
जब सरकारी नौकरी में किसी की पोस्टिंग शहर से दूरी शहरी सुविधाओं के अभाव वाले इलाक़े में हो जाती है तो ऐसा माना जाता है उसको पनिशमेंट पोस्टिंग दी गई है। चाहे उस पोस्टिंग के कारण आपको प्रकृति के अधिक क़रीब जाने का ही मौक़ा क्यों न मिले? पंकज सुबीर की यह कहानी ऐसी ही एक कहानी है जो आपको अपने रूपांतरण के लिए प्रेरित करने के लाई प्रेरित कर सकती है। बारिश के इस मौसम में पढ़िए मौसम बेचने वाले की यह कहानी- मौसम बेचने वाला। पढ़कर बताइएगा- मॉडरेटर
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“एक रुपये में सावन ले लो ऽऽऽ, दो में लो बरसातें ऽऽ
तीन रुपये में झर-झर, झर-झर बूँदों की सौग़ातें ऽऽऽ
चार आने में कड़-कड़ बादल ऽऽ आठ में चम-चम बिजली ऽऽ
मौसम बेचने वाला आया ऽऽ खोलो घर की खिड़की ऽऽ”
बहुत सुर में गा रहा है गाने वाला। जहाँ पर स्वर को खींच रहा है, वहाँ भी बिलकुल बेसुरा नहीं हो रहा है। जैसे कोई पक्का शास्त्रीय गायक हो। संदीप ने इस कमाल की गायकी को सुना तो एकदम चकित रह गया- ‘क्या ही कमाल की गायकी है। इस छोटे से गाँव में जहाँ पहुँचने के लिए ठीक-ठाक रूप से सड़क भी नहीं बनी है, वहाँ इतना कमाल का शास्त्रीय गायक कहाँ से आ गया और यह बेच क्या रहा है ?’ तेज़ी के साथ उठ कर संदीप ने खिड़की पर लगे परदे को हटाया। स्कूल के सामने के कच्चे रास्ते पर दूर एक बहुत सजी-धजी साइकिल जाती हुई दिखाई दी। साइकिल बरसाती फूल और पत्तों से सजी हुई है, और धीरे-धीरे दूर होती जा रही है। संदीप को साइकिल चलाने वाले की बस पीठ ही दिखाई दी। हरे-मटमैले कुरते से ढकी हुई पीठ। ओझल होने से पहले एक बार फिर पुकार लगायी-
‘एक रुपये में रिममझिम ले लो ऽऽऽ, दो में टापुर-टूपुर ऽऽ
तीन रुपये में लो बरखा के बूँदों वाले नूपुर ऽऽऽ
चार आने में कजरी ले लो ऽऽ आठ आने में झूले ऽऽ
मौसम बेचने वाला आया ऽऽ ले लो मौसम भूले ऽऽ”
संदीप ने उस पुकार को सुना तो उसने कुर्सी की चौखट पर ही अपने हाथों से ताल दी। गाने वाला इस बार भी बिलकुल सुर से नहीं हटा, संदीप आँखें बंद कर ताल देता रहा। जब गाना पूरा हुआ तो संदीप ने चौंक कर खिड़की के पार देखा, गाने वाला कहीं दिखाई नहीं दिया। चेहरे पर आश्चर्य के भाव लेकर संदीप वापस अपनी कुर्सी पर आकर बैठ गया। उसका दिमाग़ अभी भी उस गाने वाले के साथ ही उलझा हुआ है। उस साइकिल वाले की वह कमाल की गायकी और उसकी वह मौसम बेचने वाली पुकार अभी भी संदीप के अंदर गूँज रही है।
‘सर…! छुट्टी कर दूँ क्या स्कूल के बच्चों की ?’ स्कूल चपरासी सुरेश ने आकर पूछा तो संदीप का दिमाग़ गाने वाले से हटा।
‘अभी से छुट्टी…? अभी तो बहुत टाइम है छुट्टी में।’ संदीप ने घड़ी की तरफ़ देखते हुए कुछ रूखे स्वर में सुरेश से कहा।
‘थोड़ी देर में बहुत तेज़ बरसात होने वाली है सर, पास के गाँवों से आये बच्चों को वापस घर जाने में परेशानी होगी। रास्ते में फँस जायेंगे।’ सुरेश ने कुछ अदब के साथ कहा।
‘तुमको कैसे पता चल गया कि थोड़ी देर में बहुत तेज़ बरसात होने ही वाली है ?’ संदीप ने व्यंग्य के स्वर में उतनी ही रुखाई से पूछा।
‘बाहर निकल कर देखिए सर, बहुत घने और काले बादल हो रहे हैं, अँधियारी छा गयी है। आज तो जम के बरसने की उम्मीद लग रही है।’ सुरेश ने उतने ही अदब के साथ कहा।
संदीप धुर्वे छत्तीसगढ़ की आदिवासी जनजाति गोंड का युवक है। सरकारी शिक्षक है। कोरबा शहर से गाँव के इस स्कूल में दो-तीन महीने पहले ही पदस्थ हुआ है। बहुत छोटा-सा गाँव है यह। सड़क भी दो किलोमीटर दूर से होकर गयी है। बस से उतर कर दो किलोमीटर पैदल चलना होता है। पत्नी और साल भर की बेटी को कोरबा में ही छोड़ कर बस से आना-जाना कर रहा है। सड़क इतनी ख़राब है कि अपनी मोटर-साइकिल भी नहीं ला सकता, उससे तो बस ही अच्छी है। मगर बस से डेढ़-दो घंटे आने के और इतने ही जाने के लगते हैं। ज़िला शिक्षा अधिकारी से किसी बात पर बहस हो गयी थी संदीप की, उस समय तो बात आयी-गयी हो गयी थी, मगर जब स्थानांतरण का सीज़न शुरू हुआ, तो ठीक पहली ही सूची में संदीप का नाम था। साथियों ने कहा भी एक बार ज़िला शिक्षा अधिकारी से मिल लो जाकर, सॉरी बोल दो मगर संदीप को यह मंज़ूर नहीं था। नतीजा यह कि यहाँ गाँव आकर ज्वाइन करना पड़ा। अब यह कोशिश कर रहा है संदीप कि वापस कोरबा स्थानांतरण करवा ले। यहाँ गाँव में बेमन से काम कर रहा है वह। हमेशा घर की चिंता लगी रहती है, बेटी अभी छोटी है, और छोटे बच्चों को कुछ न कुछ बीमारी लगी ही रहती है। ज़िला शिक्षा अधिकारी ने अपने जासूस संदीप के पीछे लगा रखे हैं कि वह स्कूल रोज़ आ रहा है कि नहीं, समय पर आना और समय से जाना कर रहा है कि नहीं। नहीं तो अमूमन गाँव की पदस्थी में शिक्षक सप्ताह में दो या तीन दिन आते हैं और बाक़ी दिन गोल कर जाते हैं। कोई देखने सुनने वाला तो है नहीं। जहाँ तक पहुँचने का कोई साधन ही नहीं है पहुँचने का, वहाँ कोई अधिकारी कैसे आयेगा। साथियों ने चेता रखा है संदीप को कि ज़िला शिक्षा अधिकारी अवसर देख रहा है तुम्हें निलंबित करने का, सँभल कर रहना।
संदीप की ज़िंदगी का आधा हिस्सा बस में कट रहा है और आधा इस उजाड़-से गाँव में। संदीप अब तो भूलने भी लगा है कि वह तबला बजाता है, कविताएँ लिखता है। जब थका-माँदा घर पहुँचता है तो कोने में टेबल पर रखा तबला अपने पर से कपड़ा हटाये जाने का इंतज़ार करता मिलता है। कविता की डायरियाँ, जो एक के ऊपर एक थप्पी बना कर रखी गयी हैं, वहाँ से निकल कर टेबल पर आने की प्रतीक्षा करती मिलती हैं। मगर संदीप उनको अनेदखा करता हुआ वहाँ से चला जाता है। जब दिमाग़ पर चिंताएँ लदी हों तो शौक़ के लिए मन तैयार ही नहीं हो पाता है। शौक़ असल में तो निश्चिंत, फुरसती और उन्मुक्त मन का शगल होते हैं।
‘ठीक है… कर दो छुट्टी… और बच्चों से कहना सँभल कर घर जायें।’ संदीप ने आवाज़ को थोड़ा नरम करते हुए कहा। सुरेश मुड़ कर बाहर की तरफ़ जाने लगा।
‘सुनो…’ संदीप की आवाज़ पर सुरेश रुक कर वापस आ गया। ‘ये अभी थोड़ी देर पहले बाहर सड़क पर गाना कौन गा रहा था ? क्या बेच रहा था ?’
