आज पढ़िए वरिष्ठ लेखक पंकज सुबीर की कहानी ‘काली कामनाओं के कोलाज में कामिनी’। पंकज सुबीर की कहानियों की रेंज बहुत प्रभावित करती है। उनकी कहानियों में करुणा भी होती है, व्यंग्य भी। इस कहानी को पढ़िए जो बिल्कुल क़िस्सागोई की शैली में लिखी है। यह महज संयोग है कि आज उनका जन्मदिन भी है। कहानी पढ़िए और मन हो तो जन्मदिन की बधाई भी दीजिए- मॉडरेटर
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बदन का ज़िक्र बातिल है तो आओ,
बिना सर पैर की बातें करेंगे
‘फूटी बिजौरी’, शहर से बाहर स्थित एक कॉलोनी। इस कॉलोनी में जिन लोगों ने मकान ख़रीदे, वे थके, बुझे, असंतुष्ट- मध्यमवर्ग और निम्न मध्यमवर्ग के वे लोग थे, जो शिक्षक, सिपाही, लाइनमैन, बाबू जैसे सरकारी पदों से या तो सेवानिवृत्त हो चुके थे, या बस होने ही वाले थे। जीवन भर टूटे-फूटे, खंडहर जैसे सरकारी मकानों में रहने के बाद, अब मरने के लिए ये अपने मकान में आये थे। कुछ घरों में केवल पति-पत्नी ही थे, कुछ में बच्चे भी थे, और कुछ में बच्चों के भी बच्चे थे। कामिनी उर्फ कम्मो के प्रवेश का कारण जो घर बना, उसमें भी तीन पीढ़ियाँ रहती थीं- दादा, बेटा और पोता। सत्तर वर्ष के आर या पार की उम्र का दादा, पचास के आर या पार का बेटा और पन्द्रह के आर या पार का पोता। इन तीन पुरुषों के अलावा घर में एक स्त्री पात्र भी थी- दादा की बहू, बेटे की पत्नी तथा पोते की माँ। दादा की पत्नी कुछ साल पहले गुज़र चुकी थी और वह पूरी तरह ‘हाथ ख़ाली’ होकर सुबह पलंग के दोनों तरफ़ से उतर सकने की स्थिति प्राप्त कर चुका था। लेकिन मन की स्थिति ठीक ऐसी थी- ‘गो हाथ को जुम्बिश नहीं आँखों में तो दम है, रहने दो अभी साग़र-ओ-मीना मेरे आगे’। दादा के बेटे की स्थिति भी दादा से कोई बहुत ज़्यादा अलग नहीं थी, मतलब दोनों के लिए ही कहा जा सकता था- ‘मस्तियाँ ख़त्म, मद-होशियाँ ख़त्म थीं, ख़त्म था बाँकपन’। इन चारों के नाम तो थे लेकिन कहानी में बताना आवश्यक नहीं है, इनको हम दादा, बेटा, पोता और स्त्री ही कहेंगे। कहानी में बस एक ही नाम है- कामिनी उर्फ़ कम्मो।
ये किस ज़ोहरा-जबीं की अंजुमन में आमद आमद है
बिछाया है क़मर ने चाँदनी का फ़र्श महफ़िल में
वह सर्दियों की एक दोपहर थी, जब फूटी बिजौरी नाम का वह मोहल्ला अचानक हलचलमय हो गया। हलचल का कारण कम्मो थी, जो उस आलोच्य समय में उस बजरी की सड़क से होकर गुज़र रही थी- ‘अभी रौशन हुआ जाता है रस्ता, वो देखो एक औरत आ रही है’। स्त्री के संदर्भ में शारीरिक विन्यास के आदर्श पैमाने- छत्तीस-चौबीस-छत्तीस का एक आँकड़ा बिलकुल चौबीस तथा बाक़ी के दो आँकड़े भी एकदम परफ़ेक्ट तथा जिस मकान में कम्मो को जाना था उस मकान के नंबर के ठीक बराबर थे। असल में कम्मो को छत्तीस बटा आठ नंबर वाले घर जाना था। छत्तीस बटा आठ फूटी बिजौरी में सबसे पीछे की आठ नंबर गली का छत्तीसवाँ मकान है। इसलिए वहाँ पहुँचने के क्रम में कम्मो को लगभग पूरे मोहल्ले में से ही होकर गुज़रना पड़ा और इसी क्रम में मोहल्ला बहुत देर तक हलचल की परिधि में घिरा रहा- ‘सुना है उस के बदन की तराश ऐसी है, कि फूल अपनी क़बाएँ कतर के देखते हैं’।
जब कम्मो दादा के घर पहुँची तब दादा घर के बाहर कुर्सी पर बैठा था। कम्मो के वहाँ पहुँचने पर काव्य शास्त्र के अनुसार वाक़या कुछ यूँ हुआ- ‘ख़बर-ए-तहय्युर-ए-इश्क़ सुन न जुनूँ रहा न परी रही, न तो तू रहा न तो मैं रहा जो रही सो बे-ख़बरी रही’। इन पक्तियों का सरल हिंदी में भावार्थ कुछ इस प्रकार है- ‘जब कम्मो वहाँ पहुँची तो दादा की नज़र अख़बार से हट कर कम्मो की कमर पर पड़ी। कमर पर नज़र पड़ते ही दादा की आँखों की गोटियाँ बाहर की तरफ़ निकलना शुरू हुईं और कुछ ही देर में टप-टप कर के बाहर गिर पड़ीं। पास में कंचे खेल रहे बच्चे उन गोटियों को कंचे समझ कर उठा ले गये।’ इस बेख़बरी का कारण यह था कि दादा ने इस प्रकार की शत-प्रतिशत निर्धारित माप वाली कमर प्रत्यक्ष रूप में बरसों बाद देखी थी। दादा के मन में सबसे प्रथम भाव आया कि अपने दोनों हाथों से नाप कर देखा जाये इस कमर को। अख़बार के लगभर समानांतर स्थित कमर पर कुछ देर तक दृष्टि गड़ाए रखने के बाद दादा की नज़रें ऊपर की तरफ़ बढ़ीं, तो कुछ धीमी गति से चलीं। रुक-रुक कर, ठहर-ठहर कर। ‘बहुत रुक रुक के चलती है हवा ख़ाली मकानों में, बुझे टुकड़े पड़े हैं सिगरेटों के राख-दानों में’।
आप की नाज़ुक कमर पर बोझ पड़ता है बहुत
बढ़ चले हैं हद से गेसू कुछ इन्हें कम कीजिए
