
संजीव पालीवाल और मीनाक्षी चौधरी की लिखी किताब आई है ‘सम्पा’। वेस्टलैंड से प्रकाशित इसी किताब पर अपनी विशेष काव्यात्मक शैली में यह टिप्पणी लिखी है लेखक यतीश कुमार ने। आप भी पढ़ सकते हैं- मॉडरेटर
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1.
वह दौड़ में है
दौड़, समय से तेज दौड़ने की है
और वह घड़ी देखकर दौड़ रही है
कोई भी घड़ी समय पर कहाँ चलती है
उसे तो यह भी नहीं पता
कि घड़ी, समय की गति को
और धीमा कर देती है
यह भी, कि घड़ी जब
उल्टी दिशा में घूमने लगे
तो सवालों की सुनामी उठती है
इस बार, समय के काँटे में
ऐसी मछली फंसी है
जिसे समय न निगल पा रहा है
और न ही उगल पा रहा है
2
शब्द, ढाल और वार दोनों होते हैं
विचार, तसल्ली और बेचैनी भी
“मोहक हँसी, यादों में काँटे बन जाते हैं”
उसने यह बात शब्दों को चबाते हुए कहा
विश्वास से उभरा संकल्प
और संकल्प के आगे-आगे भागता
सवालों का दौड़ता रथ
दूरी, समय नहीं
हदस तय कर रही है
धुंध अंधेरे में
उभरती आशा
बंद गुफा में किरण बन
टिमटिमाती है
दो कदम चलो
कि अंधेरा उस रोशनी की सुराख पर
पत्थर रख देता है
ऐसे मौसम में
दर्द रुलाता है
और जिम्मेदारी चुप कराती है
अब यह तय करना मुश्किल है
कि सदमे का
टप-टप बूँद की तरह आना बेहतर है
या एकबारगी खुले नल की तरह
3.
खुशियों का सूरज उगने से मुकर रहा है
आँसुओं के पोखर में चाँद डूबता जा रहा है
और सिसकियों की लहर में
ऊबडूबा रहा है मन
एक परेशान आवाज की बेचैनी के आगे
सब बिसर जाता है
सुध भाप की तरह उड़ जाती है
और आदमी बादल बन भटकता है
एकला चलो के गीत गाते-गाते
“एक से भले दो”
और फिर “हम साथ-साथ हैं” का सुर
हिम्मत देता है
इस ऊहापोह में उम्मीद अकेली लौ है
जो बचे उजास लिए
फड़फड़ाती रहती है
थकने और टूटने में अंतर होता है
अभिमान की लड़ाई
और न्याय की लड़ाई में भी
पर रोना कमजोर होना कतई नहीं है
4.
शब्द संवाद की सीढ़ी हैं
ये कभी तीर
तो कभी पतवार बन जाते हैं
कभी-कभी तो
सिर्फ एक शब्द की पतवार
बैतरणी पार करने के लिए भी
काफी होती है
दुःख और चोट
समझदारी की सीढ़ी हैं
दुःख जब दुःख से मिलता है
तब दोनों का दुःख कम होता है
एक दरख्त की छाया
पिता के आगोश की तरह होती है।
सीने से लिपटते ही
रुलाई के फव्वारे फूटते हैं
और आदमी फिर से बच्चा बन जाता है
5.
निराशा हताशा से चुपके से मिलती है
और संघर्ष के औज़ार कुंद कर देती है
अय्यार आश्वासन अभि’नेता’ बन
रोज मुखौटे बदल लेता है
टूटती उम्मीद, दरकते हौसले
चोटिल हिम्मत
सब रास्ते के बड़े-बड़े गड्ढे हैं
पर इस सफर का मरहम
बड़ों की झप्पी और नसीहतें हैं
उंगली थामे जिनकी अभी नापनी है उसे
कई अंजान मंज़िलें
उम्मीद और निराशा के बीच झूलते हुए भी
हर संभव दरवाजा खटखटाना
और खुद को हार न मानने की याद दिलाना
इस युद्ध की असल चाबी है
6.
चीत्कार जब सीने में धँस जाए
तो ज्वालामुखी का अंकुर फूटता है
बह जाना
ज्वालामुखी होना नहीं है
संताप पीते हुए ताप भरना
ज्वालामुखी होना है
आस्था और विश्वास
चपाती बनाने वाली माँ की दो हथेलियाँ हैं
थपकी की इसी आवाज से
निराशा नजदीक नहीं फटकती
वियोग में मनोयोग जरूरी है
नहीं तो यह कब मनोरोग में बदल जाए
पता ही नहीं चलता
संघर्ष को भी पता नहीं होता
कि देखते-देखते
वह व्यक्तिगत से सार्वजनिक
कब बन जाता है
छोटी-सी लड़ाई युद्ध बन सकती है
पर हर छोटे युद्ध में
महाभारत बनने की सारी संभावनाएँ
मौजूद होती हैं
यह भी सच है
कि हर महाभारत को
जीतने का नियम एक ही होता है
कर्तव्य लालसा से मुक्त हो तो
चक्रव्यूह की चाबी बन जाती है
संयम और समर्पण, करुणा से मिलकर
अंततः सावित्री को
संजीवनी बनाने के गुण
सिखा ही देती है