‘वो…? अरे सर वो तो पागल है कोई… एक-दो साल से आ रहा है… रोज़ नहीं आता… कभी हफ़्ते में एक बार आता है, कभी दस-पन्द्रह दिनों में। क्या बेचता है किसी को पता नहीं है। बस अपनी टूटी-सी साइकिल को सजा-धजा कर आता है, गाना गाते हुए गाँव की फेरी लगाता है और चला जाता है।’ सुरेश के चेहरे पर मुस्कुराहट है। सुरेश इस गाँव का ही रहने वाला एक आदिवासी लड़का है, जो दैनिक वेतनभागी कर्मचारी के रूप में स्कूल में काम करता है।
‘किसी गाँव वाले ने कुछ ख़रीदा नहीं कभी उससे ?’ संदीप ने पूछा।
‘मैंने एक बार रोक कर उसके गाने में आये ‘धूप के ताप’ को ख़रीदने का पूछा था, तो कहने लगा ऐसे नहीं मिलेगा, मेरे साथ चलना पड़ेगा।’ सुरेश ने उत्तर दिया।
‘धूप का ताप…? पर उसके गाने में अभी धूप का तो कहीं कोई ज़िक्र ही नहीं था।’ संदीप ने कुछ आश्चर्य से प्रश्न किया।
‘अभी बरसात का मौसम है न सर, इसलिए अभी बरसात के सामान बेच रहा है। गर्मी में धूप का ताप बेचेगा, धूल का अंधड़ बेचेगा, सर्दियों में अलाव की आग बेचता है, नदी का कछार बेचता है। हर मौसम के लिए उसके पास अलग गाना है। बसंत में आम और महुए के फूलों की ख़ुशबू, और कोयल की कूक बेचता है… पागल है सर… उस पर ध्यान मत दीजिए। अब गया है तो अब नहीं आयेगा सात-आठ दिन के पहले। दूसरे गाँवों में फेरी लगायेगा अब, फिर कहीं अपने गाँव का नंबर आयेगा।’ सुरेश ने उत्तर दिया।
‘फिर तुम धूप का ताप ख़रीदने गये थे उसके साथ ?’ संदीप ने उत्सुकता से प्रश्न किया।
‘नहीं सर… मैं तो मज़ाक कर रहा था, कौन जाता उस पागल के साथ ? मैंने कहा यहीं दे दो, तो कहने लगा मैं तो बस बुकिंग एजेंट हूँ, मेरे पास माल थोड़े ही रहता है, मेरे साथ चलना पड़ेगा माल लेने। ऐसी ही उल्टी-सीधी बातें कर रहा था वह। गाँव में उसकी बात पर कोई ध्यान नहीं देता। हाँ जब लोग फुरसत में होते हैं तो चौपाल पर रोक कर मज़े लेते हैं उसकी बातों के। वैसे उसे बड़े लोगों से ज़्यादा मतलब नहीं रहता, वह तो छोटे बच्चों के साथ ही मस्त रहता है। उनके साथ ही खेलता रहता है। बच्चों के लिए कुछ न कुछ लाता ही है हर बार। बच्चे भी उसके आने की बाट जोहते रहते हैं।’ सुरेश ने उत्तर दिया।
‘ठीक है तुम जाओ। छुट्टी कर दो बच्चों की।’ संदीप ने कहा। संदीप के कहते ही सुरेश कमरे से बाहर चला गया।
सुरेश के जाने के बाद संदीप एक बार फिर कुर्सी से उठ कर खिड़की पर आया। परदा हटा कर देखा, सच में बाहर दिन में ही अँधियारा छाया हुआ है। आसमान गहरे काले बादलों से घिरा हुआ है। बरसात जैसे समय की सूई की नोक पर रुकी हुई है, अब हुई कि तब हुई। बरसात के ठीक पहले की हवा पेड़ों को झकझोरते हुए गुज़र रही है। संदीप ने उस साइकिल वाले के जाने की दिशा में देखा, पर वहाँ कोई नहीं है। ख़ुशी से झूमते बच्चे स्कूल से निकल कर भागते चले जा रहे हैं, जैसे किसी जेल से छूटे हों। बूँदा-बाँदी-सी हो रही है, मगर ये बच्चे उसका भी आनंद लेते हुए भाग रहे हैं। संदीप के चेहरे पर मुस्कुराहट आ गयी।
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संदीप उस साइकिल वाले को लगभग भूल ही चुका था। क़रीब पन्द्रह दिन बाद अचानक फिर से उसकी पुकार संदीप को सुनाई दी-
“एक रुपये में बीर बहूटी ऽऽऽ, दो में ले लो जुगनू ऽऽ
तीन रुपये में लो माटी की सोंधी-सोंधी ख़ुशबू ऽऽऽ
चार आने में इंद्रधनुष लो ऽऽ आठ में मोर-पपीहा ऽऽ
मौसम बेचने वाला आया ऽऽ ले लो भर-भर खीसा ऽऽ”
आज उसने अपनी पुकार के शब्द बदल दिये हैं, मगर राग, सुर और ताल सब पहले वाले ही हैं। कहीं ज़रा भी सुर से बेसुर नहीं हो रहा है गाने वाला। संदीप कुछ देर तक सुनता रहा, फिर उठ कर खिड़की पर आया और परदा हटा कर बाहर देखने लगा। साइकिल वाला दूर से स्कूल की तरफ़ ही आता दिखाई दिया। संदीप ने खिड़की का पूरा परदा हटा कर एक तरफ़ कर दिया। साइकिल वाले की साइकिल धीरे-धीरे संदीप के पास आ रही है और साथ ही आ रही है उसकी पुकार भी-
“एक रुपये में पोखर ले लो ऽऽऽ, दो में ले लो डबरा ऽऽ
तीन रुपये में ले लो आकर काले-काले बदरा ऽऽऽ
चार आने में हरियाली लो ऽऽ आठ में लो गुबरैला ऽऽ
मौसम बेचने वाला आया ऽऽ ले लो भर-भर थैला ऽऽ”
‘सुनो भाई… रुको तो ज़रा।’ जैसे ही साइकिल खिड़की के पास से गुज़री, वैसे ही संदीप ने आवाज़ दी।
संदीप की आवाज़ पर उस साइकिल चालक ने साइकिल रोक कर खिड़की की तरफ़ देखा। संदीप ने देखा कि वह साइकिल चालक एक अधेड़ उम्र का व्यक्ति है। अधेड़ है मगर पूरी तरह से स्लिम और फिट है। शरीर पर कुछ मटमैला-सफ़ेद कुरता-पायजामा पहने हुए है। गले में हरी किनारियों वाला मटमैला-सफ़ेद गमछा डाले हुए है। चेहरे पर काली-सफ़ेद खिचड़ी दाढ़ी है और सिर पर वैसे ही बाल। पैरों में चप्पल या जूता कुछ नहीं पहना है, नंगे पाँव है वह। उसकी साइकिल हरी पत्तियों और बरसात में खिलने वाले फूलों से सजी हुई है। हैंडल पर गुलमेंहदी के हल्के बैंगनी, सफ़ेद और गुलाबी फूल सजे हुए हैं। आगे के मडगार्ड पर ज़ीनिया और रैन-लिली के फूलों को एक के बाद एक क्रम से सजा रखा है। पीछे के कैरियर पर तितली गेंदा और अग्निशिखा के चटख पीले, नारंगी-लाल फूल बंदनवार की तरह सजे हुए हैं। उस आदमी ने अपने कुरते की जेब में भी एक अग्निशिखा का फूल खोंस रखा है।
‘जी बोलिए…?’ उस आदमी ने प्रश्न किया। संदीप ने महसूस किया कि उस आदमी ने बहुत शिष्टता के साथ प्रश्न किया है।
‘क्या बेच रहे हैं आप…?’ संदीप ने भी शिष्टता के साथ प्रश्न किया।
‘महोदय ने मेरा गाना सुना नहीं शायद…!’ उस आदमी ने इस बार कुछ मुस्कुराते हुए कहा।
‘जी मैंने सुना, एक बार कुछ दिनों पहले भी सुना था। मगर उस समय भी समझ नहीं पाया था और आज भी समझ नहीं पाया। इसलिए आपको रोक लिया… माफ़ कीजिए।’ संदीप ने कुछ विनम्रता के साथ कहा।
‘माफ़ी माँगने की कोई आवश्यकता नहीं है हज़रत… मेरा काम है फेरी लगाना और फेरी लगाने वाले को तो आवाज़ लगा कर रोका ही जाता है, इसमें माफ़ी की क्या बात हुई ? आपको क्या समझ में नहीं आ रहा है ? मैं तो बहुत साफ़-साफ़ बताता हूँ कि मैं क्या-क्या बेचता हूँ।’ उस आदमी ने मुस्कुराते हुए ही उत्तर दिया।
‘वही तो… वही तो मैं समझ नहीं पा रहा हूँ कि आप असल में क्या बेच रहे हैं। उस दिन आप कुछ और बेच रहे थे, आज कुछ और बेच रहे हैं। और आपके पास तो कोई सामान दिख भी नहीं रहा है।’ संदीप ने कुछ उलझन भरे स्वर में प्रश्न किया।
‘अच्छा तो जनाब इस बात पर अचरज में हैं।’ संदीप ने महसूस किया कि वह आदमी हर बार उसके प्रति नया संबोधन प्रयोग में ला रहा है। ‘अरे जनाब मैं जो कुछ बेचता हूँ, वह मेरे पास नहीं होता… वह तो मौसम के स्टॉक में होता है, मैं तो बस दलाली कर रहा हूँ उन सब चीज़ों की। और जहाँ तक बदल-बदल कर चीज़ें बेचने की बात है, तो जिस समय मौसम के पास जो कुछ होता है, मैं उसको ही बेचता हूँ। मौसम के पास चीज़ें हर महीने-पन्द्रह दिन में बदलती रहती हैं। जो नया माल आता है, मैं उसे ही बेचना शुरू कर देता हूँ।’ उस आदमी ने कुछ रहस्यमय तरीक़े से मुस्कुराते हुए कहा। संदीप को उस आदमी की बात कुछ समझ आयी, कुछ बिलकुल समझ नहीं आयी इसलिए वह उलझन भरी नज़रों से उस आदमी की तरफ़ देखता रहा।
‘महाशय… कुछ उलझन में हैं…’ वह आदमी अजीब तरीक़े से मुस्कुराया ‘वैसे मैंने आपको पहले कभी इस गाँव में नहीं देखा, नये आये हैं शायद…।’ उस आदमी की आँखें बहुत आत्मीयता से भरी हुई हैं।
‘जी मैं कुछ महीने पहले ही कोरबा से इस स्कूल में शिक्षक पदस्थ हुआ हूँ।’ संदीप ने उत्तर दिया।
