• लेख
  • ऑस्कर पुरस्कार ने नये नियम और नई संभावनाएँ

    हाल में ही प्रतिष्ठित ऑस्कर पुरस्कार ने अपने नियमों में बदलाव किए हैं। इस बदलावों का सिनेमा की दुनिया पर, ख़ासकर भारतीय सिनेमा की दुनिया पर क्या असर पड़ सकता है। इसी बात को लेकर पढ़िए प्रसिद्ध संस्कृतिकर्मी वाणी त्रिपाठी का यह लेख। यह लेख मूल रूप से अंग्रेज़ी में लिखा गया था और ‘द हिंदू’ में प्रकाशित हुआ था। यह उसी लेख का हिन्दी अनुवाद है- मॉडरेटर  

    =================

    मोशन पिक्चर आर्ट्स एंड साइंसेज़ अकादमी द्वारा हाल में लागू किए गये नियम केवल औपचारिक बदलाव भर नहीं हैं। ये नियम दुनिया भर के सिनेमा को देखने और उसे पहचान देने के तरीक़े में हो रहे बदलावों का संकेत हैं।

    इंटरनेशनल फीचर श्रेणी में लंबे समय से चले आ रहे “एक देश, एक फ़िल्म” वाले नियम में थोड़ी ढिलाई बरतते हुए, और बड़े-बड़े फ़िल्म फेस्टिवल में सराही गई फ़िल्मों को सीधे योग्यता देने को शर्तों की सूची में शामिल कर, अकादमी अब विश्व सिनेमा के सामने खड़ी एक पुरानी रुकावट को दूर करने की कोशिश में लगी है।

    जहां तक भारत की बात है तो यहां के लिए यह बदलाव सिर्फ़ नियमों में लाया जाने वाला छोटा-मोटा फेरबदल नहीं है, बल्कि एक नई संभावना के लिए खुलने वाला दरवाज़ा है। खासकर उस स्वतंत्र (इंडिपेंडेंट) फ़िल्म जगत के लिए, जो रचनात्मक रूप से बेहद समृद्ध होने के बावजूद लंबे समय तक हाशिये पर रहा है।

    कई दशकों से ऑस्कर तक भारत का सफ़र सिर्फ़ दुनिया की राय से तय नहीं होता रहा, बल्कि यहां फ़िल्मों को चुने जानी की यहां की अपनी प्रक्रिया की भूमिका भी बहुत महत्वपूर्ण रही है। भारत की आधिकारिक एंट्री चुनने वाली समितियों के फ़ैसलों पर अक्सर सवाल उठे, क्योंकि कई बार ऐसी फ़िल्मों को चुना गया जो तुलनात्मक रूप से ज़्यादा सुरक्षित और आसान मानी गईं, जबकि नए प्रयोग करने वाली या गहरी राजनीतिक-सामाजिक परतों वाली फ़िल्में पिछड़ गईं। यही वजह रही कि दुनिया भर में सराही जाने वाली भारत की कई फ़िल्में ऑस्कर की दौड़ में शामिल ही नहीं हो पाईं।

    इसका एक बहुत बड़ा उदाहरण रितेश बतरा की फ़िल्म दी लंचबॉक्स है। इस फ़िल्म का प्रीमियर कान्स फ़िल्म समारोह के Critics’ Week में हुआ था। दुनिया भर के फ़िल्म समारोहों में इसे सराहा गया और देश ही नहीं अंतरराष्ट्रीय दर्शकों को भी इस फ़िल्म ने अपना सा महसूस करवाया। अकेलेपन और शहरों-क़स्बों में बढ़ती दूरी को जिस नर्मी और सादगी से फ़िल्म ने दिखाया, उसने भाषा-राष्ट्रीयता से परे जाकर लोगों के दिल में अपनी जगह बना ली। लेकिन इसके बावजूद भी भारत ने आधिकारिक रूप से इस फ़िल्म को ऑस्कर में भेजे जाने लायक़ नहीं माना।

    अभी हाल ही लागू किए गये नए नियमों के तहत, अब ऐसी उम्मीद की जा सकती है कि दी लंचबॉक्स अपनी एक ख़ास और सशक्त अंतरराष्ट्रीय पहचान और फ़ेस्टिवल यात्रा पूरी कर चुकी फ़िल्मों को अब राष्ट्रीय चयन प्रक्रिया पर पूरी तरह निर्भर नहीं पड़ेगा और सीधे ऑस्कर की चर्चा का हिस्सा बन सकेगी। ऐसा ही एक दूसरा महत्वपूर्ण उदाहरण है कोर्ट (Court), जिसका निर्देशन चैतन्य ताम्हणे ने किया था।

