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  • जूठी गली- जहाँ न रातें बीत रही थीं न सुबह हो रही थी

    वरिष्ठ लेखक हृषीकेश सुलभ का नया उपन्यास ‘जूठी गली’ जब से प्रकाशित हुआ है इसकी लगातार चर्चा हो रही है। राजकमल से प्रकाशित इस उपन्यास पर आज प्रसिद्ध युवा लेखिका रश्मि भारद्वाज ने लिखा है। आप भी पढ़ सकते हैं- मॉडरेटर 

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    शेक्सपियर के दुखांत नाटक हैमेलेट का एक पात्र कहता है- Something is rotten in the state of Denmark. (Hamlet,1.4), (डेनमार्क राज्य में कुछ तो सड़ गया है।) जूठी गली उपन्यास पढ़ते हुए यह वाक्य लगातार हम तक लौटता रहता है, जो अंत तक आते-आते एक गली से आगे बढ़कर एक देश के रूपक में तब्दील हो जाता है, उस देश के रूपक में जो इतिहास और संस्कृति की कृत्रिम रक्षा के उन्माद में वर्तमान की क्षरण को महसूस ही नहीं कर पा रहा है।

    ऋषिकेश सुलभ का उपन्यास जूठी गली उसी संशय, भय और बेचैनी की आहट से शुरू होता है, जो हैमलेट नाटक का वह पात्र डेनमार्क की हवा में अनुभूत करता है, कोई सड़ांध, किसी अनहोनी की आशंका जो विकल करती है, प्रश्नाकुल करती है लेकिन कोई हल नहीं देती। जूठी गली में सिर्फ़ माघ का महीना ही किसी बाघ की तरह नहीं घुसता है, हाड़ -हाड़ गला देने वाला, हड्डियों में छेद करने वाला भय भी दबे पाँव प्रवेश करता है, जब मेडिकल की तैयारी कर रहे कुछ छात्रों को पुलिस आतंकवादी करार कर एक रात उठा ले जाती। उपन्यास आगे उन छात्रों के बारे में मौन है, सिवा एक बार उनके बेचैन, निम्नवर्गीय अभिभावकों के ज़िक्र के, जो अपने बच्चों के पहचानपत्र लिए अकुलाए, डरे आ खड़े हुए हैं। गली भी ‘अझूराई’ हुई है कि इन हिंदू पहचान वाले लोगों के बच्चों को मुस्लिम आतंकी कहकर क्यों उठा लिया गया है। इसे पढ़ते हुए पाठक हुए असहायता, वही निरुपायता महसूस करते हैं, जो एक शक्तिशाली व्यवस्था के फासीवादी नियमों के बीच भय और संशय से घिरा एक आम आदमी महसूस करता है। यह गली की दूसरी ‘ब्रेकिंग न्यूज़’ है।

    जहाँ गली एक ज़िंदा शै है

    जूठी गली केवल एक कथा की तरह नहीं खुलती, बल्कि एक जीवित, साँस लेती हुई गली का दस्तावेज लगती है, जो अपने भीतर अनगिन धड़कते जीवन, उनके आपसी टकराव, आँसू और खुशी, स्मृतियाँ और विडंबनाएँ, सपने और मोहभंग समेटे हुए है और उनकी आपस में गूँथी हुई कथाओं के माध्यम से तत्कालीन समाज एवं देश की दुखती नब्ज़ पर उँगली रखती है। यहाँ एक समृद्ध इतिहास भी है, जहाँ एक बीत गया देश का स्पंदन सुनाई देता है।

    यही इस उपन्यास का केंद्रीय स्वर है, जहाँ एक साधारण-सी गली केवल भौगोलिक स्थान भर नहीं रह जाती, बल्कि पूरे देश के बदलते सामाजिक और वैचारिक परिदृश्य का प्रतीक बन उठती है। इस गली के भीतर घटित हर हादसा, हर उल्लास, हर शोक और हर विडंबना हमारे समय की विद्रूपताओं का सजीव प्रतिबिंब बन जाते हैं।

    उपन्यास की पहली घटना है- सविता लाल उर्फ़ सुब्बो का घर से भागना। गली की उस कंपकपाती सुबह में अफ़वाहें, अटकलें हैं, भीड़ है, शोर है, विलाप है, और है एक अबूझ संशय। उपन्यास की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ गली स्वयं ‘एक केंद्रीय पात्र’ बनकर उभरती है। वह बोलती नहीं, पर सब देखती है- एक मूक साक्षी की तरह। उसके भीतर गुज़रते-रमते पात्र, उनकी कहानियाँ और लगभग हर पन्ने पर बदलते प्रसंग किसी कार्निवल-सी बहुलता रचते हैं, किसी लोककथा सा दृश्य रचते हैं।

