हिन्दी दिवस के अवसर पर पढ़िए जेन ज़ी और हिन्दी दिवस के बारे में। लिखा है युवा शोधार्थी और लेखक मुशर्रफ परवेज़ ने- मॉडरेटर
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लगा रहे प्रेम हिन्दी में, पढूँ हिन्दी लिखूँ हिन्दी,
चलन हिन्दी चलूँ, हिन्दी पहरना, ओढना खाना।
रामप्रसाद बिस्मिल जी की ये पंक्तियाँ हम और आप अक्सर हिंदी के बारे में बात करते हुए कहते हैं। मैंने ये पंक्तियाँ हिंदी दिवस के एक कार्यक्रम में सुनी थी। और संयोग देखिए कि मैं भी हिंदी दिवस पर ही बिस्मिल जी की ये पंक्तियाँ प्रस्तुत कर रहा हूँ। कुछ अर्ज़ करने से पहले मैं आप सभी को हिंदी दिवस की बधाईयां प्रेषित करता हूँ।
ख़ैर, पिछले एक सालों से GenZ शब्द का चलन खूब बढ़ा है। क्योंकि भारतवर्ष में अधिकतर संख्या GenZ की है। आज 14 सितंबर भी है, तो मुझे लगा कि GenZ हिंदी को लेकर क्या सोचते हैं? उससे आप सभी को अवगत कराता चलूँ। देखिए, मैं इसमें GenZ के तीन लोगों की बातों को रखूँगा। वे हिंदी को लेकर क्या सोचते हैं? उनके लिए हिंदी का क्या महत्व है? लेकिन कहीं भी उनका नाम नहीं लूंगा।
मैं भी एक GenZ हूँ। मेरे लिए हिंदी सुकून है। वह भाषा है, जिसमें मैंने जन्म लेने के बाद रोना और मुस्कराना सीखा। बड़ा हुआ तो इसी भाषा में ज़िद करना शुरू किया। माँ और धरती माँ के प्रति अपने एहसासात को शब्द देना सीखा। और इन दिनों इसी भाषा में सपने देख रहा हूँ।
ये तो रही मेरी बात पर आपको हिंदी साहित्य के महान आलोचक की राय पढ़वाता हूँ। जिन्हें हम आदर से ‘बच्चन सिंह’ कहते हैं। जिन्होंने ‘हिंदी साहित्य का दूसरा इतिहास’ के पहले पृष्ठ पर हिंदी के बारे में बड़ी सुंदर बात कही है।
वे कहते हैं- “हिन्दी अन्य भाषाओं से दो अर्थों में भिन्न है-क्षेत्रीयता के अर्थ में और भाषा-समुच्चय के अर्थ में। अन्य भाषाएँ एकक्षेत्रीय हैं जबकि हिन्दी बहुक्षेत्रीय है। यह हिमाचल प्रदेश, हरियाणा, राजस्थान, उत्तरप्रदेश, मध्यप्रदेश और बिहार तक फैली हुई है। अन्य क्षेत्रों में एक ही भाषा प्रमुख है तो हिन्दी प्रदेश अनेक भाषाओं और बोलियों- राजस्थानी, ब्रजी, अवधी, मैथिली, भोजपुरी, बुन्देलखंडी आदि का समुच्चय है।”
अब आप सोचेंगे कि ‘हिंदी दिवस’ आख़िर मनाते क्यों हैं? हुआ यूं कि 12 सितंबर, 1949 को शाम 4 बजे शुरू हुई बहस अगले दो दिन तक चलती रही और आखिरकार 14 सितंबर, 1949 के दिन समाप्त हुई। संविधान सभा ने विस्तृत और गहन विचार-विमर्श के बाद 14 सितंबर 1949 को हिंदी को भारत की राजभाषा के रूप में स्वीकार किया। इसके पश्चात संविधान के अनुच्छेद 343 से 351 तक राजभाषा से संबंधित प्रावधान किए गए। इसी ऐतिहासिक निर्णय की स्मृति को बनाए रखने के उद्देश्य से प्रत्येक वर्ष 14 सितंबर को हिंदी दिवस मनाया जाता है। उल्लेखनीय है कि भारतीय संविधान में ‘राष्ट्रभाषा’ का कोई उल्लेख नहीं है।
आइए, अब मैं आपको उन तीनों लोगों की बातें सुनाता हूँ, जो उन्होंने हिंदी को लेकर इशारों में बहुत कुछ कह दिया।
