
नेपाल में आई भयंक बाढ़ को लेकर लिखी यह एक लेखक की डायरी है। एक ऐसे लेखक की जो भारत-नेपाल के सीमावर्ती इलाक़े में रहता है। उनके जैसे लोगों के लिए नेपाल सीमा पर का देश नहीं है, अपना है। उसका सुख दुख सब अपना है। पढ़िए लिटरेरी क्रिटिक आशुतोष कुमार ठाकुर की यह मार्मिक टीप- मॉडरेटर
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सरहद, स्मृति और एक नदी का दुःख
सुबह जब मैंने नेपाल की खबर देखी, तब कुछ देर तक समझ में नहीं आया कि आखिर वह कौन-सी चीज थी जिसने मुझे भीतर से इतना अस्थिर कर दिया था. समाचार में कुछ नाम थे. रसुवा. तिमुरे. स्याफ्रुबेसी. भोटे कोशी. त्रिशूली. कुछ संख्याएँ थीं. कुछ तस्वीरें थीं. पहाड़ों के बीच भूरे रंग का पानी था, जिसके भीतर लकड़ियाँ, पत्थर, लोहे की चादरें और शायद किसी घर का कोई हिस्सा बहता हुआ दिखाई दे रहा था. कहीं सड़क गायब थी. कहीं पुल का सिर्फ एक हिस्सा बचा था. कहीं नदी के किनारे खड़ी कोई इमारत इस तरह टूटी हुई थी जैसे किसी ने उसे भीतर से खोखला कर दिया हो. समाचार की भाषा में इसे आपदा कहा गया था. लेकिन स्मृति की भाषा में यह कुछ और था. शायद अपना घर. शायद पड़ोस का कोई पुराना आँगन. शायद वह रास्ता जिस पर बचपन में चलते हुए कभी यह नहीं सोचा था कि एक दिन किसी नक्शे पर वह रास्ता दो देशों के बीच का रास्ता कहलाएगा.
बाढ़ का पानी हमेशा सिर्फ पानी नहीं होता. वह अपने साथ पहाड़ का मलबा, चट्टान, पेड़, मिट्टी, सड़क और मनुष्य की बनाई हुई हर वह चीज लेकर आता है जिसे उसके सामने टिकने का भरोसा था. इस बार भी भोटे कोशी की अचानक उफनती धारा ने कुछ ही समय में अपने रास्ते के बहुत कुछ को बदल दिया. तिमुरे और स्याफ्रुबेसी जैसे सीमावर्ती इलाकों में घर और दूसरी संरचनाएँ प्रभावित हुईं. सड़क संपर्क टूटा. पुल क्षतिग्रस्त हुए. जलविद्युत परियोजनाओं को नुकसान पहुँचा. कई लोग लापता हुए और राहत तथा बचाव दलों के सामने सबसे बड़ी चुनौती उन तक पहुँचना रही जिन तक पहुँचने के रास्ते ही पानी अपने साथ ले गया था.

बाढ़ की भयावहता का सबसे कठिन हिस्सा शायद यही होता है कि वह सिर्फ घर नहीं तोड़ती, वह घर तक पहुँचने का रास्ता भी मिटा देती है. जिस पुल से बचावकर्मी आते, वही पुल नदी में नहीं रहता. जिस सड़क से एंबुलेंस आती, वहाँ पत्थरों और कीचड़ की दीवार खड़ी हो जाती है. जिस मोबाइल टावर से किसी परिवार को अपने किसी सदस्य की खबर मिल सकती थी, वह भी खामोश हो जाता है. पहाड़ में आपदा इसलिए और निर्दयी हो जाती है क्योंकि भूगोल स्वयं राहत के रास्ते में खड़ा हो जाता है.
26 अगस्त 2026 की इस घटना की पूरी तस्वीर अभी सामने नहीं आई है. प्रारंभिक वैज्ञानिक आकलनों के अनुसार, तिब्बत की ओर बर्फ और चट्टानों से बने एक अवरोध के टूटने के बाद अचानक बड़ी मात्रा में पानी भोटे कोशी में पहुँचा. वह जलराशि नीचे आई, त्रिशूली से जुड़ी और आगे नारायणी नदी-तंत्र की ओर बढ़ी. वैज्ञानिक जाँच अभी जारी है, इसलिए इसके अंतिम कारण के बारे में किसी एक निष्कर्ष पर पहुँचना जल्दबाजी होगी. लेकिन जो तस्वीरें और शुरुआती रिपोर्टें सामने आई हैं, वे यह बताने के लिए पर्याप्त हैं कि पहाड़ में कुछ घंटे कितनी बड़ी तबाही के लिए पर्याप्त हो सकते हैं.
एक घर के लिए. एक सड़क के लिए. एक पुल के लिए. एक परिवार के लिए.
मनुष्य वर्षों लगाकर घर बनाता है और नदी उसे कुछ मिनटों में अपने साथ ले जा सकती है. यह प्रकृति की शक्ति का कोई रोमानी दृश्य नहीं है. यह मनुष्य की असहायता का दृश्य है. पहाड़ों में रहने वाले लोग इस असहायता को हमसे कहीं अधिक जानते हैं. उन्हें मालूम है कि पहाड़ स्थिर दिखाई देता है, लेकिन भीतर से वह लगातार बदलता रहता है. बर्फ पिघलती है. ढलान खिसकती है. नदी अपना रास्ता बदलती है. चट्टान टूटती है. और कभी-कभी वह चीज, जिसे हम हजारों वर्षों से स्थिर समझते आए हैं, एक रात में अपना आकार बदल देती है.
मैं मधुबनी का हूँ. यह परिचय जितना भौगोलिक है, उतना ही सांस्कृतिक भी. मेरे लिए मिथिला कोई प्रशासनिक इकाई नहीं रही. वह उन आवाजों, गीतों, रिश्तों और यात्राओं से बनी हुई जगह है, जिनकी कोई स्पष्ट सीमा नहीं होती. इसलिए नेपाल मेरे लिए बचपन से ही कोई बहुत दूर का देश नहीं था. नेपाल की तरफ जाते हुए ऐसा कभी नहीं लगा कि हम किसी दूसरी दुनिया में प्रवेश कर रहे हैं. भाषा में बहुत कुछ अपना था. चेहरे परिचित लगते थे. बाजारों में वही आवाजें थीं. देवताओं के नाम वही थे. विवाह के गीतों में वही भाव थे. मौसम वही था. मिट्टी की गंध में कोई अंतरराष्ट्रीय सीमा नहीं थी.
तब शायद पहली बार समझ में आया था कि नक्शा और धरातल एक चीज नहीं होते. नक्शे पर एक रेखा होती है. धरातल में नदी होती है. लोग होते हैं. स्मृतियाँ होती हैं. और कभी-कभी एक पूरा जीवन होता है.
मिथिला में नदियों को सिर्फ पानी के रूप में नहीं देखा गया. नदियाँ स्मृति थीं. नदियाँ भय थीं. नदियाँ जीवन थीं. नदियाँ मृत्यु भी थीं. कोसी का नाम लेते ही उत्तर बिहार के कितने गाँवों की स्मृतियाँ जाग जाती हैं. कमला. बागमती. गंडक. इनके किनारे बसे लोगों के लिए नदी मौसम की खबर भी है और भविष्य की आशंका भी.
बाढ़ का भूगोल समझने के लिए शायद किसी नदी के किनारे खड़े उस किसान को देखना चाहिए जो पानी उतरने के बाद अपने खेत में जाता है. वहाँ खेत होता है, लेकिन खेत वैसा नहीं रहता. उपजाऊ मिट्टी के साथ बीज बह चुके होते हैं. कहीं बालू की मोटी परत जम जाती है. कहीं खेत का किनारा टूट जाता है. और कहीं वह आदमी देर तक उस जगह को देखता रहता है जहाँ पिछले मौसम तक उसकी फसल खड़ी थी.
आपदा की तस्वीरों में मुझे हमेशा कुछ छोटी चीजें बड़ी चीजों से अधिक दिखाई देती हैं. एक चप्पल. एक टूटी हुई खिड़की. मलबे में पड़ी कोई किताब. किसी बच्चे का स्कूल बैग. किसी घर के दरवाजे का बचा हुआ चौखट. ये वस्तुएँ मृत नहीं होतीं. इनमें जीवन बचा रहता है. एक चप्पल बताती है कि कोई बच्चा वहाँ था. एक किताब बताती है कि वहाँ भविष्य की कल्पना की जाती थी. दरवाजे का चौखट बताता है कि वहाँ कभी कोई घर था और घर में लौटने वाले लोग थे.

आँकड़े हमें बताते हैं कि कितने लोग प्रभावित हुए. वस्तुएँ हमें बताती हैं कि वे लोग कौन थे. यही अंतर है समाचार और स्मृति के बीच. समाचार कहता है, इतने लोग लापता हैं. स्मृति पूछती है, उनके नाम क्या हैं? समाचार कहता है, इतने घर नष्ट हुए. स्मृति पूछती है, उन घरों में कौन रहता था?
मुझे लगता है कि आपदा के बाद सबसे कठिन काम मलबा हटाना नहीं होता. मलबा हटाया जा सकता है. सड़क फिर बनाई जा सकती है. पुल फिर खड़ा किया जा सकता है. घर फिर बनाया जा सकता है. लेकिन किसी व्यक्ति को यह विश्वास दिलाना कि वह फिर सुरक्षित है, बहुत कठिन होता है.
जिस बच्चे ने अपनी आँखों के सामने नदी को घर निगलते देखा है, उसके लिए अगली बारिश सिर्फ बारिश नहीं होगी. जिस माँ ने अपने बच्चे को मलबे में खोजा है, उसके लिए नदी सिर्फ नदी नहीं होगी. जिस किसान की उपजाऊ मिट्टी बह गई है, उसके लिए खेत सिर्फ जमीन नहीं रहेगा. आपदा धरातल को ही नहीं बदलती. वह मनुष्य के भीतर का स्मृति-प्रदेश भी बदल देती है. घर और भय के बीच की दूरी कम हो जाती है. नदी और मृत्यु के बीच की दूरी कम हो जाती है. और स्मृति बहुत लंबे समय तक वहीं बैठी रहती है जहाँ कभी घर हुआ करता था.
लेकिन हमारी आधुनिक सभ्यता ने पहाड़ को प्रायः एक संसाधन की तरह देखना शुरू कर दिया है. सड़क. सुरंग. बाँध. जलविद्युत. पर्यटन. निवेश. विकास की इन सारी आकांक्षाओं के बीच पहाड़ का अपना धैर्य और उसकी अपनी सीमाएँ अक्सर पीछे छूट जाती हैं. हमें यह याद रखना होगा कि पहाड़ इन सबके पहले भी थे. और इनके बाद भी रहेंगे. सवाल यह है कि उनके साथ हम रहेंगे या नहीं.
मिथिला की संस्कृति में शायद इसीलिए विस्थापन और प्रतीक्षा के इतने गीत हैं. सीता की स्मृति भी इसी सांस्कृतिक भू-दृश्य में जीवित है. जनकपुर और मिथिला के बीच का सांस्कृतिक संबंध किसी आधुनिक सीमा आयोग ने नहीं बनाया था. वह लोक की स्मृति में बना था. सीता की कथा में भी एक घर है. एक प्रस्थान है. एक वन है. एक लंबी प्रतीक्षा है. और अंततः लौटने की इच्छा है.
शायद इसी कारण मिथिला का मन उन लोगों का दुःख कुछ अधिक आसानी से समझ लेता है, जिनके घर अचानक उनसे छिन जाते हैं. किसी संस्कृति की असली परीक्षा उसके उत्सवों में नहीं होती. वह तब होती है जब उसके पड़ोसी पर संकट आता है. आज नेपाल के पहाड़ों में जो हुआ है, वह हमें यह याद दिलाता है कि हमारी साझा संस्कृति का अर्थ सिर्फ साझा भाषा या साझा देवी-देवता नहीं है. साझा संस्कृति का अर्थ साझा दुःख को पहचानना भी है.
बचपन में हमें शायद यह नहीं बताया गया था कि नदी किसी अंतरराष्ट्रीय समझौते की धारा नहीं पढ़ती. वह गुरुत्वाकर्षण पढ़ती है. वह ढलान पढ़ती है. वह अपने रास्ते का धरातल पढ़ती है. नेपाल के पहाड़ों से उतरता पानी जब बिहार के मैदान में आता है, तो उससे कोई यह नहीं पूछता कि वह किस देश से आया है.
इसीलिए नेपाल की पहाड़ी त्रासदी को बिहार की मैदानी संवेदना से अलग करके देखना कठिन है. आज रसुवा में कोई पुल बहता है तो कल उसकी प्रतिध्वनि किसी और नदी के किनारे सुनाई दे सकती है. आज किसी पहाड़ी गाँव का रास्ता टूटता है तो कल किसी मैदान के गाँव की चिंता बढ़ सकती है. यह सिर्फ पड़ोसी देशों का प्रश्न नहीं है. यह एक ही जल-तंत्र में रहने वाले लोगों का प्रश्न है.
हमने नदियों को अपने-अपने हिस्सों में बाँट दिया है. लेकिन नदी ने स्वयं को कभी नहीं बाँटा. यही हमारी सबसे बड़ी विडंबना है. हम राजनीतिक रूप से अलग हैं, लेकिन पर्यावरणीय रूप से एक-दूसरे पर निर्भर हैं. हम अपने-अपने देशों में रहते हैं, लेकिन एक ही बारिश से प्रभावित होते हैं. हम अलग-अलग प्रशासनिक व्यवस्थाओं के नागरिक हैं, लेकिन एक ही नदी के किनारे खड़े हैं.
मुझे हमेशा लगता है कि किसी नदी को समझने के लिए उसके उद्गम से उसके अंतिम पड़ाव तक जाना चाहिए. तब पता चलता है कि नदी कभी अकेली नहीं होती. उसके साथ पहाड़ आते हैं. जंगल आते हैं. गाँव आते हैं. शहर आते हैं. किसानों के खेत आते हैं. मछलियाँ आती हैं. बच्चों की आवाजें आती हैं. मंदिरों की घंटियाँ आती हैं. और कभी-कभी शव भी आते हैं.
अभी नेपाल के पहाड़ों में राहत और बचाव सबसे जरूरी है. लापता लोगों की तलाश होनी चाहिए. घायलों तक मदद पहुँचे. बेघर परिवारों को आश्रय मिले. संचार और सड़क व्यवस्था बहाल हो. लेकिन इसके बाद पुनर्निर्माण का जो समय आएगा, उसमें सिर्फ पुरानी चीजों को उसी जगह फिर से खड़ा कर देना पर्याप्त नहीं होगा.
कभी-कभी आपदा हमें यह सोचने का अवसर भी देती है कि हम कहाँ और कैसे रह रहे हैं. किस जगह घर बनना चाहिए. कहाँ सड़क नहीं बननी चाहिए. किस ढलान को छोड़ देना चाहिए. किस नदी को उसके प्राकृतिक विस्तार की जगह देनी चाहिए. और किन बस्तियों को सुरक्षित स्थान पर ले जाना चाहिए. पुनर्निर्माण का अर्थ सिर्फ पुराने को वापस लाना नहीं है. कभी-कभी उसका अर्थ भविष्य को थोड़ा अधिक सुरक्षित बनाना भी होता है.
सीमा-पार आपदा प्रबंधन इसलिए अब सिर्फ सरकारी सहयोग का विषय नहीं रह सकता. नेपाल और भारत को वास्तविक समय में नदी और मौसम संबंधी सूचनाओं के आदान-प्रदान, बेहतर पूर्व चेतावनी प्रणालियों, उपग्रह निगरानी और स्थानीय समुदायों तक समय पर सूचना पहुँचाने की व्यवस्था को मजबूत करना होगा. हिमालय की किसी दूरस्थ घाटी में घटने वाली घटना कुछ घंटों में नीचे के मैदानों के लिए जोखिम बन सकती है. ऐसे में सूचना का एक घंटा भी जीवन और मृत्यु के बीच का अंतर हो सकता है.
नेपाल की त्रासदी को देखते हुए मेरे भीतर बार-बार मधुबनी लौट आती है. वह मिट्टी. वह भाषा. वे पुराने रास्ते. वे रिश्ते. और वे नदियाँ जिनके नाम लेते हुए किसी बच्चे को भूगोल की किताब की जरूरत नहीं पड़ती थी.
आज नक्शे बहुत स्पष्ट हैं. लेकिन शायद हमारे भीतर का स्मृति-प्रदेश थोड़ा धुँधला हो गया है. हमने सीमाएँ बहुत अच्छी तरह सीख ली हैं. नदियों को भूल गए. हमने देशों को याद रखा. पड़ोस को भूल गए. हमने आँकड़े याद रखे. नाम भूल गए.
शायद इस आपदा की सबसे बड़ी सीख यही है कि हमें फिर से उस जीवित धरातल को पढ़ना होगा जिसमें मनुष्य अकेला नहीं है. जिसमें पहाड़ और मैदान एक-दूसरे के दुःख को समझते हैं. जिसमें नदी किसी सीमा की नागरिक नहीं होती. और जिसमें नेपाल में बहा हुआ एक घर मधुबनी के किसी आदमी की स्मृति में भी एक दरवाजा खोल देता है.
उस दरवाजे के पीछे कोई पुराना आँगन है. कोई परिचित आवाज है. कोई गीत है. और शायद एक बच्चा है, जो बहुत पहले किसी सीमा को पार करके आया था और जिसे तब मालूम नहीं था कि वह एक देश से दूसरे देश में जा रहा है. उसे सिर्फ इतना मालूम था कि उस पार भी लोग अपनी भाषा में बोलते हैं. और नदी दोनों तरफ बहती है.
पहाड़ जब रोते हैं, तो मैदानों तक उनकी आवाज पहुँचती है. सवाल यह है कि क्या हम उस आवाज को सिर्फ आपदा के बाद सुनेंगे, या उससे पहले भी, जब पहाड़ अभी टूटे नहीं हैं, जब नदी अभी अपने किनारों के भीतर है और जब किसी घर के दरवाजे पर दस्तक देने के लिए पानी ने अभी अपना रास्ता नहीं बदला है.

क्योंकि शायद किसी नदी को बचाने का सबसे मानवीय अर्थ यही है कि उसके किनारे बसे मनुष्यों को बचाया जाए.
और किसी सरहद को सचमुच मानवीय बनाने का अर्थ यह है कि उसके दोनों ओर रहने वाले लोग एक-दूसरे के दुःख को अपना दुःख समझ सकें.
(आशुतोष कुमार ठाकुर कला, साहित्य और पर्यावरण विषयों पर नियमित लेखन करते हैं.)