    यहाँ कहानी रैखिक नहीं है; यह टुकड़ों में खुलती है- एक पात्र से दूसरे, एक घटना से दूसरी और इन्हीं टुकड़ों से एक व्यापक कोलाज बनता है। एक छवि उभरती है, जो सिर्फ एक गली तक सीमित नहीं रह जाती है। जूठी गली से लगी हुई एक और गली – गाँजा गली, जूठी गली की पूरक की तरह उभरती है। दोनों की हवा एक होकर भी अलग-अलग है पर यदि कहीं आग लगती है, तो धुँआ दोनों गलियों में समान रूप से उठता है।

    रोशनी और अँधेरे से बुने हुए लोग 

    इस उपन्यास में कोई नायक नहीं है। हर पात्र अपने भीतर थोड़ी रोशनी और बहुत सारा अँधेरा दोनों लिए हुए है। यही ग्रे शेड्स इन पात्रों और उनकी कथा को यथार्थ के और करीब ले आते हैं।

    जैसे एक भाषावीर है, जो भाषा की शुद्धता का आग्रह रखता है, जिसे हर उर्दू शब्द का हिंदी पर्याय चाहिए। यह भाषावीर आज हमें हर दूसरी गली, मुहल्लों में दिखाई देता है, व्हाट्सएप समूहों में आह्वान करता सुनाई देता है कि किस तरह भाषा की शुद्धता बचाकर ही देश को और उससे भी बढ़कर धर्म को बचाया जा सकता है। भाषा इस उपन्यास की एक और ताकत है। यहाँ हिंदी और उर्दू के बीच का तनाव भी कथा का हिस्सा बन जाता है। वीर का भाषाई आग्रह और बमबम के प्रचंड देशी तेवर—दोनों मिलकर भाषा को भी एक वैचारिक युद्धभूमि बना देते हैं।

    आपराधिक प्रवृत्ति का नेता बमबम धर्म और राजनीति के गठजोड़ का उभरता चेहरा है, जिसकी आक्रामकता हमारे समय की प्रवृत्ति को उजागर करती है। हम मान सकते हैं कि नायकविहीन इस उपन्यास में बमबम एक खलनायक है लेकिन वही बमबम एक स्त्री जनक दुलारी के लिए अकेले में कलपता-रोता भी दिखाई देता है। दरअसल बमबम इस उपन्यास का सबसे जटिल पात्र है, एक ऐसा पात्र जो जिस स्त्री के लिए कोमल भावनाएँ रखता है, जिसकी गरिमा और सम्मान के लिए समाज से टकराता है, उपन्यास के अंत में धर्माधिकारी होने से मिली ताकत और अहंकार से मदांध, उसी प्राणप्रिया स्त्री का घर हड़पने के लोभ में आतुर हो उठता है। अंत में वह एक शोषक, एक संभावित बलात्कारी में तब्दील हो जाता है, जिसकी दृष्टि में मकान, ज़मीन और स्त्री सब एक हैं- कब्जे की चीज़, ताकत के बल पर हथियाए जाने की वस्तु।

    इनके अलावा भी यहाँ कई पात्र निरन्तर चहलकदमी करते रहते हैं, जैसे कोई कस्बाई गली हमेशा आने-जाने वाले लोगों से गुलज़ार रहती है, ये सब मिलकर उस गली की सामूहिक स्मृति बनाते हैं, तो एक विद्रूप वर्तमान भी रचते हैं। गली का अपना वैभवशाली इतिहास भी है, जो वर्तमान के बाशिंदों की यादों में ही रह गया है। दीवान जूठी लाल के समय का अजीमाबाद शहर, जहाँ पहले यह जूठी लाल का कटरा कहलाई फिर पीढ़ियों के बसने और उजड़ने की साक्षी बनी जूठी लाल की गली कहलाई। उस याद को भी वे अब अपने लिए बहुत गौरवशाली नहीं मानते, ज्यों भव्यता का कोई शापित खंडहर हो, जहाँ से निकल भागने का कोई रास्ता नहीं है।

    झूठी गली के स्त्री पात्र बहुआयामी हैं, वे स्वायत हैं और समर्पित भी, विचारशील भी और भेड़चाल भी। उनके भीतर सपनों, विद्रोह, असुरक्षा, समर्पण और आत्मनिर्णय के कई स्तर एक साथ सक्रिय रहते हैं, जो उनके चरित्रों को जीवंतता और कस्बाई प्रामाणिकता देते  हैं।