बाइबिल कहती है- ‘ईश्वर से छह दिन तक दुनिया को बनाया और सातवें दिन आराम किया’। जिस दिन कम्मो छत्तीस बटा आठ में पहुँची थी, उस दिन दुनिया को बनाने वाले छह दिनों में से कोई एक दिन था, इसलिए उस दिन केवल दादा के हिस्से में ही कम्मो को ताड़ना आया था। मगर फिर आराम का सातवाँ दिन अर्थात् रविवार आया। उस दिन घर के अन्य दो पुरुष भी घर पर थे। रविवार का वह अलसाया हुआ-सा दिन था, जब कम्मो वहाँ काम करने पहुँची। और फिर- ‘मस्जिदों के मीनारों ने देखा उसे, मन्दिरों के किवाड़ों ने देखा उसे, मयकदे की दरारों ने देखा उसे’। मतलब यह कि जब कम्मो किचिन से झाड़ू लगाते हुए तीनों कमरों के ठीक बीच स्थित बरामदे में पहुँची, तब तीन कमरों से अलग-अलग आवृत्ति की तीन नज़रें अलग-अलग स्थानों पर टिक गईं। दादा अपने कमरे में पलंग पर बैठा योग कर रहा था, किन्तु बात की बात में अनुलोम-विलोम स्थगन का शिकार हो गया। नज़रें ठीक चौबीस इंच माप वाले स्थान पर टिकी हुई थीं, एकदम अर्जुन की तरह। बेटा उस समय अपने पलंग पर बैठा अख़बार पढ़ते हुए चाय पी रहा था। कम्मो से उसका पहला सामना था, तो उसकी स्थिति भी दादा की तरह ‘न जुनूँ रहा, न परी रही’ वाली ही हुई। अख़बार केवल औपचारिकता के लिए हाथ में रह गया। बेटे की नज़रें चौबीस इंच पर न टिक कर अपने मकान के नंबर वाले एक नाप पर स्थिर हो गयीं। जब कम्मो बरामदे में नमूदार हुई, पोता अपने कमरे में अपनी उम्र की माँग अनुसार डम्बल से हाथों की कसरत कर रहा था। डम्बल को ऊपर उठाया हुआ हाथ बहुत देर तक नीचे नहीं आया। पोते की नज़रों ने भी अपने लिए एक दूसरा छत्तीस नंबर वाला स्थान टिकने के लिए तलाश लिया और वहीं स्थिर हो गयीं। तीन पीढ़ियाँ शिद्दत से एक ही काम में लगी थीं- ‘अब लुत्फ़ क्या मिलेगा किसी शय की दीद से, जो लुत्फ़ मिल रहा है तुझे देखने के बाद’।
तीनों पीढ़ियाँ अपने-अपने कमरे से कामिनी को ताड़ तो रही थीं, मगर यह वह खेल था जिसमें तीनों की भूमिकाएँ फिलहाल खिलाड़ी वाली नहीं थी। दादा को तो कई साल पहले खिलाड़ी के दर्जे से ज़बरन संन्यास दिलवा कर अंपायर की भूमिका प्रदान कर दी गयी थी। भले ही दादा अंपायर हो चुका था मगर ‘बंदर बूढ़ा हो जाये तो भी गुलाटी मारना नहीं छोड़ता’ कहावत की तर्ज पर अभी भी मैदान में उतरने को उसका दिल मचलता था। आख़िर को अंपायर भी तो पुराना खिलाड़ी होता ही है- ‘आज तक दिल की आरज़ू है वही, फूल मुरझा गया है बू है वही’।
बेटे की स्थिति भी दादा से कुछ अलग नहीं थी, उसने हालाँकि खेल से संन्यास नहीं लिया था, मगर जो उसकी स्थिति थी उसे लगभग संन्यास ही माना जाये, तो ठीक रहेगा। जीवन में एक स्थिति ऐसी आती है, जब आपने खेल से संन्यास की घोषणा भी नहीं की होती है और उधर आपका टीम में चयन भी नहीं किया जा रहा होता है। बेटा इसी स्थिति में था और अंपायर बनाये जाने की प्रतीक्षा में जीवन काट रहा था, मगर कहीं न कहीं अंपायर बनने से पहले एक यादगार पारी खेलने की इच्छा तो दिल में ज़िंदा थी- ‘ना-उमीदी बढ़ गई है इस क़दर, आरज़ू की आरज़ू होने लगी’।
पोता नया खिलाड़ी था, मगर उसकी भी एक समस्या यह थी कि उसे अभी तक बारहवें अतिरिक्त खिलाड़ी के रूप में ही टीम में शामिल किया जा रहा था। मतलब वह खिलाड़ी था भी और नहीं भी। टीम में शामिल था लेकिन मैदान पर उतरने का मौक़ा अभी तक नहीं मिला था। वह एक बार मैदान पर उतर कर अपना जौहर दिखाना चाहता था, बताना चाहता था कि वह भी मँझा हुआ खिलाड़ी है- ‘आरज़ू वस्ल की रखती है परेशाँ क्या क्या, क्या बताऊँ कि मेरे दिल में है अरमाँ क्या क्या’।
औरतें काम पे निकली थीं बदन घर रख कर
जिस्म ख़ाली जो नज़र आए तो मर्द आ बैठे
उस एक रविवार के बाद उस घर में बहुत कुछ बदल गया। बेटे का ऑफ़िस घर से कुछ ही दूरी पर था, मगर वह सुबह का ऑफ़िस गया फिर शाम को ही घर लौटता था। पत्नी कई बार कह चुकी थी कि दो क़दम पर तो ऑफ़िस है, दोपहर का खाना खाने घर आ जाया करो, पर बेटा नहीं आता था। मगर उस रविवार के बाद वह दोपहर का खाना खाने घर आने लगा। एक-दो दिन में कम्मो ने भी फूटी बिजौरी में ही दो-तीन और घरों में भी काम पकड़ लिया था। अब वह सुबह जल्दी कॉलोनी में आने लगी थी। दूसरे घरों का काम करने के बाद यहाँ आती थी और फिर दोपहर बाद यहाँ का सारा काम ख़त्म करके अपने घर चली जाती थी। यह उसके काम करने का अंतिम पड़ाव होता था, इसलिए वह यहाँ कुछ ज़्यादा देर तक भी रुकती थी। कभी-कभी स्त्री का मन होता था, तो वह कम्मो को खाना खाने के लिए भी रोक लेती थी। बेटा जब लंच के लिए आता तो खाना तो क्या खाता था, घंटे भर तक अपनी आँखों से कम्मो को खाता रहता था- ‘तसव्वुर ज़ुल्फ़ का है और मैं हूँ, बला का सामना है और मैं हूँ’।
पोते के साथ भी यही कुछ हुआ। वह स्कूल से आने के बाद दोस्तों के साथ उड़ा-उड़ा फिरता था, फिर शाम या कभी रात हो जाने पर ही घर आता था। अब स्कूल से आने के बाद वह भी घर ही रहने लगा। साल भर पहले से ही उसने जिम भी जाना शुरू किया था, अभी मसल्स-वसल्स तो कुछ बनी नहीं थीं, मगर फिर भी बिना आस्तीन की काली बनियान पहने घर में घूमने लगा। पुरुषों को लगता है कि जिस प्रकार स्त्री की देह का कोई भी हिस्सा खुला देख कर उनके मुँह से लार टपकने लगती है, उसी प्रकार पुरुष की खुली देह देख कर स्त्री के मुँह से भी लार टपकने लगती है और वह उस पुरुष के साथ उसके बिस्तर में समा जाने के लिए आतुर हो जाती है। पोता इसी सोच के तहत काली सेंडो बनियान और काली शार्ट पहन कर अंग-प्रदर्शन करता हुआ घर में घूमने लगा। उससे पहले वह अगर घर में रहता भी था, तो अपने कमरे में बंद ही रहता था, मगर अब वह कमरे के अलावा बाक़ी सारे घर में रहने लगा। पोते की जो उम्र थी, उस उम्र में उसे थोड़ा-सा भी इंतज़ार बहुत लम्बा लग रहा था। रोज़ कम्मो को देखता और रोज़ अपने अंदर की हलचलों को ज़ब्त करता, मन अधीर हो उठता था- ‘मैं अपने जिस्म की सरगोशियों को सुनता हूँ, तेरे विसाल की साअ’त निकलती जाती है’।
