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  • लोकतंत्र, भाषा और डेमोगॉगस

    दिल्ली विश्वविद्यालय के शोधार्थी लक्की कुमार मिश्रा लोकतंत्र, भाषा, व्यवहार को लेकर एक बहुत ज्ञानवर्धक लेख लिखा है। पढ़ना चाहिए- मॉडरेटर

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    कहा जाता है कि लोकतंत्र की शुरुआत यूनान के शहर एथेंस से हुई और इसका जनक एथेंस के राजा क्लिस्थेनेस (Cleisthenes) को माना जाता है। वह क्लिस्थेनेस ही थे जिन्होंने जनता की सहभागिता से पहली बार लोकतांत्रिक सुधार किए। मेरे लिए शब्दों की बनावट को जानना एक मजेदार प्रक्रिया होती है। मुझे लगता है कि ज्यादातर यह बनावट इस ओर इशारा करती है कि कोई भी शब्द अपने मूल रूप में किस तरीके के विचार को लेकर प्रस्तुत होता है।

    डेमोक्रेसी दो ग्रीक शब्दों के मेल से बना है। डेमोंस यानी लोग और क्रेटोस यानी शक्ति, अर्थात लोगों की शक्ति। यह वही लोगों की शक्ति है जिसका प्रयोग कर सत्ता लोगों के भले के लिए या अपना स्वार्थ सिद्ध करती है। लोकतंत्र का सबसे बड़ा उपकरण भाषा है। सत्ता की अपनी भाषा होती है, विपक्ष की अपनी भाषा, और यह दोनों ही चुनावी मैदान में भाषाई चमत्कार से ही जनता को प्रभावित करते हैं और समर्थन जुटाते हैं। और यहीं से भाषा के दुरुपयोग की सबसे बड़ी संभावनाएं लोकतंत्र में ही घटित होती हैं।

    सत्ता ज्यादातर ऐसा भाषाई आडंबर रचती है जहां आपको लगने लगता है कि आपकी और उनकी रुचि समान है। वह आप जैसा ही विचार रखते हैं, मगर असलियत इससे बिल्कुल अलग है। आप उनके विचारों से सहमत होते हैं, ना कि वह आपसे। यह सब भाषा का चमत्कार है।

    और जिस भी व्यवस्था में भाषा इतनी सशक्त भूमिका निभाती है, वहां डेमोगॉग्स के पैदा हो जाने का खतरा बढ़ जाता है। डेमोगॉग्स ऐसे राजनीतिक नेता होते हैं जिनका कोई दीन ईमान नहीं होता। वह लोगों के भीतर छिपी हुई विकृत वासनाओं को उद्वेलित करने का काम करते हैं। वह जनता को विकृत विचारों के साथ खड़े होने का सामर्थ्य देते हैं। वह उनके भीतर के डर, पूर्वाग्रह और नकारात्मक उत्साह को पैदा करते हैं और उसका प्रयोग अपने राजनीतिक लाभ के लिए करते हैं। वह समाज को विभाजित करते हैं। वह आपके भीतर की नफरत का इस्तेमाल करते हैं, क्योंकि वह जानते हैं कि नफरत में एक खास किस्म का सम्मोहन होता है। नफरत व्यक्ति को आकर्षित करती है।

    अभी हाल ही में जनवरी 2026 में डावोस में हुए वर्ल्ड इकोनॉमिक फोरम के दौरान युवाल नोआह हरारी ने एक इंटरव्यू में बात करते हुए बताया कि कैसे मानव सभ्यता की सबसे बड़ी गड़बड़ियों में से एक गड़बड़ी यह हुई कि हमने मानवीय स्वभाव को एल्गोरिथम के भरोसे छोड़ दिया। वह सोशल मीडिया पर बात करते हुए ऐसा कहते हैं। वह कहते हैं कि यह शुरुआती एल्गोरिथम फर्स्ट जेनरेशन ए आई थी, जिसने एक साथ विश्व के करोड़ों लोगों पर यह परीक्षण किया कि वह किस तरीके की भावनाओं पर ज्यादा देर ठहरते हैं, रुकते हैं और आकर्षित होते हैं, और यह पाया कि लोग हिंसा, नकारात्मकता, नफरत जैसी भावनाओं पर ठहरते हैं। और जब इस एल्गोरिथम ने यह पाया, तो उसने इसी तरीके के कंटेंट को प्रोत्साहित करना शुरू किया और उसे खूब अधिक मात्रा में प्रसारित किया। उन्होंने पाया कि अगर लोगों को इंगेज रखना है, तो इंसानी दिमाग में नफरत के बीज बोओ, या फिर उनमें लालच पैदा करो, या डराओ। यहां सच की जरूरत नहीं है, भरोसे की जरूरत नहीं, या कोई जिम्मेदारी नहीं। और अगर गुस्सा करुणा से ज्यादा इंगेजमेंट लाता है, तो इसे ही बढ़ाओ।

