श्रीकान्त वर्मा शिखर सम्मान आयोजन की रपट पढ़िए। लिखा है युवा लेखक और शोधार्थी मुशर्रफ परवेज़ ने- मॉडरेटर
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“चाहता तो बच सकता था
मगर कैसे बच सकता था
जो बचेगा कैसे रचेगा…”
ये पंक्तियाँ श्रीकांत वर्मा जी की हैं। मैंने पहली बार ये पंक्तियाँ रील देखने के क्रम में विकास दिव्यकृति सर के मुख से सुनी थी। कल यानी 18 सितंबर को श्रीकांत वर्मा जी की 95वीं जन्मतिथि का जलसा कंस्टीट्यूशन क्लब के ‘मावलंकर हॉल’ में लगा था। सैकड़ों साहित्य प्रेमी आए हुए थे। कार्यक्रम का नाम ‘श्रीकांत वर्मा शिखर सम्मान’ था।
श्रीकांत वर्मा के बारे में मैं क्या ही कहूँ? शब्द कम हैं अपने खाते में। आदरणीय बच्चन सिंह से ‘चोटी’ शब्द उधार लेकर, इतना कहना चाहूँगा हूँ कि ‘श्रीकांत वर्मा चोटी के कवि थे’। अपना परिचय इनसे मुक्तिबोध रचित ‘एक साहित्यिक की डायरी’ की भूमिका पढ़ते हुए हुई। आपने ही भूमिका लिखी। और तो और मुक्तिबोध ने आपको ही इसकी मूल पाण्डुलिपि थमाई थी। जिसकी भूमिका में श्रीकांत जी कहते हैं- “एक साहित्यिक की डायरी के पहले संस्करण की पाण्डुलिपि मार्च 1964 में भोपाल में मुक्तिबोध जी ने मुझे सौंपी थी और वह जिस रूप में चाहते थे उसी रूप में वह प्रकाशित हुई।”
अब सम्मान समारोह की शुरुआत हो चुकी थी। संचालक महोदया ने सभी का शब्दों से स्वागत किया। तत्पश्चात् उन्होंने ‘श्रीकांत वर्मा ट्रस्ट’ का संक्षिप्त परिचय दिया। मंच के बीचो-बीच तबला, हारमोनियम आदि इंस्ट्रूमेंट रखे थे। यानी कोई संगीतमय कार्यक्रम होना था। फ़िर मंच पर विदुषी ‘सुधा रघुरामन’ जी अपनी टोली के साथ आ पहुँचीं। उन्होंने विभिन्न रागों के समावेश से श्रीकांत वर्मा जी की कविता “सुनो भाई घुड़सवार मगध किधर है” व अन्य कविताओं की संगीतमय प्रस्तुति दी। अंत में उन्होंने अशाेक वाजपेयी जी की कविता “एक बार जो ढल जाएंगे, शायद ही फ़िर खिल पाएंगे” का भी संगीतमय प्रस्तुति दिया।
अब सभी आमंत्रित अतिथियों को मंच पर श्रीकांत जी के परिवार द्वारा ले जाया गया। सभी ने दीप प्रज्ज्वलन कर कार्यक्रम की विधिवत शुरुआत की। फ़िर संचालक महोदया ने श्रीकांत जी की पोती को आवाज़ दिया। वे आईं और बारी-बारी से सभी आगंतुकों का पुष्पगुच्छ (Bouquet) देकर स्वागत किया। एक स्त्री द्वारा सभी का स्वागत करना,वाकई में आँखों को अच्छा लग रहा था। इसके तुरंत बाद श्रीकांत जी पर बनी एक लघु डॉक्यूमेंट्री दिखाई गई।
अब वक़्त आ चुका था, उन सभी को सुनने का जिनका इंतज़ार साहित्यप्रेमी घंटों से का रहे थे। आपको स्पष्ट रूप से बताता चलूँ कि मैं अपनी तरफ़ से एक भी शब्द नहीं जोड़ या घटा रहा। जो जैसा जिन-जिन लोगों ने कहा, ठीक वही प्रेषित कर रहा हूँ। संचालक महोदया से सर्वप्रथम वक्ताओं की फ़ेहरिस्त से डाइस पर बुलाना शुरू किया। इन्होंने जिस क्रम में बुलाया, मैं भी उसी क्रम में आपको सुनवाता चलता हूँ।
बतौर वक्ता, विनोद भारद्वाज जी आए। इनसे अपना परिचय कुछ दिन पूर्व हुआ। ‘हिंदी सिनेमा का समाजशास्त्र’ पुस्तक पढ़ रहा था। जिसमें इनका उल्लेख करते हुए, इनके द्वारा लिखित ‘नया सिनेमा’ पुस्तक का उल्लेख पारख जी ने किया है। ख़ैर, आपने सबसे पहले श्रीकांत जी के पत्रकारिता जगत के कामों का वर्णन किया। आपने अशोक वाजपेयी जी के लंबी-लंबी चिट्ठियों का भी उल्लेख किया। आगे आपने कहा कि “मेरी श्रीकांत जी और अशोक जी दोनों से साल 1967 में मुलाक़ात हुई थी। दिनमान में श्रीकांत जी टाइपिस्ट को बोलकर लिखवाते थे।”