कम्मो के बारे में तीनों पुरुषों को बहुत ज़्यादा जानकारी नहीं थी। कम्मो के शरीर पर शादी का कोई भी प्रतीक चिह्न नहीं था, मसलन- माँग में सिंदूर, गले में मंगलसूत्र, पैरों में बिछिया, इसलिए तीनों मान कर चल रहे थे कि या तो इसकी अभी तक शादी नहीं हुई है, या फिर इसकी छोड़-छुट्टी हो चुकी है। दोनों ही स्थितियाँ उनके लिए अनुकूल हैं, मगर यदि शादी हो चुकी है और टूट चुकी है, तो अधिक अनुकूलता है- स्त्री की शादी टूट गयी है मगर उसे पुरुष देह की आदत तो लग ही गयी है, ऐसे में वह इधर-उधर मुँह तो मारती ही होगी। पुरुषों को लगता है कि विधवा या तलाक़शुदा स्त्री डाल पर पूरी तरह पक चुके उस आम की तरह होती है, जिसे ज़रा सा छूने भर से ही वह झोली में आ गिरता है। तीनों ने ‘अलकेमिस्ट’ उपन्यास तो नहीं पढ़ा था, पर उसके एक संवाद का सस्ता संस्करण शाहरुख ख़ान के मुँह से सुन रखा था कि बहुत शिद्दत से किसी को चाहो तो सारी कायनात उसे तुमसे मिलाने में लग जाती है। बस उसी को ध्येय वाक्य बना कर तीनों पूरी शिद्दत से कामिनी की कामना में लग चुके थे। उधर कम्मो को इस सब के बारे में कुछ भी पता नहीं था, वह तो रोज़ अपने समय से आती थी और घर के सारे काम पूरे करने में जुट जाती थी। मगर तीनों पुरुषों ने दो-तीन दिन में ही यह पता लगा लिया था कि बर्तन माँजना, झाड़ू लगाना, पोंछा फेरना, कपड़े धोना… जब कम्मो ये काम करती है, तब कौन से काम के समय वे कहाँ बैठेंगे, तो कम्मो के शरीर को कौन सा हिस्सा उनको अच्छे से दृष्टिगोचर होगा। तीनों उस हिसाब से अपनी सुविधा से उस स्थान पर बैठ जाते थे। मगर यह सावधानी रखते कि उनका यह देखना कोई दूसरा देख न पाये, और कोई उन्हें देखता हुआ देख ले तो- ‘तुझे दानिस्ता महफ़िल में जो देखा हो तो मुजरिम हूँ, नज़र आख़िर नज़र है बे-इरादा उठ गई होगी’।
तमाम पैकर-ए-बदसूरती है मर्द की ज़ात
मुझे यक़ीं है ख़ुदा मर्द हो नहीं सकता
वस्ल एकमात्र ऐसी घटना है जो घटने के लिए नितांत एकांत की माँग करती है। वैसे ऐसा ज़रूरी तो नहीं है मगर यही चलन है। समस्या यह थी कि घर में सब कुछ था एकांत के अलावा। जब तीन जोड़ी आँखें कम्मो के साथ पूरे घर की यात्रा करती थीं, उस समय कम्मो को मिला कर उस घर में कुल पाँच प्राणी होते थे- दादा, बेटा, पोता, स्त्री और कम्मो, ऐसे में वस्ल का एकांत किसी भी एक को मिल जाये, ऐसा संभव ही नहीं था। दादा, बेटा और पोता, तीनों को ही यह लग रहा था कि कम्मो तो अब उनकी हो ही चुकी है, बस एक नज़रों की जो झिझक है, वह एकांत में ज़रा-सी छुअन या ज़रा-सी नज़दीकी में ही मिट जायेगी और सवाले-वस्ल को उचित उत्तर प्राप्त हो जायेगा। इन तीनों में से दो तो कम्मो को स्पर्श करने का सुख भी उठा चुके थे और कम्मो को पता भी नहीं था कि वह जो कुछ हुआ था, वह उसके स्पर्श का सुख लेने के लिए हुआ था। दादा कई बार कुर्सी से उठने के लिए कम्मो को हाथ देता था और कम्मो हाथ पकड़ कर उसको उठने में मदद कर देती थी। इस दौरान दादा हाथ को थोड़ा दबा भी देता था, कम्मो सोचती थी कि उठते समय ज़ोर पड़ने के कारण यह दबाव बढ़ा है। कई बार जब पोछा लगा होने के कारण फ़र्श गीला होता था, तब भी दादा कम्मो का हाथ पकड़ कर वैतरणी पार करता था। कहावत की भाषा में कहा जाये तो दादा- लँगोटी में फाग खेलता था। दादा इससे आगे तो बढ़ना चाहता था, पर हर बार रुकना पड़ता था- ‘नहीं निगाह में मंज़िल तो जुस्तुजू ही सही, नहीं विसाल मयस्सर तो आरज़ू ही सही’।
पोता भी स्पर्श सुख ले चुका था, वह हँसते हँसते कम्मो के कंधे पर हाथ थपक देता था। या कभी-कभी किसी बात पर हँसते हुए हाय-फाय करने के लिए कम्मो से अपने हाथ की ताली पर ताली बजवा लेता था। चूँकि कम्मो की नज़र में तथा परिवार की नज़र में वह बच्चा था, इसलिए उसके लिए यह जायज़ था। नाजायज़ तो वह था, जो उसके दिमाग़ में था, पर वह तो बाहर से दिखता नहीं था। पोता अपने दोस्तों में प्रचारित कर चुका था कि कम्मो उसके प्रेम में पूरी तरह पड़ चुकी है और वह क़िला जीतने की स्थिति में आ चुका है। पुरुषों के बीच यह क़िला जीतना एक गर्व की निशानी होती है, उसके पास अभी तक यह निशानी एक भी नहीं थी, इसलिए अब वह दिनों-दिन उत्साहित होता जा रहा था। बात देखने और ताड़ने से छूने-छुआने तक आ चुकी थी। उसे लग रहा था कि जो कुछ होना है वह अब जल्द से जल्द हो जाना चाहिए, उसमें रोज़-ब-रोज़ हो रही देरी उसके लिए नाक़ाबिले-बर्दाश्त हो रही थी- ‘वस्ल हो जाए यहीं हश्र में क्या रक्खा है, आज की बात को क्यूँ कल पे उठा रक्खा है’।
केवल बीच की आयु में फँसा हुआ बेटा ही ऐसा था, जिसे बस तसव्वुर में ही कम्मो का स्पर्श करना पड़ रहा था। बेटे के पास कम्मो को प्रत्यक्ष में छूने का कोई चारा नहीं था, एक तो वह न पूरी तरह बुज़ुर्ग था और बच्चा तो ख़ैर था ही नहीं, दूसरा यह कि घर में उसकी एकदम सगी तथा व्यक्तिगत पत्नी भी उपस्थित रहती थी। पत्नी के सामने वह किसी भी प्रकार से छूने की यह घटना संपन्न नहीं कर सकता था। उसको बेसब्री से इंतज़ार रहने लगा था कि कब पत्नी कुछ दिनों के लिए कहीं अपने मायके या अन्य रिश्तेदार के घर जाती है। चूँकि बेटे को कम्मो को छूने का काम केवल तसव्वुर में ही करना था, इसलिए उसके पास यह सुविधा थी कि वह केवल स्पर्श तक नहीं रुके, उसके आगे भी बढ़ता चला जाये, जहाँ तक उसकी मर्ज़ी हो- ‘ख़्वाब भी वस्ल वाक़या भी है, जो नहीं भी हुआ, हुआ भी है’।