    ठीक यही काम, जो फर्स्ट जेनरेशन की ए आई ने सोशल मीडिया पर किया, वही काम डेमोगॉग्स भी करते हैं। वह असमानता की बड़ी बड़ी खाई पैदा करते हैं, जिससे लोगों में सहभागिता कम होती है, समझौते कर पाने की क्षमता कम होती है और लोगों के बीच नफरत बढ़ती है। अब लोग एक दूसरे को सुनने के लिए तैयार नहीं हैं, समझने के लिए तैयार नहीं हैं। इस समय आप देखेंगे कि अलग अलग विचार रखने वाले लोग अब बिल्कुल ही अलग अलग छोर पर खड़े हैं। अब व्यक्तिगत सम्मान की भी कोई जगह नहीं बची। अब राजनीतिक पार्टियां एक दूसरे से नफरत करती हैं। और यह सिर्फ एक जगह की बात नहीं है, पूरी दुनिया में ऐसा हो रहा है, क्योंकि एक जैसी टेक्नोलॉजी ही पूरी दुनिया में काम कर रही है।

    और इस समय ज्यादातर देशों की सत्ता डिमोगॉग्स के हाथ में है। डोनाल्ड ट्रंप इसका सबसे बड़ा उदाहरण है। डोनाल्ड ट्रंप इस वर्तमान समय के क्लियोन हैं। क्लियोन ऐसा ही व्यक्ति था जिसे लोकतंत्र के इतिहास में सबसे बड़ा डेमोगॉग कहा जाता है, जिसके बारे में प्लुटार्क ने लिखा कि वह बेशर्मी और अभद्रता के अलावा कुछ नहीं जानता था। भारतीय राजनीति भी इससे अछूती नहीं रही है। इस पर भी डिमोगॉग्स का ही कब्ज़ा है। लेकिन यह डेमोगोग्स हर सभ्यता में हर समय काल में इतने प्रभावी क्यों रहते हैं? यह एक जरूरी सवाल है और इस सवाल का जवाब हमें सिगमंड फ्रायड और गुस्ताव ले बोन के भीड़ संबंधी विचारों की पड़ताल करने पर मिलता है।

    गुस्ताव ले बोन की प्रसिद्ध पुस्तक The crowd: A study of the popular mind में वह बताते हैं कि भीड़ में व्यक्ति की चेतना और विवेक कमजोर पड़ जाते हैं भीड़ में व्यक्ति अपने आप से ज्यादा समूह को महसूस करता है। वह खुद को व्यक्तिगत इकाई में न देखकर सामूहिकता में देखता है। भीड़ ही उसकी शक्ति का स्रोत होती है ना कि वह खुद। भीड़ में व्यक्ति कुछ ऐसे काम भी कर सकता है जो शायद कभी अकेले में ना कर पाए। मुझे लगता है कि ले बोन अपनी भीड़ की व्याख्या को लेकर बिल्कुल सही है शायद यही कारण रहा की 1947 के दंगों में एक धर्म विशेष के व्यक्ति को दूसरे धर्म विशेष के व्यक्ति की गर्दन काट लेने की हिम्मत मिली, महिलाओं की इज्जत लूट लेने की हिम्मत मिली।

    सिगमंड फ्रायड अपनी किताब Group psychology and the analysis of the ego में ले बोन के विचारों से सहमत दिखाई देते है। फ्रॉयड का मानना था की भीड़ केवल बाहरी समूह नहीं है वह मनोवैज्ञानिक संबंधों से बनी होती है। और आगे फ्रॉयड कहते हैं कि भीड़ व्यक्ति के अवचेतन को मुक्त करती है। सभ्यता व्यक्ति की इच्छाओं और हिंसा को नियंत्रित रखती है। वही भीड़ में यह शामित आवेग बाहर आने लगते हैं। साथ ही भीड़ में व्यक्ति की नैतिक सीमाएं कमजोर पड़ती है। भीड़ में व्यक्ति को लगता है कि वह अकेला किसी चीज के लिए जिम्मेदार नहीं है।

