प्रसिद्ध लेखिका मृणाल पाण्डे ने इस छोटे मगर सारगर्भित लेख में यह बताया है कि मातृभाषाओं को सहेजने और आगे की पीढ़ी तक बढ़ाने में स्त्रियों की कितनी बड़ी भूमिका रही है। एक रोचक और अनुभवसंपन्न लेख- मॉडरेटर
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बुढापे का बड़ा वरदान होता है पढ़ने और पढ़े पर सोचने लायक समय की इफरात। सो पहली बात जिसने इस बुढ़ाते मन को खींचा यह, कि हम जीवन को एक बहती धारा, यात्रा या सफर के ही रूप में क्यों देखते-बखानते हैं? जीवन की सीधी डगर क्या आगे ही आगे चलाती है? या कि वह एक चकरघिन्नीनुमा सीढ़ी है जिसमें स्मृति शकुंतला के मृगछौने की तरह बार बार हमारा दामन मुँह में थाम कर मन को रोकती है? एक कुमाऊंनी लोकगीत में प्रेमी कहता भी है, ‘’काँ को सुआ काँ ऐ गयूं, माया लै घुमायो!’’ हे प्रिया, कहाँ से कहाँ आन पडा इस माया के भंवर में निरंतर गोल गोल घूमकर?’
बात सही है। जीवन जो हमने जिया, हमारे जाने अजाने हमारे मन पर निरंतर सवार रहता है जैसे किसी सफरी की पीठ पर उसका पिट्ठू। प्रिय विषय साहित्य और किसी शब्द विशेष से दो चार होते ही मुआ मन पुराना पिट्ठू खोल कर बैठ जाता है।
शास्त्र की बतौर भाषा इतिहास और भूगोल को (तमाम और शास्त्रों की तरह) अक्सर पुरुषों ने पुरुषों के पैरों पुरुष पाठकों के लिये ही मापा है। फिर भी कुछ तो हमारे अचेतन में है जिससे हर देश में भाषा का ‘मातृभाषा’ या ‘मदरटंग’ जैसा नाम ही सर्वस्वीकार्य है? यह सच पाणिनि महोदय बहुत पहले देख कर कह गये कि एक आमफहम, जनभाषा को न महापंडित बनाते हैं और न ही वैयाकरणाचार्य! और जनता ही उसका अंतिम मानक है, व्याकरण के नियम नहीं। आपके कहने से कुम्हार नया घडा भले रच दे, पर बड़े से बड़ा लेखक भी एक्को नया शब्द नहीं गढ पायेगा। शब्दों के जो अनगढ ढोंके तमाम जनपदों देशों से घुमंतू चरवाहों या लड़ाके कबीलों के साथ लुढ़कते पुढकते खैबर या बर्मा की नदियों के पार हिंदी पट्टी में चले आये और हमारी भाषा में समाहित होते गये उनको गौर से देखें। उनकी तराश और पॉलिशिंग कर औरतों ने ही सदियों से अगली पीढी को मिली शब्द संपदा को विस्तार दिया है। घर परिवार तक सीमित रह कर भी पुरुषों से टुकड़ा टुकड़ा बाहरी दुनिया के तमाम किस्से सुन कर माताओं नानियों दादियों ने तमाम किस्से कहानियाँ और मुहावरे पकड़े, फिर उनमें अपना कुछ मिलाया और साझा किया। ‘शुक मुख द्रव संयुता’ तोताधर्मी भागवत्कथाकार के कथावाचन की तरह उनके कुतरे भाषा के फलों में तमाम तरह की बोलियाँ और भाषाएँ मातृरस में भींग कर लोचदार और सहज ग्राह्य बनते गये हैं। यही रसमय कौर जब अगली पीढी को मिले तो कनरसिया संतान के वयस्क होने पर साहित्य और इतिहास भी आगे बन चले।
नन्हा उदाहरण अल्मोडा नैनीताल में गुज़रे अपने ही बचपन से। तब छोटे छोटे शहरों गाँवों में भी कुटुंब बडे होते थे। दिल भी। ददिहाल में कोई था नहीं लिहाज़ा गर्मी की छुट्टियों में हम बराये दस्तूर ननिहाल जा धमकते जहाँ हर बार बाल मित्रों के साथ नित नये किस्से कहानियों की खेप हम बच्चों के हृाथ लग जाती। मैं बचपन से अमृतलाल नागर के शब्दों में कनरसिया थी। बालकथायें ही नहीं बड़ों के बीच हो रही बातचीत सुनने में भी मेरी गहन रुचि रही। पहाड़ी इलाका था, किस्सागो कहाँ की है उसके अनुसार भाषा नाना क्षेत्रीय बोलियों से जुड़ी होती। घर में तो हम सब कुमाऊंनी बोलते पर जब कहानी सुनाने की बारी आती तो मथुरावाली चाची की बोली और उनके गाये पर्वगीतों में तमाम संज्ञा और क्रियापदों पर ब्रज की छाप रहती:’ ‘’तो कौवे ने बूढी से कहा कि, ‘’जो मैंने तेरो खिच्चर खायो, महिच्चर खायो, नोना खायो तेला खायो्, कचरिया खाई पपरिया खाई् तो टूट री टाँग और-?”