    कोर्ट एक ऐसी फ़िल्म है जिसमें भारतीय न्याय व्यवस्था को बहुत ही शांत लेकिन गहरे राजनीतिक ढंग से दिखाया गया है। वेनिस फ़िल्म समारोह में Orizzonti Award जीतने के अलावा इस फ़िल्म ने दुनिया भर में कई दूसरे और प्रतिष्ठित पुरस्कार भी अपने हिस्से किए हैं।। फ़िल्म का शांत और सधा हुआ अंदाज़, और न्याय व्यवस्था को देखने का उसका साफ़ नज़रिया, ये सारे वैसे एलिमेंट थे जो हाल के वर्षों में अकादमी की पसंद सूची में ऊपर रहे हैं। हालांकि कोर्ट भारत की आधिकारिक ऑस्कर एंट्री बनी थी, लेकिन उसके पास इतना बड़ा प्रचार और अभियान तंत्र नहीं था कि वह ऑस्कर की अंतिम सूची तक मज़बूती से पहुंच पाती। नए नियमों में, जहां फ़िल्म समारोहों में मिली पहचान को अधिक महत्व दिया जा रहा है, ऐसी फ़िल्में न केवल योग्यता सूची में शामिल हो सकेंगी बल्कि इन्हें एक तरह की वैश्विक मान्यता भी मिलने की संभावना है।

    ऐसा ही एक उदाहरण मसान भी है। नीरज घेवान के निर्देशन में बनी इस फ़िल्म को कान्स फ़िल्म समारोह के Un Certain Regard खंड में दिखाया गया और वहां इसने अपनी झोली में एक नहीं बल्कि दो-दो पुरस्कार भर लिए। भारत के क़स्बाई इलाक़ों में जाति, शोक और सपनों की कहानी को मसान ने जिस आत्मीयता और सहजता से पर्दे पर उतारा है, उसने सीमाओं से परे जाकर दुनिया भर के दर्शकों को अपना बनाया। लेकिन इसके बावजूद यह भारत की आधिकारिक ऑस्कर एंट्री नहीं बन सकी। अगर अभी लागू ढांचा पहले होता तो फ़ेस्टिवल में मिलने वाली सफलताओं से यह फ़िल्म सीधे अवॉर्ड्स की दौड़ तक पहुंच सकती थी।

    विलेज रॉकस्टार्स जैसी फ़िल्में इस बदलाव की अहमियतकी स्पष्टता को बढ़ाती हैं। रीमा दस की यह बेहद निजी और लगभग अपने दम पर बनाई गई फ़िल्म असम के ग्रामीण जीवन को पर्दे पर लाती है। इस फ़िल्म को राष्ट्रीय पुरस्कार तो मिला ही, साथ ही यह दुनिया भर के फ़िल्म फेस्टिवल तक भी पहुंची। फ़िल्म उस वास्तविकता और अपनेपन से सराबोर है जिसे आज वैश्विक फ़िल्म जगत लगातार ज़्यादा महत्व दे रहा है। हालांकि यह भारत की आधिकारिक ऑस्कर एंट्री बनी थी, लेकिन सीमित संसाधनों और बड़े प्रचार अभियान की कमी ने इसकी पहुंच को भी सीमित ही रखा। अगर चयन प्रक्रिया में अलग-अलग फ़िल्म फेस्टिवल की पहचान को अधिक महत्व दिया जाने लगे, तो ऐसी आवाज़ों को भी अपने कला और कहानी के दम पर आगे आने का मौका मिल सकता है, न कि सिर्फ़ बड़े उद्योग और पैसों के सहारे बनने और अपनी जगह बनाने वाली फ़िल्मों को।

    याद करने पर लगता है कि इस तरह की फ़िल्मों की सूची अंतहीन है। यह लिखते हुए अनायास ही मुझे फ़िल्म किल्ला (Killa) की याद आ रही है जिसे अविनाश अरुण ने बनाया था। बर्लिन फ़िल्म समारोह में इस फ़िल्म को Crystal Bear पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। किशोरावस्था और बदलाव के दौर को बेहद कोमलता और संवेदनशीलता से दिखाने वाली इस फ़िल्म में एक काव्यात्मक सुंदरता थी, जो अक्सर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पसंद किए जाने वाले सिनेमा में दिखाई देती है। फिर भी, यह फ़िल्म ऑस्कर की चर्चा से पूरी तरह बाहर रह गई।

