• लेख
  • संपादक के रचना-केंद्रित अनुभव

    जानकी पुल की युवा संपादक अनुरंजनी ने संपादन से जुड़े अपने अनुभवों को साझा किया है। आप भी पढ़ सकते हैं। ज्ञानवर्धक है और रोचक भी- प्रभात रंजन 

    =========================================

    संपादक के तौर पर प्रकाशित अनुभवों की अगली कड़ी में यह रचना-केंद्रित अनुभव है। जैसा कि पहले प्रकाशित अनुभव में इसका ज़िक्र हुआ है कि पढ़ने के लिए बहुत कुछ मिला, सिलेबस से बाहर बहुत कुछ। उन रचनाओं में विभिन्न विधाएँ रहीं लेकिन इसमें प्रमुखता कविता, कहानी और समीक्षा की ही रही। इन तीनों विधाओं से गुजरते हुए कई तरह की बातें सामने आईं। सबसे पहले कविताओं के बारे में-

    1.जानकीपुल पर प्रकाशन के लिए सबसे अधिक कविताएँ आईं और हर वर्ग से आईं- युवा, अधेड़, वृद्ध। यह देख एक सवाल बार-बार मन में उठता है, वह यह कि इतनी अधिकता ‘कविता’ विधा की क्यों? जबकि ई-मेल में मिले वे तमाम लेखन, जो कविता के नाम पर आए, उसे कविता मान लेना भी संभव नहीं हो सका। यह महसूस हुआ कि हिंदी की बहुत बहुत बड़ी ‘जनता’ यह एक साधारण सा कथन मानी हुई है कि कविता में हम अपने भावों को व्यक्त करते हैं। लेकिन क्या सच में कविता यही है? मेरा उद्देश्य यहाँ कविता को परिभाषित करना नहीं है न ही यह मेरी क्षमता है लेकिन यह ज़रूर कह सकती हूँ कि मैंने किस आधार पर कविताओं को चयनित-प्रकाशित किया। वे वैसी कविताएँ थीं जो समाज द्वारा बने-बनाए खाँचे को तोड़ती थीं, उसे चुनौती देती थीं।
    दूसरी बात जो कविता के संदर्भ में लोगों के मन में बनी/बैठी गलतफ़हमी को सामने लाई वह यह थी कि जैसे लोग माने बैठे हों कि “कविता में करना ही क्या है? अब तो चूँकि छंद, तुकबंदी की भी अनिवार्यता नहीं है तो गद्य ही लिख कर, छोटे-छोटे वाक्य में उसे बाँट कर( एंटर मार कर) सजा देने से कविता बन जाती है।” कविता के नाम से आए ऐसे कितने ही नमूनों ने खीझ भी पैदा की। ज़ाहिर है उन्हें मना ही किया गया।

    2.दूसरी विधा कहानी की रही जो प्रचुर मात्रा में आई। हर कहानियों को पढ़ कर यह सवाल सामने आता रहा कि इस का चयन हो तो क्यों हो और न हो तो क्यों न हो? जिन कहानियों का चयन हुआ उसके बारे में संपादकीय ‘नोट’ में लिखा जाता रहा है, यहाँ यह बताना अधिक अनिवार्य लगता है कि चयन क्यों नहीं हुआ? जिनका चयन नहीं हुआ उसके कारण भिन्न-भिन्न रहे लेकिन यह एक समानता भी रही कि बहुत सी कहानियाँ सामान्य जन-जीवन में घटने वाली, रोज़नामचा की तरह रही। रोज़ घटने वाली घटनाएँ भी कहानी का विषय हो सकती हैं लेकिन उसकी भाषा, उसकी शैली भी तो मायने रखती है। यह ठीक है कि कहानी किसी न किसी घटना पर आधारित रहती है लेकिन कहानी के नाम पर सिर्फ़ घटनाओं का क्रमवार विवरण लिख देना, कहानी नहीं होती।
    दूसरा अनुभव कहानी के संदर्भ में यह हुआ कि अधिकतर महिलाओं ने कहानियाँ भेजीं। उनमें अधिकांश कहानियों को पढ़ कर यह स्पष्ट हुआ कि उनका विषय घर-गृहस्थी तक ही सीमित है, जो कि स्वाभाविक ही है। घर से संबंधित कहानी लिखना कोई ख़राब बात नहीं है, अज्ञेय की ‘रोज़’ में भी तो घर-स्त्री है लेकिन उनके लिखने का तरीका तो पढ़ने वाले सब जानते ही हैं। मेरे पास जितनी कहानियाँ आईं उन्हें पढ़ते हुए यही लगा कि उन्हें लिखने वाली महिलाएँ जबर्दस्त तरीके से पितृसत्तात्मक समाज में ‘कंडिशनिंग’ की शिकार हैं और उन्हें इसका ज़रा भी इल्म नहीं, वे उसे ही अच्छा मान रही हैं या अगर इल्म हो भी तो उनकी रचनाओं से कम-से-कम ऐसा नहीं लगा। ‘रोज़’ कहानी में भी मालती ‘कंडिशनिंग’ की शिकार है लेकिन अज्ञेय वहाँ इस ‘कंडिशनिंग’ की ओर हर बार ध्यान दिलाते हैं न कि उसे अच्छा मानते हैं, उसका गुणगान करते हैं।
    यहाँ कुछ लोग कह सकते हैं कि संपादक भी तो महिला है, उसे कम से कम महिलाओं को समझना चाहिए, उसे स्पेस देना चाहिए। लेकिन सच कहूँ तो इस तरह की कहानियाँ पंद्रह-सोलह बरस पहले ‘गृहशोभा/गृहलक्ष्मी’ जैसी पत्रिकाओं में आती थीं। जानकीपुल के लिए आई ऐसी कई कहानियों की लेखिकाओं को इन पत्रिकाओं के नाम भी सुझाए गए।