‘पदस्थ हुए हैं या पदस्थ कर दिये गये हैं ? लगता तो नहीं कि आप अपने मन से यहाँ आये हैं। इस छोटे-से गाँव में जहाँ सड़क तक आने से कतराती है, वहाँ आप कोरबा से आ गये…?’ उस आदमी ने जैसे संदीप की दुखती रग पर चोट करते हुए कहा।
‘जी ऐसा ही समझ लीजिए…।’ संदीप ने संक्षिप्त-सा उत्तर दिया।
‘फिर तो कोशिश कर रहे होंगे कि जल्द से जल्द इस गाँव से छुटकारा मिल जाये…? वापस कोरबा स्थानांतरण हो जाये…?’ उस आदमी ने मुस्कुराते हुए कहा। संदीप ने कोई उत्तर नहीं दिया, बस उस आदमी की तरफ़ देखता रहा।
‘आप पैरों में चप्पल या जूते क्यों नहीं पहनते ? आपको चोट लग सकती है पैरों में, कोई काँच या काँटा चुभ सकता है।’ संदीप ने उस आदमी द्वारा पूछे गये प्रश्नों के उत्तर में अपनी तरफ़ से प्रश्न कर दिया।
‘चप्पल…?’ वह आदमी अपने पैरों की तरफ़ देखते हुए कुछ रहस्य से मुस्कुराया ‘चप्पल या जूता पहनने से धरती के साथ हमारा संपर्क टूट जाता है। हमारे और धरती के बीच इन्सुलेशन आ जाता है। धरती हमारे अंदर की नकारात्मकता को खींच लेती है… हमारे अंदर की सारी नकारात्मकता धरती में चली जाती है, अर्थ हो जाती है।’
उस आदमी की बात में आये अंग्रेज़ी के शब्दों से संदीप को लगा कि यह आदमी पढ़ा-लिखा है। यह वैसा नहीं है, जैसा दिख रहा है।
‘मैं समझ नहीं पाया…!’ संदीप ने जान-बूझ कर नहीं समझने की बात की।
‘शिक्षक महोदय… इतनी आसान बात आप नहीं समझ पा रहे। बिजली का करंट असल में नेगेटिव चार्ज वाले कणों- इलेक्ट्रॉन्स का एक प्रवाह है, जिनको धरती के पॉज़िटिव चार्ज का लालच दिखा कर दौड़ाया जाता है और इस दौड़ने के क्रम में उनके रास्ते में प्रतिरोध पैदा करके उनसे आवश्यक कार्य करवा लिया जाता है। उसी तरह हमारे शरीर में भी जो नेगेटिव चार्ज होता है, उसे पृथ्वी हमारे पैरों के तलवों से खींच लेती है और हमें नकारात्मक से सकारात्मक कर देती है। जूते और चप्पल हमारे और धरती के बीच इन्सुलेशन का काम कर देते हैं और हमारे अंदर की नकारात्मकता कभी समाप्त नहीं हो पाती है। इन जूते-चप्पलों के कारण ही आज हमारे आस-पास इतनी नकारात्मकता है। सबके अंदर नेगेटिव चार्ज बढ़ता जा रहा है, उसे डिस्चार्ज होने के लिए धरती का स्पर्श नहीं मिल पा रहा है। हम अपनी ही धरती से दिनों-दिन दूर होते जा रहे हैं।’ उस आदमी की आवाज़ में उदासी के साथ-साथ एक गंभीरता भी आ गयी है।
‘और जहाँ तक काँटा चुभने की बात है, तो धीरे-धीरे पैरों के तलवे प्रकृति के साथ तादात्म्य बिठा कर कठोर हो जाते हैं, ऐसे कि उनमें फिर कोई काँटा नहीं घुस पाता।’ उस आदमी ने मुस्कुराते हुए कहा।
‘आपका नाम क्या है…?’ संदीप ने बात की दिशा बदल दी।
‘मेरा नाम…?’ वह आदमी एक बार फिर रहस्य से मुस्कुराया ‘मैंने अपना कुछ नाम नहीं रखा है, नाम रखने से ही सारी समस्याएँ पैदा होती है। नाम से ही तो ‘मैं’ पैदा होता, ईगो पैदा होता है, अगर नाम ही नहीं है, तो आप कुछ हैं ही नहीं। आप नदी हैं, पर्वत हैं, पेड़ हैं, जंगल हैं… आप भी सारी प्रकृति का एक छोटा-सा हिस्सा हैं… आप भी प्रकृति हैं… झगड़ा वजूद को लेकर ही तो होता है… और वजूद पैदा होता है नाम से, इसीलिए मैंने अभी तक अपना कुछ नाम नहीं रखा।’
‘पर आपके माता-पिता ने तो आपका कुछ नाम रखा होगा…?’ संदीप ने कुछ आश्चर्य से पूछा।
‘हाँ…! पर वह पिछले जन्म की बात है। अब इस जन्म में मेरा कुछ नाम नहीं है।’ उस आदमी ने उत्तर दिया।
‘पिछला जन्म…?’ संदीप ने उलझन भरे स्वर में कहा।
‘माँ की कोख से बाहर आने के बाद से मरने तक हम कई बार जन्म लेते हैं। नया जन्म लेने के लिए मरना ज़रूरी नहीं है। आप बिना मरे भी जन्म ले सकते हैं। मेरा भी यह नया जन्म है… अब तो मैं भी भूल गया हूँ कि उस जन्म में मेरा नाम क्या था।’ इतना कह कर वह आदमी कुछ देर को रुका फिर मुस्कुराते हुए बोला- ‘नाम की उपयोगिता बस संबोधित करने के लिए ही होती है न ? उसके अलावा तो नाम का कोई उपयोग नहीं है। और संबोधन के लिए नाम का होना ही ज़रूरी नहीं होता, आपका काम भी आपका संबोधन हो सकता है। जैसे मैं हूँ- ‘मौसम बेचने वाला’। इस दुनिया में कितने ही ऐसे लोग हैं, जिनका नाम कोई नहीं जानता, लोग बस उनके काम को ही उनका नाम बना देते हैं- रद्दी वाला, ठेले वाला, सब्ज़ी वाला, पॉलिश वाला। ये लोग तरस जाते हैं कि कोई कभी उनको उनके नाम से बुलाये… धीरे-धीरे ये लोग भी भूल जाते हैं कि उनका नाम था क्या। अगर उनका काम नहीं पता हो, तो भी कोई उनको नाम से नहीं बुलाता बल्कि वैकल्पिक नामों से बुलाता है- फलाना, ढिकाना, अमका, ढिमका… गंजा-गंजा-सा, मोटा, काला… ऐसे जाने कितने ही नाम हैं लोगों के पास… इसीलिए मैंने अपना नाम रखा ही नहीं… मैं बस ‘मौसम बेचने वाला’ हूँ, इसी नाम से मुझे जानते हैं सब लोग।’
‘आपको जल्दी नहीं हो तो अंदर आइए… चाय पीते हैं साथ में।’ संदीप ने उस आदमी के बारे में और जानने के लिए कहा।
‘जल्दी… अरे हुज़ूर मेरे जितनी जल्दी तो किसी को नहीं होगी। मैं किराना नहीं बेचता हूँ, मौसम बेचता हूँ। मौसम बहुत जल्दी बीतता है… बीतने से पहले बेचना होता है। नहीं तो जो आप बेच रहे हो, वह बीत जायेगा, कुछ दूसरा आ जायेगा। मेरा काम ही जल्दी का है हुज़ूर। इस गाँव की फेरी पूरी करके अभी दस और गाँवों में जाना है। मैं रुक नहीं सकता, रुकूँगा तो कई गाँव छूट जायेंगे।’ उस आदमी ने मुस्कुराते हुए कहा।
‘कोई ख़रीदता है आपसे ये सब…?’ संदीप ने प्रश्न किया।
‘कोई ख़रीद नहीं रहा, इस कारण बेचना तो बंद नहीं किया जा सकता महोदय… मैं बेच रहा हूँ, इससे लोगों के अंदर इस बात का विश्वास तो रहेगा कि ये चीज़ें अभी पूरी तरह से ख़त्म नहीं हुई हैं, अगर इनकी ज़रूरत पड़ी तो मिल सकती हैं।’ इतना कह कर वह आदमी कुछ देर को रुका, फिर बोला- ‘और जब बंदूकें बेचने वाले, बारूद बेचने वाले, घृणा बेचने वाले, अपनी दुकानें बंद नहीं कर रहे, तो मैं क्यों करूँ…?’ संदीप ने कुछ नहीं कहा।
‘और ऐसा भी नहीं है कि कोई ख़रीदता ही नहीं है यह सब, कोई न कोई मिल ही जाता है, जिसे इस सबकी बहुत ज़रूरत होती है। मेरी दुकान सबके लिए नहीं है, बस उसीके लिए है। वह एक ग्राहक कब, कहाँ, कैसे मिलेगा, मुझे भी पता नहीं, इसीलिए गाँव-गाँव फिरता रहता हूँ। जब वह मिल जाता है तो उसे बेच देता हूँ यह सारा सामान। बेच कर ख़ाली हो जाता हूँ… फिर इंतज़ार करता हूँ किसी अगले ग्राहक के मिलने का। अभी तक तो ऐसा नहीं हुआ कि किसी मौसम में मुझे ग्राहक नहीं मिला हो। एक मौसम में एक भी ग्राहक मिल जाये तो मेरा काम हो जाता है। असल में तो मैं उस एक ग्राहक की तलाश में ही फेरी मारता हूँ गाँव-गाँव। राज़ की बात यह है कि मैं हर मौसम में उसी एक ग्राहक की तलाश में भटकता हूँ। उसी एक ग्राहक की तलाश में…!’ उस आदमी ने संदीप की आँखों में आँखें डाल कर कुछ रहस्यमय तरीक़े से कहा। संदीप एकदम सटपटा कर रह गया।
‘ओह… अब मुझे जाना होगा… बताया न कि आज की फेरी में दस गाँव और बचे हैं।’ कहते हुए उस आदमी ने अपनी साइकिल का पैडल मारा और उसे आगे बढ़ा दिया। संदीप उलझन भरी नज़रों से उस आदमी को जाता हुआ देख रहा है। साइकिल जब बहुत दूर निकल गयी तो उस आदमी का स्वर सुनाई दिया-
“एक रुपये छम-छम बूँदें ऽऽऽ, दो में ताल-तलैया ऽऽ
तीन रुपये में ले लो ठंडी-ठंडी-सी पुरवैया ऽऽऽ
चार आने में दादुर का स्वर ऽऽ आठ में साँवल रातें ऽऽ
मौसम बेचने वाला आया ऽऽ ले जाओ सौग़ातें ऽऽ”