लब्बो-लुआब यह था कि तीनों के मन में यह विश्वास जम चुका था कि अब कम्मो अब उनके लिए गूलर के फूल की तरह अलब्ध वस्तु नहीं रही है। मुकम्मल वस्ल के इंतज़ार में तीनों के प्रयास धीरे-धीरे बढ़ते जा रहे थे- ‘प्यासों रहो न दश्त में बारिश के मुंतज़िर, मारो ज़मीं पे पाँव कि पानी निकल पड़े’।
ख़्वाब में वस्ल के इल्हाम उतारे जाते
लफ़्ज़ भीगी हुई पलकों पे सँवारे जाते
कम्मो को काम पर आये हुए और कुछ दिन हो चुके थे, अब वह घर के लोगों से बहुत घुल-मिल चुकी थी। यह घुलना-मिलना दादा, बेटा और पोता, तीनों के मन में ग़लतफ़हमी पैदा कर रहा था। तीनों को ऐसा लग रहा था कि यह एकतरफ़ा नहीं है, बल्कि कम्मो की तरफ़ से तो और ज़्यादा है। तीनों को लग रहा था कि वस्ल और उनके बीच में बस तीन ही चीज़ें हैं- दो अन्य पुरुष तथा एक घर की स्त्री। जिस दिन ऊपर वाला उन पर मेहरबान होगा उस दिन ये तीनों किसी न किसी कारण से घर के बाहर रहेंगे और बात की बात में वस्ल नाम की घटना घट जायेगी। उस दिन की प्रतीक्षा में दादा, बेटा और पोता बेचैन हो रहे थे। वे अपनी कल्पनाओं के घोड़े दौड़ाते रहते थे। कल्पना में वह सब कुछ करते रहते थे, जो वे वास्तविकता में करना चाह रहे थे- ‘मगर गिरफ़्त में आता नहीं बदन उस का, ख़याल ढूँढ़ता रहता है इस्तिआरा कोई’।
पोता अपने कमरे में बैठा हुआ कम्मो को बर्तन घसते हुए देखता और उसकी आँखों में लाल डोरे उभरने लगते। वह तसव्वुर में छत्तीस-चौबीस-छत्तीस में से पहले वाले छत्तीस को अपनी दोनों हथेलियों में भींच कर नशे की-सी ख़ुमारी में डूब जाता। हवा में उड़ने लगता। उसका ज़िस्म हवा से भी हल्का हो जाता, वह पहले छत्तीस को हथेलियों में बाँधे किसी तिनके की तरह आसमान में उड़ जाता। आसमान पर पहुँच कर वह बरसात हो जाता और लम्स बन-बन कर कम्मो पर बरसने लगता। बरसता ही रहता, बरसता ही रहता। उसके लम्स से कम्मो पर सरापा नील पड़ने लगते और तसव्वुर में ही पोता हैरत में डूबा हुआ सोचने लगता- ‘क्या क़यामत है कि आरिज़ उन के नीले पड़ गए, हम ने तो बोसा लिया था ख़्वाब में तस्वीर का’। पोता तसव्वुर में ही उड़ता जाता, उड़ता जाता, ऊँचे आसमान में, ऊँचा और ऊँचा… फिर एकदम किसी पुच्छल तारे की तरह चमकता और टूट कर चंद्रमा की सतह से टकरा कर बिखर जाता। फिर बहुत देर तक तेज़ साँसें भरता हुआ पलंग पर पड़ा रहता था- ‘उस से मिलने की ख़ुशी बाद में दुख देती है, जश्न के बाद का सन्नाटा बहुत खलता है’।
दादा तो पहले ही दिन से छत्तीस-चौबीस-छत्तीस में से बीच वाले चौबीस पर स्थिर था। उकड़ूँ बैठ कर कपड़ों को मोगरी से पीटती हुई कम्मो के चौबीस वाले हिस्से में होती हलचल से दादा के अंदर भी हलचल होती थी। अपने हिस्से के चौबीस को दादा अपने तसव्वुर में बाँहों के घेरे में लिये-लिये घूमने लगता था। दादा के लिए सारी दुनिया सिमट कर कम्मो की कमर में आ चुकी थी। किसी शायर ने कहा था कि दुनिया में उसकी प्रेमिका की आँखों के सिवा कुछ नहीं रखा है, मगर दादा के लिए आँखों का स्थान कमर ले चुकी थी। तसव्वुर में ही दादा आलम कवि बन जाता था, तराशी हुई कमर को काँपती हुई उँगलियों के लम्स से छूता और हैरत से पूछता- ‘कनक छरी सी कामिनी, काहे को कटि छीन?’ और उत्तर में उनकी वस्लातुर प्रेमिका कम्मो रंगरेजिन अत्यंत मादक हाव-भाव लिये, काँपते हुए होठों से उत्तर देती- ‘कटि को कंचन काटि विधि, कुचन मध्य धरि दीन’। इस उत्तर से दादा के सिर पर मादकता का तूफ़ान चढ़ जाता। तसव्वुर में खोया हुआ दादा कुर्सी पर बैठे-बैठे ही पसीने-पसीने हो जाता, जैसे दिल का दौरा पड़ा हो। कुर्सी पर बैठा पसीने-पसीने होता दादा सोचता कि काश कम्मो आये और उसके सिर पर हाथ रख कर पूछे कि क्या हो गया, तबीयत तो ठीक है- ‘पूछ लेते वो बस मिज़ाज मेरा, कितना आसान था इलाज मेरा’।
बेटा अंतिम वाले छत्तीस पर स्थिर था। बेटा झाड़ू लगाती हुई कम्मो को देखता और छत्तीस को साथ लिये तसव्वुर की उड़ान पर निकल जाता था। बेटे का संगीत से कभी कोई नाता नहीं रहा था, मगर उसकी उँगलियाँ अपने हिस्से के छत्तीस पर किसी कुशल तबला-वादक की तरह कहरवा ताल में ‘धा गि ना तिं – ना कि धिं ना’ बजाते हुए थिरकने लगती थीं। विलम्बित लय के पचास बीपीएम से प्रारंभ होकर उँगलियाँ मध्य लय और द्रुत लय से होती हुई अति द्रुत लय के दो सौ बीपीएम पर पहुँच जाती थीं। बेटा उम्र के साथ बीपी, डायबिटीज़, हृदयरोग और थायराइड जैसी बीमारियों की चपेट में आ चुका था इसलिए तसव्वुर में भी कहरवा की बीट जब अति द्रुत लय की दो सौ बीपीएम की गति पर पहुँचती थी, तो उसका बीमारियों भरा शरीर एकदम साथ छोड़ने लगता था। अपने हिस्से के छत्तीस पर अति द्रुत गति पर कहरवा बजाता हुआ बेटा हाँफने लगता था, दिल की धड़कन अत्यंत अनियमित हो जाती थी। कहरवा की ताल टूट जाती थी, चक्र खंडित हो जाता था, उँगलियाँ सम पर आने से चूक जाती थीं। मुँह से झाग और आँखों से आँसू निकलने लगते थे। मगर आँसुओं से वस्ल में काम चलता नहीं है- ‘रख न आँसू से वस्ल की उम्मीद, खारे पानी से दाल गलती नहीं’।
सब का ख़ुशी से फ़ासला एक क़दम है