    ये सारे उदाहरण एक ख़ास तरह की पैटर्न की तरफ़ इशारा करते दिखते हैं। भारतीय इंडिपेंडेंट सिनेमा लंबे समय से दुनिया भर में देखा और सराहा जाता रहा है, लेकिन संस्थागत स्तर पर उसे वह जगह नहीं मिल पाई जिसकी वह हक़दार है। ऑस्कर के नए नियम इस स्थिति को बदलते दिखाई देते हैं, क्योंकि अब फ़ैसले का केंद्र सिर्फ़ राष्ट्रीय चयन समितियां नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय फ़िल्म समारोह और वैश्विक पहचान भी बनते जा रहे हैं।

    भारत जैसे देश में इस बदलाव महत्व और भी ज़्यादा हो जाता है, जहां फ़िल्में कई भाषाओं, क्षेत्रों और अलग-अलग कलात्मक परंपराओं में सांस लेती हैं। ऐसे में यह मान लेना कि कोई एक फ़िल्म पूरे भारतीय सिनेमा का प्रतिनिधित्व कर सकती है, हमेशा से ही एक अधूरा विचार ही रहा है। कई तरह के रास्ते खोलकर अकादमी अब यह स्वीकार करती दिख रही है कि सिनेमा कोई एकरूप दुनिया नहीं, बल्कि कई रंगों और आवाज़ों से बनी एक बड़ी तस्वीर है।

    लेकिन, इस विस्तृत पहुंच के साथ नई चुनौतियां भी सामने आती नज़र आ रही हैं। किसी बड़े फ़िल्म समारोह में सराहना मिल जाना अपने आप में ऑस्कर तक पहुंच जाने की गारंटी नहीं है। अकादमी की दुनिया अब भी काफ़ी हद तक प्रचार, लगातार दिखते रहने और इंडस्ट्री के नेटवर्क पर टिकी हुई है।

    All We Imagine as Light जैसी फ़िल्में, जिसे पायल कपाड़िया ने बनाया, यह दिखाती हैं कि अंतरराष्ट्रीय स्तर पर लगातार मौजूद रहना कितना ज़रूरी होता है। इस फ़िल्म को दुनिया भर में काफ़ी सराहना मिली, और नए नियमों के तहत ऐसी फ़िल्मों के लिए आगे बढ़ने की संभावना पहले से बेहतर हो सकती है। लेकिन सिर्फ़ तारीफ़ काफ़ी नहीं होती,  उसे ऑस्कर नामांकन तक पहुंचाने के लिए मज़बूत रणनीति और समर्थन भी चाहिए होता है।

    साथ ही कृत्रिम बुद्धि यानी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) को लेकर अकादमी की स्पष्टता इस पूरे बहस को और भी दिलचस्प बना देती है। अभिनय और लेखन जैसी श्रेणियों में मानव रचनात्मकता (ह्यूमन क्रिएटिविटी) को ज़रूरी मानते हुए अकादमी ने साफ़ किया है कि सिनेमा के केंद्र में इंसानी अनुभव और संवेदना का होना ही ज़रूरी है।

    इंडिपेंडेंट फ़िल्में बनाने वाले भारत फ़िल्मकारों के लिए यह बात ख़ास मायने रखती है, क्योंकि उनकी फ़िल्में अक्सर बड़े तकनीकी चमत्कारों की बजाय अभिनय, कहानी और मानवीय बारीकियों पर टिकी होती हैं। ऐसे में यह बदलाव इस बात का आश्वासन भी देता नज़र आता है कि कि तेज़ी से मशीनों पर निर्भर होती दुनिया में भी इंसानी अनुभवों, जीवन की सच्चाइयों और भावनात्मक गहराई से बनाई गई फ़िल्मों की अपनी अहमियत बरक़रार रहेगी।