स्वर धीरे-धीरे मद्धम होता गया और साथ ही वह साइकिल भी ओझल होती गयी। संदीप खिड़की से हट कर कमरे में आया और अपनी कुर्सी पर बैठ गया। संदीप को उस आदमी के चेहरे में जैसे कहीं कोई कौंध-सी आती रही पूरे समय। कौंध किसी जाने-पहचाने चेहरे की। जैसे कभी, कहीं जीवन में इस चेहरे को एक बार देखा है… बहुत परिचय नहीं है… न कोई क़रीबी है… मगर चेहरा बार-बार अपने अंदर से कुछ पहचान की झलक देता रहा। संदीप अपनी कुर्सी पर बैठा हुआ याददाश्त में बसे सारे चेहरों को उस चेहरे से मिला-मिला कर देख रहा है मगर हर बार उत्तर नकारात्मक आ रहा है। ऐसा लग रहा है जैसे कभी, कहीं बस कुछ क्षणों के लिए यह चेहरा सामने से गुज़रा है। नाम पता चल जाता तो यह तय हो जाता कि वह आदमी परिचित है कि नहीं, मगर नाम तो क्या उसकी आधी बातें संदीप की समझ से बाहर थीं। कौन था वह आदमी…? कुर्सी की पुश्त से सिर टिकाए, आँखें बंद किये संदीप की आँखों में धीरे-धीरे नींद उतर रही है… बरसात की दोपहर वाली मीठी दोपहरी नींद।
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बरसात का मौसम बीत गया है। संदीप की परेशानी थोड़ी कम हुई है। पहले बस से स्कूल तक आने-जाने में कीचड़ से भरे हुए कच्चे रास्ते पर जूते, कपड़े सब ख़राब हो जाते थे। अब रास्ता सूख गया है। वर्षा बीत गयी है और बर्षा के बूढ़े हो जाने के निशान के रूप में चारों तरफ़ काँस के सफ़ेद-रुपहले फूल दिखाई दे रहे हैं। यह शरद ऋतु का समय है, जब वर्षा के जाने के बाद प्रकृति अपनी सुंदरता का सबसे उत्कृष्ट प्रदर्शन करती है। रास्तों पर, मैदानों में, खेतों की मेड़ों पर, जंगल में… सब जगह तरह-तरह के रंग-बिरंगे फूल खिले हुए हैं। मौसम बेचने वाला क़रीब बीस-पच्चीस दिनों से नहीं आया है। संदीप हर रोज़ उसके आने का इंतज़ार करता है।
“एक रुपये में फूल काँस के ऽऽऽ, दो में पीली तितली ऽऽ
तीन रुपये में कंचन नदिया ले लो उथली-उथली ऽऽऽ
चार आने में नटखट गेंदा ऽऽ आठ में लो गुलमेंहदी ऽऽ
मौसम बेचने वाला आया ऽऽ घर से निकलो जल्दी ऽऽ”
संदीप ने जैसे ही पुकार का स्वर सुना वैसे ही वह अपनी कुर्सी से उठ कर बाहर की तरफ़ भागा। स्कूल के मेन गेट से जब संदीप बाहर निकला तब तक वह साइकिल वाला भी वहाँ आ गया। संदीप को आया हुआ देख कर साइकिल वाले ने मुस्कुराते हुए अपनी साइकिल को रोक दिया।
‘और सुनाइए मास्टर साहब… गाँव से छुटकारा नहीं मिल पाया आपको अभी तक…? पूरी बरसात यहीं निकल गयी ? आप पहले हैं जिनकी पूरी बरसात यहाँ बीती है, नहीं तो दो-तीन महीने से ज़्यादा कोई यहाँ टिकता ही नहीं है।’ साइकिल वाले ने संदीप की तरफ़ मुस्कुरा कर देखते हुए कहा।
‘हाँ भाई… अभी तो लगता है कि साल भर ही यहाँ रहना पड़ेगा। अब अगले सीज़न में ही ट्रांस्फ़र होगा यहाँ से।’ संदीप ने कुछ निराशा के स्वर में कहा।
‘क़िस्मत वाले हो मास्टर साहब कि आपको यह मौक़ा मिल रहा है।’ उस आदमी ने जैसे अपने आप से ही बुदबुदाते हुए कहा।
‘क़िस्मत…? हुँह…!’ संदीप ने कुछ अजीब तरीक़े से कहा।
‘आदत ही बना ली है तुम ने तो ‘मुनीर’ अपनी, जिस शहर में भी रहना उकताए हुए रहना…।’ उस आदमी ने मुस्कुराते हुए कहा।
‘मतलब…?’ संदीप ने पूछा।
‘मतलब यह कि जहाँ रहो वहाँ ख़ुश रहो… यह इंतज़ार मत करो कि अपने मन की जगह पर पहुँचूँगा तब वहाँ ख़ुश होऊँगा। ख़ुशी जगहों में नहीं होती है, ख़ुशी तो उन जगहों को जीने में होती है। तुम ख़ुश रहो या उकताए हुए रहो, रहना तो तुम्हें यहीं है, इसी गाँव में… तो फिर ख़ुश ही क्यों नहीं रहा जाये…? हाँ तुम्हारे उकताए हुए रहने से यदि तुम्हारा ट्रांस्फ़र जल्दी हो जाये कोरबा, तो फिर बेशक रहो उकताए हुए।’ उस आदमी ने मुस्कुराते हुए ही उत्तर दिया।
‘पत्नी और बेटी वहाँ कोरबा में हैं, मैं रोज़ गाँव से आना-जाना कर रहा हूँ… दिन भर उनकी चिंता रहती है… थका-हारा घर पहुँचता हूँ तो सोने के अलावा और कुछ नहीं कर पाता… और आप कहते हैं कि ख़ुश हो जाऊँ ? आपके लिए कहना आसान है।’ संदीप ने कुछ रूखे स्वर में कहा।
‘अरे तो उनको भी यहाँ ले आइए, क्यों उनको कोरबा में रखा हुआ है ? क्यों कर रहे हैं रोज़ का आना-जाना ? गाँव में क्यों नहीं रहते ? क्या गाँव में जो रहते हैं वे इंसान नहीं होते ? हुज़ूर आप गाँव में अपने स्थानांतरण को सज़ा मान रहे हैं, आपको लग रहा है कि आपको काला पानी की सज़ा दी गयी है, इसी से आपकी सारी परेशानियाँ पैदा हो रही हैं। माना हुआ सब कुछ सच नहीं होता महोदय…। इस माने हुए के ही कारण आज गाँव ख़ाली होते जा रहे हैं और शहर इंसानों के बोझ से लदे हाँफ रहे हैं। आप जैसे लोगों ने गाँव का अर्थ दुख और शहर का अर्थ सुख मान लिया है। यक़ीन मानिए आप शहर जाकर भी ख़ुश नहीं रह पायेंगे… क्योंकि आपने अपने अंदर का स्थायी भाव दुख को बना लिया है। अब आप कहीं भी जायेंगे यह स्थायी भाव आपके साथ-साथ जायेगा।’ उस आदमी ने उतनी ही विनम्रता से कहा।
‘तो मुझे ख़ुश रहने के लिए क्या करना चाहिए ?’ इस बार संदीप ने कुछ व्यंग्य के साथ पूछा।
‘यहाँ इस गाँव में आपके रहने लायक कोई घर नहीं है क्या ?’ उस आदमी ने प्रश्न के उत्तर में प्रश्न किया।
‘हाँ है न, प्रधान जी के घर में तीन कमरे दूसरी मंज़िल पर नये बने हैं, वे एक दिन चाबी लेकर आ गये थे, कहने लगे- जो किराया ठीक समझो दे देना। पर मैं यहाँ रहना ही नहीं चाहता, इसलिए मैंने हाथ जोड़ कर मना कर दिया था उनको।’ संदीप ने उत्तर दिया।
‘वहाँ कोरबा में आपका निजी मकान है क्या…?’ उस आदमी ने एक और प्रश्न किया।
‘नहीं वहाँ भी किराये का ही मकान ले रखा है।’ संदीप ने उत्तर दिया।
‘फिर क्या परेशानी है ? फिर क्यों मोह में पड़े हैं उस किराये के मकान के ? वहाँ का किराये का मकान छोड़ कर यहाँ किराये का मकान ले लीजिए। एक काम कीजिए मास्टर साहब, पत्नी और बेटी को कोरबा से गाँव ले आइए… साथ में रहिए… जब तक गाँव में आपका दाना-पानी लिखा है तब तक आनंद कीजिए यहाँ पर। अपनी बच्ची को बढ़ता हुआ देखिए… उसके साथ खेलिए… उसे उसके पिता की बचपन की यादें दीजिए… बरसात की यादें, जाड़ों की यादें, गर्मी की यादें, वसंत की यादें… हर मौसम की यादें हों उसके पास। उसे याद तो रहे कि पिता के साथ उसका बचपन कितना सुहाना बीता था। अभी तो उसे बस यह याद रहेगा कि एक आदमी उसके सुबह उठने से पहले घर से निकल जाता था और उसके सोने के बाद रात को वापस आता था।’ उस आदमी के स्वर में विनम्रता बनी हुई है। संदीप ने कुछ नहीं कहा, वह उस आदमी के चेहरे में पहचान के निशानों को देख कर किसी निर्णय पर पहुँचने का असफल प्रयास करता रहा।
‘अभी आप यहाँ गाँव में समय काट रहे हैं… यही ग़लती है आपकी। आप अब यहाँ जीना शुरू कर दीजिए। जीना शुरू कर दीजिए… क्योंकि अभी तो आप जी नहीं रहे मर रहे हो। हम जिस दिन पैदा होते हैं, उसी दिन से मरना प्रारंभ कर देते हैं… हर वह क्षण जिसको हम आनंदपूर्वक नहीं जीते… वह मृत्यु का क्षण होता है, उस क्षण में हम जीते नहीं हैं, मरते हैं। महाशय आप भी वही कर रहे हैं, आप इन दिनों जी नहीं रहे हैं, आप मर रहे हैं। धीरे-धीरे आपको जीने की जगह मरने की आदत हो जायेगी, फिर उसके बाद आप शहर में जाकर भी जी नहीं पायेंगे… वहाँ भी आप अंतिम रूप से मर जाने तब बस मरते ही रहेंगे। जीवन उन सारे क्षणों का समुच्चय होता है, जिनको हमने जिया और मृत्यु उन सारे क्षणों का समुच्चय होती है, जिनको हमने नहीं जिया.. जिनमें हम बस मरते ही रहे।’ संदीप ने देखा कि यह पूरी बात कहते समय उस आदमी का चेहरे की पूरी मुस्कुराहट चली गयी है और एक अपूर्व शांति-सी उसके चेहरे पर आ गयी है।