हर घर में बस एक ही कमरा कम है
कुछ दिन और गुज़र गये, कम्मो अब घर में रवाँ-दवाँ हो चुकी थी। लगभग घर की सदस्य जैसी हो चुकी थी। वह काम करते समय अब बहुत ख़ुश भी रहने लगी थी। वह वैसी नहीं रही थी, जैसी तब थी जब वह आयी थी। फ़िल्मी गाने गुनगुनाती रहती थी, बिना यह जाने कि उसके द्वारा गाये जा रहे गानों का घर के तीन जोड़ी कान बिलकुल अलग ही अर्थ निकाल रहे हैं। ‘वक़्त बर्बाद न बिन बात की बातों में कीजिये, आज की रात मज़ा हुस्न का आँखों से लीजिये’ गाना उस समय का हिट गाना था और सबकी ज़बाँ पर चढ़ा हुआ था, लेकिन सबकी ज़बाँ और कम्मो की ज़बाँ में तो फ़र्क़ था। यह गाना तो एक तरह से खुला आमंत्रण ही था। हालाँकि कम्मो बहुत धीमे-धीमे ही गुनगुनाती रहती थी, मगर उन कानों का क्या किया जाये जो कम्मो की एक-एक आहट पर लगे हुए थे। तीनों पुरुष गाहे-बगाहे कम्मो के साथ हँसी-मज़ाक भी करने लगे थे, जिनका जवाब कम्मो भी उसी प्रकार हँस कर देती थी। कम्मो को कहाँ पता था कि वह एक साथ तीन-तीन पीढ़ियों के साथ उनके तसव्वुर में हम-बिस्तर हो रही है। वह भी लगभग एक ही समय पर- ‘कौन बदन से आगे देखे औरत को, सब की आँखें गिरवी हैं इस नगरी में’।
इस समय तक भी जो कुछ कल्पना में हो रहा था उसे अमली-जामा पहनाने का मौक़ा तीनों में से किसी को भी नहीं मिल पाया था। घर की स्त्री इन तीन चार महीनों में कहीं भी मेहमानी करने नहीं गयी थी। वह अमूमन वैसे भी नहीं जाती थी कहीं, मगर इक्का-दुक्का जो पहले कहीं चली जाती थी, इन दिनों में वैसे भी नहीं गयी और तीन बिल्लियों के दुर्भाग्य से छींका नहीं टूट पाया। वह जाये तो किसी न किसी को मौक़ा मिले। दादा तो घर पर ही बना रहता है, बेटा छुट्टी ले सकता है उस दिन, और पोता तो ख़ैर बच्चे में गिना जाता है, वह तो बिना शक की वजह बने भी अपने मन की कर सकता है।
तीनों को दिक़्क़त अब एक-दूसरे से भी होने लगी थी। तीनों को ही ऐसा लगने लगा था कि वह स्वयं ही वह बिल्ली है जिसके भाग्य से कम्मो नाम का छींका बस टूटने ही वाला है। ज़ाहिर-सी बात है ऐसे में हर कोई यह चाह रहा था कि घर में एकांत हो, जिससे छींका टूट सके। छोटा घर था, जिसमें- ‘पाँव फैलाओ तो दीवार से सर लगता था’। कमरों के बीच में एक बरामदा था, जिसमें आवा-जाही का यातायात चलता रहता था। तीनों को कम्मो के आने के बाद लगने लगा था कि उनके घर में तो बहुत भीड़-भाड़ है। कोई भी एक मौक़ा देख कर चौका मारने की कोशिश शुरू करता कि इतने में कोई न कोई आ जाता, बात वहीं की वहीं छोड़ कर उसे हटना पड़ता था- ‘जो कोई आये है नज़दीक ही बैठे है तेरे, हम कहाँ तक तेरे पहलू से सरकते जाएँ’।’ असल में देखा जाये तो उर्दू के शब्द रक़ीब और उससे उत्पन्न दूसरे शब्द रक़ाबत वाली स्थिति ही तीनों के बीच थी। रक़ीब का अर्थ होता है प्रेम में प्रतिद्वंद्वी, एक ही माशूक़ के आशिक़ आपस में रक़ीब होते हैं। इस हिसाब से देखा जाये तो तीनों एक-दूसरे के रक़ीब तो थे, मगर इस रक़ाबत के बारे में तीनों ही नहीं जानते थे। तीनों के हिसाब से यह रक़ाबत की नहीं ‘दाल-भात में मूसलचंद’ वाली या ‘कबाब में हड्डी’ वाली स्थित थी। तीनों ही चाह रहे थे कि कुछ ऐसा हो जाये कि कबाब में मौजूद बाक़ी की दो हड्डियाँ रफ़ा-दफ़ा हों- ‘बैठे हुए रक़ीब हैं दिलबर के आस-पास, काँटों का है हुजूम गुल-ए-तर के आस-पास’।
दादा सोचता था कि काश रिश्तेदारी में किसी की मौत हो जाये, और मरने वाला इतना क़रीब का हो कि उसके बेटे और बेटे की पत्नी दोनों को जाना पड़े। बचा पोता, वह तो कॉलेज जाता ही है, जितनी देर के लिए वह कॉलेज जाता है, उतनी देर में तो छींका टूट भी जायेगा। और अगर पोता घर में रहा भी, तो वह तो नादान-सा बच्चा है, उसे किसी बहाने से भी इधर-उधर कर देना, घर से बाहर भेज देना कोई मुश्किल काम नहीं। दादा रोज़ उन रिश्तेदारों के बारे में सोचता था, जो बिलकुल जाने को तैयार बैठे थे। उसने मन में एक लिस्ट बना रखी थी कि कौन-कौन जाने की दहलीज़ पर पैर लटकाए बैठा है। लिस्ट में उसके सगे बड़े भाई का भी नाम था। रोज़ दुआएँ माँगता था कि कम से कम आज तो कोई फ़ौत हो जाये। मगर रोज़ जब वह उठता था, तो कोई भी ऐसी बुरी ख़बर नहीं मिलती थी, जो उसके लिए अच्छी हो। उसे ऐसा लगने लगा था जैसे उसकी एक ही इच्छा ऊपर वाला सुन नहीं रहा है, बाक़ी तो देने वालों को सब दे ही रहा है- ‘सब ख़्वाहिशें पूरी हों ‘फ़राज़’ ऐसा नहीं है, जैसे कई अशआर मुकम्मल नहीं होते’।
बेटा घर में होने वाले एकांत के लिए कुछ अलग तरह से सोच रहा था। घर में ‘ख़ल्वत-ए-वस्ल’ पैदा करने के लिए उसकी नज़र अपने पिता यानी दादा पर ही थी। वह चाह रहा था कि दादा तो अपनी ज़िंदगी पूरी जी चुका है। अब कर क्या रहा है, कुर्सी पर बैठा-बैठा खाँस रहा है, छींक रहा है, डकारें ले रहा है, उबासी ले रहा है और पाद रहा है। एक तरीक़े से हवा अंदर ले जाकर पाँच तरीक़ों से बाहर छोड़ रहा है। इसका अब काम भी क्या है। ये अगर निकल ले तो घर की भीड़-भाड़ में कुछ तो कमी आये। स्त्री का क्या है उसे तो किसी बहाने से मायके भेज दूँगा, और वहाँ छोड़ कर आने के लिए साथ में अपने बेटे को भी भेज दूँगा। मगर तब, जब यह बूढ़ा टरेगा। फ़िलहाल तो यही छाती पर पत्थर की तरह रखा हुआ है, इसके रहते कुछ भी नहीं किया जा सकता है घर में। बेटे का बस चलता तो वह ख़ुद ही अपने पिता से कह देता- मियाँ अब आपकी मरने की उम्र है, चैन से मरिये और हमें भी सुकून दीजिए- ‘घसीटते हुए ख़ुद को फिरोगे ‘ज़ेब’ कहाँ, चलो कि ख़ाक को दे आओ ये बदन उस का’।