GenZ एक, इनसे मेरी मुलाक़ात पहली बार हुई थी। न मैं इन्हें जानता था और न ही ये मुझे। अचानक चाय पीने के क्रम में परिचय हो गया। पहले तो हम औपचारिक रहे। फ़िर जैसे-जैसे बातें बढ़ने लगीं, तो बातें अनौपचारिक होने लगीं। मैंने उनसे पूछा कि “हिंदी को लेकर आपकी राय क्या है?” कुछ देर तो वे चुप रहे। फ़िर जवाब दिया कि “भैया, मेरी पूरी पढ़ाई सरकारी स्कूल से हुई। हिंदी में ही सारी किताबें थीं। लेकिन जैसे आठवीं पास किया और नौवीं में गया। तो घरवालों ने कोचिंग लगवा दिया। मैथ्स और साइंस एक ही मास्टर सब पढ़ाते थे। एक अलग से ट्यूशन अंग्रेज़ी की लगवा दी गई क्योंकि बोर्ड में अंग्रेज़ी का एक वैकल्पिक पेपर भी था। हालांकि मैथ्स और साइंस में भी हिंदी से अधिक अंग्रेज़ी के शब्द आते थे। परिणाम ये हुआ कि हम हिंदी से अंग्रेज़ी की ओर शिफ़्ट हो गए। बोर्ड पास करने के बाद इलेवंथ में मेरा पूरा सिलेबस अंग्रेज़ी में था। हाँ, हिंदी बोल लेता हूँ। जबकि लिखने में वर्तनी में अशुद्धियाँ हो जाती हैं।”
GenZ दो, इन्हें मैं पहले से जानता था। ये हाल में ही दिल्ली आए थे। इन्होंने बारहवीं तक की पढ़ाई अंग्रेज़ी माध्यम से की थी। इनसे जब मैंने प्रश्न किया कि “भारत की राष्ट्रभाषा हिंदी को होनी चाहिए?” तो इनका जवाब सुनिए, इन्होंने कहा- “क्या बात कर रहे हैं भैया? हिंदी तो ऑलरेडी भारत की राष्ट्रभाषा है।” फ़िर मेरा अगला प्रश्न था कि “आपने हिंदी की पढ़ाई कहां तक की है?” तो इन्होंने कहा कि दसवीं तक। फ़िर इन्होंने एक दिलचस्प किस्सा सुनाया। बताया कि हमारे गांव में न एक बाबा हुआ करते थे। उनके तीन प्रश्न होते थे। जो भी जाता उनसे ये पूछते कि- “What is your name?” ; “How old are you” और “Where do you live?” जो भी इनके तीनों प्रश्नों का उत्तर दे देता। उसको ये होनहार बालक सिद्ध कर देते। कहते कि ये बड़ा आदमी बनेगा। इसीलिए मेरे पिताजी ने मुझे बचपन से ही अंग्रेज़ी स्कूल में पढ़ाया ताकि मैं फर्राटेदार अंग्रेज़ी बोल सकूं। आज भी हमारे गाँवों में अंग्रेज़ी बोलने वाले को ज्ञाता समझा जाता है। गांव के लोग कहते हैं कि फलाना बाबू का बेटा बड़ा टैलेंटेड है।
GenZ तीन, ये ठीक-ठाक जानकर थे। इनसे बात करके अच्छा लगा। जब इनसे मैंने कहा कि “आख़िर अब तक हिंदी राष्ट्रभाषा क्यों नहीं बनी?” तो इनका जवाब सुनिए। कहते हैं- “Bro, I don’t know why after 75 years of Independence, we have no National Language.” फ़िर आगे बोले कि जिस देश में सिनेमा को अधिकतर लोग Film, किराया को Rent, कमरा को Room और शब्दकोश को Dictionary कहते हों, वहाँ कभी राष्ट्रभाषा बन ही नहीं पाएगी। आगे इन्होंने बताया कि हमारे यहाँ आज भी कई ऐसे शब्द हैं, जिसका हिंदी हम नहीं जानते क्योंकि हमेशा से हमारे यहाँ इंग्लिश के ही वर्ड्स यूज़ होते रहे हैं। बात को आगे बढ़ाते हुए कहा कि सन् 1835 में मैकाले ने शिक्षा-नीति बनाई थी। उसकी जड़ें आज भी विद्यमान हैं। अंग्रेज़ियत आज भी हम पर, आप पर, हमारे समाज पर और हर जगह हावी है। हम कोई वाक्य कहते हैं, उसमें न चाहकर भी एक-दो अंग्रेज़ी के शब्द आ ही जाते हैं। मेरा अगला प्रश्न था कि “हिंदी दिवस को लेकर आप क्या सोचते हैं?” उन्होंने उत्तर दिया कि “सोचना क्या है? साल में एक बार आता है। स्कूल, कॉलेज, यूनिवर्सिटी को बजट ख़र्च करना होता है। मंच से बड़ी-बड़ी बातें कह देते हैं। और पल्ला झाड़ लेते हैं।”
ये थे हमारे तीन GenZ, जिनसे मेरी बात हुई। इनकी बातें किस हद तक ठीक हैं, ये मैं बिल्कुल भी नहीं जानता। लेकिन इन्होंने एक साथ कई प्रश्न खड़े कर दिए। हिंदी के बहाने इन्होंने शिक्षा व्यवस्था, नीतियों के कार्यान्वयन आदि पर गहरे प्रश्न उठा दिया।
लेकिन यहाँ रुककर बताता चलूँ कि भारतीय संविधान का प्रारूप हिंदी में नहीं बल्कि अंग्रेज़ी में लिखा गया। राष्ट्रभाषा को लेकर जो बहस हुई थी, उसमें अधिकतर लोगों ने अंग्रेज़ी में अपने मतों को रखा था। यहाँ तक कि हिंदी के पक्षधर भी अंग्रेज़ी में ही बोले।