‘’फाट रे पेट’’, बालगण समवेत चिल्लाते।’’
उधर अलीगढ वाली मौसी की बतकही से मैं ‘हैंगे’ और ‘हैगी’ के क्रियापद टीप लेती। बनारस वाली चाची से ‘’गइली’ ‘खइली’ वाले नये जानपदिक क्रियापदों से भी हर बार शब्दकोष भरता चला गया। बाद को जब पढने को मैदानी विश्वविद्यालय भेजा गया तो अवधी, ब्रज, और पुरबिया हिंदी सीखना सहज बन गया।
तब घरों में मिक्सियाँ नहीं थीं। रसोई घर के वार्तालाप में चुनार से मँगवाये गये पत्थर के सिलबट्टे तक गज़ब का केंद्रीय महत्व रखते थे। समय समय पर उनको छेनी से कुशल तकनीक द्वारा ‘टंकवाया’ जाता फिर उनमें सीधे मसाला पीसने की बजाय कोई निगोड़ा पुराना आलू पीस कर उसे धुलवाना और फिर उस पर महाराज द्वारा सरसों के तेल की चिकनाई का मला जाना, इन सब सुरदुर्लभ दृश्यों के चश्मदीद गवाह हम चींटियों के जत्थों की तरह हर घटनास्थल पर डटे रहते। इसी तरह जब पीतल के बडे भगौनों में दानेदार उर्दू बोलनेवाले मुरादाबादी कारीगर आकर कलई करते, तो हमारा जमावड़ा उनकी तराश पर अश अश करता तब तक मौजूद रहता, जब तक वे बच्चियों को बीबी और बच्चों को जनाब कह कर आँच से दूर करवा न देते। ‘धौंकनी’ शब्द हमने उनके ही काम से सीखा। फिर जाड़े पास आते तो एक धनुषनुमा यंत्र से हर बरस रज़ाइयों गद्दों की रुई कातनेवाले कारीगरों की बुलाहट होती। उनसे जाना कि ताँत की डोरी क्या होती है और कैसे बनती है।
महिलाओं और बच्चों के इलाके में रसोईघर और पर्व तमाम बोलियों से सजी भाषा की खराद थे। अनेक बेटियों बहुरियों की आवाजाही से उनके मूल जनपदों के सब्ज़ियों, मसालों के नाम और उनको कूटने पीसने फटकने, पाक कलाओं और लोकल व्यंजनों के अलग अलग नाम हमारी शब्द तालिका में जुडते जाते। बहुरियाँ अपने पीहर से मिले खास मसालों से बने छोंक और रेसिपीज़ को जनानियाँ किसी खानदानी गहने की तरह जतन से सेंत कर रखतीं। अपने मसालों के मिक्स को खालिस पहाडी बहुएं ‘छौंक’ कहतीं, पर पछाहीं इलाके की बहुओं के लिये वह ‘बघार’ था। पुरबिया इलाके से पहाड़ में ब्याही गई ललनायें पीली खासकर अपने मायके की जैसी गाढी अरहर की दाल पसंद करती थीं। पर कई पछाँही सदस्य दामाद भी थे जो फूफाओं के तमाम नकचढेपन की तहत काली दाल के आशिक थे। लिहाज़ा मुरादाबादवाले चाचाजी के लिये ‘माँह दी दाल’ बनती तो लखनऊ कानपुरवालों के लिये अरहर की। स्कूलियों की पंगत पहले जीमती। उसमें बैठे हुए बहुरियों की खुसुर पुसुर सुनते यह भी मेरे कानों ने पकड़ा कि औरतों का क्या? स्वयंपाकी घरों में खाना तो वे ही एकवस्त्रा हो कर बनातीं बनवातीं लेकिन उनकी जमात अंत में ही खाती। और तब उनकी निजी पसंद नापसंद सिर्फ तब खुल कर सामने आ पाती। क्या पकेगा यह फैसला मन से वे तभी करतीं जब घर के मूंछोंवाले किसी जेवनार, मृत्यु भोज या बारात में बाहर चले गये हों।
शादी बियाह के दौरान मनमौजी लुगाइयों की बन आती। कई आशु कवियित्रियाँ नवीनतम स्कैण्डल इस तरह चलंतू सुरों में पिरोतीं कि साँप मर जाये पर मरजाद की लाठी न टूटे। सासें ननदें निशाने पर रहतीं। पर यह अवसर वे थे जब सेंसरशिप ताक पर रखी रहती और गवनहारियों की सासें उनकी बलैयाँ लेकर परछन करतीं: ‘अजी हमरे ससुर के तीब तीन बिटवा, एक शराबी एक कबाबी, एक रंडीबाज़ है,’’
इसके बाद शेष सहेलियाँ टेक दुहरातीं: ‘पायल मोरी बोले सैंयाँ जी दगाबाज़ हैं।’’ लो कल्लो बात!!

