावना को नहीं समझ पाता है। और फिर जिस धुन में में वह ‘डी.डी. द मूडी’[15] उसकी बात नहीं मानता है, उसकी वही धुन इस उपन्यास को कभी समाप्त न होनेवाली किसी कसक के साथ छोड़ जाती है। उसके चरित्र की कुछ गाँठें लेखक शुरू में ही बताता चलता है। बेबी की भी। बीच की इन घटनाओं में जैसे वे गाँठें एक-एक कर खुलती चली गई हैं।
किसी गल्प की भाषा ऐसी बाँध सकनेवाले कैसे संभव होती है, इसपर बहुत कुछ कहा जाता रहा है, मगर कंधे उचकाकर क्या जाने की तर्ज़ पर कसप भी तो कहा जा सकता है! सभी जानते हैं कि कसप अपेक्षाकृत काफ़ी कम समय में रचा गया उपन्यास है। कार्यालय की तत्कालीन राजनीति से उद्विग्न और उदासी की घोर मनोदशा में मनोहर श्याम जोशी इसे आरंभ करते हैं। वे स्वयं बताते हैं, ‘चालीस दिन मैं अपने को अपने संसार से लगभग काटकर अपने कथानायक डी.डी. से जोड़े रहा। लिखते समय मेरे वर्तमान संसार की आवाज़ तक मेरे कान में न पड़े, इस नीयत से वाकमैन पर योरोपीय इलेक्ट्रौनिक संगीतकार वान जेलिस की वह कृति बजाता रहा जो उस जमाने की बहुचर्चित फिल्म ‘चैरिएट्स ऑफ फायर’ में नेपथ्य संगीत के रूप में प्रयुक्त की गई थी।‘[16]
कसप के भाषाई उच्चावच और आँचलिकता से भरे उसके सौंदर्य को लेकर भी बहुत कुछ कहा जाता है। आलोचना-पुस्तक कथा समय में समाहित अपने आलेख धराशायी गू से गर्वोन्नत हिमशिखर तक में विजयमोहन सिंह लिखते हैं, ’कसप के ‘प्रेम’ की भाषा प्रेमियों की निजी और अपनी गढ़ी हुई न होकर ‘लोक जीवन’ या एक पूरे ‘जनपद’ की भाषा है, जो उस रूप में प्रेम का ‘एकांत’ या प्रेम के उपयुक्त ‘एकांत’ भी नहीं रहने देती। लेखक इसे ऐलानिया नायक-नायिका वाली प्रेम-कहानी कहता है, लेकिन ‘लोक-जीवन’ से जुड़ी भाषा, प्रेम के सामाजिक पक्ष को इतना प्रधान बना देती है कि केवल ‘नायक-नायिका’ या प्रकारांतर से केवल ‘प्रेम’ पर ध्यान केंद्रित रखना कठिन हो जाता है। इस तरह भाषा के स्तर पर ही नहीं, संबंधों के स्तर पर भी कसप प्रेम के पूर्ववर्ती उपन्यासों से सर्वथा भिन्न है।’
कथा की भाषा पर नहीं, कथा की नायिका बेबी पर जाते-जाते पुनः लौटते हैं। कुमाऊँनी हिंदी के लहज़े का सहारा लेते हुए कहें तो कहें कि- बहुत ही परिपक्व दिखती है बेबी, कहा। कुछ ऐसी कि डी.डी. भी मानने लगता है कि वह उसके योग्य नहीं था। कसप को पढ़ते हुए कई लड़कियाँ-महिलाएँ जाने-अनजाने बेबी जैसी होना-जीना चाहती रही हैं। यह किसी क़िरदार की बड़ी सफलता कही जाएगी। इस बेबी पर अभी बहुत कुछ और कहा जा सकता है, मगर, फ़िलहाल के लिए इति बेबी प्रसंग।
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अर्पण कुमार का संक्षिप्त परिचय :
जन्म : 14 फरवरी 1977
कविता-संग्रह :
नदी के पार नदी (2002)