‘जब समय की नदी की धारा आपके प्रतिकूल बह रही हो और आप उसे पार नहीं कर पा रहे हों, तो दुखी होने की बजाय अपने आपको धारा के हवाले छोड़ कर बहने के सुख का आनंद लेना चाहिए। नदी का कोई न कोई मोड़ ऐसा आयेगा जहाँ से आप उसे पार कर लेंगे… जब तक वह मोड़ आता है तब तक क्यों दुखी रह कर जीना ? जीवन में जब परिस्थितियाँ ऐसी हों जिनको आप बदल नहीं पा रहे हों, तो उनका आनंद लेना शुरू कर देना चाहिए। जीवन आपका है, आपको ही सब कुछ तय करना है। मेरी सलाह मानिए तो परिवार को ले आइए यहाँ गाँव में। इस दुख को आनंद में बदल दीजिए। असल में तो हमारे जीवन के सौ में से नब्बे दुख हमारे सोचे हुए ही होते हैं, वे दुख असल में कहीं नहीं होते। आप भी सोचे गये, माने गये दुखों से दुखी हैं।’ उस आदमी ने गंभीर स्वर में कहा। संदीप अभी भी उस आदमी के चेहरे में दिखाई दे रहे परिचत निशानों की शिनाख़्त में उलझा हुआ है।
‘मौका जी आ गये… मौका जी आ गये…।’ चिल्लाते हुए पास की गली से छोटे बच्चों की एक टोली दौड़ते हुए निकली और साइकिल को घेर कर खड़ी हो गयी।
‘हाँ-हाँ आ गये मौका जी… पर आज खेलने का समय नहीं है मौका जी के पास, लो ये अपना सामान और ख़ुद ही जाकर खेलो। आज मौका जी आपके गुरुजी के साथ व्यस्त हैं ज़रा।’ कहते हुए उस आदमी ने साइकिल के हैंडल पर टँगी छोटी-छोटी कपड़े की थैलियों में से एक थैली निकाल कर बच्चों को दे दी। बच्चों की आँखों में उस थैली के हाथ में आते ही चमक आ गयी।
‘चलो अब जाओ… जाकर खेलो, मैं आता हूँ थोड़ी देर में फिर तितलियों से मिलने चलेंगे।’ उस आदमी के कहते ही वे बच्चे हँसते-खिलखिलाते, दौड़ लगाते वहाँ से चले गये।
‘मौका जी…? आपने तो कहा था कि आपका कोई नाम नहीं है ?’ बच्चों के जाते ही संदीप ने प्रश्न किया।
‘यह नाम तो बच्चों ने रखा है… मौसम काका जी, उसी को छोटा करके मौका जी कर दिया है। पर यह नाम बस बच्चों के लिए है, बाक़ी दुनिया के लिए नहीं है। जब तक मुझे मेरा ग्राहक नहीं मिलता तब तक मेरी दुनिया ये बच्चे ही होते हैं… हर गाँव के बच्चे। ऐसा भी कह सकते हैं कि मैं इन के लिए ही फेरी लगाता हूँ… बीच-बीच में कोई ग्राहक भी मिल जाता है।’ उस आदमी ने हँसते हुए कहा। संदीप ने कुछ नहीं कहा।
‘आपको कुछ ख़रीदना है मुझसे…? क्यों रोका था मुझे ?’ संदीप को चुप देख कर उस आदमी ने मुस्कुराते हुए पूछा।
‘ख़रीदना तो है… पर क्या ख़रीदूँ समझ नहीं आ रहा। आप तो मौसम बेचते हैं।’ संदीप ने उत्तर दिया।
‘मौसम बाहर नहीं होता है, मौसम तो इंसान के अंदर होता है। जब बाहर का मौसम बदल रहा होता है तब इंसान को अपने अंदर के मौसम को भी उसके अनुरूप अनुकूलित करते हुए बदलना होता है। मौसम इंसान के अंदर ही होता है, मैं उसे बस बाहर निकालता हूँ। पहले लोग इस अनुकूलन की कला जानते थे, इसलिए मौसमों का आनंद लेते थे, वे गर्मी की तेज़ धूप में शरीर को जला कर भी आनंद लेते थे और बरसात की रसधार में शरीर को भिगो कर भी आनंद लेते थे। क्योंकि वे जान गये थे कि मौसम तो असल में अपने ही अंदर होता है। वे अनुकूलन की कला जानते थे, जो अब लोग भूल गये हैं। मैं बस वही कला सिखाता हूँ। मैं मौसम का आनंद लेने की कला बेचता हूँ, इसलिए आप यह कह सकते हैं कि मैं मौसम बेचता हूँ।’ उस आदमी ने विनम्रतापूर्वक कहा।
‘वही तो… मुझे तो समझ में नहीं आ रहा है कि क्या ख़रीदूँ। आपको जो अच्छा लगे वह दे दीजिए।’ संदीप ने उलझन भरे स्वर में कहा।
‘यही…! यही तो आप लोगों की सबसे बड़ी समस्या है। आप वह नहीं लेते जो आपको अच्छा लगता है, आपके लिए कोई दूसरा तय करता है कि आपको क्या लेना है। और अब तो कंपनियाँ आपके लिए तय करने लगी हैं कि आपको क्या लेना है। कंपनी तय करती है कि आपकी मोटरसाइकिल, आपकी कार, आपका मोबाइल… ये सब अब पुराने हो गये हैं, आपको दूसरा नया मॉडल लेना चाहिए, आप कंपनी के तय किये हुए को मान लेते हैं और उस नये को ख़रीदने के लिए अपने-आप को पैसा कमाने वाली भाड़ में झोंक देते हैं। आप जैसे ही वह नया ख़रीदते हैं, कंपनी उससे भी नया कुछ ले आती है और अब आपका लक्ष्य वह नये से भी नया वाला हो जाता है। आप और तेज़ दौड़ना शुरू कर देते हैं। आप दौड़ते रहते हैं और ज़िंदगी आपकी प्रतीक्षा करती रहती है कि आप कब उसे जीते हैं। ज़िंदगी आवाज़ देती है और आप उसे कहते हैं कि बस यह नये मॉडल की कार ख़रीद लूँ, फिर तुझे जीता हूँ… यह नये मॉडल का मोबाइल ख़रीद लूँ फिर सुकून से तुझे जीता हूँ। आप दौड़ते रहते हैं, दौड़ते-दौड़ते एक दिन गिरते हैं और मर जाते हैं… कंपनियों का सारा साज़ो-सामान पीछे छोड़ कर। आप समझ ही नहीं रहे कि बाज़ार आपको मृत्यु की दिशा में पूरी गति से दौड़ने पर मजबूर कर रहा है, आपके पास ज़िंदगी की बाँहों में बाँहें डाल कर बैठने का भी समय नहीं है। हुज़ूर, ख़ुद तय करना शुरू कीजिए कि आपको क्या ख़रीदना है और क्या नहीं।’ उस आदमी ने आख़िरी वाक्य पर ज़ोर देकर कहा।
‘आप चाहे जो कुछ भी कहें, पर इस बार तो आपको ही तय करना होगा कि मुझे क्या ख़रीदना चाहिए। आपकी बातें ऐसी हैं कि मुझे कुछ समझ में आ रहा है, कुछ नहीं। हो सकता है मैं ठीक निर्णय नहीं ले पाऊँ।’ संदीप ने कहा।
वह आदमी कुछ देर तक संदीप को देखता रहा। कुछ देर बाद बोला- ‘आज तो देर हो गयी, अगली बार आऊँगा तो बताऊँगा कि आपको क्या ख़रीदना चाहिए। आज अगर कुछ तय कर भी लिया तो आज तो समय बहुत हो गया है। मौसम की चीज़ें ख़रीदने के लिए आपको मेरे साथ मौसम के पास चलना पड़ेगा। आज उसके लिए समय नहीं है। वहाँ बच्चे भी मेरा इंतज़ार कर रहे होंगे।’ कहते हुए वह आदमी चलने को हुआ।
‘अगली बार कब आयेंगे आप…?’ उसे जाने को तत्पर देख संदीप ने पूछा।
‘अगली बार…? अगली बार असल में एक छलावा है, जो आ भी सकता है और नहीं भी। जीवन रास्ते की तरह नहीं होता कि एक जगह से शुरू होकर दूसरी जगह पर पहुँचे। अगली बार का कुछ नहीं कह सकता। पर हाँ अब यहाँ मेरा एक ग्राहक है तो मुझे तो आना ही पड़ेगा। कब… अभी नहीं बता कर जा सकता। इंतज़ार करते रहियेगा।’ कहते हुए वह आदमी साइकिल का पैडल मार कर आगे बढ़ गया। संदीप वहीं खड़ा उसे जाते देखता रहा। कुछ दूर जाने के बाद उस आदमी ने पुकार लगायी-
“एक रुपये में झर-झर झरना ऽऽऽ, दो में राम चिरैया ऽऽ
तीन रुपये में धूप क्वार की ले लो मेरे भैया ऽऽऽ
चार आने में शरद चाँदनी ऽऽ आठ में नीला अंबर ऽऽ
मौसम बेचने वाला आया ऽऽ घर से निकलो बाहर ऽऽ”
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उसके बाद लगभग एक माह तक वह साइकिल वाला आया ही नहीं। संदीप ने शुरू में उसके आने का इंतज़ार किया। सुरेश से उसके बारे में पूछा तो सुरेश ने बताया कि उस आदमी के आने का कोई तय नहीं है, वह पहले भी कभी-कभी एक-एक, डेढ़-डेढ़ महीने के लिए ग़ायब हो जाता रहा है, फिर किसी दिन अचानक आ जाता है। इस बीच स्कूल में त्योहारों की छुट्टी भी लग गयी, तो संदीप का भी गाँव आना-जाना बंद हो गया। धीरे-धीरे उस आदमी के बारे में संदीप ने सोचना बंद कर दिया। दो बार की ही तो मुलाक़ात थी उस आदमी से, कितने दिन याद रखा जाता उसे। त्योहार में पत्नी और बेटी के साथ पिता के घर चला गया। आदमी जब कहीं और व्यस्त हो जाता है, तो कहीं और की यादें धुँधली हो-होकर ख़त्म होने लगती हैं।
छुट्टियों ख़त्म होने के बाद संदीप ने फिर स्कूल ज्वाइन कर लिया। मगर इस बार वह गाँव अकेला नहीं आया, कोरबा से पत्नी और बेटी के साथ मय साज़ो-सामान के गाँव आ गया। प्रधान जी के मकान को किराये पर ले लिया और उसमें ही रह रहा है। कोरबा के दो छोटी कोठरियों जैसे कमरों वाले घर के मुकाबले यह घर और इसके कमरे बहुत बड़े हैं। इतने बड़े कि उनको भरने जितना सामान भी नहीं है संदीप के पास। अब संदीप के पास भी समय ही समय है। शाम को जब तबले का रियाज़ करने बैठता है तो प्रधान जी आकर बैठ जाते हैं और मंत्रमुग्ध होकर उसका तबला-वादन सुनते रहते हैं।