    3.तीसरी विधा समीक्षा की रही। उक्त दोनों विधाओं की तुलना में समीक्षाएँ कम आईं लेकिन जितनी आईं उससे ख़ुशी हुई। ख़ुशी इस बात कि जो समीक्षा के लिए जो सबसे ‘बेसिक’ होता है, कहानी न दुहराना, इसकी संतुष्टि लगभग प्रत्येक समीक्षाओं से मिली।
    समीक्षा के मामले में एक सवाल यह आता है कि किस कृति की समीक्षा होनी चाहिए? क्या जो समकालीन(वह भी सद्य: प्रकाशित) रचनाएँ हैं उनकी समीक्षा ही लिखी जानी चाहिए? वे ही प्रकाशित होंगी? कई लोगों का यही मानना है। मेरा मानना इसमें अलग है। मुझे लगता है कि समय के भीतर किसी रचना को नहीं बाँधना चाहिए। यह कहना कि अमुक कृति को आए बीस साल हो गए हैं, पचास साल हो गए हैं, हज़ार साल हो गए हैं( आदि-आदि) इसलिए इसकी समीक्षा नहीं प्रकाशित हो, यह उचित नहीं प्रतीत होता है। जैसा कि रचना और समय के बारे में बार-बार यह बात आती है कि प्रत्येक रचना के चार समय होते हैं, पहला- रचनाकार का समय, दूसरा- रचना के प्रकाशन का समय, तीसरा- रचना में उल्लिखित समय और चौथा- पाठक का समय। इसलिए जब भी कोई किसी भी रचना का पाठ करेगी/करेगा तो वह रचना उस पाठक के समय से ज़रूर प्रभावित होगी। जानकीपुल पर इस बीच कुछ ऐसी समीक्षाएँ भी आईं जिन पर पहले भी विचार हो चुका है, इसकी ख़ुशी है। वह भी तब, जब समीक्षाएँ लिखना कम होते जा रहा है।

    (यही कुछ अनुभव रचना-केंद्रित हैं, आगे और अनुभव होते रहेंगे।)

    Leave a Reply

    Your email address will not be published. Required fields are marked *

    1 mins
    WordPress Center Ankara Escort: Beypazarı Escort, Pursaklar Escort, Etimesgut Escort İstanbul Escort: Esenyurt Escort, Bahçelievler Escort, Maltepe Escort Bursa Escort: Gürsu Escort, Keles Escort, İznik Escort What are the best budget smartphones available in 2025? Reason Why Everyone Love Travel Doubts About Lifestyle You Should Clarify Blog Manager Module for CMS pro Advanced Mailchimp integration with ARForms WordPress Merge Categories WooCommerce Plugin Bundle – Elementor Addons Menu WordPress plugin – Wpdock Gravity Forms international phone input Google Analytics Events Add-on: Chauffeur Taxi Booking System MagiCards – decks of cards to shuffle | WP plugin WPQA – Builder forms Addon For WordPress WordPress Popup Plugin – Slick Popup Pro