के. विक्रम सिंह साहित्य और सिनेमा के बीच सेतु की तरह थे. ‘उन्होंने ‘तर्पण’ जैसी फिल्म बनाई, ‘जनसत्ता’ और ‘दैनिक हिन्दुस्तान’ में स्तम्भ लिखे. कल उनका निधन हो गया. आज ‘जनसत्ता’ में उनको बहुत आत्मीयता से याद किया है प्रियदर्शन ने. आपके लिए प्रस्तुत कर रहा हूँ- जानकी पुल.
=================================================================
के बिक्रम सिंह नहीं रहे- यह सरल-सीधा वाक्य लिखते हुए मेरी उंगलियां कांप रही हैं। बीच-बीच में उनकी बीमारी की ख़बर सुनता रहा था, कभी-कभी फोन पर उनसे बात भी होती रही थी, लेकिन इधर के दिनों में इस हद तक बेख़बर रहा कि यह मालूम ही नहीं हुआ कि मेरा एक अत्यंत आत्मीय दिल्ली के अस्पताल में 2 महीने से बीमार पड़ा है। यह पता नहीं, कैसा जीवन जी रहे हैं हमलोग कि एक-दूसरे की ख़बर तक नहीं रख पाते।
लेकिन यह जड़ कर देने वाला शोक मेरे भीतर क्यों है? कब मैं के बिक्रम सिंह से बहुत नियमित मिलता रहा? शायद कभी नहीं। एक दौर में उनके बारे में बस चंद सूचनाएं मेरे हुआ करती थीं- कि वे फिल्मकार हैं, कि उन्होंने तर्पण का निर्देशन दिया है, कि वे कुछ फिल्मों से निर्माण के स्तर पर भी जुड़े रहे, कि उन्होंने कई वृत्तचित्र बनाए हैं। लेकिन करीब 12 साल पहले एक संयोग ने हम दोनों को जोड़ दिया। जनसत्ता में उनका कॉलम ‘बिंब-प्रतिबिंब’ शुरू हुआ जो वे मूलतः अंग्रेज़ी में लिखते थे। किसी नियमित अनुवादक की व्यवस्था न होने की वजह से इसके अनुवाद का दायित्व मेरे ऊपर आ पड़ा। जब मैंने उनके लेखों के अनुवाद शुरू किए तो पाया कि भले वे अंग्रेजी में लिखे गए हों, लेकिन बिल्कुल हिंदी में सोचे गए हैं। उनका अनुवाद न सिर्फ आसान था, बल्कि उसमें बिना किसी मेहनत के, अपनी तरह की लय, अपनी तरह का लालित्य चले आते थे। इसके अलावा हर बार अनूदित कॉपी मैं बिक्रम सिंह को वापस कर देता जिसमें वे अपनी तरफ से संशोधन सुझाते और अंतिम कॉपी तैयार होती।
अगले कुछ दिनों में बिक्रम सिंह अनायास हिंदी के बड़े लेखकों के लिए स्पृहा का विषय हो गए। बहुत ही पठनीय भाषा में उनका सारगर्भित लेखन लोगों को आकर्षित करने लगा। उनके कुछ मित्रों ने उनसे मज़ाक भी किया कि वे इतनी अच्छी हिंदी कैसे लिखने लगे। इसके बाद के बिक्रम सिंह ने एक स्तंभ में बाकायदा इसकी सफ़ाई दी। लेकिन अनुवाद की इस प्रक्रिया ने हम दोनों को गहरे जोड़ दिया- शायद उन्हें एहसास था कि उन्हें एक अच्छा अनुवादक मिल गया है जो उनकी बातें ठीक से समझ पाता है और मैं एक ऐसे लेखक को बहुत करीब से जानने के अनुभव से अभिभूत था जिसके पास कला और संस्कृति को लेकर इतनी गहरी समझ है।
दरअसल उन लेखों के अनुवाद के क्रम में मैंने उनको ठीक से समझा और जाना। उनमें गंभीर अंतर्दृष्टि थी जो कला और संस्कृति से उनकी संलग्नता से जुड़ कर और बारीक हो जाया करती थी। अपने कॉलम में उन्होंने तमाम विषयों पर टिप्पणियां कीं, लेकिन जब वे कला, फिल्मों या साहित्य पर लिख रहे होते थे तो उनका जैसे सानी नहीं हुआ करता था। उनके पास अनुभवों की विशाल संपदा भी थी। जां क्लाद कैरियर, अनिल करंजई, शुब्रतो मित्रा, लैस्टर जेम्स पीरीज़, अनिल अग्रवाल, केदारनाथ सिंह, कुंवरनारायण, मनोहर सिंह, अबू अब्राहम, बासु भट्टाचार्य, कोमल कोठारी जैसी शख्सियतों से उनका निजी संवाद, उनके कामकाज से उनका करीबी परिचय और इन सबको लेकर उनकी विश्वजनीन दृष्टि जैसे मुझे भी समृद्ध करती रही। व्यक्तियों के अलावा उन्होंने जगहों पर भी लिखा और स्थितियों पर भी, और जब भी लिखा, जैसे ललित गद्य का एक नायाब उदाहरण पेश करते हुए लिखा।