गाँव आने के बाद संदीप को उस आदमी की याद फिर आने लगी। हर नये दिन संदीप को उस आदमी का इंतज़ार बना रहता है, मगर वह आदमी बहुत दिनों तक गाँव में नहीं आया। संदीप के अंदर इंतज़ार की शिद्दत मद्धम पड़ने ही लगी थी कि एक दिन रविवार को जब वह सुबह-सुबह घर में बैठा तबले का रियाज़ कर रहा था कि बाहर से पुकार आयी-
“एक रुपये में ठिठुरा सूरज ऽऽऽ, दो में ले लो मावठ ऽऽ
तीन रुपये में लो अलाव पर सोलह चौके चौंसठ ऽऽऽ
चार आने में कोहरा ले लो ऽऽ आठ आने में पाला ऽऽ
मौसम बेचने वाला आया ऽऽ घर से निकलो लाला ऽऽ”
रविवार के अलसाये दिन में यह पुकार जैसे किसी दूसरे समय से निकल कर संदीप के कानों तक पहुँची। संदीप को एक बार विश्वास ही नहीं हुआ कि यह पुकार सचमुच में आयी है। जैसे ही संदीप ने पुकार सुनी वैसे ही वह तेज़ क़दमों से घर की सीढ़ियाँ उतर कर नीचे की तरफ़ बढ़ गया। उसने देखा वह साइकिल वाला कुछ दूरी पर बच्चों से घिरा हुआ खड़ा है। संदीप वहीं खड़ा होकर उसका इंतज़ार करने लगा। इस बीच उस आदमी की नज़र भी संदीप पर पड़ी, तो उसने वहीं से एक हाथ हवा में हिला कर अभिवादन किया, संदीप ने भी उसी प्रकार उत्तर दे दिया।
‘कहाँ चले गये थे आप ? बहुत दिनों बाद आये।’ जैसे ही वह आदमी पास आया वैसे ही संदीप ने प्रश्न किया। आज उस आदमी की साइकिल फूलों की जगह फलों से सजी है। बेर, आँवले और अमरूद हैंडल पर, कैरियर पर, सब जगह लटके हैं।
‘मैं…? मैं इंतज़ार कर रहा था कि कब आप अपने परिवार को लेकर गाँव आते हैं… क्योंकि मेरा काम तो उसके बाद ही शुरू होना था। यदि आप परिवार को लेकर गाँव नहीं आते तो फिर आप मेरे काम के व्यक्ति नहीं थे, फिर मैं आप पर समय व्यर्थ नहीं करता। वैसे इस बीच मैं एक ग्राहक के साथ उलझ गया था। फिर यह समय ऐसा होता है जिसमें सब त्योहारों में व्यस्त हो जाते हैं, बरसात जा चुकी होती है, ठंड आयी नहीं होती है, ऐसे में मेरे पास बेचने को कुछ होता नहीं है। बस मैं भी उस ग्राहक के साथ व्यस्त हो गया।’ उस आदमी ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया।
‘क्या समस्या थी ग्राहक की ?’ संदीप ने पूछा।
‘समस्या तो यहाँ सबकी एक ही है। सबके अंदर के मौसम बुझ गये हैं। न अंदर जेठ तपता है, न सावन बरसता है और न पूस ठिठुरता है। अंदर के मौसम जब बुझ जायें तो बहुत मेहनत लगती है उनको फिर से पुराने रूप में लौटाने में।’ उस आदमी ने उत्तर दिया।
‘आपको कैसे पता चला कि उसके अंदर के मौसम बुझ गये हैं ?’ संदीप ने प्रश्न किया।
‘वैसे ही हुज़ूर, जैसे आपको देख कर पता चला था, जब मौसम बुझते हैं तो सबसे पहले आँखें बुझ जाती हैं।’ उस आदमी ने उत्तर दिया।
‘मेरी आँखें अभी भी बुझी हैं ?’ संदीप ने प्रश्न किया।
‘नहीं… थोड़ी चमक तो लौटी है, पर अभी भी पूरी तरह से नहीं लौटी है।’ उस आदमी ने मुस्कुराते हुए कहा।
‘मैंने आपसे पिछली बार कहा था कि आप तय करेंगे कि मुझे आपसे क्या ख़रीदना है।’ संदीप ने कहा।
‘हाँ मुझे याद है, इसीलिए तो आज थोड़ा जल्दी आ गया हूँ।’ उस आदमी ने सूरज की तरफ़ देखते हुए कहा।
‘हाँ हर बार आप चार बजे आते थे आज बारह बजे ही आ गये हैं।’ संदीप ने कहा।
‘वह मुझे नहीं पता, मैं घड़ी के चलने को समय नहीं मानता, मैं सूरज के चलने और मौसम के बदलने को समय मानता हूँ। मैंने अपनी ज़िंदगी से सैकेंड, मिनट, घंटे, दिन, सप्ताह, महीने, साल… जैसे सारे मानक हटा दिये हैं। मुझे नहीं पता होता कि इस समय कितने बज कर कितने मिनट हुए हैं, कौन सा दिन है, कौन सा महीना है, कौन सा साल चल रहा है और कौन सी सदी चल रही है। मैं तो मौसम के हिसाब से चलता हूँ। हाथ में बँधी घड़ी और दीवार पर टँगा कैलेंडर हमें जीने नहीं देते हैं, ये हमें बेचैन किये रहते हैं, बेचैन किये रहते हैं भागते रहने के लिए। मैं समय के मानकों से अपने आप को मुक्त कर चुका हूँ। मेरा न कोई अतीत है और न कोई भविष्य है। अतीत स्मृति है, वर्तमान सत्य है और भविष्य स्वप्न है, मैंने अपने आपको स्मृति और स्वप्न से मुक्त कर लिया है, अब मेरे पास केवल सत्य है। अतीत से इतिहास बनता है और भविष्य से योजनाएँ, जिन सभ्यताओं के पास इतिहास और योजनाएँ नहीं होतीं, वे सभ्यताएँ ज़्यादा सुखी रहती हैं।’ उस आदमी ने कहा। ‘और वे इंसान भी।’ कुछ देर की चुप्पी के बाद कहा उस आदमी ने। संदीप ने कुछ नहीं कहा बस उस आदमी को देखता रहा।
‘चलिए जनाब… आपके लिए ही आया हूँ आज मैं।’ उस आदमी ने संदीप को चुप देख कर कहा।
‘चलिए…। मैं तो कितने दिनों से आपके ही इंतज़ार में हूँ।’ संदीप के कहते ही उस आदमी ने साइकिल बढ़ा दी। संदीप भी साथ-साथ चल पड़ा।
‘अरे रुकिये तो ज़रा…।’ कुछ ही दूर जाकर उस आदमी ने साइकिल रोकते हुए कहा।
‘क्या हुआ…?’ संदीप ने प्रश्न किया।
‘मौसम के पास बिना संगीत साथ लिये नहीं जाते, मौसम बुरा मान जाता है। अपने तबले उठा लाइए घर से।’ उस आदमी ने मुस्कुराते हुए कहा।
‘तबले…?’ संदीप ने उलझन भरे स्वर में पूछा।
‘ले आइए… मेरी साइकिल के कैरियर पर बहुत जगह है।’ उस आदमी ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया। संदीप अपने घर की तरफ़ मुड़ गया।
संदीप उस आदमी के साथ गाँव के दूसरे सिरे पर स्थित एक खेत की मेड़ पर बैठा है। यह अंतिम खेत है, इसके बाद जंगल शुरू हो जाता है। जंगल जो सामने की एक पहाड़ी पर ऊपर की तरफ़ फैला हुआ है। जहाँ ये लोग बैठे हैं उसके ठीक सामने एक ऊँचाई से गिरता हुआ झरना है, जो पहाड़ी से उतरती हुई नदी बना रही है। झरना जहाँ गिर रहा है वहाँ एक गहरा और चौड़ा पानी का कुंड है, जिसका पानी गहरा नीला-हरा है, कुंड में गिरने के बाद उसके एक कोने से निकल कर नदी फिर आगे की तरफ़ बह रही है। चारों तरफ़ से भिन्न-भिन्न पक्षियों की आवाज़ें आ रही हैं। अगहन का समय है, ठंड की तीखी-सी कुनमुनाहट हवा में है।
‘आपने बताया नहीं कि मुझे आपसे क्या लेना चाहिए ?’ कुछ देर की ख़ामोशी के बाद संदीप ने कहा।
‘संदीप तुम आदिवासी हो, यह जंगल, यह नदी, यह पहाड़… ये सब तुम्हारी विरासत हैं, इन पर केवल और केवल तुम्हारा ही अधिकार है… और किसी का नहीं। यह पूरी प्रकृति तुमको पूर्वजों की परंपरा से प्राप्त हुई है। तुम असल में प्रकृति की संतान हो। इसलिए तुम्हें अपनी माँ की हत्या होते देख कर दुख होना चाहिए, क्रोध आना चाहिए, बेचैनी होना चाहिए… मगर ऐसा कुछ नहीं हो रहा है। ऐसा कुछ भी नहीं हो रहा है।’ उस आदमी की आवाज़ में पहली बार एक ठंडी-सी उदासी महसूस की संदीप ने। और पहली बार उसने संदीप को ‘आप’ के स्थान पर ‘तुम’ कह कर संबोधित किया।
‘तुम्हारे पुरखे अपनी इस प्रकृति माँ के पास जीवन की मूलभूत आवश्यकताओं का निवेदन लेकर जाते थे और उनका यह निवेदन हमेशा स्वीकार होता था। प्रकृति ने उनको कभी भूखे नहीं मरने दिया। किन्तु अब कुछ लोग जिनके अंदर लालच का एक अपार और असीम दलदल फैला है, वे तुम्हारी माँ के पास अपने लालच के तीखे नाख़ून लेकर आये हैं। अब तुम्हें अपने पुरखों की विरासत को बचाना है… तुम्हारे पुरखे विरासत में प्रकृति का पूरा संसार तुम्हें देकर गये हैं… अपनी विरासत को बचाने का संघर्ष अब तुम्हें करना है…।’ उस आदमी की आवाज़ में थोड़ी दृढ़ता-सी आ गयी है।
‘आप मुझे यहाँ क्या देने के लिए लेकर आये हैं ?’ संदीप ने अपने प्रश्न को एक बार थोड़े बदले रूप में पूछा।