    डेमोगोग्स इस बात को जानते हैं इसलिए वह कोशिश करते हैं कि व्यक्ति की एक सामूहिक पहचान बनाई जाए। उनके लिए आपकी व्यक्तिगत अस्मिता का कोई मूल्य नहीं है। यह सामूहिक अस्मिता धर्म के नाम पर हो सकती है, नस्ल के नाम पर हो सकती है, जाति के नाम पर हो सकती है, परंपरा के नाम पर हो सकती है। वह अपनी पूरी कोशिश से व्यक्ति को भीड़ का हिस्सा बना देते हैं और ऐसा करने के बाद उनके लिए लोगों पर नियंत्रण करना ज्यादा आसान हो जाता है। डेमोगोग्स एक विशेष समुदाय को बताते हैं कि कैसे एक दूसरा समुदाय आपके हितों के लिए खतरा है और हम आपके हितों के रक्षक हैं। वह दूसरे अन्य समुदायों के प्रति डर, हिंसा, नफरत के बीज होते हैं और भीड़ में ही डर, हिंसा, नफरत तेजी से फैलती है। इसे ही भावनात्मक संक्रमण कहा जाता है।

    यह समय मानवीय भावनाओं के तिरस्कार का समय है। हम एक ऐसी दुनिया में हैं जहां अब केवल और केवल शक्ति ही मायने रखती है। आजकल लोग और बड़े नेता यह मानते हैं कि दुनिया में सब कुछ बस एक दिखावा है और इन सबका कोई मतलब नहीं है। उनका मानना है कि असलियत में केवल और केवल शक्ति है। यह बहुत हद तक मैक्यावलीयन विचार है, अधिक हिंसक, अधिक क्रूर।

    इतिहास के पास भी इस विचार को पोषित करने के लिए पर्याप्त साक्ष्य हैं, क्योंकि इतिहास ज्यादातर राजनीतिक संघर्ष का इतिहास है, सत्ता हस्तांतरण का इतिहास है, क्योंकि इतिहास में केवल इन्हीं चीजों को वरीयता दी गई। लेकिन दर्शन का इतिहास, आध्यात्मिकता का इतिहास इससे बिल्कुल अलग है। लेकिन चूंकि इतिहास में उन्हें प्राथमिकता नहीं दी गई है, इसलिए पूरा का पूरा इतिहास शक्ति संघर्ष का ही हिसाब प्रस्तुत करता है।

    किसी भी लोकतांत्रिक व्यवस्था के पास इन डेमोगॉग्स से पूरी तरह बचने का कोई भी सशक्त उपकरण उपलब्ध नहीं है। लेकिन कुछ तरीके अवश्य है जिनके तहत इनके प्रभावों को कम जरूर किया जा सकता है। जिसमें सबसे पहला तरीका यह है की लोकतांत्रिक संस्थाओं को मजबूत किया जाए, उन्हें स्वायत्त बनाया जाए। न्यायपालिका, चुनाव आयोग, विश्वविद्यालय आदि स्वायत्त होने के कारण और मजबूत होने के कारण, कानून के शासन से संचालित होने के कारण सत्ता के प्रभाव में कम आते हैं। लेकिन यह संस्थाएं यदि कमजोर हुई इन पर कानून का शासन मजबूत न हुआ तो यह सत्ता सबसे पहले इन संस्थानों पर अपना अधिकार स्थापित करती है और इन संस्थाओं को अपने राजनीतिक लाभ के लिए प्रयोग में लाती है।

    दूसरा जरूरी कदम यह होना चाहिए कि समाज में शिक्षा का प्रसार बड़े स्तर पर हो क्योंकि समाज जैसे-जैसे शिक्षित होता है उसके भीतर आलोचनात्मक प्रवृत्ति विकसित होती है। जिससे वह भाषाई षड्यंत्र को समझ सकता है। Hannah Arendt ने कहा की अधिनायकवादी राजनीतिक उन समाजों में ज्यादा फैलती है जहां लोग झूठ और सत्य में अंतर नहीं कर पाते।

    स्वतंत्र और जिम्मेदार मीडिया भी डेमोगॉग्स की गति को बाधित करती है लेकिन आज की हालिया स्थिति को देखते हुए यह बहुत मुश्किल लगता है।

    याद कीजिए एरिस्टोटल ने लोकतंत्र के बारे में चेतावनी बहुत पहले ही दी थी यदि नागरिकों में संयम और नैतिक विवेक ना रहे तो लोकतंत्र भीड़तंत्र में बदल जाता है।

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    लेखक – लक्की कुमार मिश्रा, शोधार्थी, हिंदी  विभाग, दिल्ली विश्वविद्यालय।

    luckymishra4443@gmail.com

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