    सुब्बो, अर्थात सविता, इस द्वंद्व का सबसे त्रासद उदाहरण है। अपने सपनों को पूरा करने के लिए वह मुम्बई भागने का साहसिक निर्णय लेती है, जो उसके भीतर की आकांक्षा और आत्मनिर्भरता की चाह को दर्शाता है। उसके दूसरी जाति के लड़के के साथ भागने और परिवार के सम्मान के चीथड़े उड़ाने की अफ़वाहों के बीच जब वह आत्मविश्वास से भरी, किसी वेबसीरिज़ में भूमिका पाकर मुंबई से लौटती है, तो ज्यों नेपथ्य से एक कवि की आवाज़ उभरती है- अगर एक लड़की भागती है/तो यह हमेशा जरूरी नहीं है कि कोई लड़का भी भागा होगा/कई दूसरे जीवन प्रसंग हैं/जिनके साथ वह जा सकती है/कुछ भी कर सकती है ( भागी हुई लड़कियाँ- आलोक धन्वा)

    किंतु जीवट से भरी, अलभ्य सपने देखने का दुस्साहस करने वाली यही लड़की जब प्रेम में असफलता के बाद आत्महत्या कर लेती है तो हम सन्न रह जाते हैं। उपन्यास यहाँ भी हमें कई सारे सवालों के बीच छोड़, मौन रहना चुनता है। हम सोचते लगते हैं कि क्या जीवन और हालात से लड़ने का हौसला रखने वाली लड़कियों की नियति में भी एक दिन सिर्फ़ पलायन ही लिखा होता है, या तो जीवन के आगे समर्पण करते हुए, या फिर मृत्यु के!

    बब्बो उर्फ बबिता का चरित्र आरंभ में एक विद्रोही लड़की की तरह उभरता है। उसका सिगरेट पीना, एक मुसलमान युवक से प्रेम करना और वीर हनुमान संगठन और उसके सभी धर्मांध युवकों के प्रति उसकी घृणा उसे सामाजिक रूढ़ियों के विरुद्ध खड़ा करती है। फिर भी, कथा में उसका योगदान सीमित प्रतीत होता है। वह एक संभावना की तरह उपस्थित तो होती है, किंतु उसका विद्रोह किसी ठोस परिणति तक नहीं पहुँच पाता।

    इसके विपरीत, नम्मो उर्फ़ नमिता का चरित्र अत्यंत प्रभावशाली ढंग से विकसित होता है। आरंभ में दब्बू और संकोची लगभग अदृश्य नम्मो अंततः अपने जीवन के दो महत्वपूर्ण निर्णय-दलित युवक से विवाह और नौकरी स्वयं, अपने बूते लेने में सक्षम होती है। उसका यह परिवर्तन उसे उपन्यास के सबसे सशक्त स्त्री पात्रों में स्थापित करता है, जहाँ उसकी शक्ति मुखर विद्रोह में नहीं, बल्कि आत्मनिर्णय में निहित है।

    जनकदुलारी का चरित्र भी बहुत सुंदरता और महीनी से बुना गया है। उपन्यास के आरंभ में वह एक दुर्बल, अपनी सुंदरता के कारण अभिशापित स्त्री लगती है, जो अपने रूप, अपनी कचनार देह का बोझ ढोती लगभग नष्ट हो चुकी है। एक दुर्बल पति से प्रेम और देह सुख विहीन जीवन जीते हुए जनकदुलारी बमबम में अपना नायक तलाशती है, उसमें अपना तारणहार देखती है। पति की मृत्यु के बाद वह बमबम के साथ संबंध में भी आती है लेकिन उसे इस संबंध की एक गरिमापूर्ण परिणति चाहिए होती है, चोरी-छिपे का संबंध उसे स्वीकार्य नहीं होता। बमबम के इस निवेदन को ठुकराकर वह एक दृढ़ और स्वाभिमानी स्त्री की तरह कहती है  – “फुसफुसाकर बोलने वालों के पास जबरन घर में घुसने की ताकत नहीं होती बमबम जी’। यह निर्णय न केवल उसके चरित्र को नई ऊँचाई देता है, बल्कि उसकी अवहेलना कहीं न कहीं बमबम की मानसिक विक्षिप्तता का कारण भी बनती है।

    अन्य स्त्री पात्र गली के सामूहिक वातावरण को निर्मित करती हैं। वे गॉसिप बुनने, सामाजिक समीकरणों को साधने और ‘साम, दाम, दंड, भेद’ की नीति में दक्ष हैं। वे केवल पृष्ठभूमि नहीं, बल्कि उस सामाजिक संरचना का हिस्सा हैं, जो कथा को दिशा और गहराई प्रदान करती है, उसमें प्रवाह लाती है।