बतौर वक्ता, ममता कालिया जी आईं। आपने कहा कि “जब मैं एम०ए० में पढ़ती थी तो श्रीकांत जी ‘अकविता’ लिखते थे।” फ़िर आपने अशोक जी को मुबारकबाद पेश किया। और बोलीं कि “अशोक जी की दोस्ती हमेशा बुजुर्गों से रही। अशोक जी हम लेखकों को सीढ़ी और सरगुजा के जंगलों में बुलाते थे, और ‘जंगल में मंगल’ होता था।”
इनके बाद बतौर वक्ता पुरुषोत्तम अग्रवाल जी को आवाज़ दिया गया। संचालक महोदया ने परिचय में आपकी रचना ‘अकथ कहानी प्रेम की’ के स्थान पर ‘अथक कहानी प्रेम की’ कह दिया। आपने बेहद कम शब्दों में बड़ी बात कह दी। आपने यूँ कहा “यह समय विचारहीनता के उत्सव का है। ए०आई० का अंधाधुंध विकास, ह्यूमन इंटेलीजेंस का व्यवस्थित विनाश है।” फ़िर उन्होंने अशोक जी और सुमन केसरी जी के साल 2012 के बात-चीत का ज़िक्र करते हुए बताया कि अशोक जी ने कहा था “जैसे श्रीकांत वर्मा राजनीति के अंततः विफलता के कवि हैं, मैं शब्दों की अंततः विफलता का कवि हूँ।”
कार्यक्रम की अध्यक्षता कर रहे, प्रसिद्ध चित्रकार परमजीत सिंह ने अशोक जी को सम्मान हेतु बधाई दिया। आगे बोले कि “मुझे हिंदी साहित्य की ज़्यादा समझ नहीं है। मुझे यहाँ फँसा दिया गया है।” उन्होंने बताया कि आज अशोक जी ने मुझसे कहा “कि कोई बात नहीं, जितनी आपको हिंदी की समझ है बस उतनी ही मेरी आर्ट की समझ है।”
इनके बाद अरुण कमल जी को आमंत्रित किया गया। आप बतौर मुख्य अतिथि उपस्थित थे। आपने कहा कि “आज का दिन मेरे लिए भी विशेष दिन है।” आपने श्रीकांत जी की बहुत सी यादों को ताज़ा किया। कई कविताओं का भी पाठ किया। एक बात जो आपने बड़ी प्यारी कही कि “कोई भी कवि स्मृतिशेष नहीं रहता।” आपने फ्लो-फ्लो में तुलसी और कबीर से तुलना कर दिया। माज़रत के साथ कहना चाहूंगा सर कि कोई कवि बेशक़ से महान हो सकता है पर तुलसी और कबीर की बात अलग है। उनसे तुलना करना ठीक नहीं!
इनके वक्तव्य के पश्चात् अशोक वाजपेयी जी को ‘श्रीकांत वर्मा शिखर सम्मान’ से सम्मानित किया गया। आपको ₹21 लाख का चेक, सोने व चाँदी से युक्त स्मृति चिह्न और प्रशस्ति-पत्र प्रदान किया गया। सभी ने खड़े होकर आपको मुबारकबाद पेश किया।
अब डाइस पर थे, सम्मान प्राप्त करने वाले वाजपेयी जी। आपकी वाकपटुता का क्या ही कहना! हम जैसे छात्र तो आपके कहने के कायल हैं हीं। आपका उच्चारण लाजवाब है सर। आपने आज थोड़ा ज़्यादा बोला। पुरस्कार के बारे में आपने कहा कि “पुरस्कारों के साथ मेरा संबंध बड़ा अटपटा रहा है। मैं पुरस्कार दिलवाने और पुरस्कार स्थापित करवाने में रहा हूँ। मैं विनयपूर्वक यह सम्मान स्वीकार करता हूँ।”
आगे आप कहते हैं- “कविता और साहित्य विचार की विधा भी हैं। उनमें संसार, सचाई, समाज, समय, आत्म, व्यक्ति, सम्भावना आदि पर विचार होता है। यह निरा विचार नहीं, संवेदनात्मक विचार होता है, रागसिक्त विचार। कविता संसार का गुणगान करती है और उनका प्रश्नांकन भी। उसमें मानवीय प्रयत्न की सम्भावना, आकांक्षा और सीमाओं का एहतराम होता है। अपने अनेक सम्भव अर्थों और आशयों में कविता संसार का रूपक होती है, उसके अनेक अर्थों और बहुलता का रूपक। रिल्के ने कवि को ‘अदृश्य का मधुसंचयी’, बोरिस पास्तनाक ने कवि को ‘अनन्त का राजदूत/जिसे समय ने बन्धक बना रखा है’, मुक्तिबोध ने ‘आत्मा का गुप्तचर’ और हमारी परम्परा में ‘अप्रत्याशित की रमणीयता’ का रचयिता कहा है। श्रीकान्त वर्मा ने अपने को याने कवि को ‘अपनी विफलताओं का प्रणेता’ बताया है।”
रात होने लगी थी, वहीं सम्मान समारोह भी संपन्नता की ओर थी। इतने में धन्यवाद ज्ञापन हेतु श्रीकांत जी के पुत्र अभिषेक वर्मा जी को बुलाया गया। आपने पिताजी की पुरानी स्मृतियों को याद करते हुए सभी का साधुवाद किया।