पोता अलग ही सोच में जी रहा था, जेन-ज़ी का था, सो उसकी सोच बाक़ी दोनों से एकदम अलग थी। वह अपने पिता की उम्र के हिसाब से तथा उनके शरीर में मौजूद बीमारियों के हिसाब से रील्स में देख-देख कर, एआई से पूछ-पूछ कर इस बात का पता लगा रहा था कि इन-इन बीमारियों वाले को क्या खाने-पीने से दिल का दौरा पड़ना एकदम तय ही है। वह अपने पिता को मनुहार कर-कर के वही चीज़ें खिला रहा था इन दिनों। उसने सोच रखा था कि जब भी वह दिन आयेगा और उसके पिता को अस्पताल में भर्ती किया जायेगा, तो वह अस्पताल में रुकने के लिए मुश्किल वाली रात की ड्यूटी अपने सिर ले लेगा। माँ और दादा दिन भर वहाँ बने रहेंगे। दिन में वह घर में अपनी ड्यूटी पूरे आनंद के साथ पूरी करेगा। एक दिन, दो दिन, तीन दिन… जितने भी दिन की मोहलत मिल जाये। पिता भी हैरान था कि बेटे को अचानक उस पर इतना प्यार कैसे आने लगा है कि उसके लिए रोज़ कुछ न कुछ बाज़ार से लेकर आता है। पिता कंजूस था और गिन-गिन कर सिगरेट पीता था, मगर कुछ दिनों से उसका सिगरेट का पैकेट ख़ाली ही नहीं हो पा रहा था। पिता हैरान था कि रोज़ सिगरेट पी रहा हूँ मगर पैकेट दूसरे दिन उतने का उतना ही हो जाता है। पोता पूरी शिद्दत से अपने अभियान पर लगा हुआ था। कभी-कभी पिता को कुछ बहुत ज़्यादा तेल और घी की चीज़ खिलाते समय उसे आशंका होती थी कि कहीं ऐसा न हो कि दिल का दौरा इतना ज़ोर का पड़ जाये कि अस्पताल तक जाने का समय ही नहीं मिले। मगर वह तुरंत सिर को झटक कर इस आशंका को उड़ा देता था- ‘रक़ीब क़त्ल हुआ उस की तेग़-ए-अबरू से, हराम-ज़ादा था अच्छा हुआ हलाल हुआ’।
शहर का तब्दील होना शाद रहना और उदास
रौनक़ें जितनी यहाँ हैं औरतों के दम से हैं
सब कुछ लगभग तय सा ही चल रहा था उन तीनों के अनुसार। मिलन की घड़ी लगभग अब आयी कि तब आयी कि स्थिति में थी। तीनों की ही उँगलियों में वस्ल-ए-यार की चिंगारियों की आँच महसूस होने लगी थी। तीनों के अनुसार लोहा भरपूर गर्म हो चुका था और अब वे हथौड़ा मारने के उचित मौक़े की तलाश में थे। कम्मो इन दिनों घर में दूध और पानी की तरह मिल-जुल चुकी थी। सबके साथ बैठ कर हँसती-खिलखिलाती थी। कम्मो के शरीर में एक अलग प्रकार की उमंग दिखाई देने लगी थी, वह जैसे हवा के परों पर तैरते हुए घर का सारा काम करती थी। गुनगुनाती हुई, कभी-कभी अकेले में मद्धम-मद्धम नृत्य करती हुई। जब वह इस घर में आना शुरू हुई थी, तब वह ऐसे ही आ जाती थी, मगर अब वह बाक़ायदा तैयार होकर, सज-धज कर आ रही थी। थोड़ा तैयार होकर आने के कारण कम्मो का सौंदर्य और बढ़ गया था। तीनों को लग रहा था कि तीर एकदम निशाने पर जाकर लगा है। आदमी हो या औरत, जब उसके जीवन में प्रेम आता है, तो वह उसकी सुंदरता को दोगुना कर देता है। तीनों पुरुष कम्मो की दोगुनी सुंदरता पर रुकने वाले नहीं थे, वे चाह रहे थे कि कम्मो चार गुना सुंदर हो जाये। उन्होंने सुन रखा था कि प्रेम अगर इंसान को दोगुना सुंदर करता है, तो वस्ल इंसान को चार गुना सुंदर कर देता है- ‘ज़रा विसाल के बाद आइना तो देख ऐ दोस्त, तेरे जमाल की दोशीज़गी निखर आई’।
वो आ रहे हैं वो आते हैं आ रहे होंगे
शब-ए-फ़िराक़ ये कह कर गुज़ार दी हम ने
रविवार के दिन का इंतज़ार तीनों को रहता था। उस दिन अक्सर ऐसा होता था कि कम्मो दोपहर का खाना भी वहीं खाती थी, फिर स्त्री के साथ रविवार को किये जाने वाले कामों में उसका हाथ बँटाती थी और फिर ढलती दोपहर में या कभी-कभी तो शाम होने के कुछ पहले ही घर जाती थी। ऐसे में तीनों के पास उस दिन कम्मो-ताड़न-कार्य को लेकर भरपूर समय रहता था। तीनों रविवार के दिन अलग-अलग कोणों से, अलग-अलग स्थानों पर बैठ कर कम्मो को ताड़ते थे। पोता रविवार के दिन बनियान भी नहीं पहनता था, बस शॉर्ट में ही घूमता था। ख़ाली शॉर्ट पहने ऐसे स्थान पर डम्बल से कसरत करता था, जहाँ कम्मो को वह और उसका खुला बदन आसानी से दृष्टिगोचर हो। दादा बदन पर तेल लगाने के बहाने धूप में बैठ कर बदन दिखाता था और बेटा भी उस दिन बाथरूम से ख़ाली तौलिये में बाहर निकल कर देर तक वैसा ही घूमता रहता था। यह सब कुछ रविवार को ही संभव हो पाता था। रविवार के दिन तीनों अपने जिस्म का चारा बना कर मछली को फाँसने का प्रयास पूरी शिद्दत के साथ करते थे और पूरा दिन करते थे। हक़ीक़त यह थी कि तीनों के जिस्म में ऐसा कोई चारा नहीं था, जिससे कोई मछली सचमुच फँस सके, दो उमर खाये बदन थे और एक बदन अभी उमर पर आया ही नहीं था। वे तीनों फिर भी बदन की कमान पर इच्छाओं का तीर चढ़ाए उचित मौक़े का इंतज़ार करते रहते थे- ‘एक चिड़िया अभी उड़ान में है, तीर हर शख़्स की कमान में है’।
