• समीक्षा
  • जेरी पिंटो का उपन्यास और मानसिक स्वास्थ्य

    अंग्रेज़ी के प्रसिद्ध लेखक जेरी पिंटो बहुत अलग अलग तरह के विषयों पर लिखने के लिये जाने जाते रहे हैं। उनका उपन्यास ‘एम और हूम साहब’ मानसिक स्वास्थ्य पर आधारित है। इसका हिन्दी अनुवाद किया है प्रभात मिलिंद ने। वाणी प्रकाशन से प्रकाशित इस उपन्यास पर यह टिप्पणी लिखी है निष्ठा अभिजित अग्निहोत्री ने। आप भी पढ़ सकते हैं- मॉडरेटर 

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    किताब “एम और हूम साहब” ‘जेरी पिन्टो’ द्वारा मूलतः अंग्रेजी में लिखे हुए उपन्यास  “Em and the big hoom” का हिंदी अनुवाद है। जिसे प्रभात मिलिंद साहब ने बेहद खूबसूरती से हिंदी भाषा में पिरोया है। जेरी बताते हैं उनकी इस किताब की लेखन यात्रा करीब पच्चीस वर्षों तक चली। यह मानव मस्तिष्क और मनोरोग से जुड़े कई पहलुओं पर बात करती है और कई जगहों पर आश्चर्यचकित भी करती है। जहाँ भारत में मानसिक स्वास्थ्य के विषय में लोग बहुत कम सजग हैं, वहीं यह किताब पाठक के सामने इसकी मौलिक छवि प्रस्तुत करती है और इस विषय के बारे में बात करने पर विवश करती है। किताब की लेखन शैली साहसिक होने के साथ-साथ सम्मोहित भी करती है और अंत तक बाँध कर रखती है। किताब मनोरोग से जुड़े कई सवालों पर बात करती है और इसे पढ़ते हुए हम समझते हैं कि एक मानसिक रोगी का सारा जीवन किस प्रकार सामाजिक द्वन्द, वितृष्णा और अवसाद झेलते हुए बीतता है लेकिन इस सब के बीच केवल रोगी को ही नहीं बल्कि उसके परिवार को भी बहुत सहनशीलता रखने की आवश्यकता होती है।

    कहानी की मुख्य पात्र ‘इमेल्डा’ है जो एक मानसिक रोगी है। परिवार में पति और दो बच्चे हैं । कहानी का सूत्रधार इमेल्डा का बेटा है और वह अपनी माँ को ‘एम’ कहकर संबोधित करता है। वहीं ‘हूम साहब’ उसके पिता हैं जिन्हें वह इस नाम से इसलिए बुलाता है क्योंकि किसी भी गंभीर विषय पर बात करते हुए उनके मुँह से अक्सर एक बड़ा सा ‘हूम’(ह्म्म्म) निकलता है।  

    कहानी में इमेल्डा के बेटे के परिप्रेक्ष्य से उसकी माँ का जीवन सफ़र और उसके साथ-साथ उसके परिवार के संघर्ष का बड़ी ही सहजता से वर्णन किया गया है। हूम साहब ने अपने बच्चों को उनकी माँ पर पड़ने वाले दौरों की स्थिति में भी सामान्य रहकर उनकी मदद करना और उनका साथ देना सिखाया। बहुत समय से बीमार होने के कारण अब धीरे-धीरे ‘एम’ के दौरे और व्यवहार में आने वाले बदलाव को भी परिवार ने समझना शुरू कर दिया था। बच्चों के पिता अर्थात हूम साहब विपरीत परिस्थितियों में भी हमेशा संयमित दिखाई पड़ते थे। जैसे कई बार ‘एम’ का आत्महत्या करने की कोशिश करना, सड़क पर निकल कर बेतहाशा कुछ भी बोलना और बातें करते हुए अचानक किसी ट्रक के नीचे आ जाने की कोशिश करना, परिवार को उसकी जड़ों से झकझोर कर रख देता था लेकिन उन लम्हों में भी हूम साहब अपनी बेचैनी ‘एम’ पर कभी ज़ाहिर नहीं होने देते थे। हूम साहब ऐसी स्थितियों में सामान्य बने रहने का केवल दिखावा करते थे जिससे उनके बच्चों को हिम्मत मिलती रहे। उनमें एक तिलिस्मी मौन था। जो उनकी बाहरी चुप्पियों के पीछे अंतर्मन के बड़े भारी शोर को दर्शाया करता था और अपने इस शोर को वह किसी के सामने व्यक्त नहीं कर सकते थे।