‘सुनो संदीप… आज मैं तुमको यह सब कुछ दे रहा हूँ। यह पहाड़, यह जंगल, यह नदी, ये पेड़, ये खेत, यह झरना, ये पंछी… यह सब आज से तुम्हारे हवाले होता है। यहाँ से तुमको इनको लेकर आगे जाना है। तुम्हारे बच्चों के लिए और उनके भी बच्चों के लिए।’ उस आदमी ने कुछ उदास स्वर में कहा।
‘मैं कुछ समझा नहीं।’ संदीप ने कहा।
‘पता है अगर जो कुछ चल रहा है वैसा ही चलता रहा, तो एक दिन यह सब कुछ नहीं रहेगा। एक दिन पूर्व से पश्चिम की तरफ़ चलती व्यापारिक पवनें चलना बंद हो जायेंगी। अगर वे पवनें ही नहीं रहीं तो फिर कौन हमारे देश आयेगा मानसून को लेकर। अगर मानसून ही नहीं रहा तो फिर सारे मौसम अपने आप ही समाप्त हो जायेंगे। प्रकृति ने सब कुछ बहुत सोच-समझ कर और बहुत वैज्ञानिक तरीक़े से रचा है। किसी पठार के तपने से वहाँ की हवा गर्म होकर ऊपर उठेगी और नीचे की उस ख़ाली जगह को भरने के लिए मेडागास्कर के पास से व्यापारिक पवनें दौड़ पड़ेंगी समुद्र के रास्ते, समुद्र की नमी को समेटते हुए, जो बरस जायेंगी बरसात बन कर सारे देश में। बरसती ही रहेंगी तीन-चार महीनों तक। यह पूरा चक्र ही रुक जायेगा एक दिन।’ उस आदमी की आवाज़ में अभी भी उदासी घुली हुई है।
‘क्यों रुक जायेगा ?’ संदीप ने प्रश्न किया।
‘यह सब कुछ संतुलित है एक-दूसरे से, जंगल, पहाड़, पठार, ये सब मिल कर पूरा मौसम रचते हैं। अगर आप किसी भी एक को हटा दोगे तो सब असंतुलित हो जायेगा।’ उस आदमी ने उत्तर दिया।
‘जैसे…?’ संदीप ने प्रश्न किया।
‘जैसे हम अरावली पर्वत को नष्ट कर रहे हैं, मानों उसकी कोई ज़रूरत ही नहीं है। अगर अरावली अपनी जगह पर नहीं होगा तो दिसंबर-जनवरी में पश्चिम के भूमध्य सागर से आने वाली बरसाती हवाओं को रोकने वाला कोई चौकीदार नहीं होगा। इन हवाओं के पंखों पर सवार होकर बरसात रबी की पूरी फ़सल को नष्ट कर देगी। लोगों को खाने के लिए गेहूँ, चना कुछ नहीं मिलेगा। मगर यह बात उनको नहीं समझ आ रही, जो अरावली को नष्ट करने में लगे हैं। उनको नहीं पता कि हिंदूकुश के दर्रों से निकल कर जो हवाएँ हमारी तरफ़ भागती हैं उनको अरावली रोक देता है। उनको लगता है कि अरावली व्यर्थ ही अपनी जगह पर खड़ा हुआ है। प्रकृति में कुछ भी व्यर्थ नहीं है, सबकी कुछ न कुछ उपयोगिता है, फिर वह अरावली पर्वत हो या अंडमान के वर्षा-वन हों।’ उस आदमी की आवाज़ में अब उदासी के साथ थोड़ा रोष भी आ गया है।
‘मगर आप मुझसे क्या चाहते हैं ?’ संदीप ने उलझन भरे स्वर में पूछा।
‘तुमसे…?’ उस आदमी ने संदीप की आँखों में झाँकते हुए कहा ‘तुमसे मैं यह चाहता हूँ कि तुम अपने घर के और स्कूल के बच्चों को जोड़ो इन जंगलों से, पहाड़ों से, नदियों से, फूलों से, पेड़ों से, पक्षियों से, पशुओं से… उनसे कहो कि झरने की तरफ़, पहाड़ों की तरफ़ पीठ करके उनके साथ सेल्फ़ी मत खींचो, झरने को देखो, पहाड़ों को देखो, ये देखने के लिए हैं पीठ करने के लिए नहीं है। उनको समझाओ कि बरसात का मतलब केवल पानी गिरना नहीं होता, बरसात का मतलब होता है नदी का उमड़ना, हरियाली का फैलना, पहाड़ों पर बादलों का उतरना। उनको बरसात से, पानी से, कीचड़ से दूर मत करो। बरसाती कीचड़ हमारे पैरों से लिपटकर हमें ज़मीन से जोड़ने की कोशिश करती है। इस तरह की सारी चीज़ों से मिलकर ही तो एक मौसम बनता है। बच्चों को इन सबसे प्यार करना सिखलाओ। हम जिस भी चीज़ से प्यार करते हैं उसे नष्ट नहीं होने देते, उसे बचाने की कोशिश करते हैं।’ उस आदमी ने उत्तर दिया।
‘लेकिन कैसे करूँगा मैं यह सब ?’ संदीप ने फिर प्रश्न किया।
‘कबीर ने बताया है कि कैसे करना है- ‘जो घर फूँके आपनौ चले हमारे साथ’, और ग़ालिब ने भी कहा है- ‘इक आग का दरिया और डूब के जाना है’, बस वही करना होगा।’ उस आदमी ने उत्तर दिया।
‘मेरा प्रश्न अब भी वही है, यह सब कैसे करना होगा ?’ संदीप ने प्रश्न किया।
‘जब कोई धनपशु देश की सरकार से परमिट लेकर सोने की कुल्हाड़ी से जंगल को या चाँदी की कुदाल से पहाड़ों को काटने आयेगा, तब तुम्हें अपने लोगों के साथ उसके रास्ते में खड़ा होना होगा। तुम्हारे लोगों का दल, जो तुम्हें बनाना होगा। वह दल- जो उन जंगलों से और पहाड़ों से प्यार करने वाला होगा। जो सीना तान के उस धनपशु के सामने खड़ा हो जायेगा। याद रखना कि यह केवल उस धनपशु का विरोध नहीं होगा, यह सरकार का भी विरोध होगा, क्योंकि परमिट तो उसीने दिया होगा। इसलिए तुम लोगों का जितना दुश्मन वह धनपशु होगा, उससे अधिक तुम्हारी दुश्मन सरकार होगी। असल में वह धनपशु ही सरकार होगा। इसलिए तुमको सरकार से ही टकराना होगा। उस धनपशु के साथ होगी सरकार की पुलिस भी और ज़रूरत पड़ने पर सेना भी। और तुम्हारे सामने होंगे वे लोग भी, जो तुम्हें और तुम्हारे लोगों को देश के विकास में अड़चन बता कर देशद्रोही घोषित कर रहे होंगे। फिर भी लड़ना तो होगा ही।’ उस आदमी ने संदीप की आँखों में आँखें डाल कर उत्तर दिया।
‘लेकिन यह दल कैसे तैयार होगा ? कौन लोग होंगे इस दल में ? और ये लड़ेंगे कैसे उन लोगों से ?’ संदीप ने फिर पूछा।
वह आदमी संदीप के पास से उठ कर गया और झरने के ठीक पास की एक चट्टान की कगार पर खड़ा हो गया। उसके ठीक पीछे से नदी बहती हुई आ रही है और उसके पैरों के पीछे कुछ ही दूरी पर वह नदी छलाँग मार कर नीचे के गहरे कुंड में गिर रही है। वह आदमी वहाँ खड़ा होकर कुछ देर तक संदीप को देखता रहा।
‘जिन बच्चों को तुम मौसम से, प्रकृति से जोड़ोगे, वे बच्चे ही कल वह दल बनेंगे… वे बच्चे ही कल विरोध में सामने आ जायेंगे, बशर्ते उनको आज से ही इसके लिए तैयार कर दिया जाये।’ उस आदमी ने कुछ तेज़ आवाज़ में कहा। फिर उसने अपने दोनों हाथ हवा में उठा दिये। ‘तुम्हें उन बच्चों को तैयार करना होगा कि अवसर आने पर वे इस तरह हाथ उठा कर विरोध में खड़े हो जायें। चिल्ला कर, आँखों में आँखें डाल कर कहें- ‘हसदेव अरंड के ये सात लाख पेड़ मेरे पुरखे हैं… मैं कोयले की लालच में यहाँ आये किसी धनपशु को इनको नहीं काटने दूँगा।’ यह कहना होगा, यह कहना ही होगा। हसदेव में भी, अंडमान में भी और अरावली पर भी।’ उस आदमी ने अपने हाथों को उसी प्रकार हवा में उठाए तेज़ आवाज़ में कहा।
‘हसदेव अरंड के ये सात लाख पेड़ मेरे पुरखे हैं… मैं कोयले की लालच में यहाँ आये किसी धनपशु को इनको नहीं काटने दूँगा।’ यह वाक्य जैसे बिजली की तरह कौंधता हुआ संदीप के दिमाग़ को प्रकाशित करता हुआ गुज़र गया। संदीप को याद आया कि इस आदमी की यह हाथ ऊपर उठाए हुए मुद्रा इसी वाक्य के साथ किसी समाचार पत्र के मुखपृष्ठ पर प्रकाशित हुई थी। ‘ये तो सतीश मानव हैं…’ संदीप के दिमाग़ में उस आदमी का नाम अचानक उभर कर आ गया। सतीश मानव… छत्तीसगढ़ के वह लोक-गायक और रंगकर्मी, जो पिछले कुछ सालों से लापता हैं। जिन्होंने हसदेव अरण्य जंगल, जिसे आदिवासी हसदेव अरंड कहते हैं, को एक बड़े उद्योगपति द्वारा कोयले की खदान के लिए काटे जाने का, आदिवासियों को साथ लेकर व्यापक पैमाने पर विरोध किया था। वहाँ सात लाख पेड़ों को काटे जाने की अनुमति उस उद्योगपति को सरकार ने प्रदान कर दी है। सतीश मानव उसके विरोध में खड़े हो गये थे। उन्होंने आदिवासियों को साथ लेकर उद्योगपति की नाक में दम कर दिया था। वह उद्योगपति सरकार की अनुमति के बाद भी पेड़ नहीं काट पा रहा था। फिर एक दिन सतीश मानव की पत्नी और बच्चे एक कार दुर्घटना में मारे गये। लोग कहते हैं कि वह दुर्घटना भी दुर्घटना नहीं थी। और उसके कुछ ही दिनों बाद सतीश मानव भी लापता हो गये। आज तक उनका कोई पता नहीं चला। उसके बाद पेड़ कटने प्रारंभ हो गये थे।