फिर एक दिन ऐसा हुआ कि रविवार आया मगर कम्मो नहीं आयी। तीन जोड़ी आँखें दरवाज़े पर पत्थर की तरह जड़ी रहीं मगर कम्मो नहीं आयी। उस पूरे दिन तीन बेचैनियाँ घर में सरगोशी करती रहीं। कम्मो ने जब से इस घर में आना शुरू किया था, तब से यह पहला दिन था कि कम्मो नहीं आयी थी। कम्मो के नहीं आने के कारण स्त्री थोड़ा झुँझलाती हुई घर के काम निपटा रही थी। तीनों पुरुष बारी-बारी से रसोईघर में जाकर कम्मो की बाबत पूछ आये थे, किन्तु स्त्री को ख़ुद ही नहीं पता था तो वह क्या बताती। दरवाज़े पर होने वाली हर आहट पर तीनों अपने-अपने कमरों से निकल कर आतुरता से दरवाज़े की तरफ़ देखते थे, मगर- ‘कौन आएगा यहाँ कोई न आया होगा, मेरा दरवाज़ा हवाओं ने हिलाया होगा’।
दूसरे दिन भी दिन भर बेक़रारी सी बेक़रारी बनी रही, कहीं से कोई सूचना या समाचार नहीं आया। फिर अचानक शाम को एक ख़बर अफ़वाह बन कर हवा में फैली और जब तीनों पुरुष मना रहे थे कि अफ़वाह बस अफ़वाह ही रहे, तब अफ़वाह उनके सीने पर आरियाँ चलाते हुए सच हो गयी। ख़बर फूटी बिजौरी की चौथी गली के चौबीस नंबर मकान से निकल कर आयी थी। चौबीस नंबर के मकान में एक व्यक्ति अकेला रहता था। साहित्यिक भाषा में विधुर और आम बोल-चाल की भाषा में रँडवा था। मगर ऐसा भी उमर खाया रँडवा नहीं था। उसका घर भी भरा-पूरा घर था- माता-पिता, पत्नी। मगर उसकी शादी के अगले साल ही दुनिया भर में महामारी फैल गयी थी। उसके घर के सारे लोग बीमारी के संक्रमण का शिकार हो गये थे। वह तो बच गया मगर वह वबा दुनिया भर के लाखों लोगों के साथ उसके माता-पिता और उसकी पत्नी को अपने साथ ले गयी थी। तब से वह व्यक्ति अकेलापन और रँडवापा दोनों को काट रहा था। माँ-बाप भी चले गये थे, अब उसके पुनर्विवाह की सोचता कौन ? चार-पाँच साल इसी में कट गये थे। अचानक चौबीस नंबर के उस मकान में एक दिन कम्मो पहुँच गयी थी। दरअसल कम्मो की रंगत में जो गुलाब पिछले कुछ दिनों से खिल रहे थे, वो गुलाब चौबीस नंबर मकान के कारण थे, छत्तीस नंबर मकान तो यूँ ही ग़लतफ़हमी में था। उस रविवार के दिन, जब छत्तीस नंबर मकान उसकी प्रतीक्षा में बेचैन था, उस दिन घर की कामवाली कम्मो उस रँडवे आदमी के साथ किसी मंदिर में जाकर चौबीस नंबर मकान की मालकिन का दर्जा अपने मेहँदी लगे हाथों में ले आयी थी। कम्मो न केवल शादी कर चुकी थी बल्कि अब तो उसके काम के लिए छत्तीस नंबर मकान पर आने की संभावना भी समाप्त हो चुकी थी- ‘आता था जिस को देख के तस्वीर का ख़याल, अब तो वो कील भी मेरी दीवार में नहीं’।
मेरे बाद वफ़ा का धोका और किसी से मत करना
गाली देगी दुनिया तुझ को सर मेरा झुक जाएगा
छत्तीस नंबर मकान उस सोमवार की शाम अपनी बेचैनियाँ छोड़ कर ग़ुस्से से तमतमा उठा। उस रात जब छत्तीस नंबर के उस मकान में चार लोग हस्बे-मामूल खाना खाने बैठे, तो स्त्री ने तो सामान्य रूप से खाना खाया पर बाक़ी तीन पुरुषों के हलक़ से खाना नीचे नहीं उतरा। उस रात खाना खाते हुए जो बातें हुईं वे बातें जस की तस यहाँ प्रस्तुत हैं-
स्त्री- “चलो अच्छा हुआ, दोनों की ज़िंदगी सुधर गयी। दोनों के आगे-पीछे कोई नहीं था। वह बेचारी भी कब तक भाई-भाभी के घर पर रहती। ऐसे ज़िंदगी थोड़े ही कटनी थी। दोनों के माँ-बाप नहीं थे, जो उनकी शादी का सोचते। दोनों एक ही बीमारी के मारे थे, जिस बीमारी में कम्मो का मर्द और माँ-बाप मरे थे, उसमें इसके भी घर के लोग मरे थे। जैसे को तैसा मिल गया। दोनों की ज़िंदगी सुधर जायेगी अब।”
तीनों पुरुषों के लिए यह नयी सूचना थी कि कम्मो असल में विधवा थी, उसका पति महामारी में मर गया था।
दादा- “अच्छा…! तो राँड़ थी वो ? तभी मैं कहूँ कि क्यों हमेशा लहँगा उठा कर कुएँ में कूदने को तैयार रहती है। उस रँडवे की ज़िंदगी तो गयी काम से। इसकी तो आँखों में ही छिनालपन भरा था। कितने दिन रुकेगी उस रँडवे के पास, देखते हैं। उड़ती चिड़िया है, दो दिन में ही फुर्र हो जायेगी। उसे भी क्या सूझी थी शादी करने की, बड़े बुज़ुर्ग पुरानी कहावतों में सही कह गये हैं- ‘राँड़ तो रँडापा काट ले पर रँडवे काटने दें तब ना ?’, पर अब बात उल्टी हो गयी है, ये राँड़ अब उसे रँडवे को रँडवापा नहीं काटने देगी… देख लेना।”
बेटा- “सही कह रहे हो आप, एकदम खेली-खायी हुई थी। मैं तो बीच में कहने वाला था कि भगाओ साली को काम से, किसी दिन कोई न कोई कांड कर डालेगी। बहुत बदकार औरत थी, उसकी आँखों में हमेशा हवस के साँप डोलते रहते थे। अब आये तो घर में मत घुसने देना उस फ़ाहिशा को, आख़िर ये शरीफ़ों का घर है। तुम भी बिना सोचे-समझे किसी को भी काम पर रख लेती हो। अगर इस घर के मर्द भी उसकी तरह होते तो फिर तो वह कभी नहीं निकलती इस घर से। शुक्र मनाओ कि उसकी दाल नहीं गली यहाँ। उस आदमी को भी ब्लैकमेल करके ही घुसी है उसके घर में। पहले लटके-झटके दिखाए होंगे फिर जब वह जाल में फँस गया होगा, तो ब्लैकमेल करके मालकिन बन गयी घर की। अपना घर आदमियों के कारण बचा है। हममें से कोई फिसल जाता तो आज पुलिस-थाने के चक्कर काट रहे होते।”
पोता- “तभी मैं कहूँ कि जब भी मैं नहा कर बस शॉर्ट पहन कर बाथरूम से बाहर आता हूँ, तभी क्यों आती थी वह। जैसे उसने टाइम मिला कर रखा था मेरे बाथरूम से निकलने का। उसी समय झाड़ू लगाने पहुँचती थी वहाँ, और झाड़ू लगाते समय दरवाज़ा भी उढ़का देती थी, स्लट कहीं की। पता है मुझसे कैसी-कैसी बातें करती थी ? मुझे तो शरम आ रही है अब बताने में भी। मैं तो आप लोगों को पहले ही सब कुछ बताने वाला था, पर शर्म के कारण बता नहीं पा रहा था।”
बेटा- देखा… देखा… देखा…?