    इधर ‘एम’ दवाओं के असर में कभी-कभी एकदम सामान्य हो जाया करती थी, अपने बच्चों से खूब सारी बातें करती, उनके लिए नाश्ता बनाती, उन्हें जीवन की कुछ बेहतरीन सीख देती, चर्च में लोगों के लिए प्रार्थनाएं करती और किसी उदास बैठे व्यक्ति को ‘सब कुछ ठीक हो जाने’ का हौसला दिया करती और अपने अब तक के जीवन की अच्छी-बुरी यादें बच्चों से बाँटा करती… उन्हें हूम साहब को लिखे हुए अपने प्रेम पत्र पढ़कर सुनाती । इन घट रहे लम्हों में सभी के मन में एक उम्मीद जगती कि उनका घर अब सामान्य घरों जैसा हो सकता है। एक ऐसा सामान्य घर जहाँ बच्चों को केवल अपने एग्ज़ाम की चिंता होती है । लेकिन इस क्षण भी एक चिंता हरदम इनके साथ चल रही होती कि न जाने, आने वाले किस अगले पल में ‘एम’ को अचानक मानसिक दौरा पड़ेगा जिसकी वजह से उन्हें अपना एग्ज़ाम छोड़ना पड़ेगा।”

    इन सभी बातों से परे ‘एम’ की इस बीमारी ने पूरे परिवार को सौहार्द रखना भी सिखाया था। कुछ बोलने से पहले उन्हें कई बार सोचना पड़ता क्योंकि ‘एम’ के लिए कोई भी बात ट्रिगर पॉइंट हो सकती थी। शायद बहुत कम उम्र में किसी बात पर एम का मस्तिष्क आहत हुआ था, जिसे पूछने पर वह ठीक प्रकार कुछ नहीं कह पाती है लेकिन उस एक ठेस ने धीरे-धीरे जीवन के इस पड़ाव पर पहुँच कर एम का मानसिक स्वास्थ्य पूरी तरह से खराब कर दिया था।

    कहानी का कालखंड उस समय का है जब किसी भी प्रकार के मनोरोग का इलाज केवल शॉक देना ही हुआ करता था। अस्पतालों की स्थिति बेहद दयनीय थी । एक साधारण मानसिक रोगी का इलाज भी पागलखाने में किया जाता था।

    लेकिन अब हमें यह समझना बेहद ज़रूरी है कि पागल और मनोरोगी में बहुत फर्क होता है। एक मनोरोगी धीरे-धीरे पागलपन की तरफ बढ़ता है, लेकिन समय पर इलाज मिलने से उसका मानसिक स्वास्थ्य संजोया जा सकता है। जिस प्रकार शरीर पर लगने वाली चोट या आने वाले ज्वर के लिए दवाई खाना स्वाभाविक है, ठीक उसी प्रकार मस्तिष्क चोटिल होने पर उसकी दवाई करवाना और उसके इलाज के लिए प्रयत्न करना भी सामान्य सी बात ही होनी चाहिए।