दरअसल यह लालित्य उनकी सूचनाओं और उनके सरोकार से तो आता ही था, उनकी विनोदप्रियता और मूलतः फिल्मकार वाली दृष्टि की समग्रता से भी आता था। वे जैसे शब्दों से नहीं, दृश्यों से लिखते थे. चुप्पियों और आवाज़ों के अलग-अलग परदों के बीच से लिखते थे, रोशनी और अंधेरे के बीच आते-जाते लिखते थे- उनको पढ़ना असल में पढ़ना नहीं देखना था- वह सबकुछ जो वे दिखाना चाहते थे। उनका ‘विट’ भी कमाल का था जो उनके गद्य को दिलचस्प बनाता था।
हमारे बीच उम्र का बहुत बड़ा फासला रहा। वे मेरे पिता से भी दो साल बड़े थे। शायद इस संकोच की वजह से भी उनसे मैं बहुत घनिष्ठ नहीं हुआ, लेकिन हमारे बीच एक मैत्री और आत्मीय भाव हमेशा बना रहा।
यह शायद दो बरस पहले की बात है जब एक दिन अचानक उनका फोन आया। वे मुझसे मिलना चाह रहे थे। मज़ाक में उन्होंने कहा कि उस दिन वे किसी ऐसे शख्स से बात करने के मूड में हैं जो पीता न हो। हम दोनों उस शाम इंडिया इटरनेशनल सेंटर में करीब 2-3 घंटे बैठे रहे। आत्मीयता का वही ताप महसूस करते हुए, जो हम दोनों के साझा गद्य से पैदा हुआ था।
अपनी उम्र और बीमारी के बावजूद वे हमेशा योजनाओं से लैस दिखते थे। एक बड़ी फीचर फिल्म की योजना उनके भीतर बरसों से थी। इधर वे सत्यजित रे पर अपनी एक किताब पूरी करना चाहते थे। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया में आने के बाद अपनी व्यस्तता की वजह से मेरे पास अनुवाद का समय नहीं रह गया था। लेकिन मैंने उनसे वादा किया था कि जैसे ही वे पांडुलिपि भेजेंगे, मैं उसका अनुवाद करूंगा।
मैं जानता था कि यह उनके लिए नहीं, मेरे लिए ज़रूरी है। यह स्वीकार करने में मुझे कोई हिचक नहीं कि इत्तिफाक से उनका जो सानिध्य मिला, उसने मुझे समृद्ध किया। बाद में जब यह कॉलम किताब के रूप में वाणी प्रकाशन से ‘कुछ ग़मे दौरा’ के नाम से छप कर आया तो फिर मैंने पाया कि उसे पढ़ते हुए मैं काफी कुछ सीख रहा हूं।
बाद में उनकी फिल्में भी देखीं। हमेशा उनके काम ने यह एहसास कराया कि वे बड़ी सूक्ष्मता से चीज़ों को देखते हैं। जितना वे चाहते थे, उतना शायद कर नहीं पाए, या जितने की वे हैसियत रखते थे, उतना उनको नहीं मिला। शायद इसलिए कि वे बहुत ही सज्जन थे, और स्वाभिमानी भी- अपना प्राप्य मांगना, उसका दावा करना या इन सबके लिए इशारा करना भी शायद उन्हें गवारा नहीं था।
उनके निधन की ख़बर सुनी तो मुझे उनकी लिखी हुई टिप्पणी ही याद आई। कुंवरनारायण की कविता ‘आत्मजयी’ पर फिल्म बनाते हुए वे बताते हैं कि कैसे उन्होंने उसकी लोकेशन चुनी और कैसे मनोहर सिंह यम की भूमिका में नचिकेता को अग्नि के भीतर झांकने का निमंत्रण दे रहे थे। यह टिप्पणी मनोहर सिंह के देहांत के तत्काल बाद आई थी। उन्होंने बड़ी मार्मिकता से लिखा था, ‘गुज़रता हुआ वक़्त सबकुछ किस्से में बदल डालता है। यह जीवित अनुभव को यथार्थ के एक बोध से वंचित कर देता है। तब से महाराजिन बुआ और मनोहर सिंह दोनों मृत्युलोक में यम के पास जा चुके हैं और मेरे लिए वे यम की तरह ही मिथकीय हो गए हैं। मगर मेरे कानों में गूंजती मनोहर सिंह की आवाज़ अब भी वास्तविक है।‘
के बिक्रम सिंह भी अब उसी दुनिया का हिस्सा हैं। लेकिन हमारे लिए उनके शब्द, उनके दृश्य, उनके कहकहे अब भी वास्तविक हैं। कम से कम, निजी तौर पर, मेरे लिए, वे मेरी भाषा में बचे हुए हैं, मेरे अनुभव के विन्यास में शामिल हैं।


