आज पढ़िए अरुणाचल की लेखिका सुबी ताबा से बातचीत। सुबी का कहानी संग्रह ‘Tales from the Dawn-Lit Mountains’ मैंने जाने-माने लिटरेरी क्रिटिक आशुतोष कुमार ठाकुर के कहने पर पढ़ी थी और लगा जैसे लोक के गहरे आलोक को देख रहा हूँ। लोक कथाओं, लोक विश्वास, मिथकों से उन्होंने कुछ चमत्कारिक कहानियाँ बुनी हैं। उनकी एक कहानी ‘ए नाइट विथ द टाइगर’ का मैंने हिन्दी अनुवाद भी किया है जो आगे कभी पढ़वाऊँगा। उनके लेखन से मैं इतना प्रभावित हुआ कि बाद में मैंने उनका कविता संग्रह ‘Dear Bohemian Man’ की कविताएँ भी पढ़ी। उसमें उनकी प्रेम कविताएँ हैं और उनमें प्रेम की गहरी तड़प है। सुबी ताबा को 2025 में प्रतिष्ठित रामनाथ गोयनका साहित्य सम्मान भी मिला था। आज पढ़िए उनके साथ आशुतोष कुमार ठाकुर की बातचीत- प्रभात रंजन
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कुछ किताबें हमारे भीतर उसी तरह उतरती हैं, जैसे भोर की धुंध किसी पहाड़ी ढलान पर उतरती है। धीरे-धीरे। बिना किसी आवाज़ के। और फिर बहुत देर तक हमारे भीतर बनी रहती हैं। सुबी ताबा की Tales from the Dawn-Lit Mountains ऐसी ही किताब है। वह पाठक पर अपना असर थोपती नहीं, उसे अपनी ओर बुलाती है। और एक बार जब आप उसके भीतर प्रवेश करते हैं, तो पहाड़, जंगल, नदियाँ और उनके बीच बसी पुरानी स्मृतियाँ आपको अपने साथ ले चलती हैं।
अरुणाचल की पहाड़ियाँ इन कहानियों में पृष्ठभूमि और गवाह दोनों हैं। उन्होंने मनुष्यों को जन्म लेते, जीते, डरते और अपने सपनों के पीछे जाते देखा है। उन्होंने बहुत कुछ ऐसा भी देखा है, जिसे मनुष्य भूल गया है। हर नदी अपने भीतर कोई पुरानी आवाज़ लिए बहती है। हर पत्थर के भीतर कोई स्मृति सोई हुई है। इन कहानियों में प्रकृति बाहर की चीज़ नहीं रह जाती। वह जीवन का हिस्सा बन जाती है।
Tales from the Dawn-Lit Mountains की कहानियाँ अरुणाचल के उन गाँवों और पहाड़ों में जाती हैं, जहाँ पुरानी कथाएँ अभी बीती हुई चीज़ नहीं हुई हैं। वे लोगों के साथ रहती हैं। कभी किसी सर्प के रूप में, कभी किसी श्राप में, कभी किसी जंगल की आवाज़ में। एक गाँव पवित्र सर्प को छेड़ने के बाद गायब हो जाता है। एक आदमी बाघ बन जाता है। एक पुजारी बदलती हुई दुनिया के बीच अपने पुराने अनुष्ठानों को बचाए रखना चाहता है। इन कहानियों में ऐसा बहुत कुछ है जिसे पहली नज़र में हम मिथक या लोककथा कह सकते हैं। लेकिन थोड़ा ठहरकर देखें तो इनके भीतर मनुष्य और प्रकृति के बीच का वह पुराना रिश्ता दिखाई देता है, जिसमें दोनों एक-दूसरे से अलग नहीं हैं।