जैसे ही संदीप को उस आदमी का नाम याद आया वह तुरंत उठ कर खड़ा हो गया। वह जैसे ही उस आदमी की तरफ़ बढ़ने को हुआ वैसे ही उस आदमी ने अपने झोले से एक पाइप जैसी कोई चीज़ संदीप की तरफ़ फैंकी। संदीप ने उस चीज़ को हाथों में झेल कर देखा कि वह डेढ़-दो फुट लंबी, कुछ मोटे पाइप जैसी चीज़ है, जिसके दोनों सिरों पर ढक्कन लगे हैं।
‘क्या है यह…?’ संदीप ने उलझन भरे स्वर में प्रश्न किया।
‘यह बैटन है…।’ उस आदमी ने वहीं से तेज़ स्वर में कहा।
‘बैटन…?’ संदीप ने फिर पूछा।
‘बैटन नहीं समझते…? रिले रेस में एक धावक अपने हिस्से की दौड़ पूरी कर दूसरे धावक को जो देता है, यह वही है। खोल कर देखो उसे।’ उस आदमी ने अपने कंधे पर टँगे झोले को नीचे रखते हुए कहा।
संदीप ने उस पाइप के एक तरफ़ के ढक्कन को खोल कर देखा। उसके अंदर कई सारे काग़ज़ गोल-गोल करके रखे हुए हैं। संदीप ने उन काग़ज़ों को निकाला तो देखा। काग़ज़ों पर बहुत सुंदर हस्तलिपि में कविताएँ लिखी हुई हैं, वही कविताएँ जो वह आदमी गाता रहता है। हर कविता के नीचे उसके बारे में जानकारी लिखी हुई है। कुछ रेखाचित्र भी बने हुए हैं। संदीप ने कुछ उलझन भरी नज़रों से उस आदमी की तरफ़ देखा।
‘यहाँ से तुमको दौड़ना है बैटन लेकर। तुम कलाकार हो, यह सब एक कलाकार ही समझ सकता है। इसीलिए मैंने तुमको चुना है। चलो, अब तुम्हारी बारी है मौसम को ख़ुश करने की, तबला उठाओ और आठ मात्रा में कहरवा बजाओ… काली एक पर।’ उस आदमी ने वहीं खड़े-खड़े कहा।
संदीप ने अपने तबले और डग्गे को झोले से बाहर निकाला और कुछ देर तक लकड़ी के गुटकों को हथोड़ी से ठोंक कर सुर मिलाता रहा। कुछ ही देर में संदीप ने उस आदमी के कहे अनुसार आठ मात्रिक कहरवा काली एक पर बजाना शुरू कर दिया। संदीप ने देखा कि तबले की थाप के साथ ही उस आदमी के चेहरे के भाव बदलते जा रहे हैं। उसने अपनी आँखें बंद कर ली हैं और जैसे किसी परम शांति में डूबता जा रहा है वह आदमी। तबले की थाप के साथ जैसे कोई लहर-सी उस आदमी के पूरी शरीर में उठ रही है, संदीप को लग रहा है जैसे वह आदमी अभी एकदम से नृत्य करना प्रारंभ कर देगा। उस आदमी के शरीर की भंगिमाएँ जैसे किसी नर्तक-सी होती जा रही हैं। हर तिरकिट पर उस आदमी का चेहरा जैसे अपार प्रसन्नता या आंतरिक सुख से भर जाता है। संदीप हैरत में डूबा तबला बजाये जा रहा है। यह उसके जीवन का सबसे अनोखा तबला वादन है।
‘एक क़दम ही काफ़ी है…।’ उस आदमी ने कहरवा की ताल से सुर मिलाते हुए अचानक एक पंक्ति गायी। संदीप ने प्रश्नवाचक नज़रों से उस आदमी की तरफ़ देखा।
‘तुमने नहीं सुनी है यह गीत-प्रार्थना…?’ उस आदमी के प्रश्न पर संदीप ने तबला बजाते हुए ही सिर हिला कर नकारात्मक उत्तर दिया।
‘यह 1833 में जॉन हेनरी न्यूमैन द्वारा लिखी गयी एक प्रसिद्ध गीत-प्रार्थना ‘लीड, काइंडली लाइट’ है। यह अंधकार और अनिश्चितता के समय में रोशनी से की गई एक प्रार्थना है, कुछ-कुछ वैसी ही जैसी प्रार्थना बृहदारण्यक उपनिषद् में ‘असतो मा सद्गमय। तमसो मा ज्योतिर्गमय। मृत्योर्मा अमृतं गमय॥’ है। या जैसा क़ुरआन में है- ‘कुन-फ़-यकून, उसने कहा- होजा, और वह हो जाता है’। इस गीत प्रार्थना को इस एक पंक्ति के लिए याद किया जाता है- ‘एक कदम ही काफ़ी है…’। इसे न्यूमैन ने तब लिखा गया था जब वे भूमध्य सागर में एक जहाज़ पर फँसे हुए थे। इसमें किसी ईश्वर से प्रार्थना नहीं है बल्कि प्रकाश से प्रार्थना है। तुम इसी तरह बजाते रहो… मैं ताल के साथ सुर मिला कर वह प्रार्थना गाकर सुनाता हूँ तुमको।’ उस आदमी ने कहा।
संदीप पूर्ववत तबला बजाता रहा। उस आदमी ने तबले की ताल के बीच गाना शुरू करने के लिए कुछ देर तक सही स्थान आने का इंतज़ार किया और फिर एकदम गाना प्रारंभ कर दिया-
‘हे दयालु प्रकाश,
चारों ओर फैले अंधकार में मेरा मार्गदर्शन करो!
रात गहरी है, और मैं घर से बहुत दूर हूँ,
मेरा मार्गदर्शन करो!
मेरे क़दमों को थामे रहो;
मैं दूर का दृश्य देखने की इच्छा नहीं रखता;
मेरे लिए एक कदम ही काफ़ी है।’
संदीप ने देखा कि वह आदमी गाते समय आँखें बंद किये-किये अपना सिर और दोनों हाथ आकाश की तरफ़ उठाए है, जैसे किसी अज्ञात से जुड़ने का प्रयास कर रहा हो। उसके पैर हल्के-हल्के से थिरक भी रहे हैं, बिलकुल तबले की ताल से ताल मिलाकर। गीत समाप्त होने के बाद वह आदमी ‘एक क़दम ही काफ़ी है’, इस पंक्ति को बार-बार दोहराते हुए दोनों हाथ और सिर आकाश की तरफ़ उठाए बाक़ायदा नाचने लगा। कहरवा के साथ वह पंक्ति इस तरह साम्य स्थापित कर रही है, जैसे उसे कहरवा के लिए ही लिखा गया हो। वह आदमी उस पंक्ति को अलग-अलग तरह से गा रहा है और सूफ़ियों की तरह हाथ और सिर उठाए नाच रहा है। उसके नाच की गति धीरे-धीरे बढ़ती जा रही है। संदीप ने देखा कि उस आदमी की दोनों आँखों से आँसुओं की धार-सी बहने लगी है। वह अपनी सुध-बुध खोकर दीवानों की तरह नाच रहा है, उसका नाच देख कर संदीप को तस्वीरों में देखे मीरा बाई के नृत्य की याद आ रही है… वह आदमी भी जैसे प्रेम-दीवाना होकर ही नाच रहा है। अब वह ‘एक क़दम ही काफ़ी है’ के साथ बीच-बीच में ‘कुन-फ़-यकून’ और ‘मृत्योर्मा अमृतं गमय:’ भी गा रहा है।
अचानक संदीप ने देखा कि उस आदमी ने ‘एक क़दम ही काफ़ी है’ गाते हुए अपनी जगह से एक क़दम पीछे बढ़ाया है। संदीप जब तक कुछ समझता, उस आदमी को सँभलने की कहता, तब तक देखते ही देखते उस आदमी ने नाचते-नाचते ही ‘मृत्योर्मा अमृतं गमय:’ गाते हुए चट्टान की कगार से अपने शरीर को एकदम पीछे की तरफ़ उछाल दिया। तबले पर थाप देते संदीप के हाथ एकदम अवाक् होकर रुक गये। हैरत में डूबे हुए संदीप को उस आदमी का तेज़ स्वर सुनाई दिया- ‘अलविदा… हश्र में फिर मुलाक़ात होगी….।’ कुछ दूर तक ऊपर जाने के बाद वह आदमी झरने के साथ नीचे गिरने लगा। कुछ ही देर में वह आदमी संदीप की नज़रों से ओझल हो गया। संदीप अपनी जगह पर हतप्रभ-सा एक हाथ तबले पर और एक डग्गे पर रखे बैठा हुआ है।
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पंकज सुबीर- उपन्यास- ये वो सहर तो नहीं, अकाल में उत्सव, जिन्हें जुर्म-ए-इश्क़ पे नाज़ था, रूदादे-सफ़र। कहानी संग्रह- ईस्ट इंडिया कम्पनी, महुआ घटवारिन और अन्य कहानियाँ, कसाब डॉट गांधी एट यरवदा डॉट इन, चौपड़े की चुड़ैलें, होली, प्रेम, रिश्ते, हमेशा देर कर देता हूँ मैं, ज़ोया देसाई कॉटेज, ख़ैबर दर्रा। ग़ज़ल संग्रह- यही तो इश्क़ है। व्यंग्य संग्रह- बुद्धिजीवी सम्मेलन। यात्रा वृत्तांत- यायावर हैं, आवारा हैं, बंजारे हैं। जीवनीपरक पुस्तक- ज़िंदगी की किताब। लम्बी कविता- देहगाथा। कविता संग्रह- उम्मीद की तरह लौटना तुम। संपादन- नई सदी का कथा समय, विमर्श- नक़्क़ाशीदार केबिनेट, बारह चर्चित कहानियाँ, विमर्श दृष्टि- सुधा ओम ढींगरा का साहित्य, कुछ उदास कहानियाँ।
सम्मान- राजेन्द्र यादव हंस कथा-सम्मान, ज्ञानपीठ नवलेखन पुरस्कार, जे. सी. जोशी शब्द साधक जनप्रिय सम्मान, वागीश्वरी पुरस्कार, अंतर्राष्ट्रीय इन्दु शर्मा कथा सम्मान, वनमाली कथा सम्मान, शैलेश मटियानी चित्रा-कुमार पुरस्कार, अभिनव शब्द शिल्पी सम्मान, स्पंदन कृति सम्मान, आचार्य निरंजन नाथ सम्मान, स्पेनिन डॉ. सिद्धनाथ कुमार स्मृति सम्मान, शांति गया शिखर सम्मान, व्यंग्य यात्रा सम्मान, सृजन कुंज सम्मान, पूश्किन सम्मान, दुष्यंत कुमार संग्रहालय कमलेश्वर सम्मान, पृथ्वीनाथ भान साहित्य सम्मान, धर्मवीर भारती शताब्दी सम्मान, रवींद्रनाथ त्यागी स्मृति व्यंग्य यात्रा सोपान सम्मान।
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