    इमेल्डा के परिवार की सबसे बड़ी हिम्मत थी उनका प्रेम। जिसके बल पर वह लगातार सबकुछ सम्हालने की कोशिश किया करते थे। इन कोशिशों के बीच बच्चे माँ और पिता के प्रेम-पत्र पढ़कर खुद को यह समझाने की कोशिश करते रहते थे कि आज से कुछ साल पहले सब कुछ सामान्य रहा होगा और आने वाले कुछ समय के बाद उनके जीवन में एक बार फिर सब सामान्य हो जाएगा। और यही बात उनके जीवन का सबसे बड़ा आधार थी। यह परिवार साथ बैठकर की जाने वाली अपनी प्रार्थनाओं में एक खुशहाल जीवन की मनौती करता। उन्हें कभी पता नहीं होता कि कौन सी बात एम के लिए दौरे की स्थिति पैदा कर सकती है इस कारण उनकी ज़िन्दगी का एक-एक दिन बहुत धीरे व्यतीत होता था।

    इमेल्डा का दर्द कम करने की कोशिश करना बेहद कठिन था। जब वह ठीक होती तब अपने पति और बच्चों के लिए अपनी अनुपस्थिति में पढ़े जाने के लिए पत्र लिखकर रखती। उन पर प्रेम बरसाती लेकिन जिस रोज़ से उस पर दौरे पड़ने लगते वह कभी ‘नन’ बन जाने की चाहत करती तो कभी ‘टीचर’ बन जाने की इच्छा व्यक्त करती, कभी ‘डांसर’ बन जाना चाहती तो कभी अकल्पनीय सा कोई रूप लेने लगती। कभी-कभी दोनों बच्चे आपस में एक दूसरे से ‘एम’ के उन्हें छोड़कर चले जाने के बारे में सोचकर चिंतित होते फिर अगले ही पल दुःखी होने से अधिक ‘एम’ की चिंता से आज़ाद हो जाने के सपने बुनने लगते। फिर हूम साहब आकर कहते कि… “हमें हमेशा से केवल उसका (एम, का) ख़याल रखने कि आदत है इसलिए उसके जाने के बाद मिली हुई आज़ादी हमारे किसी काम की नहीं हो सकेगी।”

    यही वजह थी जब इमेल्डा का देहांत हुआ सबने खुश रहने की बहुत कोशिशें की लेकिन उनको सुकून केवल उसके साथ जिए हुए लम्हों को दोबारा जीने में मिला। तो कौन से थे वह लम्हे जानने के लिए पढ़िए – “एम और हूम साहब”

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    इस किताब से एक सबक मिलता है कि मानसिक रोग भी शुरुआत में एक सामान्य रोग की तरह ही होता है जो हद से ज्यादा बढ़ जाने पर जीवन में तूफ़ान लाने में सक्षम होता है। जिस प्रकार कोई शारीरिक बीमारी होने पर हम उसके घरेलू उपचार और डॉक्टरी इलाज में लग जाते हैं, ठीक उसी प्रकार मानसिक रोग के लक्षण दिखाई देने पर भी तुरंत उसका इलाज करवाने की तरफ रुख़ करना चाहिए। सभी मनोरोग पागलपन नहीं होते। अपना और अपने प्रियजनों के मानसिक स्वास्थ्य का ध्यान रखना हमारा कर्तव्य है। जाने अनजाने में मस्तिष्क पर लगी हुई चोटें मानसिक रोग को पनपने पर मजबूर करती हैं। अतः संवेदनशील व्यक्तियों से बात करते हुए हम सबको यह ध्यान रखना बेहद आवश्यक है कि उन्हें हमारी किसी भी बात से ठेस न पहुँचे।

    तो एम का कष्ट, हूम साहब की सहनशीलता और उनके बच्चों की ज़िंदादिली को समझने और उनसे सीखने के लिए हम सबको अपने जीवन एक बार यह किताब ज़रूर पढ़नी चाहिए।

    धन्यवाद

    निष्ठा अभिजित अग्निहोत्री

    मुंबई महाराष्ट्र

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