मैं सड़क हूँ (2011)
पोले झुनझुने(2018)
सह-अस्तित्व (2020)
नदी अविराम (2022)
उपन्यास :
पच्चीस वर्ग गज़ (2017)
आलोचना/संपादन :
आत्मकथा का आलोक (2020)
सर्जना के आयाम : सर्जक उदयभानु पांडेय (2022)
सुदीर्घ आलोचनापरक आलेख विभिन्न पत्र पत्रिकाओं में प्रकाशित।
कथेतर गद्य :
कुछेक यात्रा-संस्मरण प्रकाशित।
संयोजन/संपादन :
जनसुलभ पुस्तकालय (साहित्यिक-सांस्कृतिक मंच)
महत्त्वपूर्ण कार्यक्रमों में भागीदारी :
* हिंदी अकादमी, दिल्ली द्वारा आयोजित निराला साहित्य पर्व,प्रथम में कविता-पाठ।
*सार्क सूफ़ी महोत्सव,जयपुर में कविता-पाठ।
* भारत भवन, भोपाल में कहानी और आलेख-पाठ।
* रज़ा फ़ाउण्डेशन और कृष्णा सोबती-शिवनाथ निधि द्वारा आयोजित युवा 2022, मंडला में आलेख-पाठ।
* विश्वरंग 2022, भोपाल में संवाद।
प्रसारण :
*कविताएँ/कहानियाँ आकाशवाणी के दिल्ली, जयपुर एवं बिलासपुर केंद्रों से प्रसारित।
*दूरदर्शन के जयपुर और जगदलपुर केंद्रों से कविताओं का प्रसारण।
*रचना केंद्रित संवाद , दूरदर्शन के जगदलपुर केंद्र एवं पत्रिका टीवी, जयपुर से प्रसारित।
स्तंभ-लेखन :
‘पाखी’ पत्रिका में ‘प्रति-संसार’ नाम से नियमित स्तंभ-लेखन।
विशेष रूचि (फ़ोटोग्राफी) :
विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं और पुस्तकों के आवरण में चित्रों का उपयोग l
संपर्क :
ई-मेल : kumararpan1977@gmail.com
मोबाइल नंबर :
9413396755
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[1] . जानकीपुल https://www.jankipul.com/2017/03/manohar-shyam-joshi-on-hin-immortal-novel-kasap.html
[2] . जानकीपुल https://www.jankipul.com/2017/03/manohar-shyam-joshi-on-hin-immortal-novel-kasap.html
[3] . इसी नाम से उनपर केंद्रित प्रभात रंजन की पुस्तक भी है।
[4] . पृ. 10, ‘कसप’, तेरहवाँ पेपरबैक्स संस्करण, 2021
[5] . कथा समय / विजयमोहन सिंह
[6] . पृ. 265, ‘कसप’, तेरहवाँ पेपरबैक्स संस्करण, 2021
[7] . पृ. 102, ‘कसप’, तेरहवाँ पेपरबैक्स संस्करण, 2021
[8] . पृ. 110, ‘कसप’, तेरहवाँ पेपरबैक्स संस्करण, 2021
[9] . पृ. 10, ‘कसप’, तेरहवाँ पेपरबैक्स संस्करण, 2021
[10] .पृ. 111/112, ‘कसप’, तेरहवाँ पेपरबैक्स संस्करण, 2021
[11] . पृ. 112, ‘कसप’, तेरहवाँ पेपरबैक्स संस्करण, 2021
[12] . पृष्ठ 10, ‘कसप’, तेरहवाँ पेपरबैक्स संस्करण, 2021
[13] . पृ. 94, ;कसप’, तेरहवाँ पेपरबैक्स संस्करण, अप्रैल 2021
[14] . पृष्ठ 227, ‘कसप’, तेरहवाँ पेपरबैक्स संस्करण, अप्रैल 2021
[15] . पृ. 10, कसप, तेरहवाँ पेपरबैक्स संस्करण, अप्रैल 2021
[16] . जानकीपुल https://www.jankipul.com/2017/03/manohar-shyam-joshi-on-hin-immortal-novel-kasap.html