दादा- (बहुत ज़्यादा ग़ुस्से में मन ही मन बुदबुदाते हुए) साली रंडी, कुतिया, छिनाल।
स्त्री उन तीनों की बातें सुन-सुन कर कम्मो को काम पर रखने के अपने फ़ैसले पर सिर झुकाए शर्मिंदा हो रही थी। स्त्री के मन में विचारों का भँवर चल रहा था और दूसरी तरफ़ तीनों पुरुष बढ़-चढ़ कर कम्मो के बारे में नये-नये दावे प्रस्तुत कर रहे थे। बातों में गालियाँ थीं, कम्मो के दुश्चरित्र होने के प्रमाण थे, अपनी सज्जनता का बखान था और बहुत कुछ था… ब्ला… ब्ला… ब्ला- ‘जब इक औरत नहीं मिल पाई उनको, नमाज़ी हो गये तब मर्द सारे’।
सलाम आख़िर है अहल-ए-अंजुमन को
ख़ुमार अब ख़त्म अपनी दास्ताँ है
उस रात तीनों मर्द लगभग बिना खाना खाये ही उठ गये। पोता उस रात अपनी मोटर साइकिल उठा कर ग़ुस्से में निकल गया। चौबीस बटा चार नंबर मकान के सामने से पूरी स्पीड में मोटर साइकिल की तेज़ आवाज़ करता हुआ गुज़रा। उस रात पोते ने पहली बार दोस्तों के साथ बियर और सिगरेट पी तथा औरतों के चरित्र पर देर रात तक दोस्तों के साथ बात करता रहा। उस रात वह अपने दोस्त के घर ही रुका। सुबह भी देर से उठा, वह भी तब, जब उसके घर से दो सूचनाएँ नहीं आ गयीं।
सूचना क्रमांक 1- पोते के प्रयास भी रंग लाये और बेटे की दुआएँ भी रंग लाईं। उस रात और उसके बाद की सुबह में एक साथ दो-दो घटनाएँ हुईं। दादा उस रात जो सोया तो सोता का सोता ही रहा। जैसी बेटे ने दुआ माँगी थी, ठीक वैसा ही हुआ। दुआ क़बूल करने वाला यह थोड़े ही देखता है कि दुआ किन्हीं ख़ास परिस्थितियों में माँगी जा रही है, उसके लिए तो दुआ का मतलब दुआ। कम्मो भले ही जा चुकी थी, मगर दुआ तो क़ायम थी, सो अंतत: पूरी भी हो गयी। दिन भर कुर्सी पर बैठ कर केवल छींकने, खाँसने, डकारने, उबासने और पादने वाला दादा घर में कम हो गया।
सूचना क्रमांक 2- पोते ने दुआ तो नहीं माँगी थी, उसने तो ‘देव, देव आलसी पुकारा’ पर विश्वास रखते हुए बाक़ायदा कर्म किये थे। उसके कर्म भी रंग लाये। उस रात ग़म-ए-कम्मो में बेटे को भी नींद नहीं आयी, इस करवट से उस करवट होता रहा और उसे सुबह-सुबह पता चला कि दादा कल की रात फ़ौत हो गया। कुछ रात के जागरण, कुछ कम्मो के विरह का असर हुआ और उस पर यह ख़बर… बेटा चक्कर खाकर बेहोश होकर गिर पड़ा। उसे तुरंत अस्पताल पहुँचाया गया। पता चला हल्का हृदयाघात है, बहत्तर घंटे तक आईसीयू में ही रखना पड़ेगा। पोते ने प्रयास ‘इस दिन’ के लिए नहीं किये थे, उसने तो ‘उस दिन’ के लिए किये थे। मगर प्रयास तो प्रयास होते हैं, अगर सच्चे मन से किये जायें तो रंग तो लाते ही हैं। ख़ैर दोनों घटनाएँ एक के बाद एक घटीं। दोनों घटनाओं के बाद स्त्री अस्पताल में अपने पति के पास रुकी और पोता घर पहुँचा दादा की मिट्टी को सुधारने।
अब तो जाते हैं बुत-कदे से ‘मीर’
फिर मिलेंगे अगर ख़ुदा लाया
कम्मो के हाथों में अभी दो दिन पहले ही मेहँदी लगी थी इसलिए धार्मिक मान्यताओं के हिसाब से उसका किसी मौत-मैयत वाले घर में जाना वर्जित था, इससे अपशगुन होता है। उस पर एक पति को वह पहले खो चुकी थी, इसलिए अपशगुनों से बहुत डरती भी थी। उसकी बहुत इच्छा हो रही थी कि वह दौड़ कर पहुँच जाये छत्तीस नंबर मकान, मगर जा नहीं पा रही थी। जब दादा चार काँधों पर सवार होकर चौबीस नंबर मकान के सामने से गुज़रा, तो कम्मो दौड़ कर खिड़की पर आ गयी। आगे-आगे पोता आग की मटकी लिये हुए चल रहा था, उसकी नज़र कम्मो पर पड़ी तो उसके चेहरे पर घृणा और क्रोध के भाव आ गये, खिड़की से नज़र हटाते हुए वह बुदबुदाया- ‘कुतिया, हरामज़ादी’, उसकी आवाज़ ‘राम नाम सत्य है’ के शोर में दब गयी, किसी को सुनाई नहीं दी। खिड़की की सलाख़ों पर सिर टिका कर कम्मो अब रो रही थी। बुदबुदाने की आवाज़ फिर से आयी- ‘साली… कुलटा’, मगर इस बार पोते के होंठ बिलकुल नहीं हिले थे… तो फिर यह कौन बोला था…? क्या दादा…?
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पंकज सुबीर- उपन्यास- ये वो सहर तो नहीं, अकाल में उत्सव, जिन्हें जुर्म-ए-इश्क़ पे नाज़ था, रूदादे-सफ़र। कहानी संग्रह- ईस्ट इंडिया कम्पनी, महुआ घटवारिन और अन्य कहानियाँ, कसाब डॉट गांधी एट यरवदा डॉट इन, चौपड़े की चुड़ैलें, होली, प्रेम, रिश्ते, हमेशा देर कर देता हूँ मैं, ज़ोया देसाई कॉटेज, ख़ैबर दर्रा। ग़ज़ल संग्रह- यही तो इश्क़ है। व्यंग्य संग्रह- बुद्धिजीवी सम्मेलन। यात्रा वृत्तांत- यायावर हैं, आवारा हैं, बंजारे हैं। जीवनीपरक पुस्तक- ज़िंदगी की किताब। लम्बी कविता- देहगाथा। कविता संग्रह- उम्मीद की तरह लौटना तुम। संपादन- नई सदी का कथा समय, विमर्श- नक़्क़ाशीदार केबिनेट, बारह चर्चित कहानियाँ, विमर्श दृष्टि- सुधा ओम ढींगरा का साहित्य, कुछ उदास कहानियाँ।
सम्मान- राजेन्द्र यादव हंस कथा-सम्मान, ज्ञानपीठ नवलेखन पुरस्कार, जे. सी. जोशी शब्द साधक जनप्रिय सम्मान, वागीश्वरी पुरस्कार, अंतर्राष्ट्रीय इन्दु शर्मा कथा सम्मान, वनमाली कथा सम्मान, शैलेश मटियानी चित्रा-कुमार पुरस्कार, अभिनव शब्द शिल्पी सम्मान, स्पंदन कृति सम्मान, आचार्य निरंजन नाथ सम्मान, स्पेनिन डॉ. सिद्धनाथ कुमार स्मृति सम्मान, शांति गया शिखर सम्मान, व्यंग्य यात्रा सम्मान, सृजन कुंज सम्मान, पूश्किन सम्मान, दुष्यंत कुमार संग्रहालय कमलेश्वर सम्मान, पृथ्वीनाथ भान साहित्य सम्मान, धर्मवीर भारती शताब्दी सम्मान, रवींद्रनाथ त्यागी स्मृति व्यंग्य यात्रा सोपान सम्मान।
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