    हम यह कह सकते हैं कि झूठी गली के स्त्री पात्र किसी एक छवि में सीमित नहीं हैं। वे अपने-अपने ढंग से जीवन का सामना करती हैं, कहीं टूटती हैं, कहीं प्रतिरोध करती हैं, और कहीं चुपचाप अपने लिए रास्ता बना लेती हैं। यही विविधता उन्हें उपन्यास का एक महत्वपूर्ण और सशक्त आयाम बनाती है।

    इस नव-संस्कृति में सब होंगे एक-समान

    उपन्यास में राजनीति और धर्म प्रत्यक्ष न होकर भी हर जगह मौजूद हैं, जैसे कोई अदृश्य धागा, जो कथा को बुनता रहता है।  धर्म, जो मूलतः मनुष्यता, करुणा और सद्व्यवहार का मार्गदर्शक होना चाहिए था, वही आज मनुष्य को पथभ्रष्ट कर, उसे मानवीय मूल्यों से दूर ले जाता दिखाई देता है। उपन्यास इस त्रासदी को संवेदनशीलता और गहराई के साथ बुनता है। वीर हनुमान दल का गठन और उसकी दबंगई, हिंसक गतिविधियाँ, मंदिर में हनुमान जी की मूर्ति का विखंडन और पुनर्स्थापना, जिबह किए मांस पर रोक- ये घटनाएँ केवल प्रसंग भर नहीं, बल्कि हमारे समय के सामाजिक-राजनीतिक आलोड़न के प्रतीक हैं, उस नव संस्कृति के निर्माण के संकेत, जिसकी अंतःप्रेरणा ‘वसुधैव कुटुंबकम’ जैसे सूक्त नहीं, घृणा, हिंसा और विभेद का नया ईश्वरीय जयघोष है। यह नब संस्कृति उपन्यास के मंटू-झन्टू, अतुल, अंशुल  जैसे नए युवाओं का निर्माण कर रही है, जिनके सरोकार, जिनके जीवन का एकमात्र उद्देश्य धर्म और संस्कृति की रक्षा करना है। ये युवा एक नया देश गढ़ रहे हैं- एक ऐसा देश जहाँ किसी ‘अलग’ किसी भिन्नता के लिए कोई जगह नहीं है।  

    वही आग तुम्हारा घर भी जलाएगी

    उपन्यास का अंत चौंकाता है, एक प्रतीक गढ़ता है। वीर हनुमान संगठन का नेता बमबम, एक पागल व्यक्ति द्वारा काटे जाने के बाद स्वयं विक्षिप्त होकर कुत्ते की तरह भौंकने लगता है, जबकि काटने वाला व्यक्ति सामान्य हो जाता है। यह दृश्य केवल एक घटना नहीं, बल्कि उस विद्रूप सत्य का तीखा रूपक है, जहाँ हिंसा और उन्माद अंततः अपने ही रचयिता को निगल लेते हैं।

    झूठी गली कोई ऐसा उपन्यास नहीं है आप आनंद के लिए पढ़ जाएँ, यह पाठकों को असहज करता है, संशय में डालता है, भयातुर करता है और कई जलते- सुलगते सवालों के साथ मौन छोड़ जाता है। यह गली दरअसल हमारे इस समय का रूपक है, जहाँ हर चेहरा अधूरा है, हर सत्य संदिग्ध, और हर कथा किसी महागाथा का अंश समेटे है, ऐसी महागाथा जिसमें एक देश का अतीत और वर्तमान गूँजता है, और जहाँ उपन्यास के अंत की तरह हमारे पास शेष रहती है- सिर्फ़ भविष्य की अनिश्चितता।

    उपन्यास के अंतिम पन्नों में बब्बो राशिद के इंतज़ार में गंगा किनारे खड़ी है, जो लव जिहाद के आरोप से बचने के लिए प्रेम नहीं पलायन चुनता है- उस दिन भयावह था नदी का प्रवाह, कोलतार की तरह काला जल लिए, हाहाकारी वेग से नदी जूठी गली में प्रवेश लेती है, वर्तुलाकार लहरें ऊपर उठती है, गिरती हैं, भंवर बनाती है….  क्या नदी की इन प्रलयंकारी लहरों में प्रेम, भरोसा, मैत्री, मनुष्यता, करुणा, सहअस्तित्व- और हमारा यह देश सब डूब जाएँगे!

    न रातें बीत रही थीं, न सुबह हो रही थी

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