    लेकिन इन बदलावों का सबसे बड़ा असर शायद इस बात में दिखेगा कि अब फ़िल्मकार अपने सपनों और संभावनाओं को किस तरह देखते हैं। ख़ासकर मुख्यधारा की इंडस्ट्री से बाहर काम करने वाले फ़िल्मकारों के लिए ऑस्कर अब कोई दूर और बंद दुनिया जैसा नहीं रह जाएगा, जहां पहुंचने का रास्ता सिर्फ़ राष्ट्रीय चयन समितियों से होकर गुजरता हो। अब ऑस्कर उनके लिए पहले जितना दूर और मुश्किल नहीं लगेगा। चुनौती अब भी रहेगी, लेकिन अब वहां तक पहुंच सिर्फ़ घरेलू समर्थन पर नहीं, बल्कि दुनिया भर में मिली पहचान और बातचीत पर भी निर्भर करेगी।

    इस बदलाव से फ़िल्मों के बारे में सोचने, उसे बनाने और दर्शकों तक उसे पहुंचाने की प्रक्रिया पर भी असर पड़ेगा। आने वाले समय में अंतरराष्ट्रीय साझेदारियों, फ़िल्म समारोहों की रणनीतियों और अलग-अलग संस्कृतियों को जोड़ने वाली कहानियां केंद्र में आ सकती हैं।

    हालांकि इसके अपने ख़तरे हैं। कहीं ऐसा न हो कि फ़िल्में अपनी स्थानीय पहचान, विशिष्टता और आत्मा से दूर होकर सिर्फ़ उन चीज़ों की तरफ़ झुकने लगें जिन्हें “फ़ेस्टिवल पसंद” माना जाता है।

    लेकिन सिनेमा का इतिहास कुछ और ही कहता है। दुनिया भर में सबसे ज़्यादा असर छोड़ने वाली फ़िल्में अक्सर वही रही हैं जो अपनी मिट्टी, अपनी भाषा और अपने समाज से सबसे गहराई से जुड़ी थीं। दक्षिण कोरियाई फ़िल्म पैरासाइट (Parasite) इसका एक नायाब उदाहरण है। बोंग जून-हो (Bong Joon-ho) ने इस फ़िल्म को वैश्विक बनाने के लिए उसकी कोरियाई पहचान से समझौता नहीं किया, बल्कि उसे और मज़बूती से सामने रखा। भारतीय सिनेमा के लिए इसमें एक स्पष्ट सीख छिपी है कि लंबी और मुश्किल यात्रा में सच्चाई और स्थानीयपन ही टिकते हैं।

    आख़िरकार, ऑस्कर के ये नए नियम इस ओर इशारा करते हैं कि अब फ़ाइलों का चयन र्फ़ प्रतिनिधित्व की राजनीति से आगे बढ़कर कला और पहचान को महत्व देने पर आधारित होगा। वे यह मानते दिखते हैं कि आज का सिनेमा सीमाओं को मिटाकर नहीं, बल्कि उन्हें पार करते हुए संवाद करता है।

    भारतीय इंडिपेंडेंट सिनेमा के लिए यह एक नई संभावना का समय हो सकता है। जो फ़िल्में कभी राष्ट्रीय चयन की सीमाओं के बाहर ही छूट जाती थीं, उनके सामने अब दुनिया के बड़े पुरस्कार मंचों तक पहुंचने का एक वास्तविक रास्ता खुलता दिखाई दे रहा है, भले ही वह अभी पूरी तरह आसान न हो।

    अब असली चुनौती ऐसे ढांचे और सहयोग तंत्र तैयार करने की है जो इस बदलाव को टिकाऊ बना सकें,  जैसे फ़िल्म फेस्टिवल का एक सशक्त नेटवर्क, बेहतर अंतरराष्ट्रीय वितरण व्यवस्था और ऐसे अभियान तंत्र जो इन फ़िल्मों को दुनिया भर में सही तरह से पहुंचा सकें।

    अगर ऐसा होता है तो इसका असर सिर्फ़ पुरस्कारों तक सीमित नहीं रह जाएगा। इससे भारतीय कहानियों और भारतीय सिनेमा के प्रति दुनिया भर के लोगों के नज़रिए में भी बदलाव आ सकता है।

    ऑस्कर अब अपने दरवाज़े पहले से ज़्यादा खोलते दिखाई दे रहे हैं। भारतीय स्वतंत्र सिनेमा लंबे समय से उस दरवाज़े पर दस्तक देता रहा है। अब शायद पहली बार उसके पास भीतर जाने का मौका है, वह भी अपनी शर्तों और अपनी आवाज़ के साथ।

    Leave a Reply

    Your email address will not be published. Required fields are marked *

    1 mins