किताब की दुनिया में इतिहास भी इसी तरह मौजूद है। हिंसा की पुरानी स्मृतियाँ हैं। मिशनरियों के आने की याद है। बदलते धर्म और बदलती हुई जीवन-पद्धतियाँ हैं। जमीन और जंगल को लेकर खिंचता हुआ तनाव है। लेकिन सुबी इन चीज़ों को इतिहास की तरह नहीं सुनातीं। वह उन्हें उन लोगों के जीवन में खोजती हैं, जो आज भी उन स्मृतियों के साथ जी रहे हैं। इसलिए उनकी कहानियों में अतीत कहीं पीछे छूट गया समय नहीं है। वह कभी किसी बूढ़े की आवाज़ में लौट आता है, कभी किसी बच्चे की याद में, कभी किसी जंगल की चुप्पी में। शायद इसी वजह से इस किताब को पढ़ते हुए अरुणाचल कोई दूर का प्रदेश नहीं लगता। वह धीरे-धीरे हमारे सामने एक ऐसी दुनिया की तरह खुलता है, जहाँ पहाड़ों की अपनी स्मृति है और मनुष्य अभी भी उसे सुनना सीख रहा है।
सुबी ताबा एक कृषि अधिकारी हैं। उनका रोज़ का जीवन खेतों, बीजों और फसलों के बीच बीतता है। शायद इसी कारण उनकी कहानियों में मिट्टी इतनी सहजता से आती है। वह सिर्फ़ जमीन नहीं है। वह स्मृति है, जीवन है, संबंध है। जब सुबी लिखती हैं, तो लगता है जैसे मिट्टी के भीतर दबे हुए कुछ पुराने शब्द धीरे-धीरे बाहर आ रहे हों। उनकी कहानियों में मिथक है, स्मृति है, लोकविश्वास है और अपने समय की बेचैनी भी। लेकिन यह सब जीवन के भीतर से आता है।
हमने सुबी ताबा से भूमि, लोक, मिथक, स्मृति और मौन के बारे में बात की। उन पहाड़ों के बारे में भी, जिन्हें वह सिर्फ़ देखती नहीं हैं, सुनती भी हैं- आशुतोष कुमार ठाकुर
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आशुतोष: आपकी कहानियों में धरती बोलती है। क्या आप खुद को उसकी अनुवादक मानती हैं?
सुबी: मेरे लिए हर कहानी की शुरुआत भूमि से होती है। जमीन वह पहली जगह है जहाँ कोई कहानी जन्म लेती है और जहाँ हमारा रोज़मर्रा का जीवन घटित होता है। मुझे धरती और उसके आसपास की दुनिया को कहानी में लाना अच्छा लगता है। कई बार भूमि लोगों के माध्यम से भी बोलती है। किसी बूढ़ी औरत के हाथों में, जो कद्दू के बीज पीस रही है। किसी शमन की आवाज़ में, जो आग के पास बैठकर मंत्र बोल रहा है। मैं उस आवाज़ को सुनने और फिर उसे दर्ज करने की कोशिश करती हूँ।
आशुतोष: आप एक कृषि अधिकारी हैं। खेतों, बीजों और फसलों के साथ आपका रोज़ का अनुभव क्या आपके लेखन को भी प्रभावित करता है?
सुबी: शायद हाँ। खेती में भूमि, लोग और समाज, तीनों एक-दूसरे से जुड़े होते हैं। मेरी कहानियाँ भी अधिकतर गाँवों की दुनिया में घटती हैं, जहाँ खेती जीवन और संस्कृति, दोनों का हिस्सा है। मैंने अपने आसपास लोगों को जमीन के साथ जीते हुए देखा है। हमारे मिथक और हमारी स्मृतियाँ भी प्रकृति, समुदाय और जीवन की जरूरतों से जुड़ी हुई हैं।
आशुतोष: आपकी कहानियों में सर्प, श्राप और रूपांतरण आते हैं। क्या आपको कभी लगता है कि इन कथाओं को बाहरी पाठकों के लिए समझाना ज़रूरी है?
सुबी: कभी-कभी सांस्कृतिक फासला कम करने के लिए हमें कुछ करना पड़ता है। लेकिन मैं इन कहानियों को तर्क से समझाने या बहुत आसान बना देने के पक्ष में नहीं हूँ। ये कोई पहेलियाँ नहीं हैं जिन्हें हल करना हो। इन्हें उसी दुनिया और उसी संस्कृति के भीतर समझना चाहिए, जहाँ से ये आई हैं। इनके पीछे एक ऐसी जीवन-दृष्टि है, जिसमें मनुष्य प्रकृति से अलग नहीं है। जंगल, नदी, पहाड़, पशु और मनुष्य एक-दूसरे के जीवन से जुड़े हुए हैं।
ये उन लोगों की भावनाएँ और अनुभव हैं, जिन्होंने सदियों तक प्रकृति के साथ मिलकर जीवन जिया है। इसलिए सर्प यहाँ सिर्फ़ एक जीव नहीं है, श्राप सिर्फ़ डर पैदा करने वाली चीज़ नहीं है और रूपांतरण सिर्फ़ कोई असाधारण घटना नहीं। इनके भीतर उस समाज की स्मृति, विश्वास और जीवन को देखने का अपना तरीका छिपा है। मेरी इच्छा है कि पाठक इन कहानियों को सिर्फ़ समझें ही नहीं, उनके अंदर उतरें। उस दुनिया में जाएँ जहाँ साँप बोल सकता है, श्राप के अपने मायने हैं और रूप बदलना किसी ऐसी सच्चाई तक ले जाता है, जिसे शायद सीधे शब्दों में कहना संभव नहीं।
आशुतोष: एक कहानी में एक लड़का अपने भाई की हत्या के बाद सिर काटने वाला बन जाता है। आप इतिहास में दर्ज ऐसे आघात को कहानी में कैसे लाती हैं?
सुबी: यह प्रसंग मुझे एक शोध अधिकारी के फील्ड नोट्स में मिला था। उसमें लिखा था कि कैसे गर्दन पर मधुमक्खी के डंक ने एक छोटे लड़के को अपने भाई की गर्दन काटे जाने की घटना याद दिला दी। मैंने इतिहास की कुछ वास्तविक घटनाओं को भी इसके साथ जोड़ा। उस समय की युद्ध-पद्धतियों, पूर्वी अरुणाचल में ईसाई मिशनरियों के आगमन और उन्नीसवीं सदी के पूर्वोत्तर सीमांत क्षेत्र से जुड़े कुछ ऐतिहासिक संदर्भों को लेकर मैंने इसे एक ऐतिहासिक कथा का रूप दिया।
आशुतोष: भूमि आपके लिए क्या अर्थ रखती है, एक लेखिका के रूप में और एक ऐसी व्यक्ति के रूप में जो उसके साथ रोज़ काम करती हैं?
सुबी: भूमि मेरे लिए पूर्वज भी है और विरासत भी। हर पहाड़ी अपने भीतर एक कथा सँजोए है और हर नदी की अपनी वंशावली है। मेरे लिए भूमि घर भी है और एक किताब भी, जिसे जोता भी जा सकता है और पढ़ा भी। जब आप उसके साथ रोज़ काम करते हैं, तो उसके बदलते रूप को भी समझने लगते हैं। बारिश के बाद उसकी गंध बदल जाती है, मौसम के साथ उसका रंग बदलता है और फसल के साथ उसका जीवन भी बदलता दिखाई देता है।
भूमि के साथ काम करने से यह एहसास होता है कि वह सिर्फ़ हमारे इस्तेमाल की चीज़ नहीं है। वह हमें भी बहुत कुछ देती है और हमारे बारे में बहुत कुछ जानती है। उसके साथ रहने से लगता है कि वह साँस लेती है, सुनती है और अपनी तरह से जवाब भी देती है। शायद इसी वजह से मेरी कहानियों में भूमि बार-बार लौटती है। उसके बारे में लिखना मेरे लिए सिर्फ़ लेखन नहीं है। यह उसके प्रति आभार व्यक्त करने और उसके साथ अपने रिश्ते को स्वीकार करने का एक तरीका है।
आशुतोष: आपकी कहानियों में जंगल और नदियाँ कई बार पात्रों की तरह सामने आते हैं। क्या आपने उन्हें शुरू से ही इस तरह देखा था?
सुबी: नहीं। शुरू में मेरा ऐसा कोई इरादा नहीं था। लेकिन लिखते-लिखते उन्होंने अपनी जगह खुद बना ली। धीरे-धीरे मुझे लगा कि वे सिर्फ़ कहानी की जगह नहीं हैं। वे कहानी का हिस्सा हैं। वे बोलने लगीं।
आशुतोष: आपका एक पात्र एक पुजारी है, जो लुप्त होती परंपराओं को बचाने की कोशिश करता है। क्या आपको लगता है कि लोककथाएँ प्रतिरोध का एक रूप हो सकती हैं?
सुबी: बिल्कुल। लोककथाएँ विस्मृति के विरुद्ध एक शांत प्रतिरोध हैं। वे हमें याद रखने का अपना तरीका देती हैं। जब दुनिया हर चीज़ का नाम और अर्थ बदलने लगती है, तब मौखिक परंपराएँ लय, पुनरावृत्ति और समुदाय के माध्यम से स्मृति को बचाए रखती हैं। मेरी कहानी का पुजारी अतीत में अटका हुआ व्यक्ति नहीं है। वह कल्पना को जीवित रखने की कोशिश कर रहा है। अपनी भाषा में, अपने तरीके से याद रखना भी प्रतिरोध है।
आशुतोष: मिथकों में स्त्रियाँ प्रायःपीछे छूट जाती हैं। आप उन्हें अपनी कहानियों में किस तरह वापस लाती हैं?
सुबी: उन्हें फिर से केंद्र में रखकर। समय के साथ बहुत-से मिथक पुरुष कथाकारों ने अपनी तरह से ढाल दिए। लेकिन उनकी शुरुआती स्मृतियों में स्त्रियों की आवाज़ें भी थीं। वे अंगीठी के पास बैठकर, खेतों में काम करते हुए और रोज़मर्रा के जीवन के बीच एक-दूसरे को कहानियाँ सुनाती थीं। उन कहानियों में उनके अपने अनुभव थे, उनके डर थे, उनकी इच्छाएँ थीं और दुनिया को देखने का अपना तरीका भी था।
मैं उन स्त्रियों को सिर्फ़ कहानी के पात्रों की तरह नहीं देखती। वे गवाह हैं, उपचार करने वाली हैं, स्मृतियों को सँभालने वाली हैं और कई बार अपनी सीमाओं को तोड़ने वाली भी। मेरे लिए ज़रूरी है कि उनकी आवाज़ सिर्फ़ किसी और की कही हुई बात बनकर न रह जाए, बल्कि वे अपनी कहानी खुद कहें और अपने निर्णय खुद लें। मैं यह भी मानती हूँ कि मिथक कोई स्थिर चीज़ नहीं हैं। जैसे नदी समय के साथ अपना रास्ता बदलती है और फिर भी नदी बनी रहती है, वैसे ही मिथक भी बदल सकते हैं। उन्हें नए अनुभवों और नई आवाज़ों के लिए खुला रहना चाहिए। मेरे लिए लिखना उस आग को फिर से स्त्रियों के हाथों में सौंपने जैसा है, जिसके पास बैठकर कभी ये कहानियाँ जन्मी थीं।
आशुतोष: क्या साहित्य राजनीति या भौगोलिक सीमाओं से अधिक सच्चाई के साथ अरुणाचल को समझ सकता है?
सुबी: हाँ, मुझे लगता है कि साहित्य ऐसा कर सकता है। साहित्य उन चीज़ों को सुन सकता है जिन्हें सीमाएँ अक्सर मिटा देती हैं। गीत सीमाओं के पार चले जाते हैं, लोककथाएँ एक समुदाय से दूसरे समुदाय तक पहुँचती हैं और भाषाएँ अपनी स्मृतियों को अपने साथ लेकर चलती हैं। राजनीति रेखाएँ खींचती है, लेकिन कहानियाँ उन रेखाओं के आर-पार जाती रहती हैं।
अरुणाचल को सिर्फ़ नक्शे पर बनी सीमाओं से नहीं समझा जा सकता। यहाँ हर समुदाय की अपनी भाषा, अपनी स्मृतियाँ और अपनी परंपराएँ हैं, लेकिन इनके बीच लगातार संवाद भी रहा है। एक तागिन गाँव की लोककथा किसी मोनपा मठ या मिश्मी गाँव में भी अपनी प्रतिध्वनि पा सकती है। एक नदी की तरह कथा भी रास्ता बनाती हुई आगे बढ़ती है और रास्ते में नए अर्थ ग्रहण करती है। साहित्य इसी आवाजाही को पकड़ सकता है। शायद इसी वजह से मेरे लिए कहानियाँ किसी नक्शे से अधिक सच्चा भूगोल बनाती हैं। यही आवाजाही और यह साझा स्मृति हमारे क्षेत्र की सबसे सच्ची पहचान है।
आशुतोष: आपके लेखन में मौन बहुत गहरा है। क्या मौन की भी कोई व्याकरण होती है?
सुबी: हाँ, मौन की भी अपनी व्याकरण होती है। हमारी मौखिक परंपराओं में ठहराव का अपना अर्थ है। जब कोई कहानी सुनाई जाती है, तो हर बात तुरंत कह देना ज़रूरी नहीं होता। कई बार वक्ता का रुक जाना भी कहानी का हिस्सा होता है। वह ठहराव स्मृति को साँस लेने की जगह देता है और सुनने वाले को उस बात के भीतर जाने का समय भी।
मौन में शोक हो सकता है, श्रद्धा हो सकती है और प्रतिरोध भी। कभी वह किसी ऐसी बात को अपने भीतर रखता है जिसे शब्दों में कहना कठिन होता है। मेरे लिए लिखते समय भी यह बहुत महत्वपूर्ण है कि हर खाली जगह को शब्दों से न भर दिया जाए। मैं उस मौन को दिखाई देने वाली चीज़ बनाना चाहती हूँ, जैसे कोई ऐसी भाषा जिसे धरती शब्दों से पहले समझ लेती है। शायद पहाड़ों में रहने वाले लोग इस भाषा को हमसे थोड़ा बेहतर सुनते हैं।

आशुतोष: आपके पहाड़ों से ‘आधुनिकता’ कैसी दिखाई देती है?
सुबी: यहाँ आधुनिकता एक अजीब-सा मेल है। पूर्वजों की पहाड़ियों पर मोबाइल टॉवर हैं और पवित्र पत्थरों के पास सोलर पैनल। लेकिन मेरे लिए आधुनिक होने का अर्थ पुराने को छोड़ देना नहीं है। उसका अर्थ है पुरानी चीज़ों को नए ढंग से समझना। हमारे पहाड़ हमेशा बदलते रहे हैं। वे हवा और समय के साथ अपना रूप बदलते रहे हैं। परंपरा भी ऐसी ही है। वह स्थिर नहीं है। वह बदलती रहती है और इसी बदलाव में जीवित रहती है। हम शायद यह भूल गए हैं कि बदलना भी परंपरा का हिस्सा है।
आशुतोष: अगर आपकी किताब का कोई एक दृश्य या ध्वनि पाठकों के साथ रह जाए, तो आप चाहेंगी कि वह क्या हो?
सुबी: मैं चाहूँगी कि पुरोइक पहाड़ों की उस स्त्री की छवि पाठकों के साथ रहे, जो एक छोटी-सी झोपड़ी में बंधी हुई है। वह आधे सपने में है, आधी प्रार्थना में और आधी उम्मीद में। मैं चाहती हूँ कि जब वह जागे, तो उसके भीतर उस जीवन से बाहर निकलने का साहस हो।
पुस्तक परिचय
पुस्तक: Tales from the Dawn-Lit Mountains: Stories from Arunachal Pradesh
हिंदी नाम: टेल्स फ्रॉम द डॉन-लिट माउंटेन्स : स्टोरीज़ फ्रॉम अरुणाचल प्रदेश
लेखिका: सुबी ताबा
प्रकाशक: पेंगुइन इंडिया
मूल्य: रु399
(आशुतोष कुमार ठाकुर कला और साहित्य पर नियमित रूप से लिखते